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कणाद सिद्धान्त (kanad theory in hindi) महर्षि कणाद सिद्धांत क्या है
महर्षि कणाद सिद्धांत क्या है , कणाद सिद्धान्त (kanad theory in hindi) : महर्षि कणाद को प्राचीन भारत के वैज्ञानिक और दार्शनिक के रूप में देखा जाता है , लगभग 500 ईसा पूर्व ही भारत में पदार्थ की अविभाज्यता के बारे में अपना मत रख दिया था जिसे पदार्थ की अविभाज्यता का सिद्धांत कहा जाता है और यह मत या सिद्धांत महर्षि कणाद ने प्रतिपादित किया था।
कणाद ने अपने इस सिद्धांत में बताया था कि किसी भी पदार्थ को छोटे छोटे टुकडो में रूप में विभक्त किया जा सकता है लेकिन अंत में एक सीमा के बाद पदार्थ को और अधिक छोटे टुकडो या कणों में विभक्त नहीं किया जा सकता है। जिस सीमा के बाद कणों को आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है उन कणों को उन्होंने ‘अनु या अणु‘ नाम दिया था।
अत: उनके सिद्धांत के अनुसार किसी भी पदार्थ की सुक्ष्तम इकाई अणु होती है क्यूंकि अनु को आगे छोटे टुकडो में नहीं तोडा जा सकता है अर्थात अणु अविभाज्य कण होता है।
इसके बाद कई दार्शनीक हुए उन्होंने भी इस सिद्धांत के अनुरूप ही अपने मत रखे सभी ये माना कि किसी भी पदार्थ को छोटे छोटे टुकडो या कणों के रूप में विभक्त किया जा सकता है और एक सीमा के बाद इन छोटे टुकडो या कणों को आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है , ऐसे कण जिन्हें आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है उन्हें अणु नाम दिया गया।
ऐसा माना जाता है कि महर्षि कणाद रास्ते में पड़ी चीजो और अन्न बटोरकर अपना जीवन आपन करते थे इसलिए ही उन्हें साधू भी कहा जाता है , एक दिन वे हाथ में खाना लेकर चल रहे थे , चलते चलते उन्होंने खाने को हाथ से कुतरना शुरू किया और कुतरने से इसके छोटे छोटे कणों या टुकडो फेकना शुरू किया।
टुकडो को कुतरते हुए उन्होंने यह पाया कि इन टुकडो को एक सिमित तक खाने के टुकडो को तोडा जा सकता है या छोटे कणों के रूप में विभक्त किया जा सकता है , इसके बाद आगे और अधिक छोटे टुकडो में रूप में इन्हें नहीं तोडा जा सकता है , यही से उनके मस्तिष्क में यह सिद्धांत आया और उन्होंने अन्य चीजो में जब यह गुण देखा तो यह नियत प्रतिपादित कर दिया।
इसके बाद कई दार्शनिक हुए जिन्होंने समान मत रखे और इन दार्शनिकों के मत के आधार पर 1808 में जॉन डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत दिया जिसके अनुसार डाल्टन ने बताया कि प्रत्येक पदार्थ को छोटे छोटे कणों के रूप में विभक्त किया जा सकता है और एक सीमा के बाद इन कणों को आगे विभक्त नहीं कर सकते है , डाल्टन ने इन सुक्ष्मतम कणों को परमाणु कहा।
डाल्टन का यह सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमो पर आधारित था , डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त में द्रव्यमान के संरक्षण के नियम और निश्चित अनुपात के नियम की युक्तिसंगत व्याख्या की।
परमाणु : किसी पदार्थ का सूक्ष्मतम कण होता है जिसे आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है।
अणु : दो या दो से अधिक परमाणुओं का समूह होता है अर्थात जब दो या दो से अधिक परमाणु आपस में रासायनिक बंधो द्वारा जुड़े रहते है।
कणाद ने अपने इस सिद्धांत में बताया था कि किसी भी पदार्थ को छोटे छोटे टुकडो में रूप में विभक्त किया जा सकता है लेकिन अंत में एक सीमा के बाद पदार्थ को और अधिक छोटे टुकडो या कणों में विभक्त नहीं किया जा सकता है। जिस सीमा के बाद कणों को आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है उन कणों को उन्होंने ‘अनु या अणु‘ नाम दिया था।
अत: उनके सिद्धांत के अनुसार किसी भी पदार्थ की सुक्ष्तम इकाई अणु होती है क्यूंकि अनु को आगे छोटे टुकडो में नहीं तोडा जा सकता है अर्थात अणु अविभाज्य कण होता है।
इसके बाद कई दार्शनीक हुए उन्होंने भी इस सिद्धांत के अनुरूप ही अपने मत रखे सभी ये माना कि किसी भी पदार्थ को छोटे छोटे टुकडो या कणों के रूप में विभक्त किया जा सकता है और एक सीमा के बाद इन छोटे टुकडो या कणों को आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है , ऐसे कण जिन्हें आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है उन्हें अणु नाम दिया गया।
ऐसा माना जाता है कि महर्षि कणाद रास्ते में पड़ी चीजो और अन्न बटोरकर अपना जीवन आपन करते थे इसलिए ही उन्हें साधू भी कहा जाता है , एक दिन वे हाथ में खाना लेकर चल रहे थे , चलते चलते उन्होंने खाने को हाथ से कुतरना शुरू किया और कुतरने से इसके छोटे छोटे कणों या टुकडो फेकना शुरू किया।
टुकडो को कुतरते हुए उन्होंने यह पाया कि इन टुकडो को एक सिमित तक खाने के टुकडो को तोडा जा सकता है या छोटे कणों के रूप में विभक्त किया जा सकता है , इसके बाद आगे और अधिक छोटे टुकडो में रूप में इन्हें नहीं तोडा जा सकता है , यही से उनके मस्तिष्क में यह सिद्धांत आया और उन्होंने अन्य चीजो में जब यह गुण देखा तो यह नियत प्रतिपादित कर दिया।
इसके बाद कई दार्शनिक हुए जिन्होंने समान मत रखे और इन दार्शनिकों के मत के आधार पर 1808 में जॉन डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत दिया जिसके अनुसार डाल्टन ने बताया कि प्रत्येक पदार्थ को छोटे छोटे कणों के रूप में विभक्त किया जा सकता है और एक सीमा के बाद इन कणों को आगे विभक्त नहीं कर सकते है , डाल्टन ने इन सुक्ष्मतम कणों को परमाणु कहा।
डाल्टन का यह सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमो पर आधारित था , डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त में द्रव्यमान के संरक्षण के नियम और निश्चित अनुपात के नियम की युक्तिसंगत व्याख्या की।
परमाणु : किसी पदार्थ का सूक्ष्मतम कण होता है जिसे आगे विभक्त नहीं किया जा सकता है।
अणु : दो या दो से अधिक परमाणुओं का समूह होता है अर्थात जब दो या दो से अधिक परमाणु आपस में रासायनिक बंधो द्वारा जुड़े रहते है।
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