नवपाषाण युग की प्रमुख विशेषताएं बताइए , प्रथम खाद्य उत्पादक एवं पशुपालक neolithic age in hindi

By   March 23, 2022
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neolithic age in hindi नवपाषाण युग की प्रमुख विशेषताएं बताइए , प्रथम खाद्य उत्पादक एवं पशुपालक ?

नवपाषाण युग : प्रथम खाद्य उत्पादक एवं पशुपालक

विश्वस्तरीय संदर्भ में नवपाषाण युग (नियोलिथिक) 9000 ई० पू० से आरंभ होता है। भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण युग की एक ऐसी बस्ती मिली है जिसका समय लगभग 7000 ई० पू० बताया जाता है। यह पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में अवस्थित मेहरगढ़ में है। मेहरगढ़ बलूचिस्तान के ‘ब्रेड बास्केट‘ नाम से प्रसिद्ध कोची मैदान में बोलन नदी के तट पर अवस्थित था। यहाँ के प्राचीनतम निवासी पशुपालन करते थे और अनाज उपजाते थे। लेकिन 5550 ई० पू० के लगभग बाढ़ों के कारण वे तबाह हो गए। लगभग 5000 ई० पू० में पत्थर और हड्डी दोनों के बने औज़ारों की सहायता से कृषि और अन्य गतिविधियाँ फिर से शुरू की गईं। इस क्षेत्र के नवपाषाणयुगीन लोग शुरू से ही गेहूँ और जौ उपजाते थे। वे प्रारंभिक चरण में गाय, भेड़ और बकरी पालते थे। आरंभ में बकरियों की संख्या ज्यादा रही, लेकिन अंततः गायों की संख्या बकरियों और भेड़ों दोनों से अधिक हो गई। इससे अवश्य ही कृषि को लाभ पहुँचा होगा। अनाज अच्छी मात्रा में उपजाए जाते थे और अन्नागारों में रखे जाते थे। अधिकतर अन्नागार कच्ची ईंटों से, जिनसे आवासीय संरचनाएँ बनाई जाती थीं, बनाए जाते थे। कच्ची ईंटों की अनेक संरचनाएँ, जिनमें खाने बने हैं, अन्नागार मालूम पड़ती हैं। 4500-3500 ई० पू० के काल में कोची मैदानी क्षेत्र से सिंधु नदी के मैदानी क्षेत्र तक कृषि का पर्याप्त विस्तार हुआ। 5000 ई० पू० तक लोग चाक से मृद्भांड नहीं बनाते थे, लेकिन 4500 ई० पू० के बाद कुम्हार के चाक की जानकारी हो गई। मिट्टी के बरतनों की संख्या तेजी से बढ़ी और उन पर चित्रकारी होने लगी। सिंधु की सहायक नदी हकरा की सूखी घाटी में 47 उत्तर नवपाषाणकालीन बस्तियाँ मिली हैं। स्पष्टतः इनसे हड़प्पा संस्कृति के उद्भव का मार्ग प्रशस्त हुआ।
विंध्य पर्वत के उत्तरी पृष्ठों पर पाए गए कुछ नवपाषाण स्थलों को 5000 ई० पू० तक पुराना बताया जाता है। किंतु सामान्यतया दक्षिण भारत में पाई गई नवापाषाण बस्तियाँ 2500 ई० पू० से अधिक पुरानी नहीं है; भारत के कुछ दक्षिणी और पूर्वी भागों में ऐसे स्थल महज 1000 ई० पू० के हैं।
इस युग के लोग पालिशदार पत्थर के औज़ारों और हथियारों का प्रयोग करते थे। व खास तौर से पत्थर की कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल किया करते थे। ये कुल्हाड़ियाँ औज़ार से लोग कई तरह के काम लेते थे तथा पौराणिक कथाओं में परशुराम तो कुल्हाड़ी से लड़ने वाले महान योद्धा हो गए हैं।
नवपाषाण युग के निवासियों द्वारा व्यवहृत कुल्हाड़ियों के आधार पर हम उनकी बस्तियों के तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्र देखते हैं-उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी। उत्तर-पश्चिमी समूह के नवपाषाण औज़ारों में वक्र धार की आयताकार कुल्हाड़ियाँ हैं। उत्तर-पूर्वी समूह की कुल्हाड़ियाँ पालिशदार पत्थर की होती थीं जिनमें आयताकार दस्ता लगा रहता था और कभी-कभी कंधेदार खंतियाँ (शोलडर्ड हो) भी लगी होती थीं। दक्षिणी समूह की कुल्हाड़ियों की बगलें अंडाकार होती थीं और हत्था नुकीला रहता था।
उत्तर-पश्चिम में, कश्मीरी नवपाषाण संस्कृति की कई विशेषताएँ हैं जैसे गर्तावास (गड्ढा-घर), मृद्भांड की विविधता, पत्थर तथा हड्डी के तरह-तरह के औज़ारों का प्रयोग तथा सूक्ष्मपाषाण का पूरा अभाव। इसका महत्त्वपूर्ण स्थल है बुर्जहोम, जिसका अर्थ होता है भुर्ज वृक्ष का स्थान। यह श्रीनगर से उत्तर-पश्चिम की ओर 16 कि० मी० दूर है। वहाँ नवपाषाणयुगीन लोग एक झील के किनारे जमीन के नीचे घर बनाकर रहते थे, और शिकार और मछली पर जीते थे। लगता है, वे खेती से परिचित थे। श्रीनगर से दक्षिण-पश्चिम की ओर 41 कि० मी० दूर एक अन्य नवपाषाण स्थल है गुफकराल, जहाँ के लोग कृषि और पशुपालन का धंधा करते थे। कश्मीर में नवपाषाणयुगीन लोग न केवल पत्थर के पालिशदार औज़ारों का प्रयोग करते थे, अपितु वे हड्डी के बहुत सारे औज़ारों और हथियारों का भी प्रयोग करते थे।
भारत में चिराँद ही एक और स्थान है जहाँ हड्डी के उपकरण पाए गए हैं। यह स्थान गंगा के उत्तरी किनारे पर पटना से 40 कि० मी० पश्चिम में है। यहाँ के उपकरण हरिण सींगों के हैं और परवर्ती नवपाषाण परिवेश में 100 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्र में पाए गए हैं। यहाँ बस्ती इसलिए संभव हुई कि गंगा, सोन, गंडक और घाघरा इन चार नदियों का संगमस्थल होने के कारण यहाँ खुली ज़मीन उपलब्ध थी। पर यहाँ की नवपाषाण संस्कृति में पत्थर के औज़ारों की कमी ध्यान देने योग्य है।
बुर्ज़होम के लोग रूखड़े, धूसर मृभांडों का प्रयोग करते थे। यह रोचक बात है कि यहाँ कब्रों में पालतू कुत्ते भी अपने मालिकों के शवों के साथ दफनाए जाते थे। पालतू कुत्तों को उनके मालिकों की कब्रों में दफनाने की प्रथा भारत के अन्य किसी भी भाग में नवपाषाणयुगीन लोगों में शायद नहीं थी। बुर्ज़होम वासस्थान की सबसे पूर्व की तिथि 2700 ई० पू० है, किंतु चिराँद में मिली हड्डियों की तिथि 2000 ई० पू० से बहुत पहले नहीं रखी जा सकती है, और संभवतः यहाँ के औजार पछेती नवपाषाण काल के हैं।
नवपाषाण युग के लोगों का दूसरा समूह दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में रहता था। वे लोग आमतौर से नदी के किनारे ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर या पठारों में बसते थे। वे पत्थर की कुल्हाड़ियों का और कई तरह के प्रस्तर-फलकों का भी प्रयोग करते थे। पकी मिट्टी की मूर्तिकाओं (फिगरिन्स) से प्रकट होता है कि वे बहुत-से जानवर पालते थे। उनके पास गाय-बैल, भेड़ और बकरी होती थीं। वे सिलबट्टे का प्रयोग करते थे जिससे प्रकट होता है कि वे अनाज पैदा करना जानते थे।
तीसरा क्षेत्र जहाँ नवपाषाण युग के औज़ार मिले हैं, असम की पहाड़ियों में पड़ता है। नवपाषाण औज़ार भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर मेघालय की गारो पहाड़ियों में भी पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, हम विंध्य के उत्तर, मिर्जापुर और इलाहाबाद जिलों में भी कई नवपाषाण स्थल पाते हैं। इलाहाबाद जिले के नवपाषाण स्थलों के विषय में बतलाया गया है कि यहाँ ईसा-पूर्व पाँचवीं सहस्राब्दी में भी चावल का उत्पादन होता था, पर इसकी तिथि 1500 ई० पू० भी बतलाई जाती है।
जिन कई नवपाषाण स्थलों का या नवपाषाण परतों वाले स्थलों का उत्खनन हुआ है, उनमें प्रमुख हैं-कर्नाटक में मस्की, ब्रह्मगिरि, हल्लुर, कोडक्कल, पिक्लीहल, संगेनकल्लु, टी. नरसीपुर और तैक्कलकोट तथा तमिलनाडु में पैयमपल्ली। उतनूर आंध्र प्रदेश का महत्त्वपूर्ण नवपाषाण स्थल है। जान पड़ता है, दक्षिण भारत में नवपाषाणावस्था 2000 ई० पू० से 1000 ई० पू० तक जारी रही।
कर्नाटक के पिक्लीहल के नवपाषाणयुगीन निवासी पशुपालक थे और गाय, बैल, बकरी, भेड़, आदि पालते थे। वे मौसमी शिविरों में रहते थे। वे अपने शिविर के चारों ओर खंभे और खूटे गाड़कर मवेशी के बाड़े बनाते जिनमें वे मवेशियों को रखते और गोबर जमा करते थे। फिर वे उस सारे शिविर स्थल में आग लगाकर उसे साफ कर देते थे ताकि अगले मौसम में फिर शिविर लगाए जाएँ। पिक्लीहल में राख के ढेर और निवास स्थान दोनों मिले हैं।
नवपाषाण युग के निवासी सबसे पुराने कृषक समुदाय के थे। वे पत्थर की कुदालों (हो) और खोदने के डंडों से ज़मीन खोदते थे। डंडों में एक ओर एक से आधे किलोग्राम वजन के पत्थर के छल्ले लगे रहते थे। पत्थर के पालिशदार औजारों के अलावा वे सूक्ष्म पाषाण-फलकों का भी प्रयोग करते थे। वे मिट्टी और सरकंडों के बने गोलाकार या आयाताकार घरों में रहते थे। बताया जाता है कि गोलाकार घरों में रहनेवालों की संपत्ति पर सामुदायिक स्वामित्व होता था। जो भी हो, इतना तो निश्चित है कि नवपाषाणयगीन लोग स्थायी रूप से घर बना कर रहने लगे। ये रागी और कुल्थी पैदा करते थे।
मेहरगढ में बसने वाले नवपाषाण युग के लोग अधिक उन्नत थे। वे गेहूँ, जौ और कई उपजाते थे और कच्ची ईंटों के घरों में रहते थे।
चूँकि नवपाषाण अवस्था के कई लोग अनाजों की खेती करते थे और पशु पालते थे इसलिए उन्हें अनाज रखने के बरतनों की जरूरत हुई। फिर पकाने, खाने, और पीने के पात्रों की भी आवश्यकता हुई। अतः कुंभकारी सबसे पहले इसी अवस्था में दिखाई देती है। आरंभ में हाथ से बनाए गए मृद्भांड मिलते हैं। बाद में मिट्टी के बरतन चाक पर बनने लगे। इन बरतनों में पालिशदार काला मृद्भांड, धूसर मृद्भांड और चटाई की छाप वाले मृद्भांड शामिल हैं।
नवपाषाण युग के सेल्ट, कुल्हाड़ियाँ, बसूले, छेनी आदि औज़ार उड़ीसा और छोटानागपुर के पहाड़ी इलाकों में भी पाए गए हैं। परंतु मध्य प्रदेश के कुछ भागों में तथा उत्तरी दकन के कई प्रदेशों में नवपाषाण बस्तियों का आभास आमतौर से बहुत कम मिलता है, जिसका कारण यह है कि वहाँ ऐसे पत्थर नहीं थे जिन्हें आसानी से खराद कर चिकना किया जा सके।
9000 ई० पू० और 3000 ई० पू० के बीच की अवधि में पश्चिम एशिया में भारी तकनीकी प्रगति हुई, क्योंकि इसी अवधि में लोगों ने खेती, बुनाई, कुंभकारी, भवन-निर्माण, पशुपालन, लेखन आदि का कौशल विकसित किया। परंतु भारत में यह सारा विकास कुछ विलंब से हुआ। फिर भी, भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण युग ईसा-पूर्व छठी सहस्राब्दी के आसपास शुरू हुआ। गेहूँ, जौ आदि सहित कई महत्त्वपूर्ण फसलें इस उपमहाद्वीप में इसी अवधि से उपजाई जाने लगी और संसार के इस भाग में कई गाँव बसे। लगता है, यहाँ आकर मानव ने सभ्यता के द्वार पर पाँव रखा।
प्रस्तर युग के लोगों की एक भारी लाचारी थी। वे पूर्णतः पत्थर के ही औज़ारों और हथियारों पर आश्रित थे, इसलिए वे पहाड़ी इलाकों से दूर जाकर बस्तियाँ नहीं बना सकते थे। वे पहाड़ियों की ढलानों पर, गुफाओं में और पहाड़ियों से युक्त नदी घाटियों में ही अपना निवास बना सके। साथ ही, काफी प्रयास के बावजूद ये सिर्फ उतना ही अनाज पैदा कर सकते थे जितने से किसी तरह अपना जीवन बसर कर सकें।
-कालक्रम-
9000 ई० पू० पश्चिमी एशिया में नवपाषाण युग की शुरुआत।
7000 ई० पू० भारतीय उपमहादेश में नवपाषाणयुगीन बस्ती।
5000 ई० पू० विंध्य के उत्तर में नवपाषाणयुगीन स्थल।
62 प्रारंभिक भारत का परिचय
4500 ई० पू० कुम्हार का चाक।
और उसके बाद
2700 ई० पू० कश्मीर में नवपाषणयुगीन बस्तियों की प्राचीनतम तिथि।
2500 ई० पू० दक्षिण भारत में प्राचीनतम नवपाषाणयुगीन बस्तियाँ।
2000 ई० पू० चिराँद के नवपाषाणयुगीन अवस्था की प्राचीनतम तिथि।
1000 ई० पू० दक्षिणी और पूर्वी भारत में नवपाषाणयुगीन बस्तियों के
नवीनतम साक्ष्य।