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menstrual cycle in hindi , रजचक्र किसे कहते हैं , रज प्रावस्था (Menstrual phase)
(2) रजचक्र (Menstrual cycle) : प्राइमेट्स (primates) जन्तुओं में नर व मादा दोनों सभी ऋतुओं में अर्थात् पूरे वर्ष भर मैथुन करने में सक्षम होते हैं। स्त्रियो में मद (oestrous) अपेक्षाकृत कम स्पष्ट होता है। मादाओं द्वारा नर को मैथुन हेतु ग्रहण करने की स्थिति लगभग पूरे समय बनी रहती है। मद चक्र का आरम्भ जनन-छिद्र से रक्त स्राव द्वारा होता है। यह ऋतु-स्राव या रजोधर्म (menstruation) कहलाता है। अतः मादा प्राणियों में होने वाली यह क्रिया निश्चित दिनों अन्तराल पर होती है जिसे ऋतुस्राव चक्र या रज चक्र ( menstrual cycle) कहते हैं। इस चक्र की अवधि विभिन्न परिस्थितियों में 21-35 दिन की हो सकती है किन्तु सामान्य परिस्थिति में यह औसतन 28 दिन होती है।
मादा प्राणियों में लैंगिक विकास अथवा यौवनावस्था की शुरूआत 10 से 14 वर्ष की आयु के बीच होती है तब ही प्रथम बार ऋतुस्राव भी होता है। यह क्रिया रजोदर्शन (menarche) कहलाती है। यह क्रिया 45-50 वर्ष की आयु तक प्रति 28 दिनों के अन्तराल पर नियमित रूप से होती है। अतः ऋतु केवल अगर्भधारित ( nonpregnant) मादा जो 10 से 50 वर्ष के मध्य है में ही होता है । 10 वर्ष की आयु की कुमारियों या मादाओं में यह नहीं होता क्योंकि इनमें जनदों का विकास इस स्तर तक नहीं होता है कि वे अण्डोत्सर्ग कर सकें तथा इनके लिये आवश्यक हार्मोनों की मात्रा का स्त्रवण कर सकें। अगर्भवती महिला के गर्भाशय के अन्त:स्तर (endometrium) में होने वाले नियमित परिवर्तनों को ही रज-चक्र की परिभाषा में सम्मिलित किया जाता है। प्रत्येक बार क चक्र के दौरान गर्भाशय के भीतरी स्तर को अण्डाणु के रोपण (implantation) हेतु तैयार किया जाता है। निषेचन होने तथा रोपण होने की स्थिति में ऋतुस्राव बन्द हो जाता है अन्यथा गर्भाशय का भीतरी स्तर टूट कर अलग हो जाता है। इसके साथ ही श्लेष्मा, रक्त कोशिकीय झिल्ली के विखण्डित भाग जनन छिद्र से देह से बाहर निकाल दिये जाते हैं। यही क्रिया ऋतु-स्राव (menstruation) कहलाती | रज-चक्र के अन्तर्गत होने वाली क्रियाओं को अध्ययन हेतु तीन प्रावस्थाओं में विभक्त करते है।
(i) रज प्रावस्था (Menstrual phase) : रजोधर्म या ऋतु स्राव (menustruation or | menses) वह अवस्था है जिसमें रक्त, ऊत्तक, द्रव, श्लेष्म (mucous ) व उपकला कोशिकाओं का नियमित अन्तराल के पश्चात् स्राव होता है।
यह आवर्ती स्राव (periodic discharge) स्त्रियों में 25-65 मि.ली. प्रतिदिन लगभग 4-5 दिनों तक होता रहता है। पूर्व में गर्भाशय स्तर हार्मोन्स के प्रभाव से तैयार किया जाता है उसी क्रिया हेतु किन्तु स्राव के आरम्भ
- एस्ट्रोजन व प्रोजिस्ट्रॉन की नियमित मात्रा गर्भाशय को अब तक मिल रही होने के 1-2 दिन पूर्व से उपरोक्त हार्मोनों की मात्रा में अचानक कमी होने के कारण निषेचित अण्ड हेतु तैयार किया हुआ गर्भाशय का क्रियात्मक स्तर (stratum functionalis) नष्ट हो जाता है। अतः
इस स्तर की उपकला की विखण्डित कोशिकाएँ, ग्रन्थियों के स्रवण, ऊतक द्रव (tissue fluid). रक्त कोशिकाओं के भाग व रक्त का ह्रास होने से उत्पन्न पदार्थ स्राव के रूप में बहकर गर्भाशय की अवकाशिका (lumen) से गर्भाशय ग्रीवा (cervix) से योनि से होकर जनन छिद्र द्वारा देह बाहर निकलते हैं। इन दिनों के उपरान्त गर्भाशय स्तर बहुत पतला अपेक्षाकृत कम ग्रन्थिल संवहनियत अवस्था में रह जाता है। इस समय केवल मात्र आधारिक स्तर (stratum basalis) ही शेष रहता है।
चित्र 9.4 : मादा में रजोचक्र की विभिन्न अवस्थाओं का चित्रीय निरूपण इस प्रावस्था के दौरान अण्डाशय में अण्डाशयी चक्र (ovarian cycle) के अन्तर्गत प्राथमिक पुटकों (primary follicles) के परिवर्धन की क्रिया भी आरम्भ हो जाती है। एक सामान्य मादा प्राणी के अण्डाशय में जन्म के समय निश्चित संख्या में प्राथमिक पुटक (primary follicle) होते हैं। इनमें सै प्रत्येक पुटक में प्राथमिक अण्ड कोशिका (primary oocyte) उपस्थित होती है। ये चपटी उपकला कोशिकाओं के एक स्तर द्वारा घिरी रहती है। सामान्य मादा में इन पुटकों की संख्या लगभग 2 लाख होती है। प्रत्येक रज चक्र के आरम्भ में 15-20 प्राथमिक पुटक वृद्धि करना आरम्भ करते हैं और द्वितीयक पुटकों (secondary follicles) में परिवर्तित हो जाते हैं। इस अवस्था में द्वितीयक अण्ड कोशिका (secondary oocyte) का निर्माण हो जाता है। द्वितीयक पुटक की कोशिकाओं के
अनेक स्तर पाये जाते हैं। ये कोशिकाएँ आरम्भ में घनाकार (cuboidal ) होती है जो बाद में स्तम्भी । (columnar) प्रकार की हो जाती है। ये कण युक्त कोशिकाद्रव्य से बनी होती है अतः कणिकामय कोशिकाए (granular cells) कहलाती है। द्वितियक अण्ड कोशिका तथा कणिकीय स्तर के मध्य का पारदर्शी स्तर बनता है जिसे पारदर्शी अण्डावरण (zona cllucida) कहते हैं। यह ग्लाइकोप्रेटीन प्रकृति का स्तर होता है। कणिकीय कोशिकाओं द्वारा पुटकीय दाब (follicular fluid) स्रवण किया जता है। पुटकीय द्रव द्वितियक अण्ड कोशिका को केन्द्र से एक ओर हटा देते हैं और यह परिधि की ओर व्यवस्थित हो जाता है। पुटकीय द्रव जिस गुहा में भरता है उसे एन्ड्रम (antrum) या टकीय गुहा (follicular cavity) कहते हैं। विकासशील 15-20 पुटकों में से केवल एक कभी-कभी अधिक द्वितियक अण्ड कोशिका के रूप में परिपक्वन होता है, शेष नष्ट हो जाते हैं। पुटकों के वृद्धि की उपरोक्त क्रियाएँ पीयूष ग्रन्थि के स्रवित FSH हार्मोन के नियन्त्रण में होती है जिसकी मात्रा इस प्रावस्थ्ज्ञा के दौरान अधिक होती है। FSH का स्रवण हाइपोथैलेमस के द्वारा FSH-RH मोचक कारक के नियंत्रण में होता है। पुटकों के द्वारा एस्ट्रोजन हार्मोन का स्रवण भी होता है जो गर्भाशय के अन्तःस्तर व स्तन ग्रन्थियों को प्रभावित करता है। गर्भाशय का अन्त:स्तर निषेचित अण्ड को ग्रहण करने हेतु उत्तरोत्तर मोटा, ग्रन्थिल, संवहनीय व संवेदी बनकर अण्ड के रोपण हेतु तैयार होता है।
(ii) पूर्व अण्डोत्सर्ग प्रावस्था (Pre ovulatory phase) : ऋतुस्राव के उपरान्त किन्तु अण्डोत्सर्ग के पूर्व की यह प्रावस्था छठे से तेरहवें दिन तक रहती है। यह पुटकीय प्रावस्था (follicular phase) के नाम से भी जानी जाती है। FSH व LH पीयूष ग्रन्थि से आकर पुटकों की वृद्धि एवं एस्ट्रोजन स्रवण को बढ़ाते हैं। गर्भाशय के अन्त:स्तर (endometrium) के रोपण हेतु पूर्व तैयारी के अन्तिम चरण में आधारी स्तर की कोशिकाएँ विभाजित हो जाती है। अन्तःस्तर में नव क्रियात्मक स्तर (stratum functionalis) बनकर अन्त:स्तर 4-6 मि.मी मोटाई का हो जाता है।
चित्र 9.5 : अण्डोत्सर्ग में हार्मोनों द्वारा नियंत्रण
द्वितियक अण्डकोशिका युक्त द्वितियक पुटकों से एक या कभी अधिक ग्राफीयन पुटक (graafian follicle) बन जाता है। ग्राफीयन पुटक वह परिपक्व पुटक कहलाता है जो प्रथम सूत्री के प्रभाव से पहले FSH की मात्रा अधिक किन्तु अन्तिम दौर में LH की मात्रा अधिक होती है। विभाजन कर अण्डोत्सर्ग (ovulation) के लिये तत्पर रहता है। इस प्रावस्था के दौरान हाइपोथैलेम
चित्र 9.6 : रज-चक्र प्रावस्थाओं में तापक्रम एवं हार्मोन सम्बन्धी परिवर्तन प्रावस्था के दौरान यदि रजचक्र 28 दिन का होता है तो सामान्यतः 14वें दिन अण्डोत्सर्ग (ovulation) की क्रिया होती है। इस क्रिया के लिये LH का अधिक मात्रा में होना अधिक आवश्यक है। ग्राफी पुटक जो अण्डाशय की झिल्ली पर फूल पर बाहर आ जाता है, अन्ततः झिल्ली को तोड़कर देह गुहा में निकल जाता है।
(iii) पश्च अण्डोत्सर्ग प्रावस्था (Post-ovulatory phase) : ग्राफी पुटक के फट जाने तथा द्वितीयक अण्डकोशिका के अण्डोत्सर्ग के पश्चात् की क्रियाएँ अर्थात् यह प्रावस्था 15 वें से 28 वें दिन तक चलती है। LH स्रवण फटे हुए ग्राफी पुटक को प्रभावित करता है इसमें बने रिक्त स्थान में पीली कोशिकाएँ भरने लगती है । यह पीत पीण्ड प्रावस्था (luteal phase) कहलाती है जिसमें पीत पीण्ड (corpus luteum) का निर्माण होता है। पित पिण्ड एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टिरॉन हार्मोनों के स्रवण कर गर्भाशय अन्तःस्तर को तैयार करता है। इसके अन्तर्गत अन्त:स्तर मोटा होकर, स्रावी बन जाता है। इसमें ग्लाइकोजन का संग्रह होता है। ये हार्मोन स्तरन ग्रन्थियों को भविष्य के किये जाने वाले दुग्ध स्रवण हेतु तैयार करते हैं।
यदि पूर्व में हुए ऋतुस्राव के आरम्भ से 27वें या 28वें दिन तक भी निषेचन न हो तो पीत पिण्ड का ह्रास होने लगता है अतः प्रोजेस्टिरॉन का स्त्रवण बन्द हो जाता है । सम्भवतः यह क्रिया हाइपोथैलेमस-पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्रावित जनन हार्मोन्स के ऋणात्मक पुनर्भरण तन्त्र के प्रभाव से होती है। प्रोजिस्टिरॉन व एस्ट्रोजन की मात्रा के कम होने से गर्भाशय के अन्त:स्तर का रख-रखाव (maintenace) नहीं हो पाता है और यह ह्रासित होकर नष्ट हो जाता है अर्थात् ऋतुस्राव (menstration) की क्रिया हो जाती है। उत्तरोंत्तर अगला रज-चक्र आरम्भ हो जाता है।
यदि निषेचन की क्रिया सम्पन्न होती है तो पीत पिण्ड बना रहता है व उपरोक्त दोनों हार्मोनों का स्रवण करता रहता है तथा गर्भाशय पर रोपण की क्रिया हो जाती है। अपरा (placenta) निर्माण होता है। अपरा द्वारा स्रवित हार्मोन पीत-पिण्ड का कार्य ग्रहण कर लेते हैं। गर्भधारण के बाद की अवस्थाओं का वर्णन आगे किया गया है।
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