लाओस देश का इतिहास | laos country in hindi लाओस की राजधानी और मुद्रा क्या है ? capital currency

By   September 18, 2020

(laos country in hindi information and history) लाओस देश का इतिहास लाओस की राजधानी और मुद्रा क्या है ? capital currency ?

लाऔस
संरचना
उद्देश्य
प्रस्तावना
लाऔसी समाज
पाश्चात्य प्रभाव
लाऔस का भूगोल, इतिहास तथा अर्थव्यवस्था
प्राचीन काल
आधुनिक इतिहास
लाऔस की अर्थव्यवस्था
राजनैतिक घटना विकास
सांझा मोर्चा सरकार का गठन और राजनैतिक पार्टियां
लाऔसी सत्ता संघर्ष के प्रमुख लक्षण
अन्तर्राष्ट्रीय निहितार्थ
साम्यवाद की विजय
त्रियोका की विफलता
दक्षिणपंथी झुकाव
1973 के श्समझौते की विफलता
नयी सरकार
नेतृत्व
आंतरिक कलह
संविधान
विकासात्मक रणनीति
विदेश संबन्ध
सारांश
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
यह इकाई लाऔस के समाज एवं राजनीति से आपका परिचय कराती है। इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आपको निम्नलिखित में सक्षम होना चाहिये
ऽ लाऔस के समाज, भूगोल, इतिहास एवं अर्थव्यवस्था की मूल विशेषताओं की व्याख्या
ऽ लाऔस में गठबंधन की राजनीति की प्रक्रिया का वर्णन
ऽ लाऔस में साम्यवाद की विजय का विवरण और
ऽ नई सरकार के कामकाज की चर्चा

प्रस्तावना
वियतनाम और कम्बोडिया के समाज और राजनीति के बारे में आप पहले ही पढ़ चुके हैं। इस इकाई में हम आपका परिचय हिन्द-चीन के एक तीसरे देश, यानि लाऔस, से करा रहे हैं। लाऔस के समाज एवं राजनीति की उत्पत्ति के बारे में जानना आवश्यक है, क्योंकि इन्हें मात्र वर्तमान कामकाज की दृष्टि से नहीं जाना जा सकता। लाओस में राजनैतिक घटना-विकास विभिन्न

लाऔसी समाज
लगभग 40 लाख से थोड़ी अधिक जनसंख्या वाला बहुजातीय राष्ट्र लाऔस चालीस विभिन्न जातीय समूहों से मिलकर बना है। जातीय तौर पर लाऔस की जनसंख्या को चार प्रमुख समूहों में बांटा जा सकता हैः लाओ लम (घाटी की लाओ), लाओ ताई (आदिवासी ताई), लाओ थियंग (पहाडी इलाके का लाओ) तथा लाओ सुंग (पहाड़ की चोटियों पर रहने वाले मिओ तथा याओ आदिवासियों जैसे लाओ)। यद्यपि इन जातीय समूहों में से किसी भी एक का बहुमत नहीं है, फिर भी घाटी के लाओ संख्या एवं सामाजिक स्थिति के तौर पर स्पष्ट रूप से प्रभुत्वशाली हैं। इस समूह के अन्तर्गत कुल जनसंख्या का लगभग चालीस प्रतिशत भाग आता है। सांस्कृतिक एवं भाषाई रूप से घाटी के लाओ थाईयों से संबद्ध हैं। उत्तर-पूर्वी थाईलैण्ड में इनकी संख्या लाऔस से भी अधिक है। लाऔस की राजसी सरकार रॉयल लाओ गवर्नमैण्ट का शासन घाटी के प्रतिष्ठित लाओ करते थे, जिन्हें अन्य जातीय समूहों द्वारा आबाद किये गये क्षेत्रों तक में जिला तथा प्रान्तीय प्रमुखों के रूप में नियुक्त किया गया था। दूसरी ओर वामपंथ की तरफ झुकाव रखने वाले पाथेट लाओ एक। बहुजातीय समाज के ध्येय पर जोर दे रहे थे और साम्यवादी प्रतिरोध आन्दोलन के अनेक नेता जातीय अल्पसंख्यक समूहों से निकले थे। मैकौंग और लाल नदी के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों में बसे आदिवासी ताई आबादी का लगभग 16 प्रतिशत भाग थे। लाऔस के सबसे पुराने निवासी, लाओ थियंग आबादी का लगभग 34 प्रतिशत थे। मौन-खमेर नस्ल के ये पहाड़ी लोग भी सत्रहवीं सदी में पहाड़ों के निचले हिस्सों में चले आये। उन्हें ‘‘श्वास’’ पुकार कर बेइज्जत किया जाता है। टाओयी भाषा में इस का अर्थ है: “गुलाम’’ आदिवासी ताईयों तथा लाओ थियंगों की घाटी लाओ लोगों के खिलाफ लम्बे समय से शिकायतें रही हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य में लाऔस में आये सुंग तीन हजार फीट ऊंची भूमियों पर बस गये और जनसंख्या का 9 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। उपरोक्त के अलावा चीनी तथा बर्मी सीमाओं के नजदीक रहने वाले अख्खा और लोलों कबीलों जैसे अन्य जातीय अल्पसंख्यक भी मौजूद हैं। शहरी क्षेत्रों में वियतनामी, चीनी व दक्षिण एशियाई लोग हैं, जिनकी संख्या मामूली है। वे मौजूदा शताब्दी के दौरान ही लाऔस में आकर बस गये हैं और वाणिज्यिक गतिविधियों में लगे हुए हैं।

पाश्चात्य प्रभाव
पश्चिम के साथ संपर्क के फलस्वरूप लाऔस के पारंपरिक सामाजिक ढांचे में बदलाव आये हैं। पारंपरिक आत्मनिर्भर गांवों में रहने वाले लोग मैकोंग नदी के आसपास के क्षेत्रों में शहरीकरण के प्रभाव में आए हैं। अधिनायकवादी ढांचे ने किसानों को स्थानीय प्रभुत्व वर्ग की कृपादृष्टि पर छोड़ दिया, जोकि अमरीकी सहायता का दुरुपयोग करके अमीर बन गये थे। पाथेट लाओ लोगों ने इसका पूरा फायदा उठाया और अनेक लाऔसवासी उनकी विचारधारा की तरफ आकर्षित हुए। कम्युनिस्टों की विजय के बाद, नये सत्ता ढांचे के नियमों के अनुरूप जीवन शैली में बदलाव आये। जनसंख्या का अधिकांश भाग बौद्ध धर्म का पालन करता है जोकि कम्बोडिया एवं थाईलैण्ड से लाऔस में आया था। लोगों के जीवन में लोकगीत एवं नृत्य महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। बाँस के छोटे-छोटे टुकड़ों की सात खपच्चियों से मिलकर बनाया गया “खेनेश्’’ नामक संगीत वाद्य बहुत लोकप्रिय है। लाऔस की संस्कृति तथा समाज पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। पहली शताब्दी ईसवी से, भारत तथा लाऔस के बीच सांस्कृतिक सम्बंधों में बढ़ोत्तरी हई। भारत की सांस्कृतिक घुसपैठ शान्तिपूर्ण एवं गैर-राजनैतिक तरीकों से हुई। हिन्दू देवी-देवताओं के नामों से लाऔस के लोग परिचित हैं और वे बुद्ध की प्रार्थना करते समय इंद्र, शिव, विष्णु इत्यादि का नाम पुकारते हैं। जन्म तथा विवाह जैसे अवसरों पर बौद्ध धर्म के साथ-साथ हिन्दू रीति-रिवाजों का भी पालन किया जाता है। लाऔस के शास्त्रीय साहित्य पर संस्कृत एवं पाली भाषाओं का व्यापक प्रभाव पड़ा है। लाऔस में राम और कृष्ण की कहानियां लोकप्रिय हैं। ‘‘पंचतंत्र’’ और ‘‘जातकों’’ से ली गई कहानियों ने लाऔस की भाषा को समृद्ध बनाया है। लाऔस के शास्त्रीय नृत्य में भारतीय नृत्यों की भंगिमाओ और भावों को दर्शाने वाला गहन प्रभाव देखा जा सकता है। कला और वास्तुकला के क्षेत्र में विभिन्न अवधारणायें भारतीय थीं, किन्तु नमूनों के चयन तथा अन्य बारीकियों में स्वदेशी रूप दिया गया था।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणियां: क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से कीजिये।
1) लाऔसी समाज की प्रमुख विशेषताएं क्या थी?

 लाऔस का भूगोल, इतिहास तथा अर्थव्यवस्था
लाऔस 2,31,000 वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल वाला एक जल अवरुद्ध देश है, जोकि हिन्द-चीन प्रायद्वीप के मध्य में स्थित है। यह पांच देशों से घिरा हुआ हैः उत्तर में चीन, दक्षिण में कम्बोडिया, पूर्व में वियतनाम तथा पश्चिम में थाईलैण्ड और बर्मा। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण लाऔस अपने पड़ोसियों के बीच एक बफर राज्य बना रहा है और परस्पर विरोधी हितों वाला क्षेत्र भी एशिया की चैथी सबसे बड़ी नदी मैकोंग लाऔस में बहती है। इसका आधा भाग थाईलैण्ड के साथ लाऔस की सीमा का निर्धारण करता है। मैकोंग नदी घाटी के अलावा, लाऔस का अधिकांश क्षेत्र पथरीला और पर्वतीय है। देश के दो-तिहाई भाग में जंगल फैला हुआ है। हो चि मिन्ह का प्रसिद्ध खोजी रास्ता केयो निउआ तथा भुजिया पर्वतीय दरों के जरिये उत्तरी वियतनाम से पूर्वी लाऔस को पार करता है। यह लाऔस के पैनहैण्डल के रास्ते दक्षिण की तरफ बढ़ता है और अंततः दक्षिण वियतनाम में जाकर प्रकट होता है। यह खोजी रास्ता एक ऐसा मुख्य आपूति मार्ग था जिसके माध्यम वियतकौंग के गुरिल्ला उत्तरी वियतनाम से सहायता प्राप्त करते थे। उत्तरी लाऔस के जिऐंग खौंग प्रान्त मेंय रहस्यमयी अंतिम संस्कार के अस्थि कलश वाला जार का मैदानी क्षेत्र है। मैदानी क्षेत्र एक सामरिक महत्व रखता है क्योंकि इस पर जिसका नियंत्रण रहता है, वही लाऔस में भूतक संचार पर प्रभुत्व की स्थिति में रहता है। लाऔस की जलवायु ऊष्णकटिबंधी मानसून जैसी है, जहां मई से अक्टूबर तक वर्षा ऋतु तथा नवम्बर से अप्रैल तक शुष्क मौसम रहता है। सैन्य गतिविधियों ने भी इस चक्र का ध्यान रखा है। शुष्क मौसम हल्के हथियारों वाले पाथेट लाओ लोगों की सहायता करता है, जबकि वर्षा के मौसम में बेहतर संसाधनों, हवाई-आपूर्ति तथा अमरीका समर्थित सरकारी सेनाओं को अधिक लाभ मिलता है।

प्राचीन काल
प्रचीन काल में, लाऔस के दक्षिणी भाग में छोटी-छोटी स्वतंत्र रियासतें मौजूद थीं। स्थानीय सरदारों द्वारा वहां के निवासियों को सुरक्षा प्रदान किए जाने पर आधारित एक राजनैतिक प्रणाली विकसित हुई। दक्षिणी लाऔस फुनान के अधीन राज्य कम्बोज का एक हिस्सा था। आगे चलकर मध्य एवं उच्चतर लाऔस चेनला खमरों के अधीन हो गये। लोऔस चैदहवीं सदी के मध्य में जाकर ही एकीकृत राज्य के रूप में उभरा, जब फा नागम ने लान जांग साम्राज्य की स्थापना की, जिसकी राजधानी लुआंग नाबांग थीं। जब तक पड़ोसी राज्य कमजोर बने रहे, तभी तक यह साम्राज्य भी बना रहा। अट्ठारवीं शताब्दी की शुरुआत के समय, वंशगत झगड़ों ने, जिनके अन्तर्गत विरोधी दावेदारों ने वियतनाम और थाईलैण्ड में सहायता मांगकर समाधान ढंढने की कोशिश की थी लान जांग के टुकड़े करा दिये। लुआंग प्रबांग, वियेनटिये तथा चम्पासाक की पृथक रियासतें स्थापित की गई। थाईलैण्ड तथा वियतनाम के बीच इन तीनों रियासतों के अधिराजत्व को लेकर लम्बे समय तक तकरार चलती रही।

आधुनिक इतिहास
आधुनिक इतिहास में भी टकराव की झलक मिलती है। जिस तरह कोई भी वियतनामी राज्य जार श्के मैदानी क्षेत्रों तथा आसपास के इलाकों की शत्रुता मोल नहीं ले सकता उसी प्रकार थाईलैंड मैकौंग नदी के पश्चिमी तट पर किसी मैत्रीपूर्ण शासन प्रबन्ध की इच्छा रखता था। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम पच्चीस वर्ष में, लाऔस को थाईलैण्ड के मध्यम पूर्व की दिशा में विस्तार करते ग्रेट ब्रिटेन तथा वियतनाम के मध्यम पश्चिम की तरफ से दबाव डाल रहे फ्रांस के बीच शत्रुता को झेलना पड़ा। 1843 में लाऔस फ्रांस का संरक्षित राज्य बन गया और हिन्द-चीन संघ के प्रशासनिक ढांचे के अन्तर्गत आ गया। फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन के आधी शताब्दी तक चले शासन के बावजूद लाऔस अत्यधिक अविकसित देश बना रहा। फ्रांमीमी औपनिवेशिक नीति का निर्धारण एवं निर्देशन हनोई से होता था। लाऔस वियतनाम का एक उपनिवेश प्रतीत होता था और फ्रांसीसी नौकरशाहों द्वारा उसका प्रशासन. किया जाता था। 1946 तक केवल 1 प्रतिशत जनसंख्या को ही प्राथमिक शिक्षा मिली थी। लाऔस का व्यापार समूचे हिन्द-चीन के व्यापार का एक प्रतिशत ही था। फ्रांसिसीयों के दमन के कारण लाओ थियंग तथा लाओ मुंग द्वारा अनेक विद्रोह किये गये। दूसरे विश्व युद्ध तक, लाऔस में वियतनाम की भांति राष्ट्रवाद ने एक ठोस स्वरूप नहीं प्राप्त किया था। लाऔस के लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं हुआ था तथा उनके द्वारा विभिन्न देशों में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलनों का प्रयास भी नहीं महसूस किया गया था। दक्षिण में चम्पासाक तथा उत्तर में लुआंग प्रबांग के सामंती घरानों के बीच चल रही पारंपरिक शत्रुता के चलते लाऔस में राष्ट्रवाद की चेतना का अभाव बना रहा। राजा व उसके परिवार भूस्वामियों, बौद्ध पुजारियों तथा नागरिक सेवा के अधिकारियों से मिलकर बना मुट्ठी भर प्रतिष्ठितों का तबका फ्रांसीसी संरक्षण पर टिका हुआ था। वहां जो भी राष्ट्रीय पहचान थी, वह घाटी के लाओ लोगों की सांस्कृतिक परंपरा से निकली थी। यह लाओथियंग तथा लाओ सुंग लोगों के लिये अनुकूल नहीं थी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, वियतनामियों तथा थाई लोगों की सहायता से घाटी के लाओ राष्ट्रवादियों के नेतृत्व में स्वाधीनता संघर्ष चलाया गया। “लाओ इस्सारा’’ अथवा मुक्त लाऔस आन्दोलन ने फ्रांसीसियों को जापानी आत्मसमर्पण के बाद पुनः सत्ता हथियाने से रोकने की कोशिश की और लुआंग प्रबांग तथा चम्पास्साक रियासतों के एकीकरण की घोषणा कर दी। अक्टूबर 1945 में लाओ इस्सारा सरकार बनी। फ्रांसीसी आक्रमण के बाद इसके नेता ने थाईलैण्ड में शरण ले ली। लाऔस पहले हिन्द-चीन युद्ध के साथ घनिष्ट रूप से जुड़ा रहा। फ्रांसीसियों ने लाऔस को अनेक सहूलियतें प्रदान करना शुरू किया, क्योंकि जब वियतमिन्ह के साथ उनकी लड़ाई चल रही थी, तब वे पीछे वाले क्षेत्र में शान्ति बनाये रखना चाहते थे। अगस्त 1946 में लाऔस को आन्तरिक स्वायत्ता प्रदान की गई। मई 1947 में एक निर्वाचित संविधान सभा द्वारा तैयार किए गए एक संविधान की राजा सिसावौंग वांग द्वारा घोषणा की गई। लाऔस के एकीकृत राज्य को एक संवैधानिक राजतंत्र बनना था। 19 जुलाई 1949 के फ्रांस-लाऔस समझौते के अंतर्गत लाऔस की स्वतंत्रता को फ्रांस द्वारा मान्यता प्रदान की गई और लाऔसं ‘‘फ्रांसीसी संघ का सहयोगी राज्य’’ बना रहा। रक्षा एवं विदेश संबन्ध फ्रांस के हाथों में ही बने रहे।

लाऔस की अर्थव्यवस्था
लाऔस एक अविकसित देश है जिसकी प्रति व्यक्ति आय 170 प्रति वर्ष है। इसकी 40 लाख की जनसंख्या का लगभग 90 प्रतिशत भाग कामचलाऊ खेती में लगा हुआ है। चावल के उत्पादन में आत्मनिर्भर लाऔस मक्का, मीठा आलू, कॉफी, तंबाकू तथा लक्वीनीन आदि की पैदावार भी करता है। मियो द्वारा अफीम की खेती आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है। जंगलों में लकड़ी के संसाधन मौजूद है। प्राकृतिक संसाधनों में टिन, कोयला, सोना, ताँबा तथा मीसा मौजूद हैं। टिन तथा कुछ हद तक पोटाश और लौह अयस्क को छोड़कर इन खदानों से खनन किया गया है। लाऔस में लगभग 170 छोटे कारखाने हैं जिनमें प्लाईवुड, बिजली के तार, दवाएं, मोमबत्तियां, माचिस तथा सिगरेटों जैसी चीजों का उत्पादन होता है। लाऔस में संचार का ढांचा पर्याप्त नहीं है। देशभर में 6,000 कि.मी. दूरी तक फैली सड़के हैं। लकड़ी तथा वन उत्पादों, नाम गम के जलविद्युत डैम से प्राप्त बिजली तथा कुछ कृषि उत्पादों से ही विदेशी मुद्रा की आय होती है। अफीम तथा मारीजुआना से होने वाल वास्तविक आय के बारे में जानकारी नहीं है। लाऔस पैट्रोलियम पदार्थों, कपड़ों मशीनों, सीमेण्ट, कागज तथा इस्पात का आयात करता है। कुछ अन्य संकेतक भी लाऔस में विकास के निम्न स्तर की तरफ इंगित करते हैं। जन्म के समय जीवन की संभाव्यता क्षेत्र में एक देश को छोड़कर सबसे कम है। प्रति महिला जन्मों का औसत (लगभग 8) सबसे ऊंचा है। साक्षरता की दर पड़ोसी देशों से कम है। बच्चों का एक छोटा भाग ही माध्यमिक स्तर तक शिक्षा जारी रख पाता है। 35 से 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। युद्धों, खराब संचार, समुद्री बंदरगाहों तक प्रवेश करने की इच्छा तथा मद्रा संबन्धी अस्थिरता से पैदा हआ लाऔस का आर्थिक असंतुलन देश की अर्थव्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त हो जाने का कारण बन सकता था। हालांकि, विकसित देशों तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा दी गई वित्तीय, तकनीकी तथा वस्तुओं की सहायता से कुछ हद तक इस असंतुलन को दूर करने में मदद की है।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणियां: प) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये उत्तर से कीजिये।
1) लाऔस के आधुनिक इतिहास की संक्षिप्त चर्चा कीजिये।
2) लाऔस की आर्थिक रूपरेखा पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये।

 राजनैतिक घटना विकास
इस भाग में हम लाऔम द्वारा फ्रांसीसी संघ के ढांचे के अन्तर्गत औपचारिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लिये जाने के बाद वहां हुए राजनैतिक विकास पर चर्चा करेंगे। विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा साँझा मोर्चा सरकारें बनाई गई। विदेशी शक्तियों की भागीदारी के फलस्वरूप चलते राजनैतिक प्रगति में बाधा उत्पन्न हुई और लाऔस में गृह युद्ध भड़क उठा।

सांझा मोर्चा सरकार का गठन और राजनैतिक पार्टियां
जुलाई 1949 के फ्रांसीसी-लाऔम समझौते के बाद लाऔस के प्रतिष्ठितों का एक बड़ा वर्ग सरकार का गठन करने के लिये वापस लौटा। वामपंथी रुझान वाले पाथेट लाओ ने उस सरकार का विरोध किया जोकि फ्रांसीसियों से हाथ मिलाने को तैयार थी। अगस्त 1950 में इसने एक प्रतिरोध सरकार स्थापित की। वियतमिन्ह के साथ इसकी भी यही इच्छा थी कि समूचे हिन्द-चीन को फ्रांसिसी प्रभाव के जुए से मुक्त कर लिया जाये। गंभीर कठिनाइयों से घिरे फ्रांसीसियों ने आर.एल.जी. के प्रधानमंत्री सूवाना फूमार से वार्ता आरम्भ की। अक्टूबर 1953 की फ्रांसीसी-लाऔसी संधि ने लाऔस को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की। पर हिन्द-चीन में फ्रांसीसियों के दिन खत्म हो रहे थे। वियतमिन्ह-पाथेट लाओ ताकतें अनेक मोर्चों पर आगे बढ़ रही थी। 7 मई 1954 को दिएन बिएन फू में हुई फ्रांसिसी पराजय ने हिन्द-चीन में फ्रांस के औपनिवेशिक शासन का अंत कर दिया। दिएन बिफून के पतन के एक दिन बाद जेनेवा सम्मेलन का हिन्द-चीनी सत्र शुरू हुआ। फ्रांस, अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, जनवादी चीन, कम्बोडिया, लाऔस तथा दोनों वियतनाम जेनेवा सम्मेलन में भाग ले रहे थे। पाथेट लाओ की प्रतिरोध सरकार को मान्यता नहीं दी गई और वह सम्मेलन में भागीदार बनने में सफल नहीं हो सकी। पाथेट लाओ की लड़ाकू टुकड़ियों की औपचारिक हैसियत इसके फलस्वरूप कमजोर पड़ गई। सदस्य देशों ने लाऔस की प्रभुसत्ता, स्वाधीनता और प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान करने की शपथ ली। पाथेट लाओ लोगों को राष्ट्रीय मख्यधारा में शामिल किया जाना था उन्हें राजनैतिक प्रक्रिया में भागीदारी करनी थी। किन्तु राजनैतिक प्रक्रिया बहुत धीमी थी। एक सांझा मोर्चा सरकार की शर्तों पर हुए समझौते को टाल दिया गया। सरकार पाथेट लाओ के प्रभुत्व वाले इलाकों पर अपनी सत्ता स्थापित नहीं कर सकी। अगस्त 1955 के चुनाव पाथेट लाओ की भागीदारी के बगैर ही कराये गये। सुवाना फूमा जोकि मार्च 1956 में प्रधानमंत्री बने थे, उन्होंने राष्ट्रीय । सुलह-सफाई को पहली प्राथमिकता दी। आर.एल.जी. तथा पाथेट लाओ के बीच एक शान्तिपूर्ण संबन्ध विकसित हुआ। पाथेट लाओ के राजनैतिक अंग ष्निओ लाओ हक सत” (एन.एल.एच.एस.) को कानूनी तौर पर वैध घोषित किया गया और देश की राजनैतिक प्रक्रिया में भाग लेने की इजाजत दी गई। आर.एल.जी तथा पाथेट लाओ के बीच हुए वियनटियन समझौते में कहा गया कि एक सांझा मोर्चा सरकार गठित की जायेगी तथा परक चनाव कराये जाने होंगे। फौंग सेली और सैम निउमा के पाथेट लाओ प्रान्तों का प्रशासन आर.एल.जी. को हस्तांतरित किया जाना था तथा पाथेट लाओ सेना की दो बटालियने रॉयल लाऔसी सेना में मिलाई जानी थी। विदेश नीति की दृष्टि से लाऔस को उदासीन और गुट निरपेक्ष रहना था। नवम्बर 1957 में राष्ट्रीय संघ की सरकार का गठन हुआ। इसने उत्साह से शुरुआत की और राष्ट्रीय असैम्बली में 21 मीटों के लिए 4 मई 1958 को पूरक चुनावों की तैयारियां कर ली गई। चुनावों ने पाथेट लाओ की शक्ति को साबित कर दिखाया, जिसने अपने सहयोगियों के साथ 13 सीटें जीती थीं। इसमे प्रतिस्पर्धा कर रहे राजनैतिक समूहों में आतंक की स्थिति पैदा हो गई और राजनैतिक शक्तियों का एक नया समीकरण पैदा हुआ।

 लाऔसी सत्ता संघर्ष के प्रमुख लक्षण
लाऔस की राजनीति में, सत्ता संघर्ष के अंतर्गत तीन मुख्य धाराएं थीं-दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी तथा वामपंथी। एन.एल.एच.एस. को छोड़कर जोकि पाथेट लाओ का राजनैतिक अंग था, आमतौर पर राजनैतिक पार्टियां किसी खास विचारधारा पर दृढ़ता के साथ कायम नहीं थीं। दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग के अनुयायी तेजी से अपनी राजनीतिक विचारधाराओं को बदलते रहे। मात्र स्वार्थपरता के कारण ही लोग एक से दूसरे दल में शामिल होते रहे। किसी विशेष परिस्थिति के जवाब में अथवा किसी घटना का विरोध करने के लिए पार्टियों की स्थापना भी की गई। राजनैतिक हत्याएं आम हो गई थीं। मध्यवर्ग की अनुपस्थिति, जारी परंपराओं और राजसी घरानों के बीच मतभेदों के कारण दलीय-व्यवस्था के विकास के मार्ग में बाधा पड़ी। दक्षिणपंथ की तरफ, झुकाव था स्वतंत्र और राष्टीय प्रगतिशीलों का। फई सैननिकोन के नेतत्व में स्वतंत्र लोग जापानी कब्जे के बाद फ्रांसीसियों की वापसी को स्वीकार कर लेने के इच्छुक थे और राष्ट्रीय प्रगतिशीलों ने 1951 में स्वतंत्र लोगों से सत्ता छीन ली थी। “लाओ इस्सारा’’ के सूबाना फूमा तथा कोटे सैसोरिय जैसे भूतपूर्व नेताओं ने 1949 में राष्ट्रीय प्रगतिशील पार्टी को संगठित किया। नेशनल यूनियन और डैमोक्रेटिक पार्टियां पर्याप्त तौर पर इतनी ताकत नहीं जुटा सकी कि वे महत्वपूर्ण सिद्ध हो पाती। इन दोनों ने स्वतंत्र पार्टी के साथ मिलकर लाओ यूनियन फार पब्लिक सेफ्टी का निर्माण किया। इसके बाद पुनः फेरबदल होता रहा। जून 1958 में सोउवाला फोउमा ने काटे एवं फोउई सनाईकोनी के साथ मिलकर लाओसी पीपुल्स रैनी (आर.पी.एल) बनाई जोकि नेशनल प्रोग्रेसिव एवं इण्डियेण्डेण्ट पार्टियों से बनी थी। उग्र दक्षिणपंथी संगठन, कमेटी फार डिफेन्स आफ नेशनल इण्टरेस्ट (सी.डी.एन.आई.) निर्माण साम्यवाद को रोकने के लिये अमरीकी मद से किया गया। इसके नेता फाउमी नोसावन ने पायेट लाओ को सत्ता से हटाये जाने की मांग की ओर एक पश्चिम समर्थक सरकार बनाये जाने की पेशकश की। मध्य में यनिरपेक्ष लोग थे। क्विनिय फोलसेना की “सान्तिफल’’ (थीस पार्टी) अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उदासीनता में विश्वास रखती थी और आर.एल.जी. तथा पाथेट लाओ के बीच शक्ति बनाना चाहती थी। राजनैतिक नेताओं में से सोउवाना फोउना सबसे अधिक मान्य नेता थे और परिस्थिति के अनुसार दक्षिणपंथी एवं वामपंथी, दोनों ने ही उनका प्रयोग किया। मई 1961 में उन्होंने लाओ पेन कॉग (निरपेक्ष) पार्टी बनाई अति वामपंथ में विश्वास करने वाले पाथेट लाओ (लैण्ड आफ लाऔस) थे। इसके नेता प्रिंस सोउफानोरोंग, लुआग प्रदवंग राजसी परिवार के प्रिंस सोउवान्ना फोउमा के आधे भाई थे। लाओ इस्सारा आन्दोलन में दोनों में गठबंधन किया था। लाओ इस्सारा गुरिल्ला सेना के लिये फरवरी 1949 में सोउफनोवोंग ने एक पृथक मोर्चे का गठन किया। वह अक्टूबर 1949 में वियतचिन्ह के मुख्यालय तुइंग-क्वांग में हो ची मिन्ह के साथ मिल गये। सोउफानोरोंग ने केसान, फोउ वोंगतिचिट, सोउक वोंगसाक तथा अन्य लोगों के साथ मिलकर पाथेट लाओ का निर्माण किया। 13 अगस्त 1950 को एक प्रतिरोध सरकार की घोषण की गई। एन.एल. एच.एस. इसका राजनैतिक अंग था। इसमें लाओ थिडंग तथा लाओ मुंग अल्पसंख्यकों की भर्ती की और अन्य पार्टियों के विपरीत यह मैकोग घाटी क्षेत्र से मिलने वाले समर्थन पर आधारित नहीं थी। पाथेट लाओ, उत्तरी वियतनाम के समर्थन से, लाओस को फ्रांस एवं अमरीकी प्रभाव से मुक्त करना चाहते थे। चूंकि लाऔस विभिन्न पार्टियों की विचारधारा के आधार पर बुरी तरह विभाजित था, अतः साँझा मोर्चा सरकार को सहज रूप में चलाना असंभव हो गया। दिसम्बर 1958 आर.एल.जी. तथा पाथेट लाओ सेनाओं के बीच सीमा पर झड़पें हुई। सी.डी.एन.आई. पाथेट लाओ के प्रति एक सख्न नीति बनाने के लिये दबाव डाल रही थी। फाउमी नोसावन ने विद्रोह कराकर तख्ता पलट दिया और ‘‘पैम्सा सांगखोम’’ (सोशल डैमोक्रेट) नामक एक नई पार्टी की 1960 में स्थापना कर दी। इसके सदस्य सी.डी.एन.आई. कछ आर.पी.एल. सदस्यों के चने हए प्रतिनिधियों से लिये गये थे। लाऔस अति दक्षिणपंथ की तरफ बढ़ रहा था और राजधानी में एन.एल.एच.एस. का कोई भी प्रतिनिधि नहीं बचा था। राष्ट्रीय शान्ति वार्ता नहीं थी।

 अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थ
शीत युद्ध के तीव्र हो जाने के साथ ही लाऔस की समस्या एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही थी। कम्युनिस्ट शिविर ने पाथेट लाओ का समर्थन किया जबकि अमरीका एवं थाईलैण्ड दक्षिणपंथ के समर्थन में खड़े हो गये। विदेशी शक्तियों की भागीदारी के फलस्वरूप लाऔस की समस्या के एक राजनैतिक समाधान का रास्ता अवरुद्ध हो गया। बाहरी हस्तक्षेप की वजह से देश दो भिन्न राजनैतिक प्रणालियों के साथ दो भागों में बंट गया। अमरीका ने लाऔस की परिस्थिति को कम्युनिस्टों की विश्व प्रभत्व की महिम के हिस्से के रूप में देखा। उत्तरी वियतनाम तथा चीन के विरुद्ध लाऔस को पहली सुरक्षा पंक्ति के तौर पर उन्मूलन रणनीति के अंतर्गत शामिल किया गया। आर.एल.जी को भारी सैन्य एवं आर्थिक सहायता प्रदान करके मजबूत बनाया गया ताकि वह पाथेट लाओ की प्रगति को रोक सके। लाओस विश्व में अकेला ऐसा देश बन गया जहां अमरीका आर.एल.जी के सैन्य बजट को शतप्रतिशत सहायता दे रहा था। वियतनाम युद्ध के तीव्र होने के साथ ही लाऔस में अमरीका की गतिविधियां भी बढ़ गई। पाथेट लाओ आन्दोलन की प्रगति में उत्तरी वियतनाम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और “फाक पासोसन लाओ’’ (पीपुल्स पार्टी आफ लाऔस) के माध्यम से जिसकी स्थापना मार्च 1955 में हुई थी, भारी असर डाला था। इसने । हथियार, गोलाबारूद तथा सैन्य सलाहकार पाथेट लाओ. को प्रदान किये थे। उत्तरी वियतनाम के लिये लाऔस में कम्युनिस्टों को मिलने वाली हर सफलता दोनों वियतनामों के एकीकरण की दिशा में बढ़ा हुआ एक कदम ही था। लाऔस को लेकर थाई-वियतनामी संघर्ष प्राचीन समय से जारी था।

थाईलैण्ड यह नहीं चाहता था कि मैकोंग क्षेत्र पर किसी शत्रु-ताकत का शासन रहे। अमरीका से गठजोड़ करके थाईलैण्ड ने आर.एल.जी. के साथ निकटतम सैन्य व आर्थिक संबन्ध बना लिये थे। अगस्त 1960 में कैप्टन कोंग ली के. तखापलट द्वारा लोऔस के टकराव को एक नया आयाम मिल गया। वह सरकार के अति दक्षिणपंथी झुकाव तथा आर.एल.जी. में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार का विरोधी था। फोउमी नोसावन ने इस सरकार को अवैध घोषित कर दिया और सवन्ना खेत में एक समानान्तर सरकार गठित कर ली। अमरीका एवं थाईलैण्ड ने उसका समर्थन किया। आर.एल.जी. को दी जा रही अमरीकी सहायता रोक दी गई और थाईलैण्ड ने आर्थिक नाकेबंदी थोप दी। सोउवाना फोउमा पश्चिमी शिविर से अलग हो गया और उसने सोवियत संघ से राजनयिक सम्बन्ध कायम कर लिये। कौग ली नेपाथेट लाओ से हाथ मिला लिया। सोवियत विमानों की मदद से पाथेट लाओं लगभग आधे लाऔस पर नियंत्रण करने लगे। सोवियत संघ ने यह गणना कर ली थी कि लाऔस की राजनैतिक-सैनिक स्थिति में उसके दखल का प्रयोग अमरीका से सौदेबाजी के लिये किया जा सकता है। वह चीन-सोवियत टकराव की पृष्ठभूमि में कम्युनिस्ट-मुक्ति आन्दोलनों को समर्थन भी देना चाहता था। 1961 के गृहयुद्ध ने दोनों महाशक्तियों को एक युद्ध के मोड़ पर ला खड़ा किया। हालांकि मई 1961 में जिनेवा में लाऔस के टकराव का समाधान निकालने के लिये 14 राष्ट्रों का सम्मेलन शुरू हुआ। अमरीका एवं सोवियत संघ दोनों ही इस बात के लिये सहमत हो गए कि लाऔस की स्वतंत्रता, शान्ति, तथा निरपेक्षता का एक फार्मूला तय हो जाय, जिसे जुलाई 1962 की जिनेवा घोषणा में शामिल कर लिया गया था। शान्ति की निगरानी करने के लिये भारत कनाडा, तथा पोलैण्ड से मिलकर बना एक आन्तरिक नियंत्रण आयोग (आई.सी.सी.) गठित किया गया। आर.एल.जी ने शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व के पांच सिद्धान्तों का पालन करने की शपथ ली। नया सांझा मोर्चा सरकार को दक्षिणपंथी वामपंथी तथा निरपेक्ष लोगों के बीच एक राजनैतिक संतुलन सुनिश्चित करना था। मोउवाना फोउमा रक्षा के चार्ज सहित प्रधानमंत्री बने। सोफानोवोंग तथा
तथा एन.एल.एच.एस. में से प्रत्येक को केबिनेट में चार सीटें मिली। शेष ग्यारह सीटें सोउवाना फोउमा के निरपेक्षता के विचार के गिद विभिन्न स्तरों के लोगों में वितरित हुई। यह तय किया गया कि सरकार के तमाम निर्णय सर्वसम्मति के नियम के अनुसार लिये जायेंगे।

बोध प्रश्न 3.
टिप्पणियां: क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये उत्तर से कीजिये।
1) लाऔसी सत्ता संघर्ष के प्रमुख चरण क्या थे?
2) लाओस की घरेलू राजनीति के प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थों का संक्षेप में उल्लेख कीजिये।

 साम्यवाद की विजय
हालांकि जिनेवा समझौते के प्रावधानों का संबद्ध पक्षों द्वारा उल्लंघन किया गया और एक बार फिर युद्ध छिड़ गया। लाओस धीरे-धीरे वियतनाम युद्ध की छाया बनता चला गया। अंततः देश साम्यवादी बन गया।

त्रियोका की विफलता
त्रियोका अथवा त्रि-स्तरीय प्रशासनिक ढांचा शुरू से ही ढीला-ढाला रहा। महत्वपूर्ण निर्णयों पर एक तीन-स्तरीय समझौता व्यवहारिक नहीं था। प्रत्येक गुट का स्वयं अपने सैन्य बलों पर नियंत्रण बना रहा, यद्यपि वे सभी राष्ट्रीय सेना में विलय कर चुके थे। पाथेट लाओ सेनाएं उत्तर तथा उतर-पूर्व में तैनात थी। फोउमी ने अपनी सेनाओं को दक्षिण तथा राजधानी वियोन्टेनी के इलाके में बनाये रखा। सोउवेला फोउमा से जुड़ी कौंग ली की सेना मध्य लाऔस में तैनात की गई, जहां उनकी स्थिति को दक्षिणपंथी अथवा वामपंथी हलकों से खतरा पैदा हो सकता था। सैन्य तथा आर्थिक सहायता केन्द्रीय सरकार के सुपुर्द की जाती थी और प्रत्येक नेता इसमें से अधिकतम अपने गुट के लिये हासिल कर लेने के लिए संघर्ष करता था। तीनों पक्षों के बीच परस्पर अविश्वास की वजह से सरकार का सहज ढंग से संचालन अवरुद्ध हो गया। इसके अलावा निरपेक्षतावादी शिविर में भी कर्नल डिउमें सिपासिउथ के नेतृत्व वाली कौंग ली की सेनाओं के बहुत से लोगों पाथेट लाओ शिविर में शामिल हो जाने के कारण से, एक और विभाजन हो गया। लाऔस की निरपेक्षता को अमरीका एवं उत्तरी वियतनाम ने भंग किया। जार के इलाकों के मैदानी क्षेत्र में पुनः युद्ध छिड़ गया। आई.सी.सी. प्रभावी साबित नहीं हुई। सितम्बर 1964 में पेरिस में हुई सोउवान्ना फोउमा, सोफानोउवौंग तथा बोउन ओम की त्रिपक्षीय बैठक में भी कोई कारगर परिणाम नहीं निकल सका। इस प्रकार लाऔस की समस्या के राजनैतिक हल के लिये किए गए एक त्रिपक्षीय इन्तजाम का अंत हो गया।

 दक्षिणपंथी झुकाव
सोउवाना फोउमा धीरे-धीरे स्वयं पश्चिम का समर्थन प्राप्त दक्षिणपंथी गुट के साथ गठबंधन करता जा रहा था। ऐसा लगता था कि वह अब स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रह गया था। उसके द्वारा अमरीका को पाथेट लाओ के जनाधार वाले क्षेत्रों पर बमबारी करने की इजाजत दी गई थी। लाऔस की राजनीति में सेना का दखल बढ़ गया था। आर.एल.जी. ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र को पांच सैन्य क्षेत्रों में विभाजित कर लिया था और इनमें से प्रत्येक का शासन पारंपरिक शासक परिवारों की मदद से एक दक्षिणपंथी जनरल करता था। सेना के दक्षिणपंथियों ने कौंग लाओ की सेनाओ जनरल म्वाने राटी कौन के नेतृत्व के अधीन आ जाने के लिये विवश कर दिया। पाथेट लाओ की दृष्टि में, आर.एल.जी के दक्षिणपंथी झुकाव ने शान्ति के सारे द्वार बंद कर दिये थे। एन.एल.एच.एस. की भागीदारी के बिना ही चुनाव कराये गये। लाऔस की राजनीति में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया 1965-66 में 1959-60 के समय जैसी ही थी। एन.एल.एच.एस. की भागीदारी के बिना चुनावों के कोई मायने ही नहीं थे क्योंकि इसका लाऔस के दो-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण था। वियतनाम की परिस्थिति ने लाऔस के निरंतर जारी संकट को पीछे धकेलना शुरू कर दिया। लाऔस में अमरीका की हवाई कार्यवाहियां पाथेट लाओ की प्रगति को रोकने और उत्तरी वियतनाम द्वारा वियतकाज्ञग को सुदृढ़ बनाने के लिये लाऔस के सीमाक्षेत्र का इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगाने के उद्देश्य से की गई। दक्षिण पूर्व लाऔस में हो ची मिन्ह द्वारा खोजे गये मार्ग के आसपास जबर्दस्त बमबारी की गई क्योंकि यह दोनों वियतनामों के लिये आपूर्ति का मुख्य मार्ग था। उत्तरी वियतनाम ने इस मार्ग को खुला रखने तथा हथियार बंद लड़ाई में पाथेर लाओ की मदद के लिये लाऔस में अपनी सेनाएं तैनात कर रखी थीं। दक्षिण वियतनाम में बिगड़ती स्थिति तथा 1970 में कम्बोडिया की घटनाओं के साथ ही उत्तरी वियतनाम तथा अमरीका की संबद्ध सहयोगियों से प्रतिबद्धताएं बढ़ गई।

1973 के समझौते की विफलता
लाऔस में तब तक कोई समाधान होता नहीं दिखाई दे रहा था जब तक वियतनाम युद्ध का कोई हल न निकाला जाय। 1968 में पेरिस शान्ति वार्ताओं ने वियतनाम युद्ध का कोई समाधान खोजना शुरू किया। एक ओर अमरीका व सोवियत संघ के बीच तथा दूसरी ओर अमरीका व चीन के बीच तनाव कम करने की कोशिश के कारण परस्पर समझौते का माहौल बना। हिन्द-चीन में टकराव के स्तर में कमी आई। पेरिस में हुई प्रगति ने पाथेट लाओ तथा आर.एल.जी. के बीच वार्ताओं पर भी असर डाला। 27 जनवरी 1973 को वियतनाम पर हुए पेरिस समझौते ने लाऔस में वार्ताओं को तेज कर दिया। समझौते की धारा 20 में कहा गया था कि संबद्ध पक्ष लाऔस के बारे में 1962 के जिनेवा समझौते का सम्मान करेंगे। अमरीका एवं उत्तरी वियतनाम लाऔस की समस्या का समाधान खोजने के लिये राजी हो गये और उन्होंने दक्षिणपंथियों व पाथेट लाओ से किसी समझौते पर पहुंचने के लिये कहा। 21 फरवरी 1973 को शान्ति की बहाली तथा लाऔस में सुलह-सफाई के बारे में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। एक प्रोवीजनल गवर्नमैण्ट आफ नेशनल यूनियन (पी.जी.एन.यू.) स्थापित की जानी थी। यह समझौता पाथेट लाओ का स्पष्ट विषय था। पहले वाले समझौते का त्रिपक्षीय ढांचा इसमें नहीं था। पाथेट लाओ की मांग पर पी.जी.एन.यू. पर नियंत्रण रखने वाली एक नेशनल पॉलीटिकल काउंसिल आफ कोलिशन (एन.पी.सी.सी.) का गठन किया था। आर.एल.जी. द्वारा स्वीकार की गई एक अन्य बात थीः चुनावों से पूर्व प्रशासन के पृथक क्षेत्रों को बरकरार रखा जाना। विएन्टाइन तथा लुआंग प्रबांग को उदासीन बनाया जाना था ताकि पाथेट लाओ अपनी सेनाएं तैनात कर सके। अप्रैल 1974 में पी.जी.एन.एम. का निर्माण हुआ। पाथेट लाओ धीरे-धीरे अधिक शक्ति अर्जित करता जा रहा था और गतिविधियों के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति का अहसास कराता जा रहा था। श्लाऔस का 4/5वां क्षेत्र तथा आधी आबादी पर इसका नियंत्रण था। पाथेट लाओ की सफलता जितनी स्वयं उसकी अपनी नीतियों की वजह से थी उतनी ही आर.एल.जी. के निष्पादन के फलस्वरूप भी मिली थी। आर.एल.जी. नेताओं ने देश के विकास की अवहेलना की थी और उनका राजनैतिक आचरण अनेक निजी हितों को साधने का ही माध्यम बनकर रह गया था। राजनैतिक पार्टियां व्यक्तियों के इर्द गिर्द ही घूमती रहती थीं। अपने अस्तित्व के लिये अमरीकी सहायता पर निर्भर रहने के कारण आर.एल.जी. अमरीका का पिछलग्गू बन गई। प्रतिष्ठित वर्ग जनता का समर्थन प्राप्त नहीं कर सका। आर.एल.जी. सेना के बुरी तरह विफल रहने की वजह से पाथेट लाओ के क्षेत्रों का निरंतर बढ़ता चला गया। 1973 में आर.एल.जी. विएन्टाइन लुआंग प्रबांग तथा मैकौंग घाटी के आसपास के क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाये हुए थी। पाथेट लाओ एक सुगठित संगठन था। इसने लम्बे समय से चली आ रही जनता की समस्याओं का भरपूर फायदा उठाया और आर.एल.जी. की कमजोरियों का पर्दाफाश किया। पर्वतीय क्षेत्रों की विपरीत परिस्थितियों में काम करते हुए, पाथेट लाओ ने अपने उद्देश्य के लिये समर्पण एवं बलिदान की भावना का परिचय दिया। दक्षिण वियतनाम तथा कम्बोडिया का अप्रैल 1975 पतन हो जाने के बाद, पाथेट लाओ ने आसानी से लाऔस पर प्रभावी नियंत्रण कायम कर लिया। नवम्बर में एन.एल.एच.एस. के मुख्यालय पर पी.जी.एन.यू. तथा एन.पी.सी.सी. के संयुक्त अधिवेशन में, लाऔस की सांझा मोर्चा सरकार भंग कर दी गई। राजा ने ताज छोड़ दिया। अधिकांश दक्षिणपंथी नेता थाईलैण्ड व फ्रांस भाग खड़े हुए। 2 दिसम्बर 1975 को, लाऔस पीपुल्स डैमोक्रेटिक रिपब्लिक (एल.पी.डी.आर.) की स्थापना हुई।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणियांः क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये उत्तर से कीजिये।
1) आधुनिक लाऔस में साम्यवाद के उदय का वर्णन कीजिये।

 नयी सरकार
नया शासन प्रबन्ध अनेक समस्याओं से घिरा हुआ था। लाऔस तीन दशकों तक चले आ रहे युद्ध से तबाह हो गया था। लाऔस के निवासियों को जिस तरह की मुसीबतें, इतने लम्बे समय तक और इतनी छोटी सी वजह से उठानी पड़ उसका उदाहरण मिलना कठिन है। पिछले शासन प्रबन्ध के अनेक सर्वोच्च नौकरशाह तथा तकनीकी कार्मिक देश छोड़कर भाग गये। अर्थव्यवस्था चैपट हो गई थी। हालांकि एल.पी.डी.आर. के नेतागणों को पिछले सांझा मोर्चे की सरकार के समय का प्रशासनिक अनुभव प्राप्त था, किन्तु उनका अधिकांश समय युद्ध क्षेत्रों में ही बीता था। भारी विषमताओं का सामना करते हुए उन्होंने विश्व के एक सबसे गरीब तथा कम पिछड़े हुए देश पर प्रशासन करने का कार्य आरंभ किया।

नेतृत्व
नेतृत्व उसी समूह के हाथों में बना रहा जिसने पाथेट लाओ आन्दोलन को सफलता दिलाई थी। कैसौन फूभविहान तथा सूफौनोवोंग क्रमशः राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री बने। 1975 में “फाक पासेसन पाटीवल लाओ’’ (लाओ पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी, एल.पी.आर.डी.) के पोलिटब्यूरो में 7 सदस्य थे। वे थे केसौन, फोमविहान, नोउहक, फोउमसावन, सूफौनोवोंग, फाउमी वैगवियिट, फोउन सिपरासिउथ, खामते सिफाब्डोन सीसुमफोम लोवान्से। एल.पी.आर.डी. की केन्द्रीय कमेटी की सदस्यता अप्रैल 1982 की तीसरी पार्टी कांग्रेस में 21 से बढ़कर 49 हो गई थी और जातीय अल्पसंख्यकों का प्रतिशत लगभग 21 था। केसौन एल.पी.आर.डी. के महासचिव थे और उनकी पत्नी योगविहीन केन्द्रीय समिति की सदस्य बन गई थी। प्रधानमंत्री के पद का नाम बदलकर मंत्रिपरिषद् का चेयरमैन रख दिया गया। पार्टी नेतृत्व को परेशानी में डालने वाला एक कारक कुछ पोलिटब्यूरो सदस्यों की गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं थी।
राजसी ठाट बाट को ठुकरा दिया था, उनका आम जनता में असर बरकरार रहा किन्तु एल.पी.आर.पी. के भीतर उनका प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया। इस आरोप में कोई खास दम नहीं था कि केसौन के साथ उनके गंभीर मतभेद थे।

आंतरिक कलह
एल.पी.आर.पी. नेतृत्व शक्तिशाली शत्रुओं के प्रति सचेत था। एल.पी.आर.पी. की स्थापना के बाद, आर.एल.जी. सेना तथा नागरिक सेना के अधिकांश उच्च स्तर के अधिकारी जेलों में बंद थे। भौगो जैसे आदिवासी समूह तथा अन्य असंतुष्ट तत्वों द्वारा नई सरकार के खिलाफ हथियारबंद प्रतिरोध किया जा रहा था, जिन्होंने वाहनों पर घात लगाकर हमले किये, पुलों को नष्ट कर दिया और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले किये थे। विद्रोहियों को थाईलैण्ड के शरणार्थी शिविरों से सहायता मिल रही थी। लाओ पीपुल्स रिवोल्यूशनरी फ्रंट (एल.पी.आर.एफ.) ने सरकारी सेनाओं के साथ 1976 में झड़पें की और केसौन की हत्या करने का प्रयास किया। चीन ने थाईलैण्ड के लाओ शरणार्थियों के बीच से गुरिल्ला आन्दोलन के लिये सैनिकों की भर्ती करके तथा एक लाओ सोशलिस्ट पार्टी का। गठन करके लाऔस में आन्तरिक कलह को प्रोत्साहित किया। 1980 में देश से बाहर राजनैतिक शरण लिये हुए दक्षिणपंथियों ने बैंकोक में लाओ जनता की राष्ट्रीय मुक्ति के लिये एक संयुक्त मोर्चे का गठन किया। फोउमी नौसारन ने दावा किया कि उसे मोर्चे का नेता स्वीकार कर लिया गया है. और उसने रॉयल लाओ डैमोक्रेटिक. सरकार गठित की। 1989 में पूर्वी योरोप तथा सोवियत संघ में हुई घटनाओं का लाऔस पर भी असर पड़ा और एल.पी.आर.पी. का विरोध पुनः प्रज्वलित हो गया। मोर्चे ने दावा किया कि इसने साया बौरी प्रान्त के भीतर एक समानान्तर सरकार बना ली है। एल.पी.आर.पी., के. खिलाफ रेडियो प्रसारण भी किये गये। मौंगों आदिवासियों ने जिऐंग खुआंग प्रांत में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। सरकारी सेना द्वारा लगभग 40 लोग मारे गये। लाऔस के छात्रों ने पोलैण्ड में प्रदर्शन करके स्वतंत्र चुनाव कराये जाने तथा लाऔस से वियतनामी सेना को हटाये जाने की मांग उठाई। यद्यपि एल.पी.आर.पी. नेताओं के बीच एकजुटता के फलस्वरूप शासन प्रबन्ध की स्थिरता बढ़ी किन्तु कुछ, असंतोष के उदाहरण भी दिखाई दिये। सरकारी दैनिक मुखपत्र “सियांग पासोसौंगत्र’’ के संपादक सीसानन सिंगनानोवौंग अगस्त 1979 में चीन भाग खड़े हुए। सावन्नाखिएता प्रांत के गवर्नर को 1982 में राज्य-विरोधी गतिविधियों के कारण गिरफ्तार किया गया। अक्टूबर 1990 में भूतपूर्व विज्ञान एवं तकनीक मंत्री थौंगसौक सेसागकी तथा वन उपमंत्री रासमी. खामपौंई को गिरफ्तार कर लिया गया, ये लोग विएन्ताइन में वरिष्ठ अधिकारियों व बुद्धिजीवियों ने सोशल डैमोक्रेट ग्रुप नामक एक नई पार्टी बनाने की भी कोशिश की थी। एल.पी.आर.पी. के खिलाफ प्रतिरोध की गतिविधियां वैसे छिटपुट प्रकृति की ही थी और विभिन्न गुटों के बीच विधिवत तालमेल नहीं था। ये इतनी शक्तिशाली न थीं कि इनसे देश की स्थिरता को कोई बड़ा खतरा पैदा हो पाता।

 संविधान
मई 1947 का संविधान कम्युनिस्टों की विजय तक लागू रहा। पिछला निजाम राष्ट्रीय असैम्बली के प्रति उत्तरदायी एक मंत्रिपरिषद द्वारा शासित संवैधानिक राजतंत्र था। उच्च सदन रॉयल हाउस कहलाता था और उसमें 12 सदस्य थे, जिनमें से आधे सदस्य राजा द्वारा मनोनीत किय जाते थे और आधे राष्ट्रीय असैम्बली द्वारा चुने जाते थे। नये शासकों ने कोई नया संविधान स्वीकार करने का गंभीर प्रयास नहीं किया। 1985 में यह काम सुप्रीम पीपुल्स कॉउन्सिल को सौंपा गया। 1986 में हुए एल.पी.आर.पी. को चैथी कांग्रेस में इस मुद्दे पर विचार किया गया। 1990 में केवल संविधान का मसविदा तैयार करने की प्रक्रिया तीव्र हो गई। 1977 में सोवियत संविधान को एक आम मॉडल के रूप में स्वीकार किया गया था, किन्तु संघीय-प्रणाली के विपरीत एक एकीकृत प्रणाली को अपनाया गया। 1980 के वियतनामी संविधान से भिन्न जिसमें समाजवाद तथा मजदूर वर्ग के नेतृत्व का उल्लेख किया गया था, एल.पी.आर.पी. के मसविदे में एल.पी.आर.पी. के नेतृत्व के तहत एक जनतांत्रिक राज्य का उल्लेख करते हुए एक भूमिका एवं 10 अध्याय लिखे गये थे। देश के उद्देश्य थे शान्ति, जनतंत्र एवं संपन्नता। शान्ति, स्वाधीनता, मैत्री व गुट निरपेक्षता विदेश नीति के उद्देश्य थे। यद्यपि भूमि पर स्वामित्व राज्य का विशेषाधिकार था, किन्तु उत्पादन पर निजी स्वामित्व की गारंटी की गई थी। घरेलु तथा साथ ही विदेशी स्वामित्व तथा पूंजी निवेष की सुरक्षा की भी संवैधानिक गारंटियां की गई थी। मसविदे के अध्याय 3 में, बोलने, प्रेस तथा सभा करने की स्वतंत्रता, तथा मनमानी गिरफ्तारियों से सुरक्षा की गारंटी की गई थी। हालांकि, बहुदलीय प्रणाली की मांग तथा एल.पी.आर.पी. विरोधी एसोसिएशनों को बर्दाश्त नहीं किया जाना था। बौद्ध धर्म तथा अन्य धार्मिक आचरणों की सुरक्षा की जानी थी और साथ ही धर्म पर चलने के अधिकार भी सुनिश्चित किये गये थे।

 विकासात्मक रणनीति
सरकारी प्रचार माध्यमों के अनुसार लाऔस की समाजवादी क्रांति के तीन प्रमुख कार्यभार थेः उत्पादन के रिश्तों में क्रांतिकारी परिवर्तन, विज्ञान व तकनीकी क्रांति, तथा विचारधारात्मक एवं सांस्कृतिक क्रांति। क्रांतिकारी समर्थन के साथ, नये शासकों ने जनता को मार्क्सवाद-लेनिनवाद की विचारधारा से लैस करना तथा नये प्रशासन के नियमों के अनुरूप जनता के जीवन स्तर को बदलना शुरू किया। एक केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था अस्तित्व में आई। कृषि सम्बन्धी सहकारी संस्थायें बनाई गईं तथा वाणिज्यक गतिविधियों का राष्ट्रीयकरण किया गया। 59 राज्य वाणिज्यक उद्यम तथा 138 सहकारी संस्थाएं स्थापित की गईं। किन्तु आर्थिक स्थिति की दशा फिर भी गंभीर ही बनी रही। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें काफी बढ़ गईं और स्थानीय मुद्रा “किप‘‘ का मूल्य नीचे आ गया। व्यापक तस्कारे एवं कालाबाजारी ने अर्थव्यवस्था पर बुरी तरह असर डाला। 1979 में एल.पी.आर.पी. ने अनेक आर्थिक सुधार करके अपनी गलतियों को दुरस्त करने की कोशिश की। कुछ हद तक सरकारी निगरानी में निजी व्यापार की स्वीकृति दी गई। वस्तुओं के खरीद मूल्य थाईलैण्ड में उनके मूल्यों के बराबर रखे गये। कृषि संबन्धी सहकारी संस्थाओं को लचीला बनाया गया। पहली पंच वर्षीय योजना (1981-86) में खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म निर्भरता तथा उच्चतर श्निर्यात आय पर बल दिया गया। लाऔस की अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार हुआ किन्तु कुछ समय बाद मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि होने लगी।

1986 से ही एल.पी.आर.पी. के शासन (नई आर्थिक क्रियाविधि) नामक एक प्रमुख आर्थिक सुधार कार्यक्रम के लिये प्रयास कर रहे थे। विचारधारा सुधार कार्यक्रम के लिये प्रयास कर रहे थे। विचारधारात्मक रूढ़िवादिता का परित्याग कर दिया गया था। अविकसित अर्थव्यवस्था की सच्चाइयों का सामना होने पर, उन्होंने आर्थिक निर्णय प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण किया, व्यापार-प्रतिबन्धों को हटाया, नदी निवेष संहिता को लागू किया, राज्य के आर्थिक नियंत्रण को ढीला किया, एक निजी बाजार क्षेत्र की इजाजत दी, और विदेशी व्यापारियों को आमंत्रित किया। तीसरी पंचवर्षीय योजना (1991-95) का उद्देश्य नई आर्थिक क्रियाविधि को तेज करना था। कृषि का खास महत्व दिया गया और यह अनुमान लगाया गया कि आगामी दस वर्षों में यह देश के विकासात्मक व्यय का 1/5वां हिस्सा वहन करने लगेगी। कृषि-वानिकी समेत उद्योग को व्यय का 30 प्रतिशित आवंटन किया गया तथा परिवहन एवं संचार के लिये 25 प्रतिशत राशि रखी गई। 1989-90 में चावल की पैदावार बढ़ी किन्तु वह आशा से कम मात्रा में थी। लाऔस को कमी पूरी करने के लिये 40,000 टन चावल की आवश्यकता पड़ी। फिर भी सामूहिक कृषि उत्पादन में किए जाने से ग्रामीण उत्पादकता ने विकासोन्मुख रूझान दिखाई पड़ा। किसानों ने पुनः उन जमीनों पर खेती करना शुरू किया जो उनकी अपनी थी। प्रान्तों को निजी कम्पनियों तथा. साथ ही पड़ोसी राज्यों के साथ व्यापार समझौते करने की स्वीकृति दी गई। थाई, चीनी व वियतनामी व्यापारियों ने एक के बाद एक पुनः वाणिज्यिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। एल.पी.आर.पी. द्वारा घरेलू एवं विदेशी निवेष को बढ़ावा देने के लिए कुछ आर्थिक कानून पारित किये गये।

लाऔस के आर्थिक विकास के लिये विदेशों तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से सहायता प्राप्त करना जरूरी था। पचास के दशक के मध्य में आर.एल.जी. के बजट का 90 प्रतिशत से भी अधिक भाग अमरीकी सहायता से पूरा किया जाता था। कम्युनिस्टों की विजय के बाद, अमरीकी सहायता तथा विदेशी विनिमय गतिविधियों के फण्ड के समाप्त हो जाने पर देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त ही हो गई होती। नये शासन प्रबन्ध ने कम्युनिस्ट एवं गैर-कम्युनिस्ट, दोनों प्रकार के देशों से सहायता की मांग की। विदेशी सहायता तथा ऋण, राज्य के बजट के लिये मौजूदा राजस्व का आधे से भी अधिक बैठते थे। वियतनाम ने जल अवरुद्ध लाऔस के व्यापार को वृद्धि करने में सहायता की और दोनों ने 1977 में वियतनामी बंदरगाह डानंग के माध्यम से मालों का आयात-निर्यात करने के एक तटकर संबन्धी समझौता किया। वाणिज्यक मालों के आवागमन के लिये लाऔस की थाईलैण्ड पर निर्भरता को दूर करने के लिये इसके परिवहन के ताने बाने को वियतनाम के साथ जोड़ दिया गया। सोवियत सहायता के अंतर्गत, तेल पाइप लाइन का निर्माण, पानी-बिजली ऊर्जा क्षमता का विस्तार, टिन का खनन, तथा अंतर-स्पुतनिक सैटेलाइट लाइजन सेन्टर खोले जाना, शामिल थे।
स्वीडन ने वानिकी एवं संचार में मदद की। डच लोगों ने सिंचाई परियोजनाओं में सहायता दी। लाऔस ने कौमकोन की खोई हुई मदद के बदले में वैकल्पिक विदेशी सहायता के स्रोत तलाश किये। 1989-90 तक सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप लाऔस के तकनीकी कार्मिकों को जापान में प्रशिक्षण, तथा हाइड्रो-पॉवर योजनाएं शामिल थी। नशीली दवाओं की तस्करी रोकने तथा उत्तर-पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र का विकास करने के लिए अमरीका ने जनवरी 1990 में 8.7 मिलियन डॉलर की विकास परियोजना की घोषणा की। लाऔस ने 1990 में चीन के साथ व्यापार एवं तकनीकी सहयोग का एक समझोता किया जिसके अन्तर्गत चीन लुंग प्रबांग प्रांत में एक हवाई पट्टी का निर्माण करेगा, लाऔस को यात्री विमानों की बिक्री करेगा, बिजलीघरों का निर्माण करेगा और उत्तरी प्रान्तों में सड़कों का निर्माण करायेगा। चावल की मिलों तथा कॉफी को प्रोसेस करने के कारखानों जैसी परियोजनाएं अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेन्सी (आई.डी.ए) ने अपने हाथ में ली हैं। इसने लाऔस की अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिये 40 मिलीयन डॉलर का ऋण भी दिया है। इस ऋण से सार्वजनिक उद्यमों में सुधारों, निजीकरण, राजस्व में वृद्धि, सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंध तथा विदेशी निवेश को प्रोत्साहन, जैसे सरकार के प्रयासों को बल मिलेगा।

विदेश संबध
एल.पी.आर.पी. की विदेश नीति के निर्धारित लक्ष्य, शान्ति, मैत्री, स्वाधीनता तथा गुट-निरपेक्षता थे। किन्तु एक छोटा सा देश लाओस इन उद्देश्यों का पूरी तरह से पालन नहीं कर सका क्योंकि यह क्षेत्रीय एवं विश्व शक्तियों के टकरावपूर्ण हितों के बीच में फंसा रहा। 1990 में लाऔस की विदेश नीति में प्रमुख बदलाव आते दिखाई दिये। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में कम्यूनिज्म के ढह जाने के साथ ही एल.पी.आर.पी. के शासकों ने चीन, अमरीका तथा थाईलैण्ड से सुलह करने की कोशिश की।

एल.पी.डी.आर. की स्थापना के बाद से चीन के साथ संबन्ध बहुत मधुर हो गये। चीन ने पुनर्निर्माण के लिये 25 मिलीयन डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान की और उत्तरी लाऔस में सड़क निर्माण की गतिविधियों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज की। लाओस ने अपनी पहले वाली उदासीनता का परित्याग कर दिया, जोकि 1978 के मध्य में वियतनाम एवं चीन के बीच तनाव बढ़ जाने के समय पर थी। फरवरी 1974 के वियतनाम पर चीनी आक्रमण के बाद, चीन-लाऔस संबन्धों में गिरावट आ गई थी। सोउफानोलौंग ने चीन का एक विस्तारवादी शक्ति करार दिया था और उस पर आरोप लगाया था कि वह सीमा क्षेत्रों में सेनाओं का जमाव कर रहा है और लाओ विद्रोहियों को मदद दे रहा है। एल.पी.आर.पी. की तीसरी कांग्रेस में चीन को आमंत्रित नहीं किया गया था। इसने अपने तकनीकी कार्मिकों को अनेक परियोजनाओं से वापस बुला लिया था और लगभग एक हजार शरणार्थियों को यूनान में पुनर्वास कराकर उन्हें बगावत का प्रशिक्षण दिया था। 1980 के दशक के अंत से चीन-लाऔस संबन्धों में सुधार आया। दोनों ने 1990 में व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किये और चीन लाऔस में सबसे बड़ा विदेशी निवेषकर्ता बन गया।

एल.पी.डी.आर. के विदेश संबन्ध सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप के साथ बहत घनिष्ट थे। सोवियतों लाऔस के आर्थिक पुनर्निर्माण में मदद की थी और दोनों देशों से उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि मंडलों द्वारा एक-दूसरे के देश की यात्राएं की गई थीं। फरवरी 1982 में सोवियत चीफ आफ जनरल स्टाफ ने लाऔस की यात्रा की थी और सैन्य सहायता के विषय में एल.पी.डी.आर. नेताओं के साथ वार्ता की थी। लाऔस ने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सोवियत विचारधारा का समर्थन किया था। मई 1968 में, कम्बोडिया की राजधानी में लाऔस, वियतनाम, कम्बोडिया तथा सोवियत संघ से विदेश उप-मंत्रियों का वार्ता सम्मेलन हुआ था। प्रतिनिधियों ने कम्बोडिया में शान्ति-वार्ताओं का समर्थन किया और यह सुझाव रखा कि देशों के बीच. सीमा विवादों का निपटारा शान्तिपूर्ण तरीकों से कर लिया जाना चाहिये। लाऔस ने पूर्वी यूरोप के देशों से भी आर्थिक सहायता प्राप्त की। सितम्बर 1982 में लाऔस तथा पूर्वी यूरोप के देशों के बीच 25 वर्ष की मैत्री एवं सहयोग की संधि हुई थी।

लाऔस एवं वियतनाम के बीच ’’होठों व दांतो’’ जैसे संबन्ध वियतनाम युद्ध के बाद के काल में भी जारी रहे। यह निकटता का रिश्ता जुलाई 1977 में 25 वर्षों की एक मैत्री संधि होने पर और अधिक प्रगाढ़ बना जिसमें जीने-मरने तक एक दूसरे का साथ निभाने तथा समाजवादी निर्माण एवं रक्षा के क्षेत्र में सहयोग की प्रतिबद्धताओं को दोहराया गया। लाऔस-वियतनाम सीमा के आस-पास वियतनामी बस्तियों को प्रोत्साहन दिया गया। दिसम्बर 1978 में वियतनाम ने कम्बोडिया पर तथा फरवरी 1979 में चीन ने वियतनाम पर आक्रमण किया जिसके चलते लाऔस के लिये कोई स्वतंत्र अपनाकर चलने की सारी संम्भावनाएं अवरुद्ध हो गईं और इसके हित लगभग वियतनाम की अधीनता में आ गए। मार्च 1979 में लाऔस ने कम्बोडिया के साथ एक सहयोग के समझौते पर हस्ताक्षर किये। वियतनाम, लाऔस व कम्बोडिया चीन को राज्यों पर वियनटाइन शिखर बैठक में, तीनों देशों ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर एक जुटता की शपथ ली थी। लाऔस ने कम्बोडिया पर वियतनामी वार्ताओं के पक्ष को अपनाया। यह थाईलैण्ड, अमरीका व चीन से सुलह करने के बावजूद वियतनाम के साथ अपने विशेष रिश्तों को बनाए रखेगा।

लाऔस एवं थाईलैण्ड के बीच संबन्धों में सीमाओं को बंद किये जाने, शत्रुता तथा परस्पर द्विष का पैटर्न रहा था। उत्तर-पूर्वी थाईलैण्ड में लाओ शरणार्थी आन्दोलन ने भी संबन्धों को बिगाड़ दिया। थाईलैण्ड में 1976 के दिसम्बर माह में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद थाई छात्रों के संघर्ष के चलते परस्पर अविश्वास और अधिक बढ़ गया। उन्हें लाऔस के शिविरों में प्रशिक्षण दिया जा रहा था। थाई विद्रोहियों को लाऔस के माध्यम से वियतनाम द्वारा हथियार दिये जा रहे थे। दूसरी तरफ, थाईलैण्ड ने एल.पी.डी.आर. विरोधी गतिविधियों को जारी रखने की स्वीकृति दी। अक्तूबर 1981 में इसने लाऔस से लगी अपनी सीमाओं को बंद कर दिया और अप्रैल 1982 में छिटपुट गोलाबारी भी हुई। फरवरी 1988 का सीमाविवाद, थाई वायुसेना तथा तोपों द्वारा सायाबोरी प्रांत पर धावा बोलने के साथ शुरू हुआ किन्तु वार्ताओं के बाद युद्ध-विराम की घोषणा कर दी गई। 1988-89 में नेताओं द्वारा एक-दूसरे के देश की यात्राओं से उन के संबन्धों में कुछ सुधार हुआ। 1990 में थाई राजकुमारी सिरिण्डोंर्न ने लाऔस की अभूतपूर्व यात्रा की। सीमा सुरक्षा चैकियां खोल दी गईं। थाई व्यापारियों को लाऔस में आमंत्रित किया गया। थाईलैण्ड के पैट्रोलियम-प्राधिकारी ने लाऔस के साथं एक. समझौते पर हस्ताक्षर किये। एक दूसरे की राजधानी में मिलिटरी अटैची की नियुक्ति पुनः बहाल हुई। फिलहाल सीमा विवाद को पृष्ठभूमि में डाल दिया गया।

लाऔस ने अमरीका पर पेरिस समझौते की धारा 21 का पालन न करने का आरोप लगाया था जोकि युद्ध के घावों को भरने से सम्बन्धित थीं। अमरीका ने वियन्टाइन में अत्यधिक सीमित दूतावास बनाकर रखा था। यह आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा लाऔस की सहायता करने के विभिन्न प्रोजैक्टों में मतदान के समय अनुपस्थित संस्थाओं द्वारा लाऔस ने ईरान द्वारा अमरीकी लोगों को बंधक बनाए जाने तथा अफगानिस्तान में सोवियत आक्रमण का समर्थन किया था। किन्तु लाऔस तथा अमरीका के संबन्धों में सुधार के संकेत दिखाई दिये और शत्रुतापूर्ण तेवरों से बचने की कोशिश की गई। सितम्बर 1982 में, युद्ध में घायल हो गए अमरीकियों के परिवारों द्वारा 569 अमरीकी सैनिकों का पता लगाने के लिये लाऔस की यात्रा की गई। मार्च 1985 में, अमरीकी दूतावास द्वारा एल.पी.डी.आर. को 5000 टन चावल दान में दिया गया। अक्टूबर 1990 में दोनों देशों के बीच सर्वोच्च स्तर का संपर्क बना जिसके अन्तर्गत सैक्रेटरी आफ स्टेट जेम्स बेकर तथा विदेश मंत्री फोउनी सियासउत के बीच भेटवार्ता हुई। 8.7 मिलीयन डॉलर की छः वर्षीय विकास परियोजना अमरीका द्वारा 1975 के बाद से हिन्द-चीन के किसी देश को दी गई पहली द्विपक्षीय सहायता थी। हण्ट-ऑयल फर्म को पेम्स में पैट्रोलियम के निष्कर्षण का अधिकार मिल गया। अमरीका ने भी लाऔस के साथ राजनयिक संबन्धों में रुकावट नहीं आने दी, जैसी कि वियतनाम और कम्बोडिया के मामले में आ रही थी। दृ

बोध प्रश्न 5
टिप्पणियां: क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये उत्तर से कीजिये।
1) निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये।
क) दोनों वियतनामों को जोड़ने वाली मुख्य आपूर्ति लाइन …………………………………………………थी।
ख) एल.पी.डी.आर. की स्थापना………………………………………………………….. को हुई।
ग) 1975 में एल.पी.डी.आर. के पोलिटब्यूरो में …………………………………………….. सदस्य थे।
घ) 1990 में विएन्टाइन के वरिष्ठ अधिकारी तथा बुद्धिजीवी …………………………………………..
की मांग कर रहे थे।
ङ) 8.7 मिलियन डॉलर का अमरीकी प्रोजैक्ट……………………………..तथा………………………के लिये था।

बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न. 5
1) हो ची मिन्ह खोजी मार्ग
2) 2 दिसम्बर 1975
3) 7
4) बहुदलीय जनतंत्र
5) नशीली दवाओं की तस्करी रोकने तथा उत्तर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र का विकास

सारांश
इस इकाई में आपने लाऔस के समाज एवं राजनीति के बारे में अध्ययन किया। लाऔस का समाज बहुजातीय है। 1945 तक वहां शक्तिशाली राष्ट्रीय आन्दोलन मौजूद नहीं था। अक्टूबर 1953 में फ्रांस ने पूर्ण स्वाधीनता प्रदान की। बाहरी ताकतों की भागीदारी तथा देश को लगभग टुकड़ों में विभाजित कर दिये जाने के चलते राजनैतिक प्रगति में बाधा पड़ी। लाऔस वियतनाम युद्ध का भी परोक्ष भागीदार बन गया। 1975 में कम्युनिस्टों ने लाऔस सत्ता पर कब्जा कर लिया। नई सरकार को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। नये शासन प्रबन्ध के खिलाफ बगावत भी हो रही थी। अर्थव्यवस्था की स्थिति दयनीय थी। नयी आर्थिक क्रियाविधि ने राज्य के आर्थिक नियंत्रण को ढीला किया और निजी उद्यमों की इजाजत दी। 1990 के संविधान के मसविदे ने सख्त मार्क्सवादी दिशा का अनुसरण नहीं किया। अपनी विदेशनीति में लाऔस चीन, अमरीका तथा थाइलैण्ड के साथ बेहतर संबन्ध कायम करने का प्रयास कर रहा है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
इवाम. जी., एग्ररियन चेन्ज इन कम्युनिस्ट लाऔस, (सिंगापुर 1988)
काहिन, जी.एम.(संपा.) गवर्नमैण्ट एण्ड पॉलिटिक्स इन साउथईस्ट एशिया, न्यूयॉर्क, 1964
मिश्रा, पी.पी., लाऔस लैण्ड एण्ड इट्स पीपुल, नई दिल्ली
पाण्डे, बी.एन., साउथ एण्ड साउथईस्ट एशिया 1947-1979 रू प्रॉबलम्स एण्ड पॉलिसीज
(लंदन 1980)
सरदेसाई, डी.आर., साउथईस्ट एशिया: पास्ट एण्ड प्रैजेण्ट (नई दिल्ली, 1981)