JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now

हिंदी माध्यम नोट्स

Categories: indian

मुसोलिनी की विदेश नीति का वर्णन कीजिए , mussolini foreign policy in hindi

mussolini foreign policy in hindi मुसोलिनी की विदेश नीति का वर्णन कीजिए ?

प्रश्न: मुसोलिनी की विदेश नीति के बारे में बताइए।
उत्तर: मुसोलिनी कहा करता था कि फासिज्म वह दर्शन है जो राज्य की सत्ता की सर्वोच्चता में विश्वास करता है और शक्ति अनुशासन तथा एकता पर बल देता है।
मुसोलिनी की विदेश नीति का सर्वोपरि उद्देश्य था – ष्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और गौरव की पुनः प्राप्ति।
मुसोलिनी का कार्यक्रम
1. सैनिक शक्ति का विकास
2. साम्राज्य विस्तार
3. भूमध्यसागर में प्रभुता स्थापित करना ।
4. वर्साय संधि एवं राष्ट्रसंघ का अपमान

आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के दौरान विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास –

इस योजनावधि में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य पर विशेष बल दिया गया। एक ओर जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं पेयजल, खाद्यान्न, पोषाहार, स्वास्थ्य, स्वच्छता, आवास, शिक्षा, ऊर्जा, वस्त्र, रोजगार आदि के क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता एवं नियोजित स्तर प्राप्त करने को इस योजनावधि में उच्च-प्राथमिकता प्रदान की गई, तो दूसरी ओर अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी एवं आणविक ऊर्जा जैसे उच्च प्रौद्योगिकी-प्रक्षेत्रों में विकास को महत्व दिया गया। अनुसंधान से लेकर उनके अनुप्रयोग तक के सम्पूर्ण चक्र को सरल तथा सुगम बनाने पर भी बल दिया गया। इस योजनाकाल में कुछ और नए क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी मिशनों की स्थापना की गई।

इस योजना में सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अपनाए जागे वाले कार्यक्रमों के वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय पक्षों पर अधिक बल दिया गया, समाज को प्रत्यक्षतः प्रभावित करने वाले कार्यक्रमों को प्राथमिकता प्रदान की गयी, राष्ट्रीय स्तर पर तथा राष्ट्र के चुने हुए क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी मिशनों का पता लगाने तथा उन्हें कार्यरूप देने पर बल दिया गया, सभी स्तरों (प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च) पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षा तथा प्रशिक्षण पर जोर दिया गया, चुने हुए भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास 529 530 भारतीय संस्कृति क्षेत्रों में उच्च अनुसंधान गतिविधियों को प्रेरित किया गया, सूचना तथा प्रसार सेवाओं के विकास के लिए उचित कदम उठाए गए, परम्परागत व्यवसायों में बेहतर प्रौद्योगिकी के उपयोग को प्रोत्साहित करने तथा व्यापक पैमाने पर उनके प्रसार पर बल प्रदान किया गया।

इस योजना काल में ‘वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ (CSIR) ने चार क्षेत्रों में अपने कार्यक्रम चला, औद्योगिक एवं अर्थव्यवस्था से संबंधित कार्यक्रम, सामाजिक कार्यक्रम, आधारभूत अनुसंधान कार्यक्रम और अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी सेवा कार्यक्रम। ‘वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ को आंकड़ों के संग्रह, आंकड़ा-केन्द्रों की स्थापना, सशक्त निरीक्षण प्रणाली का विकास आदि अनेक दायित्व भी सौंपे गए। विदेशों में निवास करने वाले भारतीय वैज्ञानिकों से सेवा प्राप्त करने की दिशा में सक्रियता दिखाई गई और इसके कुछ उत्साहव)र्क परिणाम भी दृष्टिगोचर हुए। अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में प्रक्षेपण यानों एवं उपग्रहों के निर्माण में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करने को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई और अन्तरिक्ष अनुसंधान विभाग में ही सर्वाधिक व्यय किए गए।
नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002)ः नौवीं योजना में उच्च तकनीक पर बढ़ते वैश्विक प्रतिबंध के संदर्भ में आत्म-निर्भरता प्राप्त करने पर बल दिया गया तथा इस बात पर जोर दिया गया कि देश की सभी योजनाओं के निर्माण व कार्यान्वयन के बीच विज्ञान अध्येताओं को शामिल किया जाए। अनिवार्य रूप से मिशन का यह उद्देश्य निर्धारित किया गया कि संबंधित क्षेत्र में कार्यान्वित योजनाएं निश्चित रूप से अपने लक्ष्य को पूरा करें। इस बात की ओर संकेत किया गया कि प्रशासक एवं सरकार विज्ञान के सहयोगी के रूप में हों, न कि वैज्ञानिकों के नियंत्रक के रूप में। योजना प्रपत्र में यह भी कहा गया कि शोध एवं विकास संस्थानों द्वारा प्रमुखतया विज्ञान एवं तकनीकी कार्यक्रमों को उत्साहित व प्रोन्नत किया जागा चाहिए। उपलब्ध सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए उनकी क्षमता में वृद्धि के उपाय किये जाएं जहां उसे उपयोग में लाया जागा है, इस प्रकार तकनीकी दक्षता को वाणिज्यिक क्षमता में परिवर्तित किया जा सकता है।
वैज्ञानिक प्रक्रियाओं में पर्यावरणीय संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है जिससे वातावरण को स्वच्छ रखने के साथ ‘इकोफ्रेन्डली’ तकनीक का विकास हो सके। ऐसा महसूस किया गया कि शैक्षणिक संस्थान ऐसा वातावरण सृजित करें, जिससे इस क्षेत्र में सृजनात्मक योग्यता तथा नवाचार क्षमता का विकास हो सके।
जैव-प्रौद्योगिकी तथा सागरीय संसाधन के विकास पर विशेष बल देने की आवश्यकता अनुभव की गयी। सभी वैज्ञानिक क्षेत्रों में सृजनात्मक क्षमता का विकास किया जाए, विशेष रूप से उन क्षेत्रों को शामिल किया जाए जो अभी शोध के सीमान्त पर हों।
योजना के प्रपत्र में विज्ञान के लिए व्यापक स्वायत्तता की मांग की गयी। साथ ही लोचता के साथ उत्तरदायित्व( निरीक्षण तंत्र, पुनर्निरीक्षण तंत्र, आधारभूत शोध को लम्बी अवधि के आधार पर अनुमोदन, विशिष्ट क्षेत्र में मानव संसाधन विकास, नागरिक क्षेत्र में उच्च तकनीक का प्रयोग तथा विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में अध्येताओं का चयन आदि तथ्यों को शामिल कर विज्ञान के क्षेत्र में उचित प्रबंधन एवं व्यवस्था की बात कही गयी।

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007)ः दसवीं योजना में एक बार पुनः ‘विश्व आर्थिक क्रम’ के संदर्भ में पुनर्निरीक्षण किया गया तथा इस बात पर जोर दिया गया कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में ‘शोध एवं विकास’ का उद्देश्य अनुप्रयोग उन्मुख हो, जिससे नयी तकनीक का विकास, मानव संसाधन विकास में प्रोन्नति वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहन, प्राकृतिक आपदा से बचाव, राष्ट्रीय कार्यक्रमों में विज्ञान के समन्वित विकास पर जोर, पर्यावरण संरक्षण एवं भाई.चारे की भावना विकसित की जा सके।
10वीं योजना में देशीय तकनीक के विकास पर विशेष बल दिया गया, साथ ही उपलब्ध नवीनतम तकनीक पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया। इससे उन क्षेत्रों में, जहां भारत विश्व प्रतिस्प)ार् की स्थिति में है, महत्वपूर्ण परिवर्तन आए तथा इन्हें उन लोगों तक भी पहुंचाया जा सका है, जो इसके लाभ से वंचित थे। इस प्रकार नवाचारीय तकनीक के विकास की आवश्यकता है, जो भविष्य में देश की जरूरतों को पूरा कर सके तथा साथ ही देशीय तकनीक के भी विकास, संरक्षण व प्रोन्नति पर बल दिया गया। इससे न केवल देशी संसाधनों तथा जैव विविधता का विकास हुआ बल्कि देश के प्रतिष्ठित परम्परागत ज्ञान की रक्षा भी हो सकी। तकनीक के सभी स्तर यथा-परम्परागत, रूढ़िगत तथा आधुनिक, देश के सतत् विकास में सहायक हुए।
उदाहरणार्थ भारतीय निर्यात आज विश्व बाजार में सस्ते श्रम एवं प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता की वजह से प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति में है। यद्यपि उनके निर्यात मद में कोई महत्वपूर्ण तकनीक से विकसित पदार्थ शामिल नहीं है। इस बात पर बल दिया गया कि हमारे निर्यात मद में उच्च तकनीक से बनी वस्तुएं तथा नवाचार भी शामिल हों।
समन्वित प्रबन्धन एवं सतत् विकास हेतु उन तकनीकों को प्राथमिकता दी गयी, जो मानव कल्याणपरक हो। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, जनसंख्या प्रबंधन, प्राकृतिक आपदा नियंत्रण, मृदा संरक्षण, जल एवं ऊर्जा संसाधन के विकास में सृजनात्मक एवं मूल्यप्रभावी हल विकसित हुआ।
योजना प्रपत्र में इस बात पर चिन्ता व्यक्त की गयी कि विज्ञान की लोकप्रियता में कमी आयी तथा विशेषतः युवाओं में विश्वास की कमी आयी जो विज्ञान को भविष्य के रूप में अपनाना चाहते हैं। इसके लिए कुछ नवाचारीय एवं कल्पनात्मक कार्यक्रमों को आयोजित करने की आवश्यकता है, जिससे युवाओं का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आकर्षण बढ़े तथा युवा वैज्ञानिकों की संख्या में वृद्धि हो।
10वीं योजना के दौरान आधारभूत शोध, विशेषतया विश्वविद्यालय स्तर पर शोध हेतु व्यापक व्यवस्था की गयी, जिससे भारत इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान कर सके। इसमें तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत को ध्यान में रख सूचना-प्रौद्योगिकी तथा जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र का विकास करना, साथ ही कृषि तथा कृषि आधारित उद्योग एवं अवसंरचनात्मक क्षेत्र जैसे ऊर्जा, परिवहन, संचार, भवन-निर्माण आदि पर विशेष जोर देने की बात कही गयी। अन्य प्रकार की नीतियों तथा कार्यक्रमों में विज्ञान एवं तकनीक का समन्वय होना चाहिए जो आर्थिक, ऊर्जा, पर्यावरण तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित हों। यह समन्वय तकनीकी चयन, निवेश, वैयक्तिक क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का हस्तक्षेप आदि में स्पष्ट होगा। यह उपागम विकास क्षेत्र में विज्ञान एवं तकनीक को एक आवश्यक घटक के रूप में व्यवस्थित करेगा।
दसवीं योजना में इस बात पर भी बल दिया गया कि संयुक्त विकास एवं शोध संस्थानों द्वारा उत्प्रेरक तकनीक का विकास किया जाय जिससे पूर्व-वाणिज्यिक तकनीक को प्रोन्नत किया जा सके, प्रदर्शनी के माध्यम से भारतीय तकनीक का प्रदर्शन, प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे प्राकृतिक आपदा प्रबंधन, एड्स/कैंसर शोध, वैकल्पिक ऊर्जा गोत, स्वच्छ तकनीक, बौद्धिक सम्पदा संरक्षण, अंतरराष्ट्रीय विज्ञान-प्रौद्योगिकी सहयोग तथा प्रबंधन (सूचना तंत्र) आदि को अंतरराष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी सहयोग कार्यक्रम से समन्वय स्थापित करना आदि सम्भव हो सके। अंतरराष्ट्रीय सहयोग से सम्बन्धित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के कुछ क्षेत्रों की पहचान की गयी, जिनमें शामिल थे आधारभूत विज्ञान, उच्च गुणवत्ता वाला मृदभांड एवं मूर्तिकला, उच्च गुणवत्ता वाला पॉलीमर्स, नैनो-मैटीरियल्स, नैनो-टेक्नोलॉजी, नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, विनिर्माण तकनीक, बायोनिक्स, जलवायविक, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन तंत्र, कार्यात्मक जेनोमिक्स एवं प्रोटोमिक्स, वैक्सीन शोध, पादप ,वं कृषि जैव प्राविधिकीय, सागरीय संसाधन उपयोग हेतु तकनीकें, सागरीय वायुमण्डल पर शोध कार्य, विज्ञान की लोकप्रियता आदि।
यद्यपि विश्वविद्यालय तथा कॉलेज स्तर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित संस्थानों की संख्या में वृद्धि हुई है तथा पुराने संस्थानों में विज्ञान विषय को स्थापित किया गया है किंतु 1950 के बाद औसत रूप से उच्च शिक्षा में विज्ञान विषय के छात्रों की संख्या में कमी आयी है। जहां 1950 ई. में हाईस्कूल के बाद विज्ञान पढ़ने वालों की संख्या 32 प्रतिशत थी वहीं आज यह मात्र 15 प्रतिशत रह गयी है।
मानव संसाधन विकास को नवीन तकनीकी के विकास तथा नवाचार हेतु आवश्यक तथ्य माना जाता है, साथ ही आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में प्रयुक्त तकनीकें तथा समस्या समाधान में भी मानव संसाधन विशेष महत्व रखता है। मानव संसाधन देश की क्षमता के मापन का एक प्रमुख आधार भी है, देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में इसका प्रमुख योगदान होता है।
‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मानव क्षमता’ का विकास उच्च शिक्षा में विज्ञान एवं तकनीकी के अध्ययन की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी मानव शक्ति विचारणीय संख्या में होनी चाहिए, अर्थव्यवस्था के उदारीकरण एवं वैज्ञानिक विकास हेतु यह आवश्यक है। इसके लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उत्तम शिक्षा का प्रबंधन, अच्छे प्रतिभाशाली छात्रों का चुनाव इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों को अच्छे अवसर प्रदान करना, कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी विज्ञान एवं तकनीक का प्रवेश आदि उपाय किए जा सकते हैं।
उपरोक्त सभी उद्देश्यों को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब देश में उच्च सुविधा प्राप्त विज्ञान केंद्र/संस्थान स्थापित हों। भारतीय प्रबंधन संस्थान तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा देश के प्रत्येक प्रयोगशाला में कम-से-कम एक स्कूल स्थापित हो तथा शोध एवं विकास कार्य हेतु प्रतिभाशाली छात्रों को आमंत्रित किया जाए। शैक्षणिक प्रवाह अवधारणा द्वारा शिक्षकों की गुणवत्ता व ज्ञान में विकास हेतु प्रयास किया जाए, नये क्षेत्रों जेनोमिक्स, जैव-सूचना तंत्र, पॉलीमर्स आदि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। अन्य उपायों में विदेशों में कॉन्फ्रेंस व सेमिनार हेतु यात्रा भत्ते को उदार बनाना, विदेशी विश्वविद्यालयों से देश के शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों का आदान-प्रदान, स्नातक स्तरीय व स्नातकोत्तर छात्रवृत्ति प्रदान करना आदि शामिल हैं।

Sbistudy

Recent Posts

Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic

Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…

2 weeks ago

Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)

Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…

2 weeks ago

Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise

Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…

2 weeks ago

Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th

Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…

2 weeks ago

विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features

continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…

2 weeks ago

भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC

भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…

2 weeks ago
All Rights ReservedView Non-AMP Version
X

Headline

You can control the ways in which we improve and personalize your experience. Please choose whether you wish to allow the following:

Privacy Settings
JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now