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नागौर दरबार क्या था ? नागौर दरबार का आयोजन किसे कहते है what was nagaur court in hindi

nagaur court in hindi नागौर दरबार क्या था ? नागौर दरबार का आयोजन किसे कहते है ?

प्रश्न : नागौर दरबार ?

हल : 1570 ईस्वी में अकबर अजमेर यात्रार्थ आया। उसने मुग़ल वर्चस्व का प्रसार करने के उद्देश्य से अकाल राहत पहुँचाने के बहाने नागौर में अपना दरबार लगाया। इसी दौरान राजपूताना के अनेक नरेश यथा मारवाड़ के उदयसिंह , बीकानेर के कल्याणमल , जैसलमेर के हर राय आदि ने उसकी अधीनता स्वीकार कर वैवाहिक सम्बन्ध बनाये। दूसरी तरफ मेवाड़ और उसके राज्य और चन्द्रसेन विरोधी हो गए। मारवाड़ परतंत्रता की कड़ी में नागौर दरबार एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्धों से भी अधिक महत्व “नागौर दरबार” का है। यहाँ से राजपूत नरेशों का स्पष्ट वर्गीकरण मुग़ल विरोधी तथा मुग़ल मित्र के रूप में हो गया।
प्रश्न : राणा सांगा की राजनितिक उपलब्धियों का आलोचनात्मक विवेचना कीजिये।
उत्तर : महाराणा रायमल के तेरह कुँवर तथा दो पुत्रियाँ थी जिनमें पृथ्वीराज , जयमल , राजसिंह और संग्रामसिंह के नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन सभी राजकुमारों में पृथ्वीराज बड़ा योग्य तथा युद्ध विद्या में निपुण था और संग्रामसिंह महत्वाकांक्षी तथा साहसी था। आपसी युद्ध में पृथ्वीराज , सारंगदेव और संग्रामसिंह घायल हो गए। संग्रामसिंह अजमेर पहुँचा जहाँ कर्मचन्द पंवार ने उसे पनाह दी तथा वहाँ कुछ समय अज्ञातवास के रूप में रहकर अपनी शक्ति का संगठन करता रहा।
जब रायमल मृत्यु शैय्या पर था कि सांगा को अजमेर से आमन्त्रित कर मई 1509 ईस्वी में मेवाड़ के राज्य का स्वामी बनाया गया। अपनी सूझबूझ , कर्तव्यनिष्ठा और घटना चक्र के सहयोग से साँगा ने मेवाड़ नेतृत्व के स्वप्न को साकार किया। राणा सांगा भारतीय इतिहास में “हिंदुपत” के नाम से विख्यात है।
सांगा की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ : उसका राज्य चारों तरफ से शत्रुओं से घिरा हुआ है। इस समय दिल्ली में लोदी वंश का सुल्तान सिकन्दर , गुजरात में महमूदशाह बेगडा तथा मालवा में नासिरुद्धीन राज्य करते थे। इस स्थिति को संतुलित करने के लिए महाराणा ने अपने हितैषी कर्मचन्द पंवार को रावत की पदवी देकर सम्मानित किया। दक्षिण तथा पश्चिमी मेवाड़ की सुरक्षा के लिए उसने सिरोही और वागड़ के शासकों को अपना मित्र बनाया और ईडर के राज्य सिंहासन पर अपने प्रशंसक रायमल को बिठाया। मारवाड़ का शासक भी उसका सहयोगी बन गया।
सांगा का गुजरात से संघर्ष : जब 1514 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर ने यह सुना कि राणा सांगा ने भारमल को ईडर से निकालकर वहाँ का राज्य रायमल को सौंप दिया है। सुल्तान ने इस पराजय से क्षुब्ध होकर जहीरूल्मुल्क को ईडर के विरुद्ध भेजा लेकिन उसे सफलता न मिली। महाराणा ने अहमदनगर को जा घेरा। महाराणा की सेना बडनगर को लूटती हुई चितौड़ लौट आई। महाराणा की इस विजय से सोरठ का हाकिम मलिक अयाज भी उसके साथ हो गया। राणा की सेना में सलहदी तंवर आसपास के राजपूतों के साथ आ मिला।
राणा साँगा तथा मालवा का सम्बन्ध : जब सुल्तान महमूद ने मेदिनीराय को दण्ड देने के लिए गागरोन पर आक्रमण किया तो राणा ने महमूद को परास्त कर कैद कर लिया। इस अवसर पर सुल्तान ने अपने एक शहजादे को जामिन के तौर चितौड़ छोड़ा तथा महाराणा को रत्नजटित मुकुट और सोने की कमर पेटी भेंट की।
गागरोण का युद्ध (1519 ईस्वी) : महमूद खिलजी द्वितीय ने मेवाड़ के साथ युद्ध का अवसर समझकर 1519 ईस्वी में गागरोण पर आक्रमण कर दिया। महमूद खिलजी गागरोण के युद्ध 1519 इस्वी में पराजित हुआ तथा बंदी बना लिया गया।
दिल्ली सल्तनत तथा सांगा : महाराणा सांगा ने दिल्ली सल्तनत को निर्बल पाकर उसके अधीनस्थ वाले मेवाड़ के निकटवर्ती भागों को अपने राज्य में मिलाना आरम्भ कर दिया लेकिन जब दिल्ली सल्तनत की बागडोर इब्राहीम लोदी के हाथ में आई तो उसने 1517 ईस्वी में एक बड़ी सेना के साथ मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी। दिल्ली सुल्तान इम्ब्राहीम लोदी और राणा सांगा के मध्य दो युद्ध हुए।
खातोली का युद्ध (1517 ईस्वी) : मेवाड के महाराणा सांगा और दिल्ली के सुल्तान इम्ब्राहीम लोदी की महत्वाकांक्षाओं के फलस्वरूप दोनों के मध्य 1517 ईस्वी में खातोली (पीपल्दा तहसील , कोटा) में युद्ध हुआ। महाराणा सांगा ने इम्ब्राहीम लोदी को पराजित किया।
बारी का युद्ध (1518 ई) : दूसरे वर्ष सुल्तान ने “मियाँ हुसैन फरमुली” और “मियाँ माखन” के साथ महती सेना को राणा के विरुद्ध पहली पराजय का बदला लेने भेजा। महाराणा साँगा ने धौलपुर के पास ‘बारी’ नामक स्थान पर 1518 ईस्वी में इम्ब्राहीम लोदी के सेनानायकों को पराजित किया।

राणा सांगा तथा मुगल सम्राट बाबर

बयाना का युद्ध (16 फरवरी , 1527) : बयाना पर अधिकार करने हेतु बाबर ने अपने बहनोई मेहंदी ख्वाजा को भेजा। ख्वाजा ने बयाना जीत लिया। राणा सांगा पहले बयाना की तरफ बढ़ा। 16 फ़रवरी 1527 को भरतपुर राज्य में बयाना नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान संघर्ष हुआ। राणा सांगा ने बाबर की भेजी हुई सेना को ऐसी बुरी तरह परास्त किया कि पराजय का समाचार सुनकर मुगलों के छक्के छूट गये।
खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527) : खानवा युद्ध में कर्नल टॉड के अनुसार राणा की सेना में 7 उच्च श्रेणी के राजा , 9 राव और 104 बड़े सरदार सम्मिलित हुए। 17 मार्च 1527 ईस्वी प्रात: साढ़े नौ बजे के लगभग युद्ध आरम्भ हो गया। युद्ध के मैदान में राणा साँगा घायल हो गया जिससे युद्ध का मंजर ही बदल गया। अंतिम रूप से विजय बाबर की हुई। बाबर ने अपने हताहत शत्रुओं की खोपड़ियों को बटोरकर मीनार खड़ी की तथा वह गाजित्व प्राप्ति के श्रेय का भागी बना।
सांगा का व्यक्तित्व : सांगा अंतिम हिंदू राजा था , जिसके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियाँ विदेशियों को भारत से निकालने के लिए सम्मिलित हुई। सांगा ने अपने देश के गौरव रक्षा में एक आँख , एक हाथ तथा एक टांग गवां दी थी।
इसके अलावा उसके शरीर के भिन्न भिन्न भागों पर 80 तलवार के घाव लगे हुए थे। इतिहास में महाराणा साँगा का नाम “अंतिम भारतीय हिंदु सम्राट” के रूप में अमर है , जिसने अपने नेतृत्व में सब राजपूत जातियों को विदेशी आक्रमणों को रोकने तथा उनसे वीरता से मुकाबला करने के लिए संगठित किया। कर्नल टॉड ने राणा सांगा को सिपाही का अंश कहा है।
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