गांधार कला की दो विशेषता का उल्लेख कीजिए , मथुरा और गांधार शैली में अंतर greco-buddhist art of gandhara in hindi

By   May 10, 2021

greco-buddhist art of gandhara in hindi गांधार कला की दो विशेषता का उल्लेख कीजिए , मथुरा और गांधार शैली में अंतर ?

उत्तर : स्तूपों के अतिरिक्त कनिष्क के समय में कनिष्कपुर (कश्मीर स्थित वर्तमान कान्सोपुर) तथा सिरकप (तक्षशिला) नामक स्थान पर नये नगरों का
निर्माण करवाया गया। कनिष्क के शासन-काल में कला के क्षेत्र में दो स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ
– (1) गन्धार शैली तथा (2) मथुरा शैली।
इन दोनों को कनिष्क की ओर से पर्याप्त प्रोत्साहन एवं संरक्षण प्रदान किया गया। इनका विवरण इस प्रकार है –
गंधार मर्ति कला शैली – यूनानी कला के प्रभाव से देश के पश्चिमोत्तर प्रदेशों में कला की जिस नवीन शैली का उदय हुआ उस गंधार शैली कहा जाता है। पाश्चात्य विद्वानों की धारणा है कि सर्वप्रथम गंधार शैली में ही बुद्ध की मर्तियों का निर्माण किया गया। किन्तु इस संबंध में कोई ठोस प्रमाण हमें प्राप्त नहीं होता। वी.एस. अग्रवाल ने अत्यन्त तार्किक ढंग से यह सिद्ध कर दिया है कि सर्वप्रथम बुद्ध मूर्ति का आविष्कार मथुरा के शिल्पियों द्वारा किया गया था। चूंकि मथुरा के शिल्पी बहुत पहले से ही यक्ष तथा नाग की सुन्दर-सुन्दर मूर्तियाँ बना रहे थे, अतः कोई कारण नहीं कि बुद्ध मूर्तियों की रचना का प्रथम श्रेय उन्हें न दिया जाय। गंधार शैली में भारतीय विषयों को यूनानी ढंग से व्यक्त किया गया है। इस पर रोमन कला का भी प्रभाव स्पष्ट है। इसका विषय केवल बौद्ध है और इसी कारण कभी-कभी इस काल को यूनानी-बौद्ध (ग्रीको-बद्धिस्टर, इण्डो-ग्रीक अथवा ग्रीको-रोमन (यूनानी-रोमीय) कला भी कहा जाता है। इस शैली की मूर्तियाँ अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के अनेक प्राचीन स्थलों से प्राप्त हुई हैं। इसका प्रमुख केन्द्र गंधार ही था और इसी कारण यह श्गंधार कलाश् के नाम से ही ज्यादा लोकप्रिय है।
बौद्ध मुर्तियाँ – गन्धार कला के अंतर्गत बुद्ध एवं बोधिसत्वों की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण हुआ। ब्राह्मण तथा जैन धर्मों से संबंधित मर्तियां इस काल में प्रायः नहीं मिलती। मूर्तियाँ कलो स्लेटी पाषाण, चूने तथा पकी मिट्टी से बनी हैं। ये ऽ ध्यान, पदमासन, धर्मचक्र प्रवर्तन, वरद तथा अभय आदि मुद्राओं में हैं। आरम्भिक बुद्ध मूर्ति पेशावर के पास शाहजी की देरी से प्राप्त कनिष्क चैत्य की अस्थिमंजूषा पर बनी है। विरमान की अस्थिमंजूषा पर भी बुद्ध को मानव रूप से दिखाया गया है। शाहजी की ढेरी से प्राप्त मंजूषा के ढक्कन पर बुद्ध पद्मासन में विराजमान हैं। उनके दायें तथा बायें क्रमशः ब्रह्मा तथा इन्द्र की मर्तियां उत्कीर्ण हैं। बुद्ध के कन्धों पर संघाटी तथा ढक्कन के किनारे उड़ते हए हंसों की पंक्ति है। मंजषा के किनारे कन्धों पर माला उठाये हुए यक्षों की आकृतियां हैं। उत्कीर्ण लेख में कनिष्क तथा अगिशल नामक वास्तकार का उल्लेख मिलता है। सहरी बहलोल, तख्तेवाही आदि से मिली स्थानक मुद्रा की मूर्तियां अधिक मांसल तथा भारी-भरकम काया की हैं। बर्लिन संग्रहालय में रखी हुई ध्यान मुद्रा में निर्मित मूर्ति में शांति, करुणा एवं आभा का प्रदर्शन मिलता है इसी प्रकार लाहौर संग्रहालय में रखी गयी एक मूर्ति संरचना एवं शिल्प की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इन मूर्तियों के ही साथ बुद्ध के जीवन तथा पूर्व जन्मों से संबंधित विविध घटनाओं के दृश्यों जैसे – माया का स्वप्न, उनका गर्भधाण करना, माया का कपिलवस्तु से लुम्बिनी उद्यान में जाना, बुद्ध का जन्म, लुम्बिनी से कपिलवस्तु वापस लौटना, अस्ति टा कुण्डली फल बताना. सिद्धार्थ को बोधिसत्व रूप, पाठशाला में बोधिसत्व की शिक्षा, लिपि विज्ञान में सिद्धार्थ की परी उनकी मल्ल तथा तीरन्दाजी में परीक्षा, यशोधरा से विवाह, देवताओं द्वारा संसारत्याग हेतु सिद्धार्थ से प्रार्थना, सिद्धार्थ कपिलवस्तु छोड़ना, कन्थक से विदा लेना, बुद्ध के दर्शन हेतु मगधराज बिम्बिसार का जाना, संबोधि प्राप्त के पहले की विविध स्थितियां, देवताओं द्वारा बुद्ध से धर्मोपदेश के लिये प्रार्थना करना, धर्मचक्रप्रवर्तन, बुद्ध का कपिलवस्तु आगमन का राहुल को भिक्ष की दीक्षा देना, नन्द सन्दरीकथानक, बुद्ध पर देवदत्त के प्रहार, श्रावस्ती में अनाथपिण्डक द्वारा विहार का दान, नलगिरि हाथी को वश में करना, अंगुलिमाल का आत्मसमर्पण, किसी स्त्री के मृत शिशु की घनाट, आनन्द सान्त्वना देना, इन्द्र और पञ्चशिख गन्धर्व द्वारा बुद्ध का दर्शन, आम्रपाली द्वारा बुद्ध को आम्रवाटिका प्रदान करना, कशीनगा में महापरिनिर्वाण, धातुओं का बँटवारा तथा धातु पात्र का हाथी की पीठ पर ले जाया जाना, धातु पूजा, त्रिरत्न पूजा सहित 61 दृश्यों का अंकन इस शैली में किया गया है। इससे सूचित होता है कि शिल्पी ने बुद्ध के लौकिक तथा पारलौकिक जीवन से संबंधित प्रायः सभी छोटी-बड़ी घटनाओं को अत्यन्त बारीकी के साथ्ज्ञ चित्रित किया है। इतना विशद चित्रांकन कहीं अन्यत्र नहीं मिलता। कुछ दृश्य अत्यन्त कारुणिक एवं प्रभावोत्पादक हैं। तपस्यारत बुद्ध का एक दृश्य, जिसमें उपवास के कारण उनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया है, गन्धार कला के सर्वोत्तम नमूनों में से है। कलाकार को उपवासरत तपस्वी के शरीर का यथार्थ चित्रण करने में अद्भुत सफलता मिली है। नसों तथा पसलियों को अत्यन्त कुशलतापूर्वक उभरा गया है, पेट अन्दर धंसा हुआ है किन्तु मुखमण्डल की शांति, दृढ़ इच्छाशक्ति को प्रकट करती है। इसी तरह बुद्ध से विदा लेते हुए उनके कन्थक नामक प्रिय अश्व का दृश्य काफी प्रभावोत्पादक है। उसके मुखमण्डल पर विदाई के विषाद तथा शोक के भाव को व्यक्त करने में कलाकार को अपूर्व सफलता मिली है। बोधिसत्व मूर्तियों में सबसे अधिक मैत्रेय की है। कुछ अवलोकितेश्वर तथा पद्मपाणि की मूर्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इन्हें हाथ में कमल, पुस्तक तथा अमृतकलश लिये हुए दिखाया गया है। उनका स्वरूप राजसी है। कई मूर्तियों में दाढ़ी-मूंछ, धोती, संघाटी आदि दिखाया गया है। गचकारी (ैजनबबव) की कई बुद्ध और बोधिसत्व मूर्तियां भी मिलती हैं जो कलात्मक दृष्टि से अच्छी हैं। इसी का रूप मृण्मय मूर्तियों में दिखाई देता है जो सिंध तथा मीरपुर खास से मिली हैं। गन्धार शैली की अधिकांश मूर्तियाँ लाहौर तथा पेशावर के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इन मूर्तियों की कुछ अपनी अलग विशेषतायें हैं जिनके आधार पर वे स्पष्टतः भारतीय कला से अलग की जा सकती है। इनमें मानव शरीर के यथार्थ चित्रण की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। मांस-पेशियों, मूंछों, लहरदार बालों का अत्यन्त सूक्ष्म ढंग से प्रदर्शन हुआ है। बुद्ध की वेष-भूषा यूनानी है, उनके पैरों में जूते दिखाये गये हैं, प्रभामण्डल सादा तथा अलंकरणरहित है और शरीर से अत्यन्त सटे अंग-प्रत्यंग दिखाने वाले झीने वस्त्रों का अंकन हुआ है। उनके सिर पर धुंघराले बाल दिखाये गये हैं। इन सबका फल यह है कि बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी देवता, अपोलो की नकल प्रतीत होती हैं। महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ अपने सूक्ष्म विस्तर के बावजूद मशीन से बनाई गई प्रतीत होती हैं। इनमें वह सहजता तथा भावात्मक स्नेह नहीं है जो भरहुत, सांची, बोधगया अथवा अमरावती की मूर्तियों में दिखाई देता है। इसी कारण यह कहा जाता है कि इस शैली के कलाकार के पास श्यूनानी का हाथ परन्तु भारतीय का हृदय था।श्
बुद्ध तथा बोधिसत्व मूर्तियों के अतिरिक्त गन्धार शैली की कुछ देवी-मूर्तियाँ भी मिलती हैं। इनमें हारीति तथा रोमा अथवा एथिना देवी की मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हारीति को मातृदेवी के रूप में पूजा जाता था तथा वह सौभाग्य तथा धन-धान्य की अधिष्ठात्री थी। अग्रवाल महादेय ने लाहौर संग्रहालय में सुरक्षित रोमा देवी की मूर्ति को गन्धार कला की सर्वोत्तम मूर्तियों में स्थान दिया है। इसे सिर पर टोप धारण किये हुए तथा हाथ में ब» लिये हुए दिखाया गया है। उसके मुखमण्डल से तेज निकल रहा है। हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों में पंचिक कुबेर, हारीति, इन्द्र, ब्रह्मा, सूर्य आद का चित्रण इस कला में मिलता है। सहरी बहलोल से प्राप्त हारीति तथा कुबेर की एक युगल मूर्ति उत्कृष्ट कलाकृति है। यह पेशावर संग्रहालय में सुरक्षित है। शाहजी की ढेरी से प्राप्त कनिष्क मंजूषा के ऊपर बुद्ध के साथ इन्द्र तथा ब्रह्म का चित्र एवं गंधार से प्राप्त काले स्लेटी पत्थर की उत्कीर्ण सूर्य प्रतिमा, जिसमें सूर्य को चार अश्वों के रथ पर आसान दिखाया गया है, भी काफी सुन्दर है। उनके दोनों ओर अनुचरों का अंकन है।
कपिशा (बेग्राम, अफगानिस्तान) से अनेक दन्तफलक मिले हैं जो कभी श्रृंगाल पेटियों अथवा रत्नमंजूषाओं के अंग रहे हा इन पर अनेक मुद्राओं एवं भंगिमाओं में सुन्दरियों का अकंन किया गया है। 1937-39 के मध्य फ्रांस के पुरातत्ववेत्तआ खुदाई के दौरान इन्हें प्रकाशित किया था। इनमें शुक क्रीड़ा, हंस क्रीड़ा, नृत्य दृश्य, पानगोष्ठी, उड़ते हुए, हंस, दप निहारती आदि सुन्दरियों एवं प्रसाधिकाओं की आकृतियां अत्युत्कृष्ट हैं। कुछ फलक मथुरा शैली से मिलते-जुलते हैं। एक आकृति में बालक को गोद में लेकर स्तनपान कराती हुई नारी प्रदर्शित की गयी है। ये गन्धार कला शैली की महिक आकृतियां हैं जिनमें तत्कालीन समाज के कुलीन तथा सामान्य वर्ग में प्रचलित वेशभूषा की जानकारी मिलती है। इस वध दृश्यों पर भारतीय तथा सामान्य वर्ग में प्रचलित वेशभूषा की जानकारी मिलती है। इन विविध दृश्यों पर भारत तथा रोमन कला, दोनों का प्रभाव परिलक्षित होता है।
वासुदेव शरण अग्रवाल ने प्रतिमाशास्त्र की दष्टि से गंधार कला की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है – बुद्ध की जीवन की घटनायें और बोधिसत्व की मूर्तियां, जातक कथायें, यूनानी देव-देवी और गाथाओं के दृश्य, भारतीय देवता और देवियाँ, वास्तु-संबंधी विदेशी विन्यास, भारतीय अलंकरण एवं यूनानी, ईरानी और भारतीय अभिप्राय एवं अलंकरण।
गन्धार शैली में निर्मित बुद्ध तथा बोधिसत्व मर्तियाँ ही विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। इन मूर्तियों में आध्यात्मिकता तथा भावुकता न होकर बौद्धिकता एवं शारीरिक सौन्दर्य की ही प्रधानता दिखाई देती है। इनके मुंह में बनाई गयी मूंछे तथा पैरों में दिखाये गये चप्पल से किसी प्रकार का भाव अथवा धार्मिक भावना प्रकट नहीं होती। ये अत्यन्त घटिया कोटि की है तथा भारतीय कलाकार ऐसी मूर्ति बनाने में कभी गर्व नहीं करते। अपने यूनानी स्वरूप के कारण यह भारतीय कला की मुख्य धारा से पृथक् रही तथा इसका क्षेत्र पश्चिोमत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा। मार्शल महोदय ने सही ही लिखा है कि यूनानी तथा रोमन कलाओं ने गंधार शैली को जन्म देने के अतिरिक्त भारतीय कला के ऊपर कभी भी वैसा प्रभाव उत्पन्न नहीं किया जैसा कि इटली अथवा पश्चिमी एशिया की कला के ऊपर। यूनान तथा भारत के दृष्टिकोण मूलतः भिन्न थे। यूनानी, मनुष्य के सौन्दर्य एवं बुद्धि का ही सर्वेसर्वा समझते थे। भारतीय दृष्टि में लौकिकता के स्थान पर अमरत्व तथा ससीम के स्थान पर असीम की प्रधानता थी। यूनानी विचार नैतिक एवं बद्धिप्रधान था जबकि भारतीय विचार आध्यात्मिक एवं भावना-प्रधान था।
इस प्रकार गंधार कला अपने विदेशी प्रभाव के फलस्वरूप भारतीय कला का सौन्दर्य विहीन रूप ही प्रतीत होती है। कुमार स्वामी के शब्दों में गंधार की यथार्थवादी कला घोर पाखण्ड का आभास देती है क्योंकि बोधिसत्वों की संतुष्ट अभिव्यक्ति तथा किचित् छैलछबीली वेशभूषा एवं बुद्ध मूर्तियों की स्त्रैण और निर्जीव मुद्रायें बौद्ध विचारधारा की आध्यात्मिक शक्ति का प्रकटीकरण नहीं कर पाती हैं। किन्तु भारत के बाहर गांधार कला का व्यापक प्रभाव रहा। इसने चीनी तुर्किस्तान, मंगोलिया, चीन, कोरिया तथा जापान की बौद्ध कला को जन्म दिया।
मार्शल के अनसार गंधार की पाषाण-कला का प्रारम्भ 25-60 ई. के मध्य पल्हव शासन काल में हुआ, द्वितीय शती में कुषाण काल में उसका पूर्ण विकास हुआ तथा ससैनियन आक्रमण के परिणामस्वरूप इस कला का चतुर्थ शती ईसवी के प्रारंभ में हास हो गया। कुषाण, विशेषकर कनिष्क का काल ही इसके चर्मोत्कर्ष का काल रहा। इस कला के हास के साथ ही उसका स्थान अत्युत्कृष्ट गचकारी और मृण्मय कला के ग्रहण कर लिया।

प्रश्न: कुषाण कालीन बौद्ध स्तूप स्थापत्य के प्रमुख स्थलों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: पेशावर का बौद्ध स्तूप – बौद्ध कला का विकास कषाण राजाओं के संरक्षण में भी होता रहा। प्रसिद्ध कुषाण शासक कनिष्क एक महान् निर्माता था। उसके शासन काल में अनेक स्तपों तथा विहारों का निर्माण हआ। अपनी राजधानी (पेशावर) में 400 फीट ऊँचा विशाल स्तूप उसने बनवाया था जिसकी वेदिका 150 फीट ऊँची थी। फाह्यान तथा हेनसांग दोनों ने इसका विवरण दिया है। फाह्यान के अनुसार उसने जितने भी स्तूप देखे थे, उनमें यह सर्वाधिक प्रभावशाली था। हेनसांग के विवरण से पता चलता है कि यह स्तप पांच भमियों में बना था तथा इसके शिखर में 25 सनहले मण्डप बनाये गये थे। पूर्वी मुख के सोपान के दक्षिण में महाचैत्य की दो छोटी प्रतिकृतियां तथा भगवान् बुद्ध की दो विशाल मूर्तियां थी। दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम में दो और मूर्तियां बनी थी। इसके निकट एक विशाल संघाराम (विहार) बना था जो कनिष्क चैत्य कहा जाता था और सम्पूर्ण बौद्ध जगत् में प्रसिद्ध था। इसका निर्माण यवन वास्तुकार अगिलस द्वारा किया गया था। यह अनेक शिखर, भूमि, स्तम्भ आदि से अलंकृत था। हेनसांग के भारत आने के कुछ पूर्व ही यह स्तूप जलकर नष्ट हो गया था। पेशावर स्थित शाहजी जी की ढेरी के उत्खनन में कनिष्क चैत्य के अवशेष प्राप्त होते हैं।
तक्षशिला का धर्मराजिका स्तूप – तक्षशिला का सबसे महत्वपूर्ण धर्मराजिका स्तूप था। मूलतः इसका निर्माण अशोक के समय में हुआ किन्तु कनिष्क के समय में उसका आकारवर्धन किया गया। ऊँचे चबूतरे पर निर्मित यह स्तूप गोलाकार है। चार दिशाओं में चार सीढ़ियाँ हैं। इसका निर्माण पाषाण से किया गया है। चैकी से स्तूप गोलाकार है। चार दिशाओं में चार सीढियां हैं। इसका निर्माण पाषाण से किया गया है। चैकी से स्तप के ऊपरी भाग तक इसे विविध अलंकरणों से सजाया गया है। इसके अतिरिक्त बल्ख तथा खोतान तक अनेक स्तूप निर्मित करवाये गये थे।
मनिक्याल स्तूप – मनिक्याल क्षेत्र में कई स्तूप बने थे। मनिक्याल, रावलपिण्डी से बीस मील की दूरी पर है। यहां से प्राप्त एक लेख से पता चलता है कि कनिष्क के अठारहवें वर्ष दण्डनायक लल द्वारा इन स्तूपों को बनवाया गया था। मनिक्याल स्तूप का चबूतरा गोल है जिस पर अर्ध गोलाकार गुम्बद 127 फीट व्यास तथा 400 फीट के क्षेत्रफल में फैला हआ है। स्तप की खदाई में एक धात मंजषा मिली है जिसमें कई सिक्के तथा मोतियां एक स्वर्णपात्र ये थे। उल्लेखनीय है कि गन्धार क्षेत्र से स्तूपों का वास्तु विन्यास मध्य भारतीय स्तूप जैसा नहीं था। गंधार स्तूप काफी ऊँचे होते थे। उनके चैकोर अधिष्ठान का कई भूमियों में निर्माण होता था। जिन पर चढ़ने के लिये एक या अधिक सीढ़ियाँ बनाई जाती थी। वेदिका तथा तोरण का प्रयोग बन्द हो गया। स्तूप पर ही विविध शिल्प उत्कीर्ण किये गये थे। ये जातक कथाओं की अपेक्षा बुद्धचरित्र से अधिक संबंधित थे। सम्पूर्ण स्तूप एक बुर्ज जैसा दिखाई देता था। इन स्तूपों पर गंधार शैली विशेष कर प्लास्टर प्रतिमा (Stucco Figures) स्पष्टतः दिखाई देती है।