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एन. लहमान का सामाजिक व्यवस्था सिद्धांत क्या है niklas luhmann’s system theory in hindi theory
niklas luhmann’s system theory in hindi theory निकलस लहमान का सामाजिक व्यवस्था सिद्धांत क्या है ?
एन. लहमान का सामाजिक व्यवस्था सिद्धांत
अभी कुछ समय पहले, एन. लहमान ने समाज विज्ञान की बुनियादी समस्या को समझने के लिए सामाजिक व्यवस्था के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। उन्होंने सामाजिक स्तरीकरण की मौजूदा व्याख्याओं के दायरे से निकलकर विश्लेषण की दृष्टि से एक संश्लेषित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। लहमान के अनुसार समाज के समाजशास्त्रीय सिद्धांत में व्यवस्थाओं या प्रणालियों के सामान्य सिद्धांत में क्रमिक विकास के सामान्य सिद्धांत का समावेश होना चाहिए, जिसमें इन सभी को परस्पर निर्भर माना जाए। इसी प्रकार समाज के सामान्य सिद्धांत को स्थिरता-परिवर्तन, संरचना-प्रक्रिया और मतैक्य-द्वंद्व के द्विभाजन से परे जाना चाहिए। इसी प्रकार द्वंद्व के सिद्धांत को मतैक्य सिद्धांत भी प्रदान करना चाहिए और प्रक्रिया के सिद्धांत को सामाजिक संरचना की भी व्याख्या करनी चाहिए।
बॉक्स 8.01
सामाजिक स्तरीकरण या सामाजिक असमानता पर जो भी साहित्य मौजूद है वह ज्यादातर इसे नैतिकता के परिप्रेक्ष्य से देखता है। यानी यह उसे ‘अच्छा‘ या ‘बुरा‘ रूप में लेता है। मार्क्सवादी विद्वान और द्वंद्ववादी सिद्धांतकार इसे प्रभुत्व और शोषण के रूप में लेते हैं और इसलिए इसे अनिवार्य रूप से बुरा कहते हैं। उधर, प्रकार्यवादी सिद्धांत समाज में काम कर रही स्तरीकरण प्रणाली जिन सामाजिक जरूरतों और अपेक्षाओं की पूर्ति करती है, उनकी बात करते हुए उसे सही ठहराता है। मगर लहमान सामाजिक स्तरीकरण को क्रमिक विकास के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।
लहमान का तर्क है कि सिर्फ पराधीनता-प्रभुत्व/शोषण के मुद्दे पर ही केन्द्रित रहना या फिर समाज के लिए यह एकीकरण का जो कार्य करता है उसके आधार पर इसे उचित ठहराना, दोनों ही भ्रामक होगा। शुरुआत में स्तरीकरण समाज के आकार और जटिलता में वृद्धि का परिणाम था। समाज के आकार और उसकी परिभाषा में और वृद्धि होने से समाज के सभी सदस्यों के लिए निजी स्तर पर परस्पर प्रभावी क्रिया असंभव हो गई। “सामाजिक संप्रेषण‘‘ के लिए ‘‘वरणात्मक तीव्रकों‘‘ (सेलेक्टिव इंटेंसीफायर) की जरूरत हुई। इस का समाधान स्तरीकरण ने निकाला। इसने समाज को असमान उप-व्यवस्थाओं में बांटा। इसके फलस्वरूप सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक परिवेश के साथ इसकी परस्पर प्रभावी क्रिया के स्तर पर तो असमानता एक मानक बन गई। मगर उप-समह के अंदर समानता एक निर्देशक सिद्धांत. एक मानक बन गई, जो एक सामाजिक स्तर विशेष के सदस्यों के बीच संप्रेषण और सामाजिक परस्पर प्रभावी क्रिया या व्यवहार को संचालित करने लगी।
इस प्रकार शुरुआत में विभेदन की जो प्रक्रिया समाज के आकार और जटिलता में वृद्धि से आरंभ होती है, उसी से समाज में खंडीय विभाजन भी होता है। खंडीय विभाजन का एक चिर-परिचित उदाहरण वर्ण था है। इस चरण पर विभेदन की भूमिका परिवार के स्तर पर होती है और प्रत्येक खंड एक संवृत्त या बंद सामाजिक स्तर होता है। मगर विभेदन की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती है उसकी जगह स्तरीकरण की वर्ग जैसी खुली व्यवस्था ले लेती है, “प्रकार्यात्मक विभेदन के प्रभाव जिसकी निरंतर पुनरुत्पत्ति करते हैं।‘‘
सामाजिक स्तरीकरण की अलग-अलग व्याख्याएं
सामाजिक असमानता या स्तरीकरण एक विश्वव्यापी वास्तविकता है। सभी समकालीन समाजों में संपत्ति, प्रतिष्ठा और सत्ताधिकार के मामले में असमानताएं किसी न किसी सीमा तक अवश्य पाई जाती हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि असमानताएं प्राचीन समाजों की भी विशिष्टता रही हैं। असमानताएं सामाजिक दृष्टि से एक निश्चित पैटर्न में बंधी होती हैं और उन्हें समाज से कछ वैधता प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में, एक समूह के कानून और मानदंड उसमें विद्यमान असमानता की व्यवस्था को संचालित करते हैं। यही कारण है कि सामाजिक स्तरीकरण समाजशास्त्रियों और अन्य समाज विज्ञानियों के लिए एक ज्वलंत प्रश्न रहा है। उन्होंने विभिन्न समाजों में विद्यमान असमानता के ढांचों और प्रचलनों का गंभीर विश्लेषण वर्णन करने के साथ-साथ इसकी व्याख्या करने या सिद्धांतों की स्थापना करने क किया है।
समाजशास्त्रियों और अन्य समाज-विज्ञानियों के अलावा सामाजिक असमानता साधारण चिंतक, दार्शनिकों और धर्मगुरुओं के लिए भी चिरकाल से चिंतन का विषय रही है। जहां एक ओर हिन्दू धर्म विभिन्न जाति समूहों में व्याप्त असमानताओं को उचित ठहराता है, तो वहीं धार्मिक दर्शनों में असमानता के बर्ताव से दूर रहने की शिक्षा दी गई है और अपने धर्मावलंबियों से सभी मनुष्यों के साथ समानता का व्यवहार करने का आह्वान किया गया है। इसी प्रकार पश्चिमी चिंतकों और दार्शनिकों में इस विषय को लेकर मतभेद रहे हैं। मनुष्यों से अलग-अलग बर्ताव करना और उन्हें असमान पारितोषिक देना क्या उचित और न्यायसंगत है? यह प्रश्न बहस का मुद्दा रहा है। इस विषय पर हम दो भिन्न दृष्टिकोणों को पहचान सकते हैं। कुछ लोग रूढ़िवादी या पुरातनपंथी मत रखते हैं तो अन्य दार्शनिकों ने असमानता की मौजूदा व्यवस्थाओं की मीमांसा विकसित कर आमूल परिवर्तनकारी विकल्प सुझाए हैं।
यूरोप के पुरातनपंथी चिंतकों ने यह तर्क देने का प्रयास किया कि चूंकि सामाजिक असमानताएं हर जगह विद्यमान हैं इसलिए वे प्राकृतिक और अपरिहार्य हैं। इसे दूसरी तरह से कहें तो उन्होंने अलग-अलग आधार पर असमानताओं को सही ठहराया। एडम स्मिथ जैसे आधुनिक, पश्चिमी जगत के अग्रणी उदार दार्शनिक और आधुनिक अर्थशास्त्र के संस्थापक ने मुक्त बाजार व्यवस्था की पैरवी करते हुए सामाजिक असमानताओं को उसके लिए सही ठहराया। उनका कहना था कि बाजार में व्यक्ति अपने-अपने निजी हितों को किसी राजनीतिक प्रभुसत्ता के हस्तक्षेप या वितरण के नैतिक सिद्धांत के बिना ही साधते हैं जिसमें यह उनकी क्षमताओं की परीक्षा लेता है और उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें अलग-अलग तरीके से पुरस्कृत करता है।
इसी प्रकार जो विद्वान डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत से अभिभूत थे उन्होंने भी मनुष्य के बीच व्याप्त असमानताओं को सही ठहराया। सामाजिक डार्विनवादियों ने तर्क दिया कि व्यक्तियों की भी पादप और जंतुओं की प्रजातियों की तरह छंटाई और चयन होता है। चयन की इसी प्रक्रिया के जरिए गुणवान व्यक्तियों को समाज में महत्व और प्रतिष्ठा वाले पदों पर बिठाया गया जबकि साधारण लोगों से श्रमजीवी जनसमूह या वर्गों का निर्माण हुआ। जैसा कि डब्लू.जी. समर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक फोकवेज में तर्क दिया है, “वर्ग आधारित विषमताएं अनियवार्यतः मनुष्य की सामाजिक उपयोगिता का पैमाना था, जो श्वयं में मूलतः उसकी नैसर्गिक योग्यता को मापने का पैमाना था।‘‘ इस रूढ़िवादी सिद्धांत के एक अन्य पैरोकार इटली के प्रसिद्ध विद्वान गाएत्नो मोस्का थे। इनका भी यही मत था कि विषमताएं मानव जीवन की एक अपरिहार्य वास्तविकता हैं। उनका कहना था कि चूंकि मानव समाज राजनीतिक संगठन के बिना काम नहीं कर सकता था, इसलिए इन संगठनों को शक्ति-सत्ताधिकार में विषमताओं को जन्म देना ही था।
मगर वहीं आधुनिक पश्चिम दर्शन में आमूल परिवर्तनवादी चिंतन की भी एक लंबी परंपरा रही है। जिसने रूढ़िवादी मत के खिलाफ अपने तर्क रखे हैं। आमूल परिवर्तनवादी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि मनुष्यों के साथ असमान रूप से व्यवहार यानी उनके साथ भेदभाव बरतना नैतिक दृष्टि से गलत है। इनका यह तर्क भी है कि एक ऐसे समाज का निर्माण करना संभव है जिसमें सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार हो और उन्हें समान अधिकार मिलें। लॉक और रुसो जैसे दार्शनिकों ने बड़े जोरदार ढंग से तर्क रखा कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सभी मनुष्यों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। आधुनिक यूरोप के सबसे सिद्ध दार्शनिकों में मार्क्स और एंजेल्स की रचनाओं में ही हमें रूढ़िवादी दृष्टिकोण की सबसे व्यवस्थित और सुविकसित मीमांसा मिलती है। पूंजीवादी विकास की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का गहराई से विश्लेषण करते हुए उन्होंने रूढ़िवादी या “उदार बुर्जुआ‘‘ दृष्टिकोण के जवाब में एक आमूल परिवर्तनवादी प्रतिस्थापना (एंटी-थीसिस) प्रस्तुत की जिसे हम समाजवादी सिद्धांत के नाम से जानते हैं।
सामाजिक स्तरीकरण का समकालीन समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य
जैसा कि हमने ऊपर कहा है, आधुनिक यूरोप के कालजयी दार्शनिकों ने जिस तरह से सामाजिक असमानता की व्याख्या की है और सामाजिक स्तरीकरण के प्रश्न से समकालीन समाजशास्त्रीय सिद्धांत जिस तरह से जूझ रहे हैं उसमें हमें एक रोचक समानता नजर आती है। इस विषय में दो सबसे प्रभावी परिप्रेक्ष्य हैं प्रकार्यवादी सिद्धांत और द्वंद्ववादी सिद्धांत । ये दोनों परिप्रेक्ष्य ऊपर बताए गए रूढ़िवादी और आमूल परिवर्तनवादी दृष्टिकोणों से काफी समानता रखते हैं। ये दोनों परिप्रेक्ष्य इस विषय पर एक मानकीय दृष्टिकोण से शुरुआत करते हैं। प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य या मतैक्य सिद्धांत सामाजिक विषमता की अपरिहार्यता और सामाजिक व्यवस्था के लिए इसके सकारात्मक कार्य पर जोर देता है। दूसरी ओर, द्वंद्ववादी सिद्धांत इसे उन हितों के रूप में देखता है जिन्हें एक विशेष समाज में विद्यमान असमानता के ढांचे में कुछ खास व्यक्तिय और समूह दूसरे की कीमत पर साधते हैं। इसीलिए वे इसकी अवैधता और नकारात्मक पहलू को उठाते हैं।
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