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मोडल फर्म किसे कहते है | मॉडल फर्म की परिभाषा क्या है आकार model firm in hindi meaning
model firm in hindi meaning मोडल फर्म किसे कहते है | मॉडल फर्म की परिभाषा क्या है आकार ?
मोडल फर्म
‘‘मोड‘‘ एक सांख्यिकीय औसत है। यह वितरण में प्रायः पाई जाने वाली वस्तु का मूल्य है। अनुभव सिद्ध साक्ष्य की जाँच करने पर प्रायः यह पाया जाता है कि एक उद्योग में कुल फर्मो का बड़ा अनुपात लगभग समान आकार का ही है। फर्म के इस आकार को ‘‘मोडल आकार‘‘ माना जा सकता है और सभी फर्म जो इस आकार के सदृश हैं को ‘‘मोडल फर्म‘‘ माना जा सकता है।
यह तथ्य कि ऐसे मोडल आकार प्रत्येक उद्योग में पाए जाते हैं, बहुधा लक्षण प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जाते हैं और अनुकूलतम फर्मों की पहचान इनसे की जाती है। यहाँ अन्तर्निहित मान्यता यह प्रतीत होती है कि इस तथ्य की गुंजाइश रखने के बाद कि कुछ फर्मों का विकास होगा और कुछ अन्य का पतन, एक उद्योग में बहुसंख्य फर्मों के अपने अनुकूलतम आकार तक पहुँच जाने की आशा की जा सकती है।
आलोचना
मोडल फर्म की अवधारणा भी दोषरहित नहीं है।
एक, एक ही उद्योग में फर्म का अनुकूलतम आकार एक फर्म से दूसरे फर्म में भिन्न-भिन्न हो सकता है।
दो, अलग-अलग फर्मों में एक ही प्रकार की उद्यमिता योग्यता उपलब्ध नहीं हो सकती है।
तीन, मोडल टाइप पर विचार करने से हम कई मामलों में दिग्भ्रमित हो सकते हैं।
बोध प्रश्न 1
1) अनुकूलतम फर्म की परिभाषा कीजिए। इस अवधारणा की क्या सीमाएँ हैं?
2) प्रतिनिधि फर्म क्या है? इस अवधारणा की सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
3) ‘‘मोडल फर्म‘‘ की परिभाषा कीजिए।
4) ‘‘संतुलन फम‘र्‘ की परिभाषा कीजिए।
बड़े पैमाने की अपमितव्ययिता के अनेक कारण हैं। इनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:
प्रबन्धकीय बाधाएँ
जब एक फर्म एक बिंदु से आगे विस्तार करता है तो इसके प्रबन्धन और निर्णय करने की प्रक्रिया के सम्मुख नई चुनौतियाँ उपस्थित होती हैं। यदि इन चुनौतियों का सामना सही ढंग से नहीं किया जाए तो फर्म की उत्पादकता और दक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
निर्णय लेने में अधिक समय लगता है। फर्म की विभिन्न इकाइयों के बीच संचार अधिक जटिल हो जाता है और परोक्ष समन्वय प्रक्रिया कम प्रभावोत्पादक रह जाती है।
बड़ी संख्या के संदर्भ में प्रबन्धन पद्धति पद सोपानिक प्रकृति का होगा। फर्म का आकार जैसे-जैसे बढ़ता है पद सोपान व्यवस्था अधिक सघन हो जाती है। इसलिए विभिन्न मध्यवर्ती स्तरों पर लिए गए निर्णयों में समन्वय करने की केन्द्रीय प्रबन्धन की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है और यह सभी प्रबन्धकीय समस्याओं का मूल है, यह फर्म के विकास में वास्तविक रूप से बाधाएँ पैदा करता है और बड़े पैमाने की अपमितव्ययिता का प्रमुख स्रोत है।
तकनीकी बाधाएँ
सिद्धान्ततः, एक फर्म अनुकूलतम आकार तक पहुँच सकता है और फिर इसे दोहरा सकती हैं। इससे पैमाने का स्थिर उत्पादन होगा। किंतु व्यवहार में यह संभव नहीं है । एक बिंदु से आगे, पैमाने के उत्पादन में और वृद्धि तकनीकी अदक्षता को जन्म देता है। उदाहरण के लिए, मशीन जितना बड़ी होगी, उसके लिए उतने ही अधिक स्थान की आवश्यकता होगी। इसलिए, भवन बहुत बड़ा होगा जिसके लिए सुदृढ़ नींव की जरूरत होगी। यह आवश्यक नहीं कि इस प्रकार की श्रृंखला का पूरी तरह से पालन किया जाए। इस बात की पूरी संभावना है कि समय बीतने के साथ जब संयंत्र का आकार बढ़ता है आदानों की असमानुपातिक वृद्धि हो। इस प्रकार अनुपातहीन ढंग से वृद्धि के कारण औसत लागत वक्र बड़े पैमाने की अपमितव्ययिता के कारण ऊपर की ओर बढ़ने लगता है।
परिवहन लागत और बाजार सघनता
किसी फर्म के आकार के विस्तार में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण बाधाएँ भी हैं। किसी भी अन्य लागत के समान परिवहन लागत भी एक बिंदु के बाद लागत वृद्धि नियम के अंतर्गत है। घटक आदान के रूप में परिवहन के उपयोग में जैसे-जैसे वृद्धि होती है, परिवहन का औसत लागत बढ़ने लगता है। परिवहन में वृद्धि होने लगती है। परिवहन लागत का उत्पादन की कुल लागत का हिस्सा होने के कारण कुल लागत में वृद्धि होने लगती है और इससे उत्पाद प्रतिस्पर्धा से बाहर हो सकता है।
परिवहन लागत एक बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है विशेषरूप में जहाँ यह कुल लागत का एक बड़ा हिस्सा होता है।
पूँजी की कमी
उत्पादन के पैमाने पर एक बिंदु से आगे एक औद्योगिक फर्म को वित्तीय बाधा का सामना करना पड़ सकता है। विस्तार के आरम्भिक चरण में एक फर्म के लिए पूँजी बाजार से धन उगाहना तथा वित्तीय संस्थाओं से पूँजी प्राप्त करना आसान नहीं होता है किंतु एक बिंदु से आगे फर्म की वित्तीय आवश्यकता ज्यामितीय क्रम में बढ़ती है। इस चरण में इसे बड़े पैमाने पर धन की जरूरत होती है जो इसे किसी भी स्थिति में प्रचुर रूप से उपलब्ध नहीं होती है। इस परिवेश में, फर्म को अपना आकार सीमित रखने पर बाध्य होना पड़ता है तथा और भावी विस्तार को तब तक टालना पड़ना है जबतक कि यह आवश्यक वित्त के लिए अधिक लागत वहन करने में सक्षम न हो जाए तथा ऐसा करने का इच्छुक नहीं हो। वित्त के उच्च लागत से उत्पादन लागत में भी वृद्धि होगी।
व्यक्तिगत सीमाएँ
एक फर्म के आकार की वृद्धि में उद्यमी योग्यता और क्षमता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कभी-कभी उद्यमी फर्म का छोटा आकार पसंद करता है जिससे कि उनका प्रबन्ध प्रभावशाली तरीके से किया जा सके। ऐसे उद्यमी बड़ा फर्म पसन्द नहीं कर सकते हैं क्योंकि इसके लिए अधिक प्रयासों और समन्वय की नई दक्षताओं की आवश्यकता पड़ती है अन्यथा व्यापार पर प्रभावशाली नियंत्रण में कमी इत्यादि आ जाती है। वे उन फालतू समस्याओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते हैं और इसका कारण इन समस्याओं से निपटने में उनकी अक्षमता हो सकती है अथवा वे अपने छोटे व्यापार की आय, अधिकार और सम्मान से ही संतुष्टी महसूस कर सकते हैं।
श्रमिक समस्याएँ
श्रमिक समस्याओं के कारण भी फर्म का विकास अवरुद्ध होता है। फर्म के आकार के विस्तार के साथ ही, श्रम बल की संख्या भी बढ़ती है। श्रमिक ट्रेड यूनियनों में संगठित हो जाते हैं। टेड यूनियनों को प्राप्त सांविधिक संरक्षण के अलावा बड़ी संख्या में श्रमिक स्वयं अधिक अधिकारों का प्रयोग करने में सक्षम हो जाते हैं। जब तक कि समुचित ढंग से इन्हें व्यवस्थित नहीं किया जाए और समन्वय स्थापित नहीं किया जाए, इस प्रकार के मजदूर संघ उद्यमियों के लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं तथा फर्म के और विस्तार को सीमित कर सकते हैं।
सामाजिक अथवा संस्थागत बाधाएँ
समाज, बाजार शक्ति जो मूल्य में वृद्धि कर सकती है के प्रति शंकालु होता है। इसलिए विनियमों और ‘‘एंटीट्रस्ट‘‘ विधानों के माध्यम से आकार पर प्रतिबंध लगाया जाता है।
संक्षेप में, हमने ऊपर फर्म के विकास में बाधक विभिन्न घटकों का सविस्तार वर्णन किया है। इसलिए, एक फर्म को अपने लिए अनुकूलतम आकार का चयन करना पड़ता है, अर्थात् यह एक बिंदु तक अपने प्रचालन के पैमाने का विस्तार कर सकता है, उससे आगे नहीं।
आकार का चयन
हमने ऊपर विभिन्न घटकों पर चर्चा की जो बड़े पैमाने की मितव्ययिता उत्पन्न करके फर्म के आकार का संवर्द्धन करते हैं। हमने बड़े पैमाने की अपमितव्ययिता के विभिन्न स्रोतों को भी चिन्हित किया है। प्रत्येक फर्म अनुकूलतम आकार प्राप्त करना चाहता है अर्थात् जहाँ इसकी बड़े पैमाने की मितव्ययिता समाप्त हो जाती है किंतु बड़े पैमाने की अपमितव्ययिता भी शुरू नहीं होती है।
अनुकूलतम का यह बिंदु अलग-अलग उद्योगों में भिन्न-भिन्न हो सकता है। किसी उत्पादन व्यवसाय और प्रदत्त प्रौद्योगिकी में छोटा फर्म अनुकूलतम होता है जबकि कुछ अन्य व्यवसायों में औद्योगिक इकाई तब तक आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद नहीं हो सकती है जब तक कि इसका आकार यथेष्ट रूप से बड़ा न हो।
एक फर्म अधिकतम लाभ कमाने का प्रयास करता है। इस प्रयास में यह निर्गत के किसी भी स्तर पर उत्पादन लागत को न्यूनतम करना चाहता है। तथापि, वास्तविक निर्गत चयन का निर्धारण माँग और लागत घटक दोनों के द्वारा होता है। मान लीजिए प्रत्येक फर्म अनुकूलतम आकार तक पहुँचने का प्रयास करता है अर्थात् औसत लागत वक्र का न्यूनतम बिन्दु निरर्थक है। एकाधिकारवादी प्रतिस्पर्धा के चैम्बरलेन मॉडल में, उप-अनुकूलतम संयंत्र आकार पर संतुलन स्थापित होता है।
बोध प्रश्न 3
1) फर्म के विकास में सहायक प्रबन्धकीय घटक क्या हैं?
2) फर्म के विकास में कौन से वित्तीय घटक सहायक होते हैं?
3) फर्म के विकास में कुछ महत्त्वपूर्ण बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
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