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अनुलोम विवाह किसे कहते हैं | अनुलोम विवाह क्या है परिभाषा के बारे में मतलब अर्थ Hypergamy in hindi
Hypergamy in hindi meaning definition अनुलोम विवाह किसे कहते हैं | अनुलोम विवाह क्या है परिभाषा के बारे में मतलब अर्थ ?
शब्दावली
अनुलोम विवाह (hypergamy)ः निचली जाति की महिला और ऊँची जाति के पुरुष के बीच विवाह।
मृत्यु दर (mortality rate)ः मौतों की आवृत्ति का माप।
लिंग अनुपात (sex-ratio): प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं का अनुपात।
श्राद्ध: हिंदुओं में पुण्यतिथि।
यह देखा गया है कि दहेज प्रथा का प्रचलन अनुलोम विवाह (hypergamy) अर्थात् उच्च जाति के पुरुष और निम्न जाति की महिला के बीच विवाह से शुरू हुआ। ‘‘स्त्री धन‘‘ की अवधारणा संपत्ति में हिस्सा जिसे महिलाएँ विवाह के समय प्राप्त करती हैं, उसका स्थान धीरे-धीरे दहेज ने ले लिया है। अचल संपत्ति के बदले आमतौर पर वधू को नकद या किसी अन्य रूप में दहेज दिया जाता है जिस पर शायद ही उसका नियंत्रण होता है। मध्यम वर्ग में उपभोक्तावाद की वृद्धि अर्थात् उपभोग की वस्तुएँ जैसे-टी.वी., वीडियो, फ्रिज आदि हासिल करने की इच्छा ने दहेज की माँग को और हवा दी है। यह प्रथा अब निम्न वर्ग और गैर-हिंदू समुदायों में भी आ रही है, जहाँ यह पहले बिल्कुल नहीं थी। दहेज के बारे में प्रचलित धारणा है कि यह महिला के निर्वाह का उत्तरदायित्व लेने के लिए वर के परिवार को क्षतिपूर्ति दी जाती है। यह धारणा इस संकल्पना पर बनी है कि महिला ‘‘कामकाजी‘‘ व्यक्ति नहीं है और विवाह वर के परिवार पर वधू के परिवार से ‘‘गैर कामकाजी‘‘ व्यक्ति के निर्वाह के इस ‘‘भार‘‘ को डालता है। यह धारणा गलत है क्योंकि (क) यह गृहिणी और माता के रूप में महिलाओं द्वारा निभाई जाने वाली बहु आयामी भूमिका को कम आँकता है, और (ख) इस बात को स्पष्ट नहीं करता है कि रोजगारशुदा महिलाओं के लिए भी दहेज देने की आशा क्यों की जाती है?
कुछ महिलाएँ संगठन परामर्श एवं कानूनी सहायता देती हैं और संकटग्रस्त महिलाओं के लिए सहायता केंद्र और अल्पकालिक निवास-गृह-चलाती हैं। फिर भी, महिलाओं को ‘‘उत्सर्जनीय‘‘, ‘‘अनावश्यक‘‘ सामग्री के रूप में देखे जाने को बंद करना जरूरी है और उन्हें समुदाय, पड़ोसियों तथा अपने माता-पिता से अधिक समर्थन मिलना चाहिए।
माता-पिता और समाज द्वारा विवाह को असाधारण महत्त्व दिए जाने तथा किसी भी कीमत पर विवाह के लिए दबाव डालने की मानसिकता का विरोध करने की जरूरत है। दहेज प्रथा का स्थायित्व महिलाओं की महत्ता को कम करता है और लड़कियों के पैदा होने को अवांछित बनाता है। अविवाहित रहने के विकल्प को सम्मान और महत्त्व दिया जाना चाहिए। अकेले रहने वाली अविवाहित अथवा पैतृक परिवार के साथ रहने वाली महिला को ‘‘विचलन‘‘ के बदले एक ‘‘प्रतिमान‘‘ के रूप में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
उद्देश्य
इस इकाई में हमने महिलाओं की अस्मिता, गरिमा और सामाजिक न्याय से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आपके द्वारा संभव होगा:
ऽ महिलाओं की प्रस्थिति के विभिन्न सूचकों की विवेचना करना;
ऽ उन संरचनाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं को स्पष्ट करना जिनके कारण महिलाओं को गौण समझा गया है;
ऽ समाज में होने वाले विभिन्न प्रकार की हिंसा की भूमिका की जाँच करना;
ऽ संरचनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ में महिलाओं के मुद्दों का विश्लेषण करना; और
ऽ भारत में महिलाओं के मुद्दों के प्रति समकालीन चुनौतियों व प्रतिक्रियाओं का वर्णन करना।
प्रस्तावना
भारत में महिलाओं की प्रस्थिति पर समिति द्वारा बनाई गई रिपोर्ट समानता की ओर (ज्वूंतके म्ुनंसपजल) प्रस्तुत होने के बाद ही भारत में महिलाओं की प्रस्थिति पर ध्यान आकर्षित हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्देशों के अनुपालन में भारत सरकार द्वारा गठित इस समिति ने भारत में महिलाओं की प्रस्थिति का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न प्रस्थिति सूचकों पर विचार किया। इस रिपोर्ट में स्तब्ध करने वाली इस सूचना का रहस्योद्घाटन किया गया कि देश में विभिन्न क्षेत्रों में तो उत्तरोत्तर परिवर्तन हो रहे हैं, परंतु महिलाओं को निरंतर अधोगामी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। विश्व के अनेक भागों से इसी प्रकार के रहस्योद्घाटनों के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्रसंघ ने वर्ष 1975 को महिला वर्ष और 1975-85 के दशक को महिला दशक घोषित किया।
रिपोर्ट के निष्कर्षों और उसके बाद के शोध अध्ययनों में महिलाओं के लिए समानता की संवैधानिक गारंटी और वास्तविकता में विरोधाभास पाया गया है। महिला संगठनों और मानव अधिकार संगठनों द्वारा विभिन्न मुद्दों जैसे – बलात्कार, दहेज मौतें, पारिवारिक मारपीट, सती, परित्यजन, भ्रूण-हत्या आदि मामलों के लिए अभियान शुरू किए गए और लिंगभेद संबंधी न्याय पाने का प्रयास किया गया। 1970 और 1980 के दशक के मध्य में इस शताब्दी के महिला आंदोलन की दूसरी लहर दिखाई दी। भेदभाव, अधीनता और उपेक्षा के प्रति अनुभवों को स्पष्ट करने की इस नई जागरूकता के कारण ज्ञान के विद्यमान स्वरूप की जाँच करने का अवसर मिला। इस समय से महिलाओं से संबंधित शोध कार्य प्रारंभ हुए। अनेक कमियों के बावजूद 1970-80 के दशक के दौरान महिलाओं से संबंधित अधिनियमों, नीतियों और कार्यक्रमों में संशोधन किए गए तथा कानून बनाए गए।
प्रस्तुत इकाई में हम कुछ समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे जिनका सामना भारतीय महिलाएँ करती हैं। इकाई का प्रारंभ महिलाओं की प्रस्थितियों के सूचकों की पहचान करने से किया है। इसके बाद एक संस्था के रूप में परिवार तथा महिलाओं को एक गौण भूमिका अदा करने में परिवार की समाजीकरण की भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया गया है। अंत में दुव्र्यवहार और हिंसा के विभिन्न रूपों पर विस्तार से चर्चा की गई है जो महिलाओं के व्यक्तित्व और सम्मान को चुनौती देते हैं जैसे – यौन अत्याचार और बलात्कार, पारिवारिक मारपीट और दहेज-मौतें, व्यभिचार अथवा वेश्यावृत्ति और अश्लील साहित्य और संचारमाध्यमों में महिलाओं का मिथ्या निरूपण।
सारांश
इस इकाई में विभिन्न सूचकों जैसे जनसांख्यिकीय प्रस्थिति, स्वास्थ्य प्रस्थिति, साक्षरता, रोजगार प्रस्थिति और राजनीतिक प्रस्थिति के माध्यम से भारत में महिलाओं की प्रस्थिति प्रस्तुत की गई है। महिलाओं की आजादी को कम करने वाले जाति प्राधार और उसकी भूमिका, वर्ग प्राधार और महिलाओं के अधीनीकरण एवं उसके स्थायीकरण के बारे में चर्चा की गई है। ‘‘एक संस्था के रूप में‘‘ और गौण भूमिका निभाने के लिए एक बेटी के समाजीकरण में परिवार की भूमिका, दहेज और हिंसा के विभिन्न रूप जो महिलाओं की अस्मिता और सम्मान को संकट में डालते हैं, इन मुद्दों का विश्लेषण किया गया है।
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