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गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विशेषताएं , उपलब्धियां क्या है | non-aligned movement in hindi aims and achievements

non-aligned movement in hindi aims and achievements गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विशेषताएं , उपलब्धियां क्या है ?
गुटनिरपेक्ष आदोलन की पृष्ठभूमि (Background of Non-Aligned Movement)
इस नीति को आंदोलन के रूप में स्वीकृति मिलना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन को 1961 में भारत की पहल पर शुरू किया गया और औपचारिक रूप से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का शुभारंभ. प्रधानमंत्री नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टोटो और मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने किया।
बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष देशों के पहले सम्मेलन में पच्चीस देशों ने भाग लिया। इसकी अध्यक्षता टीटो ने की थी। किस देश को आमंत्रित करना है और किसको नहीं, इसका निर्णय सामूहिक रूप से नेहरू, नासिर और टीटों ने किया था। उन्होंने निमंत्रण भेजते समय विभिन्न देशों की विदेश नीतियों का परीक्षण भी किया था।
पहले शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाँच मानदंड निर्धारित किए गए थे। ये निम्नवत् थे-
1. संबद्ध देश गुटनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की विदेश नीति पर स्वतंत्र आचरण करता हो।
2. संबद्ध देश उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करता हो।
3. संबद्ध देश शीत युद्ध से संबंधित न हो।
4. संबद्ध देश ने किसी महाशक्ति के साथ कोई द्विपक्षीय संधि न की हो, और
5. उस देश की भूमि पर कोई भी विदेशी सैनिक अड्डा स्थापित न किया गया हो।
आरंभ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन पच्चीस देशों ने शुरू किया था। कालांतर में इसके विकास क्रम में कई परिवर्तन आए हैं। इन परिवर्तनों को गुणात्मक व संख्यात्मक दोनों ही रूपों में देखा जा सकता है। समय-समय पर इसके शिखर सम्मेलन होते हैं, जिनमें अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों पर विचार किया जाता है और यह प्रयत्न किया जाता है कि आंदोलन के सभी देश एक समान दृष्टिकोण अपनाएँ। हालाँकि यह कार्य कठिन अवश्य हो गया है, क्योंकि सदस्य देशों की संख्या बढ़ने से आम सहमति का निर्माण प्रायः जटिल होता है। फिर भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सफलता आज भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक नया आयाम जोड़ती है।

क्या गुटनिरपेक्षता का आशय तटस्थता या पृथकता से है?
(Does Non-Alignment Mean Neutrality or Separation ?)
गुटनिरपेक्षता हेतु दो प्रमुख शब्दों का प्रयोग किया जाता है। ‘तटस्थता’ (Neutrality) और ‘तटस्थतावाद’ (Neutralism)। परंतु इन दोनों ही शब्दों से गुटनिरपेक्षता की अवधारणा का सही अर्थ नहीं निकलता। वस्तुतः अवधारणा के रूप में तटस्थता शब्द का प्रयोग युद्ध के दौरान ऐसे देश के लिए किया जाता है जो लड़ाई में सम्मिलित ही न हो। इस संदर्भ में स्पेन का उदाहरण लिया जा सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध में स्पेन न तो मित्र राष्ट्रों के पक्ष में था और न ही धुरी राष्ट्रों के पक्ष में। उसने स्वेच्छा से युद्ध में भाग नहीं लिया। अतः स्पेन तटस्थ था।
ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार तटस्थता वह स्थिति है जिसमें कोई देश किसी भी युद्धरत देश का समर्थन नहीं करता है और युद्ध के दौरान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी की सहायता नहीं करता है। तटस्थ देश के आचरण का आधार अंतर्राष्ट्रीय कानून होता है।
गुटनिरपेक्षता के संदर्भ में तटस्थता का आशय स्पष्ट करना आवश्यक है। गुटनिरपेक्षता किसी ऐसे राज्य की तटस्थता नहीं है जिसकी किसी युद्ध में भागीदारी न हो। यह स्विट्जरलैंड और आस्ट्रिया की स्थिति से भी भिन्न है। शेष सभी राज्यों ने इन दोनों देशों को यह आश्वासन दिया हुआ है कि वे उन पर कभी भी आक्रमण नहीं करेंगे। परंतु विशेषज्ञों के अनुसार तटस्थता शब्द का. प्रयोग शांतिकाल में राजनयिक तौर पर अलग रहने की नीति के लिए किया जा सकता है। तटस्थता का यह अर्थ गुटनिरपेक्षता के उद्देश्यों को सुपरिभाषित करता है।
यहाँ तक तो ठीक है कि कोई तटस्थ राज्य इसलिए तटस्थ कहलाता है कि वह युद्ध मे शामिल नहीं हैं। अमेरिका 7 दिसंबर, 1941 से पूर्व द्वितीस विश्व युद्ध में तटस्थ था परन्तु जापान द्वारा पर्ल हार्बर (Pearl Harbor) पर अवाई आक्रमण के बाद वह युद्ध में शामिल हो गया। इसी स्थिति में इसे तटस्थ नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, ‘तटस्थतावाद’ का प्रयोग स्विट्जरलैंड जैसी स्थिति के लिए किया जाता है। ये शब्द विशेष रूप से उन राज्यों के लिए प्रयुक्त होते हैं जिन्होंने कभी भी किसी पर भी आक्रमण न करने की घोषणा की होती है। स्विट्जरलैंड की अपनी कोई सेना ही नहीं है और उस पर दोनों ही विश्व युद्धों में किसी ने आक्रमण भी नही किया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आॅस्ट्रिया को भी 1955 में तटस्थतावादी देशों की श्रेणी मे रखा गया।
कभी-कभी गुटनिरपेक्षता को पृथकता से भी जोड लिया जाता है। यह भ्रांत धारणा है। पृथकता का अर्थ है अन्य देशों की समस्याओं से अलग रहना। संयुक्त राज्य अमेरिका 1823 में घोषित मुनरो-सिद्धांत (Monrse Doctrine) के अनुसार अपने आप को यूरोप की समस्याओं से पूरी तरह दूर रखता था। क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध से पहले यूरोप में उसकी कोई रुचि नहीं थी। वह पृथकता के अनुसार केवल अमेरिका की समस्याओं में रुचि लेता था। इसके विपरीत गुटनिरपेक्ष देश अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पूरी रुचि लेते हैं। वे केवल इसलिए गुटनिरपेक्ष कहलाते हैं क्योंकि वे स्थायी रूप से किसी बड़ी शक्ति का दामन नहीं पकड़ते। इस प्रकार गुटनिरपेक्षता को पृथकतावाद से हटकर देखा जाना चाहिए।
गुटनिरपेक्ष देश स्वेच्छा से निर्णय करते हैं, प्रत्येक प्रश्न पर अपने विचार व्यक्त करते हैं और मतदान करते हैं। वे न तो किसी. गुट में होते हैं, और न ही सभी से पृथक होते हैं, वास्तव में गुटनिरपेक्ष देश अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं में सकारात्मक भूमिका निभाते. हैं। गुटनिरपेक्ष देश स्थायी संधियों से दूर रहने की नीति का अनुसरण करते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि गुटनिरपेक्ष देश दोनों गुटों के साथ एक समान संबंध रखते हैं। इसे न तो तटस्थता कहा जा सकता है और न ही पृथकता। गुटनिरपेक्ष देश दोनों के साथ एक जैसी दूरी बनाकर चलते हैं।

गुटनिरपेक्षता के सकारात्मक और नकारात्मक आयाम
(Positive and Negative Dimensions of Non Alignment)
किसी भी अवधारणा के दो पहलू होते हैं- सकारात्मक और नकारात्मक। गुटनिरपेक्षता भी इसका अपवाद नहीं है। सकारात्मक पक्ष का अर्थ है कि नए-राज्य (गुट निरपेक्ष देश) शीत युद्ध से बचना चाहते थे परंतु वे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से दूर नहीं रहना चाहते थे। उनके अनुसार सकारात्मक तटस्थता बड़ी शक्तियों के बीच होने वाली भयानक लड़ाइयों के बीच मध्यस्थता करने का प्रयास था। नकारात्मक दृष्टि से गुटनिरपेक्षता का अर्थ है शक्तिहीनता के कारण नए राज्यों का बड़ी शक्तियों की समस्याओं से दूर रहना। भारत इस शक्तिहीनता के विचार से सहमत नहीं है। भारत का दृढ़ विचार है कि गुटनिरपेक्षता कमजोरी नहीं है, यह तो विश्व राजनीति में स्वतंत्र भागीदारी का नाम है। इस प्रकार गुटनिरपेक्षता स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अवधारणा का नाम है। सकारात्मक गुटनिरपेक्षता का अर्थ है अपनी इच्छा से स्वतंत्र निर्णय करना, महाशक्तियों से आदेश न लेना, सैनिक गठबंधनों में न फँसना और न ही किसी बड़े देश को अपनी भूमि पर सैनिक अड्डे बनाने देना।
इसका अर्थ अंतर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्व से भागना नहीं है। यह कगार पर बैठने की नीति भी नहीं है। गुटनिरपेक्ष देश, विश्व-राजनीति में पूरी तरह भाग लेते हैं और दोनों गुटों के साथ मैत्री रखने में विश्वास रखते हैं। भारत ने गुटनिरपेक्षता के द्वारा कभी भी एक महान शक्ति बनने का प्रयास नहीं किया। गुटनिरपेक्षता एक आदर्शवादी अवधारणा न होकर बिलकुलं यथार्थवादी सिद्धांत है। गुटनिरपेक्षता स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने और विश्व शांति बनाए रखने की एक अनोखी नीति है।

भारतीय विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता की प्रस्थिति
(Status of Non-Alignment in India’s Foreign Policy)
हम सभी इस बात को जानते हैं कि भारत की नीति सकारात्मक और सक्रिय रूप से विश्व राजनीति में भाग लेने की है। यही कारण है कि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने वाला पहला देश था। भारत को गुटनिरपेक्ष नीति का अग्रद्त भी कहा जाता है। भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति केवल गुटों की राजनीति से दूर रहने की नीति है। नेहरू ने 1949 में अमरीकी कांग्रेस में बोलते हुए कहा था कि “यदि कहीं पर स्वतंत्रता संकट में पड़ेगी या न्याय का खतरा होगा या कहीं आक्रमण किया जाएगा तो हम न तो तटस्थ रह सकते हैं और न ही रहेंगे।” हमारी नीति तटस्थतावादी नहीं है, बल्कि यह ऐसी नीति है जो सक्रिय रूप से शांति स्थापित करने और उसे मजबूत आधार देने की नीति हैं। भारत ने अपने लिए एक स्वतंत्र स्थान बनाया है और अपने जैसे अन्य राज्यों के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव स्थापित करने में उसकी प्रभावी भूमिका रही है। भारत की विदेश नीति के समीक्षकों ने आरंभ में ही यह कहा था कि यह नीति लोकतंत्र के पक्ष में तटस्थता की नीति होगी। इस प्रकार से यह नीति महात्मा गाँधी के अहिंसा के विश्वास को प्रोत्साहन देती है। दृ
भारत संसार को तीसरे महायुद्ध से बचाना चाहता था। पं. नेहरू का मानना था कि यदि कोई विपत्ति आएगी तो वह समस्त संसार को प्रभावित करेगी। अतः हमारा पहला प्रयास यह होना चाहिए कि विपत्ति को आने से ही रोका जाए। भारत के इस संकल्प को दोहराते हुए कि हम शक्ति गुटों से दूर रहेंगे. नेहरू ने 1949 में कहा था कि- “यदि किसी कारण से हमें एक शक्ति गुट में शामिल होना ही पड़ता है तो शायद एक दृष्टिकोण से हम कुछ भला ही करेंगे पर मुझको इस विषय में कोई भी शंका नहीं लगती कि एक वृहत-दृष्टिकोण से ऐसा करना न केवल भारत के लिए बल्कि विश्व शांति के लिए भी हानिकारक होगा।”

भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में सम्मिलित हैं- देश का आर्थिक विकास, विदेशी मामलों में कार्य करने की स्वतंत्रता, देश की संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता को सुरक्षित रखना तथा विश्व शांति के प्रयास। भारत का यह दृढ़ विश्वास रहा है कि इन उद्देश्यों की प्राप्ति तथा विदेश नीति संबंधी निर्णय स्वतंत्रता से लेकर शक्ति गुटों से दूर रहकर ही की जा सकती है।
नेहरू की प्रतिबद्धता उदारवाद की पश्चिमी संकल्पना और लोकतंत्र के प्रति थी। परंतु उन्होंने कभी भी उन सैनिक गठबंधनों का समर्थन नहीं किया जिन्हें अमेरिका ने साम्यवाद के प्रसार को रोकने के लिए स्थापित किया था। उनके द्वारा सैनिक संधियों का विरोध जिन दो कारणों से किया गया, वे हैं- उपनिवेशवाद को नए रूप में प्रोत्साहन मिलना तथा इन सैनिक संधियों की देखादेखी दूसरे गुट में भी सैनिक संधियाँ होंगी और शस्त्रों की होड़ आरंभ होने की भी आशंका बढ़ जाएगी।
लोकतांत्रिक समाजवाद के विचार के समर्थक के रूप में नेहरू जी जाने जाते हैं। लेकिन यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने साम्यवादी राज्य को एकाधिकारवादी कहकर अस्वीकार किया था और मार्क्सवाद को घिसा-पिटा सिद्धांत बताया था। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति गुटों की राजनीति के विचार का ही विरोध किया था। इस प्रकार भारत की नीति का उद्देश्य एक तीसरा गुट बनाना नहीं था, परंतु नए स्वतंत्र हुए राज्यों को निर्णय करने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दिशा में यह एक कदम था।
जहाँ तक गुटनिरपेक्षता के संबंध में भारत के दृष्टिकोण की बात है तो भारत ने गुटनिरपेक्षता को शांति की नीति के रूप में अपनाया था, झगड़ा बढ़ाने के लिए नहीं। भारत की गुटनिरपेक्षता का संबंध, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में स्थिति को अपरिवर्तनीय रखने से नहीं था बल्कि यह तो देश और विश्व के हित में परिवर्तन लाने, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, जातिभेद और नव उपनिवेशवाद का विरोध करने की नीति है। गुटनिरपेक्षता के माध्यम से भारत इन बुराइयों से संपूर्ण विश्व को मुक्त कराना चाहता था, साथ ही साथ वह महाशक्तियों की श्रेष्ठता का दबाव कम करके सभी राष्ट्रों में समानता की भावना भी गुटनिरपेक्षता के माध्यम से लाना चाहता था।
गुटनिरपेक्षता बल प्रयोग को अस्वीकार करके अंतर्राष्ट्रीय विवादों में शांतिपूर्ण निरूशस्त्रीकरण की सिफारिश करती है और सभी देशों के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्रोत्साहन देती है। यह सभी परमाणु अस्त्रों के विनाश और पूर्ण निःशस्त्रीकरण की सिफारिश करती है। भारत की विदेश नीति समस्त मानवता की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान पर जोर देती है। भारत अन्याय और असंतुलन पर आधारित वर्तमान अर्थव्यवस्था को समाप्त करके एक ‘नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ (New International Economic Order) की स्थापना का पूरी तरह से समर्थन करता है। गुटनिरपेक्षता को संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्तिशाली बनाने की नीति के रूप में भी देखा जा सकता है।

गुटनिरपेक्षता का विकल्प चुनने का तर्काधार
(Logic behind Choosing the Option of Non-Alignment)
गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के पीछे भारत का दृष्टिकोण मुख्यतः निर्णय लेने की स्वतंत्रता की रक्षा करना था। इसके अतिरिक्त आर्थिक विकास पर भारत बहुत अधिक बल दे रहा था। आरंभ में गुटनिरपेक्षता को नीति अपनाने के प्रमुख कारण थे-
पण् ऐसा माना जा रहा था कि अमेरिका या सोवियत गुट के साथ भारत की संलग्नता अतर्राष्ट्रीय तनाव को बढ़ा सकती थी तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति की संभावनाएँ क्षीण हो सकता था इसीलिए नेहरू ने कहा था कि शक्ति गुटों से विपत्तियाँ आएंगी और भारत इनसे दूर रहना चाहता है। भारत के भौगोलिक, सामाजिक महत्व के कारण और सभ्यता के विकास में उसके योगदान के आधार पर अंतराष्ट्रीय तनाव कम करने व शांति को प्रोत्साहन देने में इसे महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी।
पपण् दोनों गुटों के बीच एक सेतु के कार्य की सकारात्मक भूमिका निभाने वाला भारत न तो एक बड़ी शक्ति था और न ही बिल्कुल मेहत्वहीन राष्ट्र था। भार के पास एक महान शक्ति बनने की संभावना अवश्य थी। भारत की वर्तमान आवश्यकताओं और उसकी राष्ट्रीय पहचान को दुष्टिगत रखते हुए गुटनिरपेक्षता की नीति आवश्यक थी। भविष्य में भारत को एक महान शक्ति के रूप् में उभारने में भी गुटनिरपेक्षता काफी सहायक सिद्ध हो सकती थी।
पपपण् भारत पश्चिमी गुट में इसलिए भी सम्मिलित नहीं हो सकता था, क्योंकि इस गुट के अनेक देश उपनिवेश वादी शक्ति थे या रहे चुके थे। कुछ देश अब भी जातीय भेद का व्यवहार कर रहे थे। दूसरी ओर भारत सोवियत गुट में इसलिए नहीं हो सकता था क्योंकि भारत को साम्यवादी विचाराधारा कभी स्वीकार्य नहीं थी। अततः भारत ने भावनात्मक और वैचारिक दोनों ही कारणों से किसी शक्तिगुट में न शामिल होने का निर्णय किया।
पअण् किसी भी अन्य प्रभुसता संपन्न देश की भांति भारत में अपने निर्णय स्वयं करना चाहता था।
अण् अपनी आर्थिक विकास की परियोजनाओं हेतु भारत को विदेशी पूँजी की तुरंत आवश्यकता थी। राजनीतिक तौर पर किसी एक विशेष देश से सहायता उचित नहीं थी। फलतः कठिन शर्तें न जुड़ी होने की स्थिति में देश के लिए लाभदायक तो यह था कि हमें जहाँ से भी सहायता मिले, उसे स्वीकार करें।
अपण् सत्य और अच्छाई किसी एक धर्म या दर्शन के एकाधिकार में नहीं होते। इस भावना का प्रबल पक्षधर भारत सहनशीलता में विश्वास करता है। उस समय की स्थिति में सहनशीलता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही देश के हित में थे। भारत मित्रता सबके साथ शत्रुता किसी से नहीं के आदर्श पर चलना चाहता था।
अपपण् देश की आंतरिक स्थिति भी गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के लिए बहुत हद तक उत्तरदायी थी। यदि भारत किसी भी गुट के साथ संलग्न होने का निर्णय करता तो. उससे राजनीतिक विवाद तो उत्पन्न होते ही साथ ही साथ अस्थिरता की भी आशंका बढ़ती।
यह स्पष्ट है कि भारत की जनता ने आमतौर पर पं. नेहरू की गुटनिरपेक्षता की नीति का समर्थन किया। अन्य अनेक देशों ने भी इस नीति को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल पाया और इसके प्रसार में भरपूर सहयोग दिया। यह नीति लगभग पचास वर्षों तक अबाध गति से सफलतापूर्वक चली।

एकघ्रुवीय विश्व में गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता
(Relevance of Non-Alignment in Unipolar World)
पिछले एक दशक से अंतर्राष्ट्रीय पहल पर घटित होने वाली घटनाओं पर यदि दृष्टि डाली जाए तो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के पंडित भी यह समझ पाने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं कि नई विश्व व्यवस्था का क्या रूप होगा। शीतयुद्ध 1990 से पूर्व ही समाप्त हो गया था। गोर्बाचेव के सोवियत साम्यवादी पार्टी के महासचिव बनने के साथ ही इसकी समाप्ति की प्रक्रिया 1985 में ही शुरू हो गई थी। उन्होंने देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था में अनेक सुधार आरंभ किए परंतु उन सुधारों का परिणाम कुछ विचित्र ही हुआ।
गोर्बाचेव और अमेरिकी राष्ट्रपति रोगन ने विदेशी संबंधों की दिशा में बातचीत का जो सिलसिला शुरू किया वह संसार को शीतयुद्ध की समाप्ति की ओर ले गया। ये दोनों नेता चार वर्ष के अंतराल में (1985-1988) चार बार मिले और अंततः 1987 में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि के द्वारा मध्यम-दूरी और कम-दूरी के परमाणु प्रक्षेपास्त्रों के उन्मूलन का निर्णय लिया गया। इस संधि का अनुमोदन 1988 में हुआ, जिसने अगले वर्ष शीतयुद्ध के तनाव को समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
बर्लिन की दीवार, जिसने बर्लिन नगर को दो भागों में विभाजित किया हुआ था, वह भी नवम्बर 1989 में गिरा दी गई। अगले वर्ष साम्यवादी पूर्वी जर्मनी और पूँजीवादी पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण हो गया। इस नई जर्मनी ने खुले बाजार पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था को अपनाया। साथ ही पूर्वी यूरोप के अनेक साम्यवादी देशों ने साम्यवादी व्यवस्था को तिलांजलि दे दी। अंततः दिसम्बर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। ये देश (पंद्रह गणराज्य) संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बने और रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी मान लिया गया।
रूस को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भी मिल गई। अब संसार में केवल एक महाशक्ति अमेरिका ही शेष रह गया। काफी समय तक ऐसा प्रतीत होता रहा कि संसार एकधुव्रीय हो गया है, परंतु जिस गति से चीन और भारत तेजी से आर्थिक शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं उससे यह आशा की जा सकती है कि वे अमेरिका को कभी भी चुनौती दे सकते हैं। संसार शायद बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता अब क्या रह गयी है?, यह प्रश्न नई विश्व व्यवस्था के संदर्भ में विचारणीय है। गुटनिरपेक्षता का जन्म शीतयुद्ध के कारण मानने वाले विचारकों की दृष्टि में शीतयुद्ध के समाप्त होने के बाद इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। ऐसा कहा जाता था कि गुटनिरपेक्षता दो शक्ति गुटों की विशेष परिस्थिति का विशेष उत्तर थी। जिस समय संसार के अधिकतर देश दो में से किसी एक गुट में शामिल हो रहे थे, उस समय भारत को यह निर्णय कि वह तीसरा मार्ग चुनेगा, साहस और प्रगति का प्रतीक था। प्रथमतः नेहरू और भारत की विदेश नीति के अनेक समर्थकों के अनुसार गुटनिरपेक्षता व्यवहार में स्वतंत्र रूप से, विदेश संबंधों के निर्णय करने की नीति थी। इसका अर्थ हुआ कि भारत अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से नई दिल्ली में बनाता था। वह इस विषय पर लंदन, वाशिंगटन या मास्को से संचालित नहीं होता था। दूसरे, इस नीति ने कहीं से भी आर्थिक विकास के लिए सहायता लेने की संभावनाएँ खुली रखी थी। तीसरे गुटनिरपेक्षता का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना था। निष्कर्षतः जहाँ तक गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता की बात हैं तो यह कहीं से भी कम नहीं हुई है। जब उद्देश्य ज्यों के त्यों अस्तित्वमान हैं तो उपयोगिता परतो प्रश्नचिह्न लगाया ही नहीं जा सकता।
जून 1991 में जब पी. वी. नरसिंह राव ने प्रधानमंत्री का पद सँभाला। तब तक सोवियत संघ का विघटन नहीं हुआ था, पर शीतयुद्ध समाप्त हो चुका था। प्रधानमंत्री राव ने इस बात को दोहराया कि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति पर पहले की तरह चलता रहेगा। टोकियो में 1992 में नरसिंह राव ने एक भाषण में स्पष्ट किया कि- “गुटनिरपेक्षता की विदेश नीति पर चलना आज पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। गुटनिरपेक्षता का मूल आधार राष्ट्रों की स्वतंत्रता और उनके विकास का अधिकार है। चाहे गुटों की स्थिति कुछ भी क्यों न हो, चाहे किसी समय एक गुट हो या अनेक, गुटनिरपेक्ष देशों की यह इच्छा है कि वे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें और उसी के आधार पर किसी अन्य देश के साथ जुड़े बिना स्वयं अपने निर्णय कर सकें।” उन्होंने यह जोर देकर कहा था कि अब किसी भी देश के प्रभुत्व का समय नहीं रह गया है। विश्व एकध्रुवीय, द्विध्रुवीय या बहुध्रुवीय कैसा भी हो, छोटे और कमजोर देशों की विदेश नीति के विकल्प के रूप में गुटनिरपेक्षता सदा ही वैध और प्रासंगिक रहेगी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन आज भी उतना ही उपयोगी है, जितना 1960 में था। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम आज भी बड़ी शक्तियों के प्रभुत्व का शिकार हैं। इन्द्र कुमार गुजराल ने भी विदेश मंत्री के रूप में, 1996 में गुटनिरपेक्षता की नीति में भारत के विश्वास की संपुष्टि की थी। इस प्रकार गुटनिरपेक्षता की उपयोगिता व अस्तित्व पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाए जा सकते क्योंकि यह केवल शीतयुद्ध तक केंद्रित नहीं था बल्कि यह बहुउद्देश्यीय था।
राजनीतिक सिद्धांत के रूप में गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता कम हुई है क्योंकि प्रत्येक देश स्वतंत्र रूप से विदेश नीति का निर्धारण कर रहा है और शीतयुद्ध भी समाप्त हो चुका है। उदाहरण के लिए 1996 में निःशस्त्रीकरण सम्मेलन में जिस तरह भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि (Comprehensive Nuclear Test Ban Treaty – CTBT) का विरोध करके निषेधाधिकार का प्रयोग किया और फिर महासभा में भी उसके विरुद्ध मतदान किया, उससे यह स्पष्ट है कि कोई गुटनिरपेक्ष देश चाहे तो किसी भी प्रश्न को ही गुट निरपेक्ष की श्रेणी में रखा जा सकता है, से निर्णय लेकर कार्य कर सकता है। अनेक दबावों के बावजूद भारत ने व्यापक परीक्षण निषेध संधि (Comprehensive Nuclear Test Ban Treaty – CTBT) पर हस्ताक्षर नहीं किए। परंतु आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन के लिए गुटनिरपेक्षता आज भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी अपने जन्म के समय थी।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विश्लेषणात्मक अध्ययन
(Analytical Study of Non-Alignment Movement)
अपने हितों के अनुसार जहाँ तक संभव हो विदेशी प्रभाव के बिना निर्णय करने की स्वतंत्रता, इसमें विदेश और रक्षा नीतियों के संचालन की स्वतंत्रता भी निहित है। कुछ प्रश्नों जैसे- उपनिवेशवाद का उन्मूलन, साम्राज्यवाद का विरोध, जातिभेद के विरूद्ध संघर्ष और फिलिस्तीन का प्रश्न ने गुटनिरपेक्ष देशों को एक आंदोलन के मंच पर एकत्र किया था।
वास्तव में शीतयुद्ध के दौरान भी इन प्रश्नों पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भूमिका बहुत सीमित थी क्योंकि आंदोलन के मंच पर तो संपूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित किया जाता था और सामान्य राजनीतिक एवं नैतिक समर्थन दिया जाता था ताकि समस्याओं का निवारण हो सके। स्वयं गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने किसी समस्या का उपचार नहीं किया। इस प्रकार प्रथम तीन मुद्दे अब महत्वहीन हो गए हैं। आज फिलिस्तीन की समस्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन को बाहर सुलझायी जा रही है।
शीतयुद्ध के बाद विश्व की सुरक्षा के प्रश्न अब उत्तने गंभीर नहीं रह गए है, जितने 1989 तक था इसलिए गुटनिरपेक्ष आदोलन को चाहिए कि अब वह समकालीन विषयों के समाधान पर जोर दे। संसार में हिंसा आतंकवाद, आर्थिक असमानताएँ, पारिस्थितिकीय मुद्दे और मानवाधिकार आज की समस्याएँ हैं। दूसरी ओर, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के कई उद्देश्यों की तो आज क्षेत्रीय संगठनों ने अपना लिया है। तीसरी दुनिया के देशों में जो तकनीकी और आर्थिक परिवर्तन हुए हैं, वे एक जैसे नहीं हैं। परिणामस्वरूप गुटनिरपेक्ष देशों में

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