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आर्थिक मंदी क्या है आर्थिक मंदी के प्रमुख कारण क्या थे 1929 महामंदी great depression of 1929 in hindi
results of great depression of 1929 in hindi आर्थिक मंदी क्या है आर्थिक मंदी के प्रमुख कारण क्या थे 1929 महामंदी ?
प्रश्नः आर्थिक मन्दी के क्या कारण थे ?
उत्तर: क्षतिपूर्ति तथा युद्ध ऋणों की समस्या, उद्योगों व कृषि का यंत्रीकरण, संकुचित आर्थिक राष्ट्रीयता, आयात-निर्यात का नियमन, स्वर्ण का विषम विभाजन आदि आर्थिक मंदी के कारण थे। तात्कालिक कारण 24 अक्टूबर, 1929 को ब्लैक थर्सडे था।
प्रश्न: आर्थिक मन्दी के क्या परिणाम निकलें ?
उत्तर: आर्थिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रसंघ को आघात, लोकतंत्रीय शासन पद्धति पर आघात, शस्त्रीकरण की दौड़, वादो का प्रसार-साम्यवाद, सैन्यवाद, साम्राज्यवाद, नाजीवाद, फांसीवाद।
प्रश्न: आर्थिक मन्दी
उत्तर: प्रथम विश्वयुद्ध के समाप्त होने के पश्चात् सभी यूरोपीय देशो में पुननिर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। सभी यूरोपीय देश आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हो रहे थे। इंग्लैण्ड और फ्रांस में तेजी से आर्थिक विकास हो रहा था। रूस भी गृहयुद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों से उभरने का प्रयास कर रहा था। जर्मनी भी अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास कर रहा था। परंतु अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह एक बाहरी चमक-दमक थी। अर्थशास्त्रियों के अनुसार विश्व की अर्थव्यवस्था एक कमजोर नींव पर रखी हुई थी। एक मामूली या क्षणिक हवा के झोंके से यह अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो सकती थी।
अक्टूबर, 1929 में अमेरिका के शेयर बाजार में अचानक तेजी से गिरावट आई। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका और अन्य देशों के हजारों बैंक दिवालिया हो गये। कीमतों में तेजी से गिरावट आई। हजारों की संख्या में लोग बेरोजगार हो गये। अतिउत्पादन के कारण कनाडा में धान (अनाज) तथा ब्राजील में कोको के भंडारों को जला दिया गया। अर्थशास्त्रियों के अनुसार पूंजीवादी राष्ट्रों में अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। परंतु 1929 की इस आर्थिक मंदी का व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने पूरे विश्व को विशेषतः अमेरिका व यूरोप को डस लिया। यह आर्थिक मंदी 1929-30 में प्रारम्भ हुई और 1931 तक इसका प्रभाव चरम सीमा पर थी। 1933 के पश्चात् इसका प्रभाव कम होने लगा।
प्रश्न: आर्थिक मन्दी के कारण बताइए।
उत्तर: i. प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियाँ
ii. कृषि उपज एवं औद्योगिक सामग्री का अति उत्पादन जबकि क्रयशक्ति का ह्रास (कांडलिंफ श्द कॉमर्स ऑफ नेशनश्)
iii. क्षति-पूर्ति तथा युद्ध ऋणों की समस्या।
iv. व्यापार चक्र का प्रभाव।
v. संकुचित आर्थिक राष्ट्रीयता – अन्तर्राष्ट्रीय बाजार अति संकुचित हो गया – युद्ध ऋण व क्षति पूर्ति के लिए समस्या।
vi. सोने का विषम विभाजन – अमेरिका व फ्रांस में एकत्रित सोना मुद्रा स्फीति का आधार।
vii. यंत्र जनित बेरोजगारी।
viii. सट्टेबाजी की बढ़ती हुई प्रवृत्ति – प्रो. फाकनर
ix. उपभोग में कमी – जे.एम.क्लार्क
x. अति आपूर्ति।
xi. तात्कालिक कारण – न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में 24 अक्टूबर, 1929 को एकाएक शेयरों का मूल्य 50 अरब डालर गिर गया। जिसने न
केवल अमेरिका को वरन् सम्पूर्ण विश्व को हिला दिया। जिससे चारों ओर भखमरी बेरोजगारी – गरीबी आदि का वातावरण छा गया।
यह विश्व आर्थिक मन्दी थी।
प्रश्न: आर्थिक संकट के वैश्विक प्रभावों एवं परिणामों के बारे में बताइए।
उत्तर: अन्तराष्टीय सहयोग की नीति को पीछे धकेल कर आर्थिक राष्ट्रवाद को जन्म दिया। जिसमें अपने उद्योग-धंधों को संरक्षण, आयात कम निर्यात पर अधिक बल, आर्थिक सहायता, तटकर, चुंगी आदि विभिन्न उपाय अपनाएं। राष्ट्रसंघ को आघात, लोकतंत्रीय शासन पद्धति पर आघात हुआ। अधिनायकवाद का उत्कर्ष, इटली में फांसीवाद का विकास, जापान में सैन्यवाद का उदय, राजकीय नियंत्रण में वृद्धि, शस्त्रीकरण की दौड, साम्यवाद का प्रसार, इटली का एबीसीनिया पर आक्रमण आदि से जर्मनी में नाजीवाद का उदय, अन्तर्राष्ट्रीय अराजकता उत्पन्न हो गयी तथा इन सभी का परिणाम द्वितीय विश्व यद्ध था।
प्रश्न: महान मन्दी के निवार्णाथ उपचार के कौन-कौनसे कदम उठाए गए।
उत्तर: हूवर मुहलत (Hoover Moratorium) 1 जुलाई, 1931 से अमरीकी राष्ट्रपति हूवर द्वारा आर्थिक मंदी से ग्रसित देशों को बाहर निकालने के लिए मुहलत दी। हूवर मुहलत का आशय था अमेरिकी सरकार विदेशी सरकारों से अपना पैसा वसल करना एक वर्ष के लिए इस शर्त पर
स्थिगित करती है कि सभी अन्तर सरकारी कर्ज की, जिसमें क्षतिपूर्ति कर्ज भी शामिल हो, वसूली इसी प्रकार स्थिगित कर दी जाए।
i. लोसाने सम्मेलन – (16 जून, 1932) रू जर्मनी अपनी क्षतिपूर्ति का भुगतान सिर्फ 15 करोड़ पौण्ड दे दे और अपने 5ः शेयर अन्तर्राष्ट्रीय
चुकान बैंक में करदे तथा 15 वर्ष बाद उसी मूल्य में अपने बॉण्ड ले ले। लोसाने सम्मेलन ने क्षतिपूर्ति को लम्बी अवधि के बाण्डों में
बदलकर जर्मनी की स्थिति सुधारी।
ii. लन्दन विश्व आर्थिक सम्मेलन – (जून, 1933) रू मुद्रा का स्थिरीकरण, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में संरक्षण नीति क्यों आई बातों पर विचार हुआ।
प्रश्न: आर्थिक मंदी के कुछ कारण थे अथवा यह परिस्थितीय चक्र का परिणाम थी। विवेचना कीजिए।
उत्तर: (1) प्रथम विश्वयुद्ध से उत्पन्न परिस्थितियां रू अर्थशास्त्रियों के अनुसार सभी छोटे-बड़े युद्धों के पश्चात् आर्थिक मंदी की स्थिति पैदा होती है।
ऐसा सप्तवर्षीय युद्ध, अमेरिका में गृह-युद्ध, नेपोलियन के युद्धों व फ्रेंको प्रशा युद्ध में भी हुआ। युद्ध के समय साम्रगी की मांग बढ़ती है।
इसके परिणामस्वरूप उद्योगों का विस्तार होता है। कई लोगों के सेना में भर्ती होने के कारण श्रम की दर में वृद्धि होती है। इससे रोजगार उपलब्ध होता है और मुनाफे में वृद्धि होती है। ऐसी परिस्थितियाँ युद्ध समाप्त होने के पश्चात् जारी नहीं रहती है और उसके पश्चात् मंदी आ जाती है। परन्तु प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् परिस्थितियों के कारण आर्थिक मंदी का प्रभाव व्यापक था। युद्ध की भयंकरता मंदी की भयंकरता तय करता है।
(2) क्षतिपूर्ति व युद्ध ऋण रू क्षतिपूर्ति आयोग को जर्मनी द्वारा दी जाने वाली राशि को निर्धारित करने के लिए रिपोर्ट 1 मई, 1921 तक प्रस्तुत करनी थी। आयोग ने रिपोर्ट 27 अप्रैल, 1921 तक प्रस्तुत कर दी। जर्मनी द्वारा दी जाने वाली राशि 33 अरब डॉलर (6600 मिलियन पाउण्ड) तय की गई। आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत होने से पहले जर्मनी को 5 अरब डॉलर अग्रिम राशि देना तय हुआ।
युद्ध ऋण रू युद्ध के समय मित्र राष्ट्रों ने अमेरिका से 7 बिलियन डॉलर का ऋण लिया। युद्ध समाप्त होने के पश्चात् पुननिर्माण के लिए 3 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त ऋण मित्र राष्ट्रों ने लिया। युद्ध ऋण का भुगतान क्षतिपूर्ति राशि से करना निश्चित किया। अमेरिका के शेयर बाजार में गिरावट आने के पश्चात् मित्र राष्ट्रों को ऋण देने से मना कर दिया। दूसरी ओर जर्मनी क्षतिपूर्ति की राशि देने में अमसर्थ था अमेरिका द्वारा ऋण देना बंद करने की घोषणा के कारण यूरोपीय देशों में पुननिर्माण का कार्य ठप्प हो गया और यूरोपीय देशे में आर्थिक संकट आ गया।
(3) कृषि व उद्योगों का मशीनीकरण रू युद्ध के समय मांग बढ़ने के कारण कृषि व उद्योगों में अधिक से अधिक उत्पादन मशीनों के माध्यम से होने लगा। मशीनों के प्रयोग के परिणामस्वरूप 1919 में एक श्रमिक जो कार्य 52 घंटे में करता था वह 1929 में 30 घंटे में करने लगा। मशीनों के प्रयोग के कारण कम श्रमिकों की आवश्यकता पड़ी। कृषि व उद्योग में श्रमिकों की छटनी की जाने लगी। इसके परिणामरूवरूप सभी देशों में बेरोजगारी की समस्या बढ़ी। इस समस्या ने आर्थिक संकट को ओर गहरा बना दिया।
(4) अतिउत्पादन व क्रय शक्ति में कमी रू युद्ध के समय व युद्ध समाप्त होने के पश्चात् मांग को परा करने के लिए अत्यधिक उत्पादन किया गया जिससे अतिउत्पादन की स्थिति पैदा हुई। दूसरी ओर बेरोजगारी के कारण विशेषतः श्रमिकों की क्रय शक्ति में कमी आयी। सभी यूरोपीयदेशो विशेषतरू जर्मनी की मुद्रा का मूल्य भी न्यूनतम स्तर तक घट गया। 1923 में 1 बिलियन मार्क बैंक नोट से केवल एक सिगरेट का पैकट खरीदा जा सकता था। किन्तु 10 वर्ष पूर्व बिलियन मार्क बैंक नोट की कीमत 50 हजार पाउण्ड थी।
(5) सोने की कमी रू अर्थशास्त्रियों के अनुसार विश्व में सोने की कमी के कारण भी आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ। अतिपर्ति की राशि का भुगतान व युद्ध ऋण की राशि का भुगतान सोने के रूप में किया जा रहा था। क्षतिपूर्ति को अधिकतम राशि फ्रांस को मिल रही थी व युद्ध ऋण की अधिकतम राशि अमेरिका को मिल रही थी। लगभग 400 सोना अमेरिका व फ्रांस में संग्रहित हो गया। इसके परिणामस्वरूप जिन देशों में सोने के सिक्के प्रचलित थे मंदो हो गये। किन्तु उन्हीं देशों में आर्थिक संकट का प्रभाव पड़ा। अर्थशास्त्रियों के अनुसार सोने की कमी से आर्थिक संकट गहरा गया।
(6) आर्थिक राष्ट्रवाद या आर्थिक संरक्षणता रू प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् सभी यूरोपीय देशों ने आर्थिक संरक्षणता या आर्थिक राष्ट्रवाद की नीति का अनुसरण किया। इस नीति के अनुसार अधिक से अधिक आयात कर व चुंगी लागू की गई व स्वदेशी पर अधिक से अधिक बल दिया गया। इंग्लैण्ड कर मुक्त व्यापार की नीति का समर्थक था परन्तु इंग्लैण्ड ने भी आर्थिक राष्ट्रवाद की नीति का अनुसरण किया। इस नीति के परिणामस्वरूप विश्व व्यापार में अत्यधिक कमी आयी। 1920 के दशक में विश्व व्यापार में यूरोपीय व्यापार की 10ः की कमी आयी।
(7) तात्कालिक कारण: इसे वाल स्ट्रीट की घटना कहते हैं। 1920 के दशक में अमेरिका में अत्प्रयाशित आद्यैागिक विकास हुआ। 1920 के दशक को अमेरिका में श्तवंतपदह ज्मअमदजलश् कहते हैं क्योंकि आर्थिक मामले में बहुत विकास हुआ। अमेरिका विश्व का 40ः उत्पादन करने लगा। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् अमेरिका सबसे बड़ा आर्थिक दृष्टिकोण से युद्ध विजेता सिद्ध हुआ। अमेरिका में अधिक से अधिक लोगों ने अपना धन शेयर बाजार में निवेश करना प्रारम्भ किया। अमेरिका में शेयर बाजार के भाव 2 गुना से लेकर 20 गुना तक बढ़ गये। इससे अमरीकीवासियों को अत्यधिक लाभ हुआ। परंतु अक्टूबर, 1929 में अचानक शेयर बाजार में गिरावट आई। 24 अक्टूबर, 1929 एक ही दिन में 16ध् मिलियन शेयर्स न्यूनतम कीमतों पर बेच दिये गये। इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी शेयर बाजार में 50 अरब डालर की गिरावट आ गई। एक ही सप्ताह में अमेरिका के शेयर बाजार में 40 हजार मिलियन डालर की गिरावट आ गई। इस घटना को वॉल स्ट्रीट की घटना कहते हैं। इसे श्ठसंबा ज्ीनतेकंलश् भी कहते हैं।
प्रश्न: आर्थिक मंदी की समस्या के सुलझाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कौन-कौनसे प्रयास किए गए? ये प्रयास इस समस्या को सुलझाने मे कहा
तक सफल रहे ?
उत्तर: आर्थिक मंदी की समस्या का समाधान करने के लिए सबसे पहला कदम फ्रांस के विदेश मंत्री एरिस्टाइड ब्रिया (।तपेजपकम ठतपंदक) ने 1930 में इस समस्या का समाधान करने के लिए यूरोपीय संध बनाने का सुझाव दिया। इस संदर्भ में उसने राष्ट्र संघ को सुझाव दिये। ब्रिया के सुझाव के आधार पर राष्ट्र संघ ने एक समिति का गठन किया। इस समिति की पहली बैठक जनवरी, 1931 में आयोजित की गई। इस बैठक में व्यापारिक बाधाओं को दूर करने पर बल दिया गया। इसके अंतर्गत सीमा शुल्क या आयात कर कम करने पर बल दिया गया। ऑस्ट्रिया ने एक क्षेत्रीय संघ बनाने का भी सुझाव दिया। इसका फ्रांस ने विरोध किया। 1931 में जब ऑस्ट्रिया व जर्मनी ने एक सीमा शुल्क संघ का गठन किया तो फ्रांस ने इसका भी विरोध किया क्योंकि यह वर्साय की संधि के विरुद्ध था। इस प्रकार यह सम्मेलन आर्थिक समस्या को सुलझाने में असमर्थ रहा।
लोसाने सम्मेलन- जून, 1932
राष्ट्र संघ के तत्वाधान में जून, 1932 में स्विट्जरलैण्ड में लोसाने (स्ंनेंददम) नामक स्थान पर एक आर्थिक सम्मेलन हुआ। इसमें
अमेरिका ने भी भाग लिया। इस सम्मेलन में दो विषयों पर विचार हुआ। प्रथम, क्षतिपूर्ति तथा द्वितीय युद्ध ऋण। जिन राष्ट्रों ने यह सुझाव
दिया कि यदि जर्मनी तीन अरब मार्क एक मुश्त यूरोपीय पुननिर्माण के लिए अदा करता है तो शेष क्षतिपूर्ति की राशि को समाप्त किया जा
सकता है। युद्ध ऋण के संदर्भ में मित्र राष्ट्रों ने क्षतिपूर्ति की राशि की कटौती के अनुपात में युद्ध ऋण की राशि को कम करने की मांग
की। अमेरिका ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
हूवर मुहलत
अमरीका के राष्ट्रपति हबर्ट हूवर (भ्मइमतज भ्वनइमत) ने सुझाव दिया कि पूरे विश्व में ऋण अदायगी को एक वर्ष के लिए स्थगित कर
दिया जाए। इस सुझाव को मानने से प्रमुख देशो ने इन्कार कर दिया। अमरीकी राष्ट्रपति हूवर के दबाव के कारण लोसान सम्मेलन में
क्षतिपूर्ति की राशि को पूर्णतया समाप्त कर दिया।
लंदन सम्मेलन- जून, 1933
लोसाने सम्मेलन में आर्थिक समस्या का समाधान करने के लिए जो सुझाव दिए गए उन पर अमल करने के लिए। जून, 1933 में लंदन में विश्व आर्थिक सम्मेलन में हुआ। इस सम्मेलन में (1) व्यापारिक बाधाओं को दूर करने का बल दिया गया। (2) मुद्रा के मूल्य को बढ़ाने पर विचार किया गया। परन्तु कोई भी देश व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के पक्ष में नहीं था अत, लंदन सम्मेलन भी असफल रहा।
1933-34 तक आर्थिक मंदी का प्रभाव कम होने लगा। अमेरिका में राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कई आर्थिक सुधार किये। इससे अमेरिका की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। विश्व के अन्य देशों में भी आर्थिक सुधार होने लगा।
प्रश्न: आर्थिक महामन्दी से निपटने के अमेरिका ने किन नीतिगत साधनों का प्रयोग किया गया था ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर: वर्ष 1929 की महामन्दी विश्व को अपनी चपेट में लेने वाला सबसे भंयकर आर्थिक संकट था। यह अमेरिका से प्रारम्भ होकर समूचे औद्योगीकृत विश्व में फैल गया। इसके उद्भव में अनेक कारणों ने अपनी भूमिका निभाई, किन्तु इसका एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण था- 1920 के दशक में सम्पत्ति का असमान वितरण।
महामंदी से निपटने के वर्ष 1933 में नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रुजवेल्ट ने नई नीतियाँ प्रारम्भ की, जिन्हें श्न्य डीलश् या नई सौदेबाजी के रूप में जाना जाता है। इस न्यूडील के मुख्यतः तीन उद्देश्य थे – राहत, पुनरुद्धार और सधार। राहत से आशय था गरीबी से ग्रस्त लाखों भूखों और बेसहारों को सीधे सहायता देना। पुनरुद्वार का अर्थ था कि ने बेरोजगारी घटाने और नई माँग पैदा करने का प्रण किया था ताकि इससे अर्थव्यवस्था को पुनः आगे बढ़ाया जा सके। सधार से राष्ट्रपति रुजवेल्ट का आशय था शेयर बाजार के पतन की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने का संकल्प। इसके तहत निम्नलिखित निर्णय लिए गए।
न्यू डील में बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं को सरकार द्वारा अस्थायी तौर पर अपने अधिकार में लिया गया, जिससे कि निवेशकों का विश्वास बहाल हो सके।
शेयर बाजार को सुधारने के लिए एक प्रतिभूति विनिमय आयोग की स्थापना की गई तथा निवेशकों के लिए यह अनिवार्य हो गया कि वे शेयरों के मूल्य की कम-से-कम 50ः राशि का नकद भगतान करके ही शेयर उधार पर खरीद सकते थे।
किसानों की सहायता के लिए सरकार द्वारा किसान राहत अधिनियम पारित किया गया, जिसके अन्तर्गत किसानों को अपना उत्पादन कम करने के लिए मुआवजा दिया गया जिससे कीमतें बढ़ीं और किसानों की आय बढ़ गई।
नागरिक संरक्षण कोर नामक लोकप्रिय योजना लागू की गई जिससे युवाओं को नौकरी दिलाने में सहायता की गई। देशभर में संरक्षण परियोजनाएँ प्रारम्भ की गई इससे लाखों रोजगार के अवसर सृजित किए गए। दृ
नए सौदे का एक प्रमुख महत्वपूर्ण भाग था वर्ष 1933 का राष्ट्रीय औद्योगिक पुररुत्थान अधिनियम, जो लोगों को पुनरू स्थायी नौकरियों पर लाने के विचार को ध्यान में रखकर बनाया गया, ताकि वे खरीददारी करते समय स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। इस अधिनियम के अंतर्गत देश में अवसंरचनात्मक ढाँचे का विकास किया गया। इसके साथ ही राष्ट्रीय पुनरुत्थान प्रशासन का सृजन किया गया, जिससे श्रमिकों के कार्य घण्टे तय किए गए तथा बाल श्रम समाप्त किया गया जिससे रोजगार के नए अवसर सृजित किए गए।
दो विशेष श्रमिक अधिनियम पारित किए गए जिसके द्वारा श्रमिक संघों को मान्यता प्रदान की गई। मजदूरों के लिए अपीलीय प्राधिकरण बनाया गया तथा साप्ताहिक कार्य घण्टे तय करके न्यूनतम मजदूरी तय कर दी गई इससे लोगों में रोजगार सुरक्षा की भावना बढ़ी।
उपरोक्त नीतिगत उपायों ने आर्थिक मन्दी के कारण भुखमरी व कंगाली की हालत में पहुँचे लोगों को राहत पहुंचाई। नए रोजगार सृजित होने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने पुनः गति पकड़ी।
प्रश्न: द्वितीय विश्व युद्ध के कारणों में आर्थिक मंदी सबसे महत्वपूर्ण कारण था, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध को अवश्यम्भावी बना दिया। व्याख्या कीजिए।
उत्तर: (1) आर्थिक राष्ट्रवाद – (ं) स्वदेशी पर बल दिया गया।
(इ) अधिक से अधिक सीमा शुल्क लागू किये गये। इसके परिणामस्वरूप विश्व के व्यापार में गिरावट आई।
(2) लोकतांत्रिक व्यवस्था को आघात – जनता अधिनायकवाद की ओर बढ़ी।
(3) अधिनायकवाद का उदय – जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों में अधिनायकवाद का उदय हुआ।
(4) अर्थव्यवस्था पर राज्य नियंत्रण में वृद्धि – अर्थव्यवस्था में राज्य की अहस्तक्षेप की नीति (लेसेज फेयर) चल रही थी। आर्थिक मंदी के पश्चात, अमेरिका इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, जैसे देशो ने अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।
(5) साम्यवाद का उदय – आर्थिक मंदी ने रूस, यूगोस्लाविया, बल्गेरिया आदि पूर्वी यूरोपीय देशों में साम्यवाद के उदय के लिए वातावरण
तैयार किया।
(6) जापान में सैनिकवाद का उदय-आर्थिक मंदी के कारण जापान ने 1931 में मंचूरिया पर आक्रमण किया। इसी आर्थिक कारण से 1937 में उसने चीन पर भी आक्रमण किया।
(7) इटली में तानाशाही सरकार की स्थापना – मुसोलिनी के नेतृत्व में तानाशाही सरकार की स्थापना हुई। आर्थिक संकट के कारण ही
इटली ने 1935 में आबीसीनिया (वर्तमान इथियोपिया) पर आक्रमण किया।
(8) जर्मनी में हिटलर का उदयं – आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप ही जर्मनी में हिटलर का उदय हुआ। इन सबका परिणाम था द्वितीय
विश्व युद्ध।
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