पर्ण जीर्णता (leaf senescence in hindi) | पर्ण जीर्णता की परिभाषा क्या है | leaf senescence कहते है

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(leaf senescence in hindi) पर्ण जीर्णता की परिभाषा क्या है | leaf senescence कहते है ?

पर्ण जीर्णता (leaf senescence) : पर्ण जीर्णता एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें पत्ती परिपक्व होकर धीरे धीरे जीर्ण होकर मृत हो जाती है या पीली पड़कर सूख जाती है। यह प्रक्रिया आनुवांशिक रूप से नियंत्रित होती है और बाह्य कारकों से भी प्रभावित होती है। अधिकतर वार्षिक पादपों में क्रमिक जीर्णता देखने को मिलती है , जिसमें पुरानी पत्तियाँ पहले जीर्ण होकर मृत होती है जबकि युवा पत्तियों में जीर्णता के लक्षण बाद में क्रमशः प्रकट होते है। पर्णपाती वृक्षों (deciduous trees) में पतझड़ में सभी पत्तियाँ एक साथ जीर्ण होकर मृत हो जाती है।

पत्तियों में जीर्णता के लिए अनेक कार्यिकी और संरचनात्मक परिवर्तन उत्तरदायी होते है। जीर्णता के समय अनेक अपघटनीय एंजाइम (hydrolytic enzymes) बनते है जो कोशिकाओं के प्रोटीन , न्यूक्लिक अम्ल और कार्बोहाइड्रेट का अपघटन करते है। अपघटनकारी एन्जाइम्स के प्रभाव से संश्लेषी प्रक्रियाएँ समाप्त हो जाती है जिससे पत्तियों के ऊत्तक में इन पदार्थो की सांद्रता कम होने लगती है।
जीर्णता की प्रारम्भिक अवस्था में पत्ती में उपस्थित क्लोरोफिल विघटित होने लगता है और क्लोरोप्लास्ट के एंजाइम्स और प्रोटीन नष्ट हो जाते है। क्लोरोफिल के नष्ट होने से पत्तियां पीली पड़ने लगती है। क्लोरोफिल के नष्ट होने के साथ ही एंथोसायनीन की मात्रा पत्तियों में बढ़ जाती है। जिससे पत्तियाँ लाल पीली अथवा कॉपर कलर की दिखाई देने लगती है। जीर्णता के कुछ एन्जाइम प्रमुख रूप से rubisco की क्रियाशीलता भी समाप्त हो जाती है जिससे प्रकाश संश्लेषण की दर में अत्यधिक हास होता है।
जीर्णता के समय पत्तियों में प्रोटीन की मात्रा तेजी से कम होती है जिसके दो प्रमुख कारण है –
(1) प्रोटीन संश्लेषण की दर कम हो जाती है जिससे नए प्रोटीन नहीं बनते और (2) प्रोटीन अपघटन की दर बढ़ जाती है। प्रोटीन का अपघटन अमीनों अम्लों में होता है जिससे पत्तियों में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है और इसका स्थान्तरण अन्य भागों में हो जाता है। इसके अतिरिक्त जीर्णता के समय लिपिड कलाओं का हास होता है , जिससे कला पारगम्यता बढ़ जाती है इसके फलस्वरूप कोशिका में खण्डों का विभेदन समाप्त हो जाता है।
जीर्णता विभिन्न हार्मोन के संतुलन द्वारा नियंत्रित होती है। हार्मोन सान्द्रता का पर्ण जीर्णता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सामान्यतया इथाइलीन और एब्सिसिक अम्ल , जीर्णता को प्रेरित करते है जबकि आक्सिन , जिब्बेरेलीन और साइटोकाइनिन जीर्णता को स्थगित करने में सहायक होते है। जीर्णता की स्थिति में इथाइलीन और एब्सिसिक अम्ल की मात्रा कई गुणा तक बढ़ जाती है जिससे जीणता की गति में वृद्धि हो जाती है। इथाइलीन और एब्सिसिक अम्ल सामूहिक रूप से “मृत्युकारी हार्मोन” का कार्य करते है।
किसी भी पादप में जीर्णता का चमोत्कर्ष पादप की प्राकृतिक मृत्यु के रूप में होता है। पुरानी पत्तियों की जीर्णता के फलस्वरूप इनके झड़ने से पूर्व पोषक तत्वों का पादप के अन्य विकासशील भागों में पुनर्वितरण होता है जिससे तरुण पत्तियों तथा कलिकाओं के विकास में सहायता मिलती है। पर्णपाती वृक्ष जीर्णता के माध्यम से प्रतिकूल परिस्थितियों को टालने में सक्षम होते है।