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नागर, द्रविड़ और वेसर मंदिर शैली क्या है | nagar dravid vesar temple style in hindi
nagar dravid vesar temple style in hindi नागर, द्रविड़ और वेसर मंदिर शैली क्या है ?
गुप्त काल : महान युग भारतीय कला के इतिहास में गुप्त काल को इसलिए महान युग कहा जाता है क्योंकि कलाकृतियों की संपूर्णता और परिपक्वता जैसी चीजें इससे पहले कभी नहीं रहीं। इस युग की कलाकृतियां, मूर्तिशिल्प,शैली एवं संपूर्णता, सुंदरता, एवं संतुलन जैसे अन्य कला तत्वों से सुसज्जित हुईं।
गुप्त धर्म से ब्राह्मण थे और उनकी भक्ति विशेष रूप से विष्णु मंे थी, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिए भी उदारता दिखायी। पौराणिक हिंदू धर्म में तीन देवता हैं विष्णु, शिव एवं शक्ति। शिव के प्रति उनमें विशेष अनुराग था यानी शिव अग्रणी देवता थे। यद्यपि दक्षिण और दक्षिण पूर्व में शैववाद का विकास हुआ तथा दक्षिण-पश्चिम मालाबार के कुछ भागों में एवं पूर्वी भारत में शक्तिवाद का विकास हुआ। कृष्ण पर आधारित वैष्णववाद था जो मुख्यतः भारत के उत्तरी एवं मध्यम भाग में केंद्रित रहा। इन सभी धार्मिक देवताओं की
पूजा सब जगह होती रही और उनके मंदिर एवं उनकी मूर्तियां सब जगह प्रतिष्ठापित हुईं।
मंदिर शैलीः नागर, द्रविड़ एवं वेसर
देवी.देवताओं की मूर्तियों को रखने के स्थान मंदिरों की स्थापना संभवतः ईसापूर्व की दूसरी शताब्दी में हुई। ईसा पूर्व की दूसरा सदी में हुए उत्खनन में मिले देवगृह को देखकर पता चलता है कि वह बेहद छिन्न-भिन्न था। वह अत्यंत शीघ्र खत्म होने वाली वस्तुओं से बना था। उनमें वास्तुकलात्मक सिद्धांतों के पालन की गुंजाइश कम थी। यह गुप्त काल था, जब भवनों के निर्माण में ईंटों और पत्थरों का प्रयोग होना प्रारंभ हुआ। गुप्त काल में ही भारतीय मंदिरों का निर्माण कार्य भी प्रारंभ हुआ। उस दौरान प्रयोग के तौर पर दो प्रमुख शैलियों का ही प्रयोग किया जाता था।
गुप्त काल के मंदिर मुख्यतः पांच प्रकार के होते थे। (प) समतल छत और कम ऊंचे खंभों वाले चैकोर भवन जैसे मंदिर उदाहरणतः ऐरान के विष्णु और वाराह मंदिर और तिगावा का कंकाली देवी मंदिर। इन मंदिरों के केंद्र यानी गर्भगृह में एक प्रवेश द्वार और एक मंडप होता था। (पप) प्रथम शैली के बने मंदिरों में एक चीज और जोड़ दी गयी प्रर्दिक्षणा उदाहरणार्थ भूमारा (मण्प्र.) का शिव मंदिर तथा ऐहोल का लाधखान (पपप) कम और समतल शिखरों वाले चतुर्भुज मंदिर जैसे दसावतार मंदिर (झांसी के देवगढ़ में बना पत्थर का मंदिर) एवं भीतरगांव (कानपुर जिले) के ईंट के मंदिर। इन मंदिरों का आधार एक ऊंचा चबूतरा होता है और उसके ऊपर महलनुमा विशाल मंदिर का निर्माण किया जाता है। (द्वितीय और तृतीय शैली के मंदिर में कई मंजिले और शिकारा शैली के मंदिरों का निर्माण उत्तर और दक्षिण दोनों भागों में एक साथ हुआ) (पअ) आयताकार मंदिर जिनकी छत्त गोलाकार होती थी। जैसे सेजारला (कृष्णा जिले) में कपोतेश्वर के मंदिर। (अ) गोलाकार मंदिर जो आयताकार स्वरूप लिये हुये होते थे इस तरह के मंदिरों का एक उदाहरण बिहार के राजगीर का मनियार मठ है। (चतुर्थ एवं पंचम शैली के मंदिर प्रारंभिक अवस्था के अवशेष के रूप हैं और उनके बाद के मंदिरों के विकास में कोई खास प्रभाव नहीं दिखायी देता।)
नागर एवं द्रविड़ शैलीः शिल्पशास्त्र भौगोलीकरण के हिसाब से तीन तरह की शैलियों को मान्यता देता है नागर, द्रविड़ एवं वेसारा। नागर-उत्तरी क्षेत्र, द्रविड़ दक्षिण, वेसारा-विंध्यास एवं कृष्णा के बीच का क्षेत्र। ये मंदिर वस्तुतः अपने भौगोलीकरण के आधार पर नहीं बने हैं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र की प्रचलित शैली का ही संकेत करते हैं। वस्तुतः तीनों शैलियां आगे चलकर दो में ही बदल गयीं नागर और द्रविड़।
नागर शैली के मंदिर चैकोर रूप लिये होते थे। वे देखने में अलग तरह के प्रतीत होते थे, बाहर से भी उनमें अनेक उभार हैं। रथाकाश प्रत्येक उभार के मध्य भाग एक अनोखा स्वरूप लिये हुए हैं। शिकारा भी इनमें इस तरह से उत्कीर्ण कर उभारा गया है जो अंदर की ओर प्रतीत होता है और अमलका के चारों ओर अंडाकार परत है। इस प्रकार इस शैली की जो दो प्रमुख विशेषताएं हैं उनमें एक उसका अनोखा आधार बनाने की योजना है और दूसरा वक्रीय शिकारा है।
द्रविड़ शैली में गर्भगृह परिक्रमा कक्ष के भीतर स्थित हैं और पिरामिड आकार के शिखरों को विभिन्न स्वरूपों और आकारों में कई मंजिलों में बनाया गया है। भारत में मंदिर निर्माण वास्तुकला मध्य काल के आखिर में अंतिम और पूर्ण चरम बिंदु पर पहुंची। इसमें एक विशेषता उभर कर सामने आयी वह थी मूर्तिकला और वास्तुकला की दृष्टव्यता। इसका निर्माण उच्चतम तकनीकी दक्षता के साथ किया
गया था। यद्यपि द्रविड़ शैली वंशानुगत पनपी, पर नागर शैली ने बड़े पैमाने पर अपनी जगह बनायी। यह शैली क्षेत्रवार तो विकसित हुई ही, साथ ही प्रत्येक क्षेत्र नें अपनी-अपनी खुद की तकनीक और दक्षता से इसका विकास किया। दक्षिण अथवा भारतीय मंदिर मिश्रित शैली के बने मंदिरों के रूप में जागे जाते हैं। उन्होंने नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों से अपने लिए आकार और स्वरूप के तत्वों को अपनाया।
भारतीय कला में स्थापत्य का सभी काल-खण्डों में विशिष्ट स्थान रहा है। सामान्यतः स्थापत्य को ही वास्तुकला अथवा वास्तुशिल्प की संज्ञा दी जाती है। गुप्तकाल में चूंकि कला का सर्वतोमुखी विकास हुआ, स्थापत्य कला का क्षेत्र भी इससे वंचित नहीं रहा। वास्तव में स्थापत्य कला के क्षेत्र में जितनी तीव्र एवं व्यापक गतिविधि इस काल में देखने को मिलती है, वैसे न तो इससे पूर्व और न ही इसके बाद के युग में दृष्टिगोचर होती है। गुप्तकला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह कला-आंदोलन किसी एक क्षेत्र विशेष में सीमित न होकर सम्पूर्ण भारत तथा भारत की सीमाओं के बाहर दूरस्थ क्षेत्रों तक पल्लवित एवं विस्मृत हुआ। यथार्थरूप में इस काल में राजनैतिक स्थिरता तथा आर्थिक समृद्धि से संस्कृत साहित्य की प्राणभूत ‘स्थापत्य कला’ को एक नई राष्ट्रीय दिशा के साथ सार्वभौम समृद्धि प्राप्त हुई, परिणामस्वरूप इस युग ने एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया।
गुप्तकालीन वास्तु के सूक्ष्म अनुशीलन से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि वास्तु रचना के दोनों ही पक्षों सौंदर्य तथा शिल्प में नवीनतम एवं सृजनात्मकता का सूत्रपात हुआ। सौंदर्यशीलता के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि इस काल में नव-कल्पनाओं एवं अपूर्व प्रतिमानों का अभ्युदय हुआ तथा अपरिमित सृजनशीलता को प्रश्रय मिला।
गुप्तकालीन समस्त वास्तु-रचनाओं को उनमें प्रयुक्त भवन-सामग्री के आधार पर तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है (प) ईंट निर्मित स्ािापत्य; (पप) गढ़े पत्थरों से निर्मित स्थापत्य; तथा (पपप) शैलकृत गुहा वास्तु। इन तीनों ही माध्यमों में हिंदू तथा बौद्ध धार्मिक भवनों का निर्माण हुआ। इसके अतिरिक्त गुप्तकालीन स्तम्भों में कीर्तिस्तम्भ, ध्वजस्तम्भ एवं स्मारक स्तम्भ भी उल्लेखनीय है।
ईंट निर्मित स्थापत्यः गुप्तकालीन ‘ईंट-निर्मित वास्तु’ को मुख्यतया दो भागों (प) हिंदू देवालय; एवं (पप) बौद्ध चैत्य, विहार एवं स्तूप। वास्तव में गुप्तकालीन ईंट-निर्मित मंदिरों की संख्या कम है। इनमें से प्रमुख रूप से भीतरगांव का विष्णु मंदिर, सिरपुर मंदिर समूह, अहिच्छत्र के ध्वस्त मंदिर तथा तेर के मंदिर उल्लेखनीय हैं। ईंट निर्मित स्थापत्य की अपनी भी कुछ विशेषताएं हैं। गुप्तकाल तथा उसके आस-पास निर्मित स्मारकों में निर्माण संबंधी गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा गया है एवं कल्पना का सहारा लेकर सभी सम्भव प्रयोग भी किए गए हैं। सांचों में ढालकर तैयार की गई समतल एवं सपाट ईंटें जुड़ाई के समय अच्छी तरह एक-दूसरे पर बैठ जाती थी। जुड़ाई के लिए मिट्टी के पतले पलस्तर का प्रयोग किया गया है जिससे ईंट प्रायः एक-दूसरे से सट गई हैं। जुड़ाई के पलस्तर में चूने के प्रयोग का यद्यपि शिल्पियों को ज्ञान था परंतु इस विधि का प्रयोग सीमित है।
दरवाजों और खिड़कियों के बीच छोड़े गए अंतरालों को पाटने के लिए तीन विधियों का प्रयोग किया गया है (प) काठ अथवा पत्थर का लिन्टल डालकर, (पप) रोड़ेदार विधि द्वारा, तथा (पपप) ईंटों को मेहराब के सिद्धांत के अनुरूप एक दूसरे के सहारे टिकाकर। इसी प्रकार ईंट निर्मित स्मारकों में अंलकरण हेतु तीन विधियों का प्रयोग किया जाता था (प) प्रथम तकनीक के अनुरूप ईंटों की चुनाई के पूर्व आवश्यकतानुसार गढ़ लिया गया (पप) चुनाई के उपरांत निर्मित सतहों को छेनी-हथौड़ी से काट छीलकर अलंकरण किए जाते थे (पपप) अंतिम तकनीक अलंकारिक रिलीफ गढ़तो मूर्तियों एवं सजावटी फलकों को गीली मिट्टी में ही अंतिम रूप देकर पका लिया जाता था तथा चुनाई के समय उन्हें यथा स्थान दीवारों में स्थित कर दिया जाता था। कभी-कभी स्टक्कू पलस्तर द्वारा भी सीधे तौर पर किए गए ‘अलंकरण’ पाए गए हैं। सम्पूर्ण उत्तर-भारत के अनेक स्ािानों से गुप्तकालीन ‘पकाई मिट्टी’ की प्रचुर मात्रा में मूर्तियों का प्राप्त होना यह प्रमाणित करता है कि इन स्थलों पर कभी पकाई ईंटों के अनेक मंदिर रहे होंगे। उत्खननों में कौशाम्बी, सारनाथ श्रावस्ती, वैशाली तथा नालन्दा आदि स्थलों से ईंटों के बने गुप्तकालीन ‘स्तूप’ एवं विहारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो तत्कालीन स्थापत्य-पर प्रकाश डालते हैं।
गढ़े हुए पाषाण खण्डों से निर्मित स्मारकः ईंट निर्मित वास्तु के अतिरिक्त इस काल खण्ड में गढ़ कर तैयार किए गए पाषाण खण्डों को एक के ऊपर एक रखकर भवनों का निर्माण किया गया। इस तकनीक का प्रयोग हिंदू तथा बौद्ध दोनों प्रकार के स्थापत्य स्मारकों में किया गया। यद्यपि यह परम्परा गुप्तकालीन शिल्पियों के लिए नवीन नहीं थी। परंतु इस युग में पाषाण खण्डों को छील-तराश तथा उत्कीर्ण कर चिनाई.विधि का प्रचुर प्रयोग मंदिर वास्तु में परिलक्षित होता है। वास्तव में ब्राह्मण-धर्म के पुनरुत्थान के परिणामस्वरूप मंदिर स्थापत्य को विशेष प्रोत्साहन प्राप्त हुआ और भिन्न देवालयों में विभिन्न मूर्तियां स्थापित की गईं, परंतु सभी मंदिरों की वास्तुकला में समता दिखलाई पड़ती है।
गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य की सामान्यतः विशेषताएं इस प्रकार हैं
(प) सभी मंदिरों की स्थापना ऊंचे चबूतरों पर की जाती थी।
(पप) मंदिरों के ऊपर चढ़ने के लिए चारों दिशाओं में सोपान का प्रावधान होता था।
(पपप) प्रारंभिक मंदिरों की छतें चपटी होती थीं परंतु बाद के गुप्तकाल न मंदिरों में शिखर का प्रादुर्भाव सामान्यतः दृष्टिगोचर होता है।
(पअ) सभी मंदिरों की बाहरी दीवारें सादी होती थीं।
(अ) र्गीा-गृह में सामान्यतः एक ही द्वार रहता था जिसमें मूर्ति की स्थापना होती थी।
(अप) इन मंदिरों के ‘द्वार-स्तम्भ’ अलंकृत थे तथा द्वारपाल के स्थान पर गंगा-यमुना की मूर्तियों को स्थान दिया गया है।
(अपप) गर्भगृह के चारों तरफ ‘प्रदक्षिणापथ’ बनता था जो छत से ढका रहता था दर्शनार्थी सीढ़ियों द्वारा सर्वप्रथम इसी स्थान पर आते थे तदंतर गर्भगृह में प्रवेश करते थे।
(अपपप) गुप्तकालीन मंदिरों के स्तम्भों के सिरे पर एक ‘वग्रकार प्रस्तर’ रहता था जिन पर सिंहों की चार मूर्तियां रहती थीं।
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