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संयुक्त क्षेत्र किसे कहते हैं | संयुक्त क्षेत्र के उद्योग क्या है अर्थ मतलब उदाहरण joint sector in hindi
joint sector in hindi definition examples importance meaning संयुक्त क्षेत्र किसे कहते हैं | संयुक्त क्षेत्र के उद्योग क्या है अर्थ मतलब उदाहरण ?
संयुक्त क्षेत्र
संयुक्त क्षेत्र संगठन का वह प्रकार है जिसमें सरकारी और निजी दोनों अस्तित्व सहयोगी भागीदार के रूप में कार्य करते हैं। यद्यपि कि 1969 में दत्त समिति के प्रतिवेदन के बाद संयुक्त क्षेत्र का महत्त्व बढ़ा, इस प्रकार के संगठनों का गठन 1956 की औद्योगिक नीति संकल्प, के बाद से ही शुरू हो गया था। इस संकल्प में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच सहयोगी उद्यमों के लिए उपबंध किए गए थे। इस प्रकार की व्यवस्था में निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का संसाधनों पर संयुक्त रूप से स्वामित्व नियंत्रण और प्रबन्धन होता है, इसलिए इसे ‘‘संयुक्त क्षेत्र‘‘ कहा जाता है। पहले सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं का निजी क्षेत्र में उनकी निवेश की गई राशि पर शायद ही कोई नियंत्रण होता था। संयुक्त क्षेत्र का विचार कुछ इस तरह से शुरू किया गया था ताकि सार्वजनिक क्षेत्र का वित्तीय संसाधनों के ऊपर कुछ नियंत्रण रहे।
संयुक्त क्षेत्र में, सरकार और वित्तीय संस्थाओं के स्वामित्व में कुल मिलाकर 50 प्रतिशत से अधिक इक्विटी नहीं हो सकती है। दूसरा, एक निजी निवेशक भारत सरकार की अनुमति के बिना प्रदत्त पूँजी का 25 प्रतिशत से अधिक नहीं धारण कर सकता है। संयुक्त क्षेत्र फर्म का गठन कंपनी अधिनियम, 1956 के अनुरूप किया जा सकता है। संयुक्त क्षेत्र में कुछ प्रसिद्ध नाम भारत शेल, कन्टेनर कारपोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकॉर), मारुति उद्योग लिमिटेड, गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर कारपोरेशन, हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड, मंगलौर रिफाइनरीज एण्ड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड इत्यादि।
संयुक्त क्षेत्र की भूमिका और लाभ
संयुक्त क्षेत्र की परिकल्पना इसलिए की गई थी कि सामाजिक विकास के कुछ तत्व मौजूद रहें। सार्वजनिक क्षेत्र की भांति, संयुक्त क्षेत्र भी रोजगार का सृजन, अन्तर-प्रादेशिक असमानता में कमी और पिछड़े क्षेत्रों का विकास जैसे सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता करता है। व्यवसाय में सरकार की भागीदारी से एकाधिकारवादी शक्ति के सृजन पर नियंत्रण करने, एकाधिकारों की वृद्धि और व्यावसायिक कदाचारों को रोकने में सहायता मिलती है। संयुक्त क्षेत्र के लाभ यह हैं कि यह सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के सर्वोत्तम तत्वों को परस्पर जोड़ सकता है। संयक्त क्षेत्र फर्म में सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं से अति आवश्यक वित्तीय संसाधन प्राप्त किए जा सकते हैं और निजी पार्टी अपनी सर्वोत्तम कार्यप्रणाली का उपयोग कर सकती है जिससे वांछित दिशा में बेहतर औद्योगिक विकास का सूत्रपात हो सकता है। इस प्रकार संयुक्त क्षेत्र उन क्षेत्रों अथवा उद्योगों में जहाँ निजी क्षेत्र ने अकेले काम करने का साहस नहीं जुटाया होता फर्मों को प्रेरित करके औद्योगिक संरचना को व्यापक आधार प्रदान कर सकता है।
सीमाएँ और हानियाँ
संयुक्त क्षेत्र फर्मों में उद्यम में सम्मिलित पार्टियों के बीच विवाद होने की संभावना रहती है। चूँकि निजी क्षेत्र का उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है और सार्वजनिक क्षेत्र सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने में प्रयासरत रहती है, इससे उद्देश्यों में टकराव पैदा हो सकता है।
उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:
ऽ समझ सकेंगे कि सार्वजनिक, निजी, संयुक्त और सहकारी क्षेत्र क्या हैं;
ऽ भारत में उनके लिए परिकल्पिक भूमिकाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे;
ऽ सभी क्षेत्रों को तुलनात्मक दृष्टि से परख सकेंगे; और
ऽ बदलते हुए परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता को समझ सकेंगे।
प्रस्तावना
आर्थिक कार्यकलाप जैसे वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन तथा वितरण मुख्यतः चार क्षेत्रों सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, संयुक्त क्षेत्र और सहकारी क्षेत्र में होता है। विभिन्न देशों ने अपने आर्थिक इतिहास की विभिन्न अवधियों में इन क्षेत्रों को अलग-अलग महत्त्व दिया है। विभिन्न आर्थिक कारणों से कतिपय वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन और वितरण जानबूझ कर विशेष क्षेत्रों के लिए अलग रखा गया है। आर्थिक कारणों के अलावा वर्तमान शासन की वैचारिकी भी विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक कार्यकलापों के विभाजन को निर्धारित करती है। यद्यपि कि इस तरह का कोई कठोर विभेद नहीं है कि कोई विशेष उद्योग किसी विशेष क्षेत्र में ही रहेगा, कतिपय उद्योग अथवा कार्यकलाप परम्परागत रूप से विशेष क्षेत्र में ही रहे हैं क्योंकि निजी क्षेत्र ने उनमें रुचि नहीं दिखाई विभिन्न क्षेत्रों के उद्देश्यों, भूमिकाओं और सीमाओं पर नीचे चर्चा की गई है।
सारांश
किसी भी आर्थिक व्यवस्था में, संगठन का एक ही स्वरूप विद्यमान नहीं रह सकता है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था उन शर्तों पर चलती हैं कि संगठन के सभी मुख्य स्वरूपों का न सिर्फ सहअस्तित्व रहता है अपितु, वे परस्पर एक दूसरे पर भी निर्भर रहते हैं। समय की आवश्यकता के कारण, स्वतंत्रता के ठीक बाद सार्वजनिक क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था में इसकी परम्परागत भूमिका से अधिक महत्त्व दिया गया था। वर्षों तक सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों ने अर्थव्यवस्था की विकास प्रक्रिया में योगदान किया है। तथापि, उदारीकरण के बाद धीरे-धीरे सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्व निजी क्षेत्र की तुलना में घटता जा रहा है। अब निजी क्षेत्र के पास अपेक्षित पूँजी और सार्वजनिक क्षेत्र के परम्परागत क्षेत्रों में भी योगदान करने की क्षमता है। इस समय, खुले और भूमंडलीय एकीकृत अर्थव्यवस्था में जहाँ अस्तित्व बनाए रखना दुर्लभ संसाधनों के कुशल उपयोग पर निर्भर करता है, यह स्वीकार किया जाने लगा है कि सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी की तुलना में निजी क्षेत्र की भागीदारी बेहतर विकल्प है। अतएव, पूरे विश्व में पहले से कहीं ज्यादा गति से निजीकरण की ओर प्रगति हो रही है।
शब्दावली
सहकारी संस्थाएँ ः सहकारी संस्थाएँ समान आर्थिक हितों के अनुसरण और समान आर्थिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए गठित लोगों का निजी स्वैच्छिक स्वतंत्र एसोसिएशन है।
संयुक्त क्षेत्र फर्म ः यह संगठन का स्वरूप है जिसमें सरकार और निजी क्षेत्र की पार्टियाँ मिलकर संसाधनों और कार्यकलापों का स्वामित्व, नियंत्रण और प्रबन्धन संभालती है।
निजीकरण ः सरकार से आम जनता के स्वामित्व में संसाधनों के प्रभावी हस्तांतरण की ओर कदम।
निजी क्षेत्र ः संगठन, जिनका स्वामित्व, नियंत्रण और प्रबन्धन निजी पार्टियों के हाथ में है।
सार्वजनिक क्षेत्र ः संगठन, जिनका स्वामित्व नियंत्रण और प्रबन्धन सरकार के विभिन्न स्तरों के हाथ में है।
सार्वजनिक सीमित कंपनी: संगठन, जिसमें स्वामी अथवा शेयर धारकों का दायित्व . धारित शेयरों की राशि के बराबर सीमित होता है।
सार्वजनिक उपक्रम ः से अभिप्राय गैर-विभागीय उपक्रम है जिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों (केन्द्र सरकार, राज्य सरकार अथवा स्थानीय सरकार) पर निगम और कंपनियाँ हैं।
कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
अग्रवाल पी.एन (2001). ए कम्प्रिहेन्सिव हिस्ट्री ऑफ बिजनेस इन इंडिया: फ्रॉम 3000 बी. सी टू 2000 एडी, टाटा मैक्ग्रा-हिल पब्लिशिंग कंपनी लिमिटेड, नई दिल्ली।
इंडियन टैक्स इंस्टीट्यूट (1999). फिफ्टी इयर्स ऑफ इंडियन इण्डस्ट्री: 1950-2000, दिल्ली।
लेन, जैन एरिक (संपा) (1997). पब्लिक सेक्टर रिफॉर्स: रैशनल ट्रेन्ड्स एण्ड प्रॉब्लम्स, मेज पब्लिकेशन्स लिमिटेड, लंदन
सार्वजनिक उपक्रम सर्वेक्षण प्रतिवेदन, विभिन्न अंक।
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