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आंशिक उत्पादकता किसे कहते है ? partial productivity in hindi meaning factor productivity in hindi
factor productivity in hindi partial productivity in hindi meaning definition आंशिक उत्पादकता किसे कहते है ? परिभाषा क्या है ?
आंशिक और पूर्ण उपादान उत्पादकता
आंशिक उत्पादकता
एक औद्योगिक फर्म में श्रम आदान की तुलना में उत्पादन के अनुपात पर विचार कीजिए। हम उत्पादन कार्य में योजित मूल्य को निर्गत के रूप में लेते हैं और इसे कर्मचारियों की संख्या से विभाजित करते हैं। यह अनुपात हमें श्रम उत्पादकता की माप प्रदान करता है। इसी प्रकार पूँजी आदान की तुलना में निर्गत का अनुपात अर्थात् योजित मूल्य को पूँजीगत स्टॉक से विभाजित करने से हमें पूँजी उत्पादकता की माप मिलती है। उत्पादकता के इन परम्परागत मापों को आंशिक उत्पादकता के रूप में जानते हैं, क्योंकि हम एक समय में उत्पादकता के एक उपादान पर विचार करते हैं। किसी एक आदान के लिए आंशिक उत्पादकता अनुपात उस आदान के उपयोग में दक्षता के स्तर का संकेत करता है। यदि श्रमिक उत्पादकता बढ़ती है, तो हम कह सकते हैं कि वह फर्म श्रम के उपयोग में अधिक दक्ष हो गया है।
आंशिक उत्पादकता माप जैसे श्रम उत्पादकता उपयोगी हैं, किंतु इनकी अपनी सीमाएँ हैं। उस परिस्थिति में जब समय बीतने के साथ पूँजी-श्रम अनुपात (अथवा उत्पादन की पूँजी गहनता) में वृद्धि हो रही है, कर्मकारों के पास काम करने के लिए अधिक से अधिक पूँजी होगी। यह मशीन द्वार मनुष्य का प्रतिस्थापन है। उस स्थिति में, श्रम उत्पादकता में महत्त्वपूर्ण वृद्धि देखी जा सकती है। किंतु श्रम उत्पादकता में वृद्धि पूरी तरह से पूँजी द्वारा श्रम के प्रतिस्थापन के कारण है और इसलिए नहीं कि समग्र उत्पादकता अथवा फर्म की दक्षता में ‘‘शुद्ध‘‘ लाभ के कारण। यदि उपादान प्रतिस्थापन का प्रभाव अत्यधिक प्रबल है, तो श्रम उत्पादकता में, फर्म की समग्र दक्षता में कमी आने के बावजूद भी वृद्धि हो सकती है।
दूसरी बात यह है कि उपादान प्रतिस्थापन के कारण श्रम उत्पादकता और पूँजीगत उत्पादकता विपरीत दिशा में गतिमान हो सकते हैं। श्रम उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ पूँजीगत उत्पादकता में गिरावट आ सकती है। ऐसी स्थिति में, यह स्पष्ट नहीं है कि उत्पादन की समग्र दक्षता बढ़ रही है या घट रही है।
आंशिक उत्पादकता अनुपात की इन समस्याओं का समाधान पूर्ण उपादान उत्पादकता की गणना करके की जा सकती है क्योंकि यह एक साथ सभी आदानों की उत्पादकता को प्रदर्शित करता है।
बोध प्रश्न 1
1) रिक्त स्थान की पूर्ति करें:
क) औद्योगिक उत्पादकता बढ़ने से …………… (तीव्र/मंद) औद्योगिक वृद्धि होती है।
उत्पादकता वृद्धि से औद्योगिक उत्पादों की लागत ……….(बढ़ेगी/घटेगी)।
इसके परिणामस्वरूप औद्योगिक उत्पादों के लिए माँग में ………..(तीव्र/मंद) वृद्धि होगी। उत्पादकता में वृद्धि से संसाधनों का …………….. (बेहतर/खराब) उपयोग होगा।
ख) पूर्ण उपादान उत्पादकता एक साथ सभी …………………..की उत्पादकता को प्रदर्शित करता है। पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि …………………की वृद्धि-दर और ………………….. की वृद्धि-दर में अंतर है।
2) सही के लिए ‘‘हाँ‘‘ और गलत के लिए ‘‘नहीं‘‘ लिखिए:
प) विकासशील देशों में उद्योगों में उत्पादकता वृद्धि का प्रमुख स्रोत अनुसंधान
और विकास है। ( )
पप) उत्पादकता वृद्धि अन्तरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में सहायक होता
है। ( )
पपप) श्रमिक उत्पादकता और पूँजीगत उत्पादकता सदैव एक ही दिशा में गतिमान
होते हैं। ( )
पअ) यदि समग्र दक्षता अथवा पूर्ण उपादान उत्पादकता में गिरावट आ रही है तब
भी श्रमिक उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है। ( )
3) पूर्ण उपादान उत्पादकता में वृद्धि को प्रभावित करने वाले तीन कारकों को सूचीबद्ध कीजिए।
बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) क) क्रमशः तीव्र, कम, तीव्र, बेहतर।
ख) क्रमशः सभी आदानय उत्पादनय कुल आदान ।
2) प) सहीय (पप) सहीय (पपप) गलतय (पअ) सही।
3) उपभाग 19.2.2 पढें और अपने उदाहरण दें।
उद्देश्य
इस इकाई में, हम उत्पादकता की माप की अवधारणा और पद्धतियों पर चर्चा करेंगे। पूर्ण उपादान उत्पादकता (टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी) और इसके माप की अवधारणा चर्चा का मुख्य केन्द्र होगा। कुछ संबंधित अवधारणाओं जैसे उत्पादकता कार्य और तकनीकी दक्षता पर भी चर्चा की जाएगी। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:
ऽ आंशिक और पूर्ण उपादान उत्पादकता की अवधारणा को समझ सकेंगे;
ऽ पूर्ण उपादान उत्पादकता का महत्त्व समझ सकेंगे;
ऽ पूर्ण उपादान उत्पादकता की माप की पद्धतियाँ और उनकी सीमाओं को जान सकेंगे;
ऽ तकनीकी दक्षता की अवधारणा को समझ सकेंगे; और
ऽ तकनीकी दक्षता और पूर्ण उपादान उत्पादकता के बीच संबंध को जान सकेंगे।
प्रस्तावना
औद्योगिक उत्पादकता में हमारी अभिरुचि क्यों है? यह अभिरुचि मुख्यतः इसलिए भी बढ़ जाती है कि उत्पादकता में वृद्धि से औद्योगिक विकास होता है और जिसके साथ अन्तरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। किसी भी विकासशील देश के लिए इन दोनों का ही अत्यधिक महत्त्व है। इन देशों के लिए औद्योगिक विकास महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यही आर्थिक विकास के मार्ग को प्रशस्त करता है। अन्तरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे निर्यात बढ़ाने में मदद मिलती है और इससे भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार होता है।
औद्योगिक उत्पादकता के बढ़ने से तीव्र औद्योगिक विकास क्यों होता है? इसके दो कारण हैं। पहला, उत्पादकता में वृद्धि से औद्योगिक उत्पादों के लागत और मूल्य में कमी आएगी। इसके परिणामस्वरूप घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार दोनों में माँग में तेजी से वृद्धि होती है। दूसरा, औद्योगिक उत्पादकता में वृद्धि का परिणाम संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। इसलिए, उतने ही निवेश के बावजूद अधिक उत्पादन वृद्धि संभव होता है।
औद्योगिक उत्पादकता के संबंध में अनेक अध्ययन किए गए हैं। जिसके द्वारा इसके महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। कई विकसित और विकासशील देशों के लिए किए गए अध्ययन से पता चलता है कि औद्योगिक विकास में उत्पादकता वृद्धि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। वहीं विकसित देशों के लिए किए गए शोधों से पता चलता है कि औद्योगिक फर्मों के अनुसंधान और विकास प्रयास उद्योगों में उत्पादकता वृद्धि के प्रमुख स्रोत रहे हैं। औद्योगिक उत्पादकता संबंधी अधिकांश शोधों में पूर्ण उपादान उत्पादकता (टी एफ टी) अनुमानों का उपयोग किया गया है।
शोध और नीति विषयक चर्चाओं में पूर्ण उपादान उत्पादकता को जो महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है उसके मद्देनजर पूर्ण उपादान उत्पादकता की अवधारणा और उसके माप की पद्धतियों के बारे में जानना उपयोगी होगा।
सारांश
उत्पादकता वृद्धि से औद्योगिक विकास और अन्तरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता दोनों को बढ़ावा मिलता है और विकासशील देशों के लिए ये दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
श्रम की तुलना में निर्गत के अनुपात से हमें श्रम उत्पादकता के माप का पता चलता है। पूँजी आदान की तुलना में निर्गत के अनुपात से हमें पूँजी उत्पादकता का माप मिलता है। यद्यपि कि आंशिक उत्पादकता माप उपयोगी है, किंतु इसकी अपनी सीमाएँ हैं। आंशिक उत्पादकता माप से जुड़ी समस्याओं का समाधान पूर्ण उपादान उत्पादकता की गणना करके किया जा सकता है क्योंकि यह सभी आदानों को एक साथ लेकर उत्पादकता बताता है।
पूर्ण उपादान उत्पादकता की परिभाषा कुल आदान की तुलना में निर्गत के अनुपात के रूप में दी जा सकती है। अन्यथा, पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि की परिभाषा निर्गत की वृद्धि-दर और कुल आदान की वृद्धि-दर के बीच अंतर जो विभिन्न आदानों की वृद्धि-दरों का भारित संयोजन है, के रूप में की जा सकती है।
पूर्ण उपादान उत्पादकता में न सिर्फ प्रौद्योगिकीय प्रगति अपितु क्षमता के बेहतर उपयोग, श्रमिकों की बढ़ी हुई कार्यकुशलता, इत्यादि का प्रभाव भी सम्मिलित है। इसलिए यह प्रौद्योगिकीय परिवर्तन और कार्यकुशलता में परिवर्तन जिसकी सहायता से ज्ञात प्रौद्योगिकी का उत्पादन में प्रयोग किया जाता है, का सम्मिलित माप है।
पूर्ण उपादान उत्पादकता की अवधारणा का उत्पाद फलन की अवधारणा से निकट संबंध है। पूर्ण उपादान उत्पादकता में वृद्धि प्रौद्योगिकीय प्रगति के कारण दो समयों के बीच उत्पाद फलन में होने वाले परिवर्तन का द्योतक है।
पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि के माप के दो उपागम हैं: वृद्धि लेखा उपागम और अर्थमिति उपागम। वृद्धि लेखा उपागम में टी एफ पी सूचकांकों (ट्रांसलॉग सूचकांक की भाँति) का उपयोग किया जाता है। अर्थमिति उपागम में, उत्पाद फलन का अनुमान अवरोह विश्लेषण के द्वारा किया जाता है। वृद्धि लेखा विश्लेषण उपागम की कुछ अत्यन्त ही प्रतिबन्धात्मक मान्यताएँ हैं: समानुपातिक प्रतिलाभ, पूर्ण प्रतियोगिता और उत्पादन के कारक जिन्हें सीमान्त उत्पाद के बराबर महत्त्व दिया जा रहा है। उत्पाद फलन उपागम में इस उपागम की आवश्यकता नहीं होती है किंतु, इस उपागम के माध्यम से प्राप्त अनुमान बहुधा बहु-समरेखीय की समस्या द्वारा ग्रस्त होते हैं।
एक फर्म की तकनीकी दक्षता संभाव्य निर्गत की तुलना में वास्तविक निर्गत का अनुपात है, जिसमें संभाव्य निर्गत प्रदत्त प्रौद्योगिकी की सहायता से फर्म में नियोजित आदानों से उत्पादित हो सकने योग्य अधिकतम निर्गत है। पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि को प्रौद्योगिकीय प्रगति और तकनीकी कार्यकुशलता में परिवर्तन की दर के कुल जोड़ के रूप में लिखा जा सकता है।
उत्पादकता विश्लेषण में योजित मूल्य फलन का उपयोग काफी प्रचलित रहा है। किंतु योजित मूल्य फलन की गंभीर कमियाँ हैं और सकल निर्गत फलन का उपयोग करना श्रेयस्कर है क्योंकि यह श्रम और पूँजी के साथ-साथ आदान के रूप में सामग्रियों को भी समरूप महत्त्व देता है।
कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
एम.आई. नादिरि, (1970). ‘‘सम एप्रोचेज टू द थ्योरि एण्ड मीजरमेंट ऑफ टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी: ए सर्वे‘‘ जर्नल ऑफ इकनॉमिक लिटरेचर, दिसम्बर।
सी. केन्नेडी एण्ड ए.पी. थिर्लवाल, (1972). ‘‘सर्वेज इन अप्लाइड इकनॉमिक्स: टेक्निकल प्रोग्रेस‘‘ इकनॉमिक जर्नल, मार्च
जे. डब्ल्यू, केन्ड्रिक और बी.एन. वक्कारा (सम्पादित), (1980). ‘‘न्यू डेवलपमेंट्स इन प्रोडक्टिविटी मीजरमेंट एण्ड एनालिसिस‘‘, एन बी ई आर, स्टडीज इन इनकम एण्ड वेल्थ, खंड 44।
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बी.एन. गोल्डार, (1985). प्रोडक्टिविटी ग्रोथ इन इडियन इण्डस्ट्री, एलाइड पब्लिशर्स, नई दिल्ली।
आई.जे. अहलूवालिया, (1991). प्रोडक्टिविटी एण्ड ग्रोथ इन इंडियन मैन्यूफैक्चरिंग, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली।
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