प्राकृतिक सम्पदा का प्रबन्धीकरण (management of natural resources in hindi) प्राकृतिक संसाधन 

By   August 5, 2020

(management of natural resources in hindi) प्राकृतिक सम्पदा का प्रबन्धीकरण

जीवनयापन के लिए मानव विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहता है , परिणामस्वरूप मानव ने इन संसाधनों का मनमाना अंधाधुंध दोहन प्रारंभ कर दिया। इस अविवेकपूर्ण उपयोग से भौतिक सुखों में बढ़ोतरी का खतरा भी उत्पन्न हो गया है। वास्तव में मानव द्वारा प्रकृति पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिए अन्य जीवधारियों तथा प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग आज की प्रमुख समस्या है। इसी बुद्धिमानीपूर्ण संसाधनों के सदुपयोग को जिससे कि मानव जाति और संसाधनों का अस्तित्व अपने स्थान पर बना रहे , उसे संसाधनों का प्रबन्धीकरण कहते है।

विगत 80 वर्षो के अनुभवों तथा शोध के आधार पर पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के महत्व को स्पष्ट करते हुए अनेकों सुझाव तथा उपाय बताये है। अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति संसाधन संरक्षण परिषद् के वैज्ञानिक डॉ. रेयमंड एफ. डासमैन ने इस विषय को प्राथमिकता देने का सुझाव देते हुए प्राकृतिक संसाधन संरक्षण को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है –

“वातावरण के विवेकपूर्ण सदुपयोग से मानवीय रहन सहन के लिए उच्च कोटि की सुविधाएँ जुटाने की प्रक्रिया को प्राकृतिक संसाधन संरक्षण कहते है। ”

रेयमंड का यह भी कहना है कि मानव कल्याण के लिए पारिस्थितिकी नियमों के आधार पर सभी संसाधनों की निरन्तरता बनाये रखने के लिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए संरक्षण प्रदान करना होगा तथा विकास कार्यों में इन नियमों को प्राथमिकता भी देनी होगी।

अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति तथा प्राकृतिक संसाधन संरक्षण परिषद् के वैज्ञानिक रेयमंड के अनुसार प्रबन्धीकरण का आधार है मानव कल्याण के लिए पारिस्थितिकी नियमों के आधार पर सभी प्राकृतिक संसाधनों की निरंतरता बनाये रखने के लिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए , संरक्षण प्रदान करना तथा विकास कार्यो में इन नियमों को प्राथमिकता देना।

प्राकृतिक संसाधन

विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों को दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. पुनर्विकास योग्य संसाधन (renewable resources)
  2. अपुनर्विकास योग्य संसाधन (non renewable resources)

नवीकरणीय अथवा पुनर्विकास योग्य संसाधन (renewable resources)

इस समूह के अंतर्गत सभी जैविक घटक शामिल है जिनका व्यापक उपयोग किया जाता है। इन संसाधनों को उचित वातावरण प्रदान करने और उपयोग उपरान्त फिर से पुनर्विकास किया जा सकता है। इन संसाधनों के संरक्षणपूर्ण उपयोग से अनेकों लाभ उठाये जाते है। विभिन्न पुनर्विकास योग्य संसाधन निम्नलिखित प्रकार है –

  1. वन एवं वन प्रबन्धीकरण:

वनों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। अनेकों आर्थिक समस्याओं का समाधान इन्ही से होता है। इंधन , कोयला , औषधियुक्त तेल और जडीबुटी , लाख , गोंद , रबड़ , चन्दन , इमारती सामान तथा अनेकों लाभदायक पशु पक्षी तथा कीट आदि वनों से प्राप्त होते है लेकिन पिछले पांच से छ: दशकों में वनों का अविवेकपूर्ण दोहन किया गया है। वनों के अभाव में जल , वायु तथा वर्षा के प्राकृतिक चक्र भी अनियंत्रित होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

वन संरक्षण एवं विकास के लिए वर्षा ऋतु में प्रत्येक वर्ष वन महोत्सव मनाया जाता है तथा सरकारी व गैर सरकारी संस्थायें उचित स्थानों पर पौधे लगाकर वन विकास में भाग लेते है। हाल ही में अनेकों राप्तय सरकारों ने “सामाजिक वानिकी” नामक कार्यक्रम चलाया है , जिसके माध्यम से समाज में वनों के महत्व तथा विकास की चेतना का नियमित प्रचार व प्रसार किया जा रहा है।

वन संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए :

  • वनों की अंधाधुंध कटाई तथा आर्थिक दोहन को प्रभावी कानून से रोका जाए व उल्लघंन करने वालों को कड़ी सजा दी जाए।
  • प्राकृतिक वन प्रदेशों में आधुनिक उद्योगों को लगाने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लागू किया जाए।
  • वन प्रदेशों में निर्माण योजनायें पूर्ण रूप से प्रतिबंधित की जाए।
  • वन विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता व संरक्षण दिया जाए।
  • वन संरक्षण एवं विकास को अनिवार्य पाठ्यक्रम के रूप में पढाया जाए।
  • वन चेतना , संरक्षण एवं विकास के लिए उत्तर प्रदेश की भांति सभी जिला मुख्यालयों पर “वन चेतना” केन्द्रों की स्थापना पूरे देश में की जाये।
  • “वन महोत्सव” को राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में मनाया जाए , जिसमे सभी विभागीय कर्मचारीयों , शिक्षकों तथा विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए।

2. वन्य जन्तु प्रबन्धिकरण (wildlife management)

वन्य जन्तुओं का प्रबंध जीव विज्ञान की वह प्रावस्था है जो कि वन्य जंतुओं का सर्वश्रेष्ठ संभवत: विकास , उपयोग और संरक्षण से सम्बन्धित है। सभी जातियों के प्रबंध का आशय यह है कि कोई जाति अधिक शोषण , बीमारी अथवा अन्य प्राकृतिक कारणों से विलुप्त नहीं हो जाए। अन्य जन्तुओं के प्रबंध का उद्देश्य यह भी है कि वन्य जन्तुओ से मनुष्य को अधिक से अधिक संभावित लाभ हो।

प्रबंधक को सूचनाओं द्वारा जो मदद मिलती है , उनको निम्नलिखित छ: समूहों में विभक्त किया जा सकता है –

  1. आवास आवश्यकता
  2. भोजन स्वभाव
  3. प्रजनन
  4. जीव संख्या परिमाण और घटाव बढाव।
  5. सीमा
  6. अन्य जातियों के साथ अंतर सम्बन्ध

जब किसी एक जाति का प्रबंध करना हो तो उसके लिए सर्वप्रथम जानकारी होनी चाहिए , जैसी कि जीव संख्या परिमाण तथा इसका अन्य जातियों से अन्तर्सम्बन्ध। इस प्रकार का अन्तर्सम्बन्ध लाभदायक अथवा हानिकारक हो सकता है। भक्षक , परजीवी एवं बीमार जीवों से जीव संख्या कम होती है। कभी कभी मानव की प्रतिक्रियाएं भी जाति को कम करने का कारण हो सकती है।

कई समय हमारी अनेक गेम जातियों की जीव संख्या भोजन की कमी के कारण परिमित हो सकती है। प्रबंध में वन्य जातियों द्वारा अक्सर भोजन के लिए प्रतियोगिता का होना महत्वपूर्ण कारक है। इस प्रकार की प्रक्रिया मत्स्य जीवसंख्या के प्रबंध में मुख्य रूप से सत्य है।

कभी कभी भली प्रकार आवास की अनुपस्थिति भी गेम जातियों की जीव संख्या को परिमित करता है , इस प्रकार के आवासों को बढ़ाने की चेष्टा की जाती है। आजकल वन्य जन्तुओ के प्रबंध में आवास विकास एक प्रभावकारी साधन सिद्ध हुआ है।

वन्य जन्तु

वनों की भांति वन्य जन्तु भी मानव पर्यावरण के एक महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन आधुनिकीकरण प्रक्रिया में विद्युत उत्पादन के लिए बाँध निर्माण , सडकों या रेलों के जाल एवं विशाल गृह निर्माण योजनाओं ने अनेकों वन्य जन्तुओ के प्राकृतिक निवास समाप्त कर दिए है। परिणामस्वरूप आज अनेकों वन्य जन्तु जातियां या तो लुप्त हो गयी है अथवा विलुप्तिकरण के कगार पर खड़ी है। विलुप्तिकरण की तरफ अग्रसर होने वाले वन्य जन्तुओ में सफ़ेद शेर , गैंडा , बब्बर शेर , चिंकारा , चीतल , हाथी , काला चीतल , जंगली सूअर , मगरमच्छ आदि कुछ प्रमुख जन्तु है। केरल विश्वविद्यालय के जन्तुशास्त्री श्री एम. बालकृष्णन तथा के.एन. अलेक्जेंडर के अनुसार 350 वन्य प्राणी जातियों में से 81 विलुप्तिकरण संकट से ग्रस्त है।

इन वन्य जन्तुओं के संरक्षण के लिए पारिस्थितिकी वैज्ञानिकों ने अनेकों प्रभावकारी कदम उठाये है। इसी सन्दर्भ में सन 1952 में भारतीय वन्य प्राणी परिषद का गठन हुआ था। इस परिषद् के तत्वावधान में सन 1970 में अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति तथा प्राकृतिक संसाधन संगठन (IUCN) ने अपनी 10 वीं बैठक नयी दिल्ली में आयोजित की , जिससे वन्य जंतुओं सहित विश्वभर में सम्पूर्ण पारिस्थतिकी परितंत्र संरक्षण के लिए शक्तिशाली प्रस्ताव किये गए , परिणामस्वरूप आज भारत सरकार सहित सभी राज्य सरकारों ने अलग से पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी मंत्रालय स्थापित किये है तथा अनेकों प्रभावी कानून बनाये है। परिषद की उपरोक्त बैठक में वन्य जन्तु संरक्षण के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए गए थे –

  • प्रजननकारी जन्तुओं के आखेट पर पूर्ण क़ानूनी प्रतिबन्ध।
  • वन्य जन्तुओ के लिए अभयारण्यों का विकास एवं इनमें संरक्षणपूर्ण पालन पोषण की व्यवस्था।
  • वन्य जन्तुओं के प्राकृतिक आवासों में आवश्यक सुधार।
  • आखेट योग्य जन्तु अथवा जन्तु जातियों का निर्धारण एवं आरक्षित आखेट क्षेत्रों का विकास।

उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हमारे देश में लगभग 240 वन्य जीवन विहार एवं अनेकों राष्ट्रीय वन्य प्राणी उद्यान स्थापित किये गए है। प्रत्येक वर्ष 1 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जाता है। जिसमे साधारण व्यक्तियों को वन्य प्राणियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी जाती है।

वन्य जन्तु संरक्षण के लिए सन 1967 में वन्य जीव कोष की एक शाखा राष्ट्रीय अपील भारत में स्थापित की गयी है जिसके सहयोग से मद्रास (तमिलनाडु) में एक सर्प उद्यान का विकास किया गया तथा भारतीय बस्टर्ड , बाघ और नीलगिरी टाइगर्स संरक्षण परियोजना चलाई गयी , जिनके परिणामस्वरूप आज इन जातियों को नया जीवन मिला है।

इसी प्रकार भरतपुर (राजस्थान) का पक्षी विहार (घना पक्षी विहार) अनेकों देशी एवं विदेशी पक्षियों की शरणस्थली के रूप में विश्वविद्यालय हो चूका है। उत्तरप्रदेश का जिम कार्बेट पार्क तथा राजस्थान में सरिस्का वन विहार (जिला अलवर) भी अनेकों वन्य जन्तुओं जैसे बाघ , नीलगाय , चीता , हाथी आदि का संरक्षणपूर्ण विकास करने में सहायक हो रहे है।

डाल्फिनो पर संकट समाप्त करने के लिए कई सुझाव दिए जा रहे है। इन विभाग अभयारण्य क्षेत्र में तथा मछुआरों के अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठन गंगा मुक्ति आन्दोलन ने मछुआरों से गिल , नेट एवं अन्य विनाशकारी जालों के परित्याग की अपील की है।

दिल्ली में भारतीय उपमहाद्वीप में नदियों के डाल्फिन के संरक्षण पर आयोजित सेमिनार में एक बार फिर चेतावनी दी गयी है कि यदि डाल्फिनो का शिकार तथा गिल नेटों का चलन बना रहा तो अगले 50 वर्षो में कम से कम गंगा के डाल्फिन समाप्त हो जायेंगे।

  1. अभयारण्य (sanctuaries) : सामूहिक संरक्षण के अंतर्गत एक ही आवास में पौधों और जन्तुओ की कई जातियों का साथ साथ परिरक्षण और संरक्षण किया जाता है। इस कार्य हेतु आवासों का चयन किया जाता है कि उनकी पर्यावरणीय दशाएं इस प्रकार की हो कि उनमें बाहर से भारी संख्या में प्राणी खासकर प्रवासी पक्षी आ सके। कई देशों ने इस तरह के पक्षी विहारों की स्थापना और विकास किया है। इन पक्षी विहारों में प्राणियों को स्वच्छ पर्यावरणीय दशाएं उपलब्ध करायी जाती है। उदाहरण के लिए , संयुक्त राप्तय अमेरिका के वनमुर्गी विहारों में बत्तख , हंस और जल पक्षी की कई जातियों के लिए आदर्श स्थानों और घोंसला बनाने के लिए अनुकूल स्थानों को उपलब्ध कराया जाता है।

भारत के दिल्ली चिड़ियाघर और भरतपुर पक्षी विहार में दूरस्थ स्थानों (जैसे साइबेरिया) से आने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए स्थान और खाद्य पदार्थो की आपूर्ति के लिए भरपूर व्यवस्था की जाती है और आखेट अथवा किसी भी प्रकार के मानवीय कार्यो से उनकी पूर्णतया रक्षा की जाती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च पर्वतीय प्रारक्षण में अल्पाइन पौधों की जातियों की रक्षा की जाती है आदि।

  1. राष्ट्रीय उद्यान (national park):

आवास परिरक्षण के अंतर्गत प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों और पारिस्थितिकीय संसाधनों की बहुमुखी रक्षा के लिए विविध प्रकार के पारिस्थितिकीय संसाधनों वाले विस्तृत क्षेत्रों को आरक्षित कर दिया जाता है। इस प्रकार के प्रकृति प्रारक्षण को राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है। ऐसे राष्ट्रीय उद्यानों की बाहरी प्राणियों और मनुष्यों के प्रभावों से पूर्ण रक्षा की जाती है।

  1. जैवमण्डल प्रारक्षण (biosphere reserves): जीव मण्डल प्रारक्षण का कार्यक्रम , UNESCO के मनुष्य और जैवमंडल कार्यक्रम (mab – man and biosphere programme) के अंतर्गत आता है। जीवमण्डल प्रारक्षण की संकल्पना का सामान्य तात्पर्य है प्राकृतिक आवासों और उनमे पाए जाने वाले पौधों और जन्तुओ की रक्षा और संरक्षण।

उल्लेखनीय है कि “जीवमंडल प्रारक्षण” की संकल्पना की शुरुआत 1968 में MAB द्वारा आयोजित “द रैशनल यूज एंड कंजर्वेशन ऑफ़ द रिसोर्सेज ऑफ द बायोस्फीयर” नामक संगोष्ठी के समय हुआ था। इस संगोष्ठी की संस्तुतियो में से एक संस्तुति “जननिक संसाधनों के उपयोग और परिरक्षण” से सम्बन्धित थी। इन संगोष्ठी की संस्तुतियों में से प्रमुख है कि महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों , पालतू पौधों और जन्तुओं के मौलिक आवासों और संकटापन्न और दुर्लभ जातियों की बची संख्या के परिरक्षण के लिए विशेष तौर पर प्रयास किया जाना चाहिए।

सन 1969 में यह निर्णय लिया गया कि MAB कार्यक्रम के अंतर्गत विश्वभर में राष्ट्रीय उद्यानों , जैविक प्रारक्षण और अन्य रक्षित क्षेत्रों की व्यवस्था की जाए और इनमें घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया जाए। ऐसे समन्वित क्षेत्रों को कभी कभी जैवमण्डल प्रारक्षण नाम से सम्बोधित किया जाता रहा लेकिन जैवमंडल प्रारक्षण की संकल्पना का उद्भव सन 1971 में हुआ और प्रथम जीवमण्डल प्रारक्षण का अभिनिर्धारण से 1976 में किया गया। 1976 के बाद से MAB द्वारा अभिनिर्धारित जैवमण्डल प्रारक्षण की संख्या में निरंतर वृद्धि होती गयी और 1986 के अंत तक 70 देशो में 1986 जीवमण्डल प्रारक्षण को तैयार कर दिया गया।

सन 1974 में UNESCO और UNEP (United Nations Environment Programme) के सहयोग से विशेष टास्क फ़ोर्स का गठन किया गया जिसने “जैवमण्डल प्रारक्षण” की विशेषताओं का निर्धारण किया और उसके विभिन्न उद्देश्यों को निश्चित किया।

जैवमण्डल प्रारक्षण का उद्देश्य

जैवमण्डल प्रारक्षण की भूमिकाओं और प्रमुख उद्देश्यों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया।

  1. संरक्षणात्मक भूमिका: जननिक संसाधनों और प्राकृतिक पारिस्थितिक तन्त्रों का संरक्षण और जैविक विविधता का अनुरक्षण।
  2. तार्किक अर्थात शोध सम्बन्धी भूमिका: MBA कार्यक्रम के तहत शोध और अध्ययन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित और निर्धारित शोध क्षेत्रों की स्थापना करना , विभिन्न शोध क्षेत्रों के मध्य विभिन्न सूचनाओं का आदान प्रदान करना , विभिन्न कार्यक्रमों को मोनिटर करना और संरक्षण से सम्बन्धित प्रशिक्षण प्रदान करना।
  3. विकासीय भूमिका: पर्यावरण संरक्षण और भूमि संसाधन के विकास के मध्य सम्बन्ध स्थापित करना।

3. विकासीय भूमिका

  • संरक्षणात्मक भूमिका : जननिक संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण।
  • तार्किक भूमिका : शोध कार्य और मोनिटरिंग के लिए अन्तर्राष्ट्रीय परिषद की स्थापना।
  • विकासीय भूमिका : पर्यावरण और विकास कार्यो में सम्बन्ध स्थापित करना।

UNESCO की सन 1981 की विज्ञप्ति के अनुसार जैवमण्डल प्रारक्षण के निम्नलिखित उद्देश्य है –

  • विश्व के विभिन्न भागों में जैवमंडल प्रारक्षण की अधिकाधिक संख्या में स्थापना करना।
  • संरक्षण की समन्वित योजना को कारगर बनाना।
  • पारिस्थितिकीय और आनुवांशिक विविधता और शोध में समन्वय स्थापित करना। ,
  • पर्यावरणीय दशाओं को नियमित रूप से मोनिटर करना।
  • पर्यावरण और पारिस्थितिकी से सम्बन्धित शिक्षा और प्रशिक्षण करना आदि।

जैवमण्डल प्रारक्षण का क्षेत्रीयकरण : सन 1976 में जैवमंडल प्रारक्षण के लिए सामान्य क्षेत्रीयकरण प्रारूप का प्रस्ताव रखा था। इस क्षेत्रीयकरण योजना के अंतर्गत जैवमण्डल प्रारक्षण में 3 क्षेत्र होने चाहिए –

  1. पूर्ण रूप से रक्षित कोड क्षेत्र
  2. पूर्ण रूप से सीमांकित मध्यवर्ती क्षेत्र
  3. असीमांकित बाह्य क्षेत्र अथवा आवांतर क्षेत्र

क्रोड़ क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान का प्रतिनिधित्व करता है। सरकारी कर्मचारियों को छोड़ कर कोई भी व्यक्ति इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं पा सकता है। मध्यवर्ती मण्डल का सीमांकन तो अच्छी तरह किया जाता है लेकिन इसका उपयोग ऐसे कार्यो के लिए किया जा सकता है जो पूर्णतया नियंत्रित और अविध्वंसक हो। बाह्य मण्डल की सीमा सुनिश्चित नहीं होती है। इसका प्रायोगिक शोध , परंपरागत उपयोग , पुनर्वास आदि के लिए उपयोग किया जा सकता है।

संहत जैवमण्डल प्रारक्षण

  1. सन 1977 में संहत जीवमंडल प्रारक्षण की संकल्पना का विकास किया गया। इस संकल्पना के अनुसार मुख्य “जीवमण्डल प्रारक्षण” के साथ कुछ गौण जैवमण्डल प्रारक्षण भी होने चाहिए। क्योंकि एक ही सम्बंद्ध क्षेत्र में “जैवमण्डल प्रारक्षण” के सभी कार्य सम्पादित नहीं किये जा सकते।

माइकेल बैटिसी (1986) के अनुसार इन्होने विशुद्ध “जैवमण्डल प्रारक्षण” के लिए निम्नलिखित विशेषताओं का होना आवश्यक बताया है –

  • जैवमण्डल प्रारक्षण में पूर्ण रूप से रक्षित मण्डल होना चाहिए। इसके अभाव में कोई भी जैवमण्डल प्रारक्षण विशुद्ध और वास्तविक जैवमण्डल प्रारक्षण नहीं हो सकता है।
  • जीवमण्डल प्रारक्षण में स्थित राष्ट्रीय उद्यान का उद्देश्य उसके बाहर स्थित आस पास के क्षेत्र का विकास करना भी होना चाहिए।
  • जैवमण्डल प्रारक्षण में पारिस्थितिक तंत्र के विकास के लिए संरक्षण सम्बन्धी कार्यो और शोध कार्यो और शिक्षा के मध्य पूर्ण सम्बन्ध और परस्पर सहयोग होना चाहिए।
  • किसी भी जैवमण्डल प्रारक्षण का विश्व के अन्य जैवमण्डल प्रारक्षण के साथ सम्पर्क होना चाहिए , इनमे शोध से सम्बन्धित सूचनाओं का आदान प्रदान होना चाहिए और प्रायोगिक शोध कार्यो की नियमित मोनिटरिंग होनी चाहिए।
राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य जैव मण्डल आरक्षित प्रदेश
केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार द्वारा विश्व व्यापक
1.       यह मुख्य रूप से समस्त मिली-जुली वन्य जीवों के संरक्षण के लिए होता है | यह बहुधा विशिष्ट प्रकृति के संरक्षण के लिए निर्धारित होता है | इस क्षेत्र में पूरा पारितंत्र समाहित होता है |
2.       भारत में इसका क्षेत्र आयाम 0.04 से 3162 वर्ग किलोमीटर तक होता है |

भारत में इनका वितरण निम्नलिखित है –

लगभग 40% , 100-500 वर्ग किलोमीटर

15% , 100-500 वर्ग किलोमीटर

जबकि इसका क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान की अपेक्षा अधिक व्यापक होता है | यह 0.61 से 7818 वर्ग किलोमीटर तक होता है |

भारत में इसका वितरण निम्नलिखित है –

40% , 100-500 वर्ग किलोमीटर

25% 500 वर्ग किमी.

इसका क्षेत्र प्रसार बहुधा सर्वाधिक व्यापक होता है | यह 5670 वर्ग किलोमीटर से ऊपर ही होता है , निचे नहीं |
3.       इसमें पर्यटन की अनुमति होती है | इसमें भी पर्यटन की अनुमति होती है | समान्यतया पर्यटन की आज्ञा नहीं मिलती |
4.       इसका शोध और वैज्ञानिक प्रबंधिकरण बहुधा नहीं होता | इसमें भी नहीं होता | इसमें वैज्ञानिक और शोधीय प्रबंधिकरण होता है |
5.       अभी तक इसमें व्याप्त प्राणियों के जीन पूल और उसके संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया है | इस क्षेत्र में भी बहुधा जीन पूल संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया है | इसमें बहुधा जीन पुल संरक्षण का ध्यान दिया गया है |