हिंदी माध्यम नोट्स
मनुष्य तथा मृदीय प्रक्रम क्या हैं , Man and Pedological Process in hindi मानव तथा वैश्विक तापवृद्धि
मानव तथा वैश्विक तापवृद्धि मनुष्य तथा मृदीय प्रक्रम क्या हैं , Man and Pedological Process in hindi ?
मनुष्य तथा मृदीय प्रक्रम
(Man and Pedological Process)
मृदा एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि यह मनुष्य के लिये वांछित सभी प्रकार का आहार प्रदान करती है, साथ ही साथ यह किसी न किसी रूप में सभी प्रकार के स्थलीय एवं जलीय पौधों तथा वनस्पतियों के जीवन के लिये आधार प्रस्तुत करती है। किसी निश्चित मृदा परिच्छेदिका के विभिन्न संस्तरों में कार्यरत भौतिक प्रक्रम मिट्टी के सामान्य गुणों को निर्धारित करते हैं। मिट्टियाँ मानव क्रियाकलापों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती हैं तथा बदले में मानव क्रियाकलाप मिट्टियों की परिवर्तनशील विशेषताओं को प्रभावित करते हैं। स्पष्ट होता है कि मृदा परिच्छेदिका के प्रक्रमों तथा मानव क्रियाकलापों के मध्य अन्तर्सम्बधों का अध्ययन बेहतर भूमि उपयोग नियोजन के लिये अत्यावश्यक है।
धरातलीय सतह, खासकर ढलुआ सतह की वनस्पतियों के अनावरण के परिणामस्वरूप तीव्र गति से होने वाले अपरदन के कारण मृदा परिच्छेदिका के सभी स्तरों का क्षय मनुष्य के द्वारा मृदा तंत्र में होने वाले दृश्य प्रत्यक्ष प्रभावों में सर्वप्रमुख है। मनुष्य के मृदा पर अप्रत्यक्ष प्रभावों के अन्तर्गत उसके आर्थिक क्रियाकलापों द्वारा मृदा की परिच्छेदिकाओं के विभिन्न स्तरों में मृदा के गुणों में होने वाले परिवर्तनों को सम्मिलित करत है। सर्वप्रथम विभिन्न जलवायु तथा वनस्पति मण्डलों के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का परिच्छदिकाओं के विभिन्न स्तरों की विशेषताओं का अध्ययन आवश्यक होता है। द्वितीय स्तर पर मनुष्य द्वारा मिट्टियों में किये गये निवेश के कारण मिटिटयों के संघटकों तथा मृदा परिच्छेदिकाओं के प्रकमान होने वाले अनेक परिवर्तनों तथा प्रभावों का सूक्ष्म स्तरीय अध्ययन होना चाहिए। इसके अलावा कृप विभिन्न तकनीकों तथा विधियों एवं विभिन्न प्रकार के भूमि उपयोंगों के कारण मृदा परिच्छेदिका के प्रक्रन पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन होना चाहिए। मनुष्य एवं मृदाओं के बीच अन्र्तसम्बन्धी के इतिहास का विवरण, समय के परिवेश में मिट्टियों के गणों एवं विशेषताओं में हुए पारवतना को समझने में सहायक हो सकता है। इसी तरह मृदा परिच्छेदिका के विकास एवं सम्वद्धन कपात अध्ययन से मिट्टियों के अध्ययन में तीन प्रकार से सहायता मिलती है-
(i) वर्तमान मिट्टियों में मानव-जनित गुणों एवं विशेषताओं के विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में, (ii) विभिन्न मृदा-निर्माणक प्रक्रमों के कार्य करने की दर के अभिनिर्धारण में, तथा (iii) भविष्य में मिट्टियों के विभिन्न गुणों में सम्भावित परिवर्तनों के पूर्वानुमान में। यस. ट्राजिल (1981) के मतानुसार बिना जती हई उच्चस्थलीय खरिया मिट्टी के गहरे भूरे रंग वाले श्।श् हामस तत्व अधिक होता है। जबकि जती हुई खरिया मिटटी में ह्यूमस तत्व कम होता है क्योंकि जुलाई के कारण स्तर में केंद्रित अधिक हास तत्व का मृदा परिच्छेदिका के सभी स्तरों में वितरण हो जाता है। इसके विपरीत बिना जुती हुई उच्चस्थलीय खारिया मिटटी के ‘A’ स्तर में कैल्सियम कार्बोनेट की मात्रा कम होती है (15-20 प्रतिशत) परन्तु जुताई के बाद यह मात्रा बढ़कर 68 से 90 प्रतिशत तक हो सकती है क्योंकि जुताई के कारण मृदा परिच्छेदिका के निचले स्तर से तथा मृदा के नीचे स्थित भाग से कैलसियम कानिट ऊपरी भाग में आ जाते हैं।
खाद्यानों के अधिकाधिक उत्पादन के लिये मिट्टियों को उर्वर बनाने हेतु रासायनिक खादों का प्रयोग एवं प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यद्यपि आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से कृषि में रासायनिक खादों का प्रयोग केवल वांछनीय है वरन् आवश्यक भी है परन्तु इनका प्रयोग स्थान विशेष की मिटिटयों के गुणों तथा विषेताओं और इन खादों को आत्मसात करने की मिट्टियों की क्षमता की परख एवं जानकारी के पश्चात काफी सूझ-बूझ के साथ करना चाहिए। ढीलो, बड़े कणों वाली तथा सुप्रवाहित मिट्टियों में यदि नाइटोजन का प्रयोग आवश्यकता से अधिक किया जाता है तो नाइट्रोजन के अधिक भाग का क्षय हो जाता है, क्योंकि जल में शीघ्र ही घुल जाती है तथा जल के साथ अन्यत्र गमन कर जाती है। इसके विपरीत फास्फेट मिट्टियों में आत्मसात हो जाता है तथा उसका सान्द्रण बढ़ जाता है परन्तु यह पौधों के लिए कम मात्रा ही सुलभ हो पाता है।
मनुष्य तथा वैश्विक तापवृद्धि
सामान्य तौर पर 20वीं सदी में वायुमण्डलीय तापमान में 0.5° से 0.7° C की वृद्धि दर्ज की गई है। CC की 2001 की तृतीय रिपोर्ट के अनुसार (20वीं सदी) में भूमण्डलीय स्तर पर धरातलीय सतह के तापमान में 0.6° ब् की वृद्धि हुई है। वास्तव में सन् 1860 से भूमण्डलीय तापमान में वृद्धि की प्रवति चलती ही है। IPCC के अनुसार सन् 1950 से धरातलीय सतह तथा इसके ऊपर स्थित 8 किलोमीटर तक की ऊंचाई वाले वायुमण्डल के भूमण्डलीय तापमान में प्रति दशक में 0.1° C की दर से तापमान में वृद्धि हई सन् 1979 से उपग्रह एवं गुब्बारे द्वारा तापमान के मापन के रेकार्ड से पता चलता है कि धरातलीय सतह तथा उसके ऊपर 8 किमी. की ऊँचाई वाले वायुमण्डल के तापमान में 0.15° C 0 से 0.05° C प्रति दशक वे दर से वृद्धि हुई है।
एक अनुमान के अनुसार विगत एक सौ वर्षों में (20वीं सदी) धरातलीय वायु के तापमान में 0.5° से 0.7° C तक की वृद्धि हुई है। एक अन्य अनुमान के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में जीवाश्म ईंधन (कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस) के धुआंधार दहन (Combustion) से 1880 से 1940 के मध्य 0.4° C तापमान में वृद्धि हुई है। परन्तु जीवाश्म ईंधनों के लगातार बढ़ते जलावन के बावजूद 1950 के बाद तापमान से हृास हुआ है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में 1940 के बाद तापमान में वद्धि प्रारम्भ होती है तथा 1940 एवं एवं 1960 के बीच 0.6°C तापमान की वृद्धि दर्ज की गयी। उल्लेखनीय है कि हिन्द महासागर के तापमान में 1997-1998 के दौरान 2° C की वृद्धि दर्ज की गयी जिस कारण आकस्मिक प्रवाल विरंजन की घटना हुई जिस कारण अण्डमान निकोबार तथा लक्षद्वीप के 70 प्रतिशत प्रवालों की मृत्यु हो गयी। भूमण्डलीय ताप वृद्धि के पूर्वकथन के लिए विभिन्न मॉडलों का निर्माण किया गया है। S.H. Schneider (1950) के अनुसार यदि वायुमण्डलीय कार्बन डाइआक्साइड का सान्द्रण 300 ppmv से बढ़कर 600चचउअ हो जाता है तो तापमान में 1.5 से 3°C तक वृद्धि हो जायेगी। S. Manabe तथा RT withorata (1975) ने जनरल सरकुलेशन मंडल का निर्माण किया है कि यदि वर्तमान (1975 का स्तर) वायमण्डलीय कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा दो गुनी हो जाती है तो धरातलीय तापमान में 2.9° C की वृद्धि हो सकती है।
भूमण्डलीय परिसंचरण मॉडल (GCM) के अनुसार 20वीं शताब्दी में भूमण्डलीय तापमान में 0.4° C से 0.8° C तक की वृद्धि हुई है, तथा इस मॉडल के पर्वकथन के अनुसार भविष्य में उच्च अक्षाशों वाले युगों, मुख्यतः आर्कटिक प्रदेशों का तेजी से उष्मन होगा। ग्रेट ब्रिटेन, नार्वे, कनाडा, संयुक्त राज्य आदि शीतकालीन हिम के समय से पहले पिघलने के कारण बसन्तकाल का आगमन 15 दिन पहले होने लगा क्योंकि बसन्तकालीन पौधों का पुष्पन समय से 15 दिन पहले होने लगा है। उत्तरी भारत के मैदानी भागों में आम के पेड़ों में दिसम्बर, 2007 के प्रथम पखवारे में लगभग एक महीना पहले बौर का आना भी तापमान में वृद्धि का संकेतक है। ज्ञातव्य है कि कतिपय विज्ञानियों ने आम के समय से पहले पुष्पन को वाइरस का परिणाम बताया है। IPCC (2001) की रिपोर्ट भी इस तथ्य की पुष्टि करती है क्योंकि सामान्य तौर पर 1990 से 1993 के बीच स्थलीय भागों से वृद्धि हुई है जबकि दिन के अधिकतम तापमान में मात्र 0.1° C प्रति दशक की दर से वृद्धि हुई। सागरीय भागों पर तापमान में वृद्धि स्थलीय भागों की आधी दर से हुई है। सन् 1970 से 2000 ई. के मध्य एल निनो परिघटना की वृद्धि से भी धरातलीय सतह एवं इसके वायुमण्डल के ऊष्मन का सत्यापन होता है। इस तरह 20वीं सदी के तापमान के अभिलेख से स्पष्ट होता है कि धरातलीय सतह एवं निचले वायमण्डल के तापमान में वृद्धि की प्रवृत्ति रही है जिससे यह प्रमाणित होता है कि भूमण्डलीय ऊष्मन हो रहा है। इस अवधारणा के विपरीत वैज्ञानिकों के एक वर्ग का यह तर्क है कि तापमान के आंकड़े प्रामक हैं क्योंकि अधिकांश तापमानों का मापन नगरों में किया गया है। World Wide Fund (WWF) के 2008 के पूर्वानुमान के अनुसार 2026 तक भमण्डलीय तापमान में औद्योगिक क्रान्ति के पहले के तापमान के स्तर से 2° C तथा आर्कटिक प्रदेश के तापमान में 6°C तक वृद्धि हो जायेगी।
हिमचादरों एवं हिमनदों का पिघलना
हाल के हिमचादरों एवं हिमनदों के निवर्तन के साक्ष्यों के आधार पर यह पता चला है कि ग्रीनलैण्ड एवं अण्टार्कटिका को हिमचादरें टूट रही हैं, आर्कटिक प्रदेशों के स्थायी हिमावरण पिघल रहे हैं, महाद्वीपीय हिमनदियों के आकार तथा लम्बाई में संकुचन हो रहा है तथा ऊष्ण एवं उपोषण कटिबन्धों में अवस्थित उच्च पर्वतों की हिमरेखा में ऊर्ध्व गमन हो रहा है। अण्टार्कटिका के प्राकृतिक पर्यावरण का निरन्तर मापन तथा निगरानी की जा रही है, यथा रू धरातलीय सतह एवं वायु के तापमान की माप, आइस कोर विश्लेषण, हिमचादरों एवं हिमनदियों के आकार एवं मोटाई की नाप, हिमचादरों के पिघलने एवं संकुचन की दर आदि की माप आदि। अण्टार्कटिका की हिमचादरों की नियमित निगरानी से ज्ञात हो चुका है कि उनमें 100 मी. प्रतिवर्ष की दर से संकुचन हो रहा है। सन् 1950 के बाद से पश्चिमी अण्टार्कटिका प्रायद्वीप में 4°ब् तापमान की वृद्धि दर्ज की गयी है। सन् 1940 से अण्टार्कटिका प्रायद्वीप के हवाई छाया चित्रों तथा सैटेलाइट इमेजेस के अध्ययन के आधार पर ‘ब्रिटिश अण्टार्कटिका सर्वे‘ के एलिसन कक का कहना है कि अण्टार्कटिका प्रायद्वीप के लगभग सभी हिमनदियों में निवर्तन हो रहा है।
इस प्रकार इतने पर्याप्त उपलब्ध सुलभ हैं जिनके माध्यम से प्रमाणित हो जाता है कि अण्टार्कटिका तथा ग्रीनलैण्ड में हिमशैल्फ टूट रहे है तथा बड़े-बड़े प्लावी हिमखण्डो का निर्माण हो रहा है। विभिन्न साक्ष्य अण्टार्कटिका के आइस शेल्फों में तेजी से विघटन को इंगित करते हैं। उदाहरण के लिए लार्सन आइस शा का 1995 में विघटन हो गया। सन् 1998-99 के दौरान लार्सेन समेत कई अण्टार्कटिका के हिम शेल्फा यथाः लासन B एवं वाइक्स का विघटन हो गया जिस कारण ये टटकर अण्टार्कटिका से अलग हो गग्ने तथा आइसबर्ग में परिवर्तित हो गये। हिमालय आल्प्स तथा एण्डीज पर्वतों की हिमनदियों के पिघलने तथा निवर्तन के अनेक साक्ष्य सुलभ हैं। कतिपय उदाहरणों के माध्यम से पर्वतीय हिमनदियों के पिघलन एवम सत्यापित किया जा सकता हैः
(i) पिछली शताब्दी में यूरोप के अल्पाइन हिमनदियों की लम्बाई एवं आयतन में 50 प्रतिशत की कमी आई है।
(ii) पेरू में एण्डीज पर्वत की हिमनदियों में विगत सदी के अन्तिम तीन दशकों, अर्थात् 1978 से 2000 ई. तक, उपरिमुखी निवर्तन (नचूंतक तमजतमंज) में 7 गुनी वृद्धि हुई है।
(iii) रूसी काकेसस पर्वत के हिमनदों की लम्बाई में सन् 1960 से हिमद्रवण के कारण 50 प्रतिशत हृास हुआ है।
(iv) चीनी त्यानशान पर्वतीय हिमनदों के पिघलने के कारण 1960 के बाद से उनके आयतन में 25 प्रतिशत की हानि हुई है।
(v) माउण्ट केनिया के अधिकांश हिमनद विगत शताब्दी में समाप्त हो गये। तंजानिया के माउण्ट किलीमंजारो से हिमावरण लगभग समाप्त हो गया है।
महत्वपूर्ण प्रश्न
दीर्घउत्तरीय प्रश्न
1. मानवजनिक भूआकरिकी का विस्तृत में अर्थ स्पष्ट कीजिए।
2. मनुष्य तथा जलीय उपक्रम का विस्तृत वर्णन कीजिए।
3. अपवाह बेसिन को प्रभावित करने वाले घटक स्पष्ट कीजिए।
लघुउत्तरीय प्रश्न
1. मानवजनिक भूआकारिकी का ऐतिहासिक परिवेश स्पष्ट कीजिए।
2. मनुष्य तथा तटीय प्रक्रम का विस्तुत वर्णन कीजिए।
3. मनुष्य और परिहिमानी पर टिप्पणी लिखो।
4. मनुष्य तथा मृदीय प्रक्रम पर टिप्पणी लिखो।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1. मानवजनिक भूआकारिकी को कब महत्व मिलने लगा-
(अ) प्रथम विश्व युद्ध के बाद (ब) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद
(स) शीत युद्ध के बाद (द) उपरोक्त सभी
2. ‘‘पृथ्वी के स्वरूप् को बदलने में मनुष्य की भमिका‘‘ नामक विषय पर सर्वप्रथम अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी कब हुई-
(अ) 1955 (ब) 1960 (स) 1965 (द) 1970
3. चट्टानों तथा रिगोलिथ (आवरण) के विघटन एवं वियोजन को-
(अ) कटाव (ब) अपक्षय (स) बहाव (द) अन्तराल
4. मृदा एक महत्वपूर्ण-
(अ) प्राकृतिक संसाधन है (ब) माननिर्मित संसाधन है
(स) आपदा है (द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- 1. (ब), 2. (अ), 3. (ब), 4. (अ)
Recent Posts
Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic
Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…
Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)
Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…
Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise
Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…
Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th
Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…
विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features
continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…
भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC
भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…