हिंदी माध्यम नोट्स
पितृसत्ता क्या है | पितृसत्तात्मक व्यवस्था क्या है की परिभाषा किसे कहते है दोष patriarchy in hindi meaning
patriarchy in hindi meaning definition पितृसत्ता क्या है | पितृसत्तात्मक व्यवस्था क्या है की परिभाषा किसे कहते है दोष ?
पितृसत्ता और सामाजिक लिंग सोच
प) परिवार के बारे में हमारे विचार अक्सर हमारे निजी अनुभवों से उत्पन्न होते हैं। अगर हम शहरी मध्यम वर्ग या निम्न या उच्च वर्ग के हैं तो उसमें न्यूक्लीयर परिवार ही मानकीय होता है, जिसका मुखिया पुरुष रहता है। मानकीय से यहां हमारा तात्पर्य यह है कि यही पैटर्न अनुभवजन्य रूप से न सिर्फ अनेक परिवारों के लिए सही होगा बल्कि अन्य किस्म के परिवारों को इसमें विसंगति के रूप में देखा जाएगा। एक ऐसा घर-परिवार जिसकी मुखिया स्त्री हो उसे विपथन के रूप में ही देखा जाएगा।
पप) दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आदर्श या मानकीय पहलू के आधार पर ही राज्य में ऐसे नियम-कानून होंगे जो नर मुखिया वाले न्यूक्लीयर परिवार को आदर्श या मानक मानकर बनाए गए होंगे। कई महिलाएं जो घर-परिवार की मुखिया थीं उनके सामने ऐसी स्थिति आ गई कि उन्हें इस आधार पर गरीबी-उन्मूलन योजनाओं का लाभार्थी होने का अधिकार देने से मना कर दिया गया कि वे महिलाएं हैं इसलिए वे अपने घर की मुखिया नहीं हो सकतीं। यह ऐसा उदाहरण है जिसमें मानकीय वास्तविकता अनुभवजन्य वास्तविकता को किनारे धकेल देती है ।
पपप) तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धारणा को कई तरह से गलत ठहरा सकते हैं जो यह मान कर चलती है कि पुरुष मुखिया की आय ही सबसे महत्वपूर्ण कारक है। इसलिए अगर कोई महिला कमा भी रही है तो भी इससे महिला की हैसियत से स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा।
पअ) कई घरों में महिलाओं की आमदनी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और जीवन शैली को बनाए रखने के लिए नितांत आवश्यक है। इस स्थिति में महिलाओं का वैतनिक-रोजगार आंशिक रूप से उनके घरों की वर्ग स्थिति को तय करती है।
अ) पांचवी महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्नी का रोजगार पति की हैसियत को प्रभावित कर सकता है। इसमें संदेह नहीं कि महिलाएं अपवाद स्वरूप ही अपने पति से अधिक धन अर्जन कर पाती हैं, लेकिन पत्नी का धन अर्जन के लिए काम करना भी उसके पति के वर्ग को प्रभावित करने वाला एक बड़ा महत्वपूर्ण कारक हो सकता है। उदाहरण के लिए, पति एक अर्ध-दक्ष नील-पोश (ब्लूकॉलर) कर्मचारी है और पत्नी किसी गारमेंट फैक्टरी में रोजगार कर रही है। इस स्थिति में पत्नी का व्यवसाय समग्र परिवार की स्थिति का मानक बन सकता है।
अप) ऐसे कई ‘अंतः वर्गीय‘ (कॉस-क्लास) परिवार भी देखने में आते हैं जिसमें पति का कार्य पत्नी के कार्य से उच्च वर्ग की श्रेणी में होता है। इसके उलट स्थिति बहुत कम देखने में आती है। इसके परिणामों के विश्लेषण के लिए गिने-चुने ही अध्ययन हुए हैं जिसके कारण हम यह नहीं जानते कि क्या निर्णायक प्रभाव के रूप में हमेशा पुरुष के व्यवसाय को ही लेना उचित है।
अपप) ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ रही है जिनमें एकमात्र रोजी-रोटी कमाने वाली महिलाएं ही हैं।
इस उभरते रुझानों के निहितार्थों का विश्लेषण करना उपयोगी होगा। अक्सर ऐसा कहा जाता हैं कि पश्चिम में बदलते यौन प्रतिमानों और महिला स्वतंत्रता के कारण ऐसे एकल-अभिभावक घरों की संख्या बढ़ रही है, जिनकी मुखिया निर्विवाद रूप से स्त्रियां ही हैं। यह अर्द्धसत्य उनके ही नहीं बल्कि हमारे समाज में भी इससे पहले से ही परित्यक्त महिलाओं के अनेक उदाहरण रहे हैं जिनमें पहले महिलाओं को हर लिया जाता था। ऐसी ‘पतित महिलाएं‘ अक्सर घरों की मुखिया भी होती थीं। स्तरीकण के सिद्धांत में इस तरह की घटनाओं का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं रही क्योंकि इसमें यह समझने के लिए एक विश्लेषिक श्रेणी के रूप में सामाजिक-लिंग का प्रयोग कभी नहीं हुआ कि पितृसत्ता का पुनर्सजन वर्ग और परिवार व जातीयता के जरिए किस तरह से होता है।
नर मुखिया वाले मानकीय परिवार ने पुरुषों को वर्ग और परिवार दोनों के बाहर संबंध बनाने के लिए स्थान देकर अपनी शद्धता और प्रामाणिकता बनाएं रखी। मगर वहीं मध्यम वर्गीय, सवर्ण महिला अगर विवाहेतर संबंध रखती थी तो उसे अपने वर्ग और परिवार दोनों से बाहर कर दिया जाता था। इधर भारत में वर्ण-व्यवस्था का अनुलोभ-विवाह का अपना एक नियम था। इसका यह मतलब था कि एक स्त्री अपनी जाति में या उससे ऊपर की जाति में ही ब्याह कर सकती थी। वह निम्न जाति में विवाह नहीं कर सकती थी। इसलिए स्तरीकरण के एक सिद्धांत के रूप में सामाजिक-लिंग के अध्ययन में सिर्फ यही देखकर नहीं चलना होगा कि एक परिवार में महिलाओं की क्या कोई हस्ती, कोई हैसियत है जो उन्हें अपने परिवार के पुरुष मुखिया से मिली है। बल्कि इसमें यह भी देखना होगा कि पितृसत्ता किस तरह से पुरुषों और महिलाओं के लिए विभेदी तरीके से कार्य करती है। जब हम स्तरीकरण और सामाजिक-लिंग सोच पर चर्चा करते हैं तो हमें इसमें लैंगिकता के नियंत्रण से जुड़े मुद्दों, पवित्रता के प्रतिमानों, परिवार, वर्ग और जातीय प्रतिमानों/नियमों का उल्लंघन करने वाली महिलाओं पर थोपे जानी वाली सामाजिक वर्जनाओं या दंडों, पुरुष और महिला यौन आचरण के दोहरे मानदंडों को भी लेकर चलना होगा।
जातीयता और सांस्कृतिक वंचना
जैसा कि हमने जातीयता और स्तरीकरण की चर्चा करते हुए यह देखा था कि जाति या वर्ग की तरह जातीयता भी भौतिक और सांस्कृतिक वंचना निर्धारण में महत्वपूर्ण है। यही बात सामाजिक-लिंग सोच (जेंडर) के लिए भी कही जा सकती है। भारत में महिला आंदोलनों ने भूमि के अधिकार और उस तक पहुंच का मुद्दा उठाया है। महिलाएं खेतों में काम करती तो थीं लेकिन उन्हें कानून और रीति-रिवाजों ने भूमि के अधिकार से वंचित रखा। साम्यवादी चीन के शुरुआती वर्षों में महिलाओं को भूमि का अधिकार एक बहुत बड़ा मुद्दा था। वहां जब भूमि सुधार लागू हुए तो उसके फलस्वरूप भूमि-विलेखों (लैंड-डीड) का मुद्दा उठा। तब जाकर नियामकों को एहसास हुआ कि भूमि-विलेखों की इकाई यूं तो परिवार ही हो, मगर इसमें साफ-साफ यह भी दर्ज हो जाना चाहिए कि पुरुष और महिला दोनों को भूमि पर बराबर अधिकार होगा।
यह हमें परिवार और सामाजिक-लिंग सोच (जेंडर) के महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है जो स्तरीकरण के मुद्दों से जुड़ा है। जैसे सांस्कृति और भौतिक संसाधनों तक असमान पहुंच। हमारे देश में अनेक जमींदार परिवार ऐसे हैं जो अपने बेटों को तो पढ़ाएंगे लेकिन बेटियों को नहीं। इसी प्रकार कई भूमिहीन परिवार अपने बीमार बेटे को तो डॉक्टर के पास ले जाएंगे, मगर अपनी बीमार बेटी को नहीं। कई मध्यम वर्गीय परिवार अपनी बेटी को इसलिए शिक्षित अवश्य करेंगे कि जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों को घर में पढ़ा सके मगर इसलिए नहीं कि वह आजीविका कमाए। दूसरे शब्दों में, पुरुष और स्त्रियां एक वर्ग में एक ही परिवार के तो हो सकते हैं मगर भौतिक और अभौतिक संसाधनों तक पहुंच के मामले में उनका दर्जा एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न होता है।
बोध प्रश्न 2
1) राष्ट्रवाद और जातीयता के बारे में पांच पंक्तियां लिखिए ।
2) पितृसत्ता और सामाजिक लिंग (जेंडर) पर पांच पंक्तियों में एक टिप्पणी लिखिए।
बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 2
1) हमें यह कहना चाहिए कि राष्ट्रवाद अपने आप में जातीयता का ही एक रूप है। इसकी रचना एक विशेष जातीय पहचान के राज्य में संस्थायन से होती है। लेकिन यहां अंतर यह है कि जातीय समूह जब तक जरूरत न पड़े मिल-जुलकर काररवाई नहीं करते जबकि राज्य एक इकाई के रूप में काम करता है। दूसरी ओर जातीय समूहों को राज्य का दर्जा पाने के लिए अक्सर आंदोलन करना पड़ता है।
2) पितृसत्ता हमेशा पुरुषों का पक्ष लेती है और इसमें पुरुष ही सत्ता के मुखिया होते हैं। इसके फलस्वरूप राज्य भी पुरुषों का ही पक्षपोषण करता हैं । पुरुष अक्सर महिलाओं से अधिक कमाते हैं जिससे उनके आधिपत्य को और बल मिलता है। मगर जब महिला की आमदनी पुरुष से अधिक हो तो इससे पुरुष की हैसियत, उसकी स्थिति में इजाफा तो होता है मगर प्रायः महिला की हैसियत में इजाफा नहीं होता। मगर ऐसी स्थिति में जहां महिला ही एकमात्र कमाने वाली हो तो इससे पितृसत्ता के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा हो जाती है।
Recent Posts
Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic
Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…
Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)
Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…
Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise
Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…
Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th
Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…
विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features
continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…
भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC
भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…