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सरकार कौन बनाता है | भारत में सरकार कैसी बनती है government kaise banate hain banti hai
government kaise banate hain banti hai सरकार कौन बनाता है | भारत में सरकार कैसी बनती है ?
कौन सरकार बनाता है?
राजनीतिक दल जिसके पास एक साधारण बहुमत होता है, जिसका अर्थ है कि उस दल को सरकार बनाने के लिए केन्द्र के मामले में लोकसभा अथवा राज्य के मामले में विधानसभा में कुल सीटों की संख्या के आधे से कम से कम एक अधिक जीता होना चाहिए, सरकार बनाता है। हमारे देश में कराए गए 13 लोकसभा चुनाव परिणाम यह इंगित करते हैं कि यह कांग्रेस पार्टी ही है जिसने अनेक अवसरों पर भारतीय चुनाव में सीटों पर बहुमत हासिल किया, परन्तु यह दल चुनाव में वैध मतों के 50 प्रतिशत से अधिक कभी प्राप्त नहीं कर सका । कांग्रेस पार्टी के लिए सर्वाधिक शानदार जीत 1984 के लोकसभा चुनाव में रही जब पार्टी ने 415 सीटों की सर्वोच्च गणना प्राप्त की, परन्तु इसके बावजूद वह केवल 48 प्रतिशत वोट ही पा सकी। वास्तव में, इस देश के चुनावी इतिहास में किसी राजनीतिक दल का यह अब तक का सर्वोत्तम प्रदर्शन था।
किन्तु भारतीय राजनीति के रुझानों में एक बड़ा बदलाव आया है, विशेषकर नब्बे के दशक में पिछले दशक के दौरान भारत में चार लोकसभा चुनाव हुए हैं, लेकिन कोई राजनीतिक दल बहुमत नहीं जुटा सका है। इन चुनावों के दौरान भी सर्वोत्तम प्रदर्शन कांग्रेस पार्टी का ही था – 1991 के लोकसभा चुनावों के दौरान, जब इसने 244 लोकसभा सीटें जीतीं और जनमत का 36.6 प्रतिशत मतदान हुआ। जब सदन में सीटों का बहुमत किसी राजनीतिक दल को नहीं मिलता है, उसे ‘‘त्रिशंकु सदन‘‘ माना जाता है। ऐसी परिस्थितियों में दो या दो से अधिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं अथवा अधिकतम सीट-संख्या वाला राजनीतिक दल सरकार बनाता है और अन्य लघुतर राजनीतिक दलों द्वारा बाहर से समर्थन दिया जाता है। जब दो या दो से अधिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं, उसे गठबंधन सरकार कहते हैं। आप गठबंधन सरकार के बारे में इकाई 23 में पढ़ेंगे। लेकिन यदि एक दल सरकार बनाता है, बेशक उसके पास बहुमत न हो तथा अन्य राजनीतिक दलों से समर्थन उसको बाहर से प्राप्त हो, उसको अल्पमत सरकार के रूप में देखा जाता है।
चुनाव और सामाजिक परिवर्तन
आप इकाई 31 में पढ़ेंगे कि चुनावों – आवधिक चुनावों, मतदान प्रतिशत और जनता की बृहद-स्तरीय भागीदारी ने भारत में लोकतंत्र को मजबूत किया है। राष्ट्रीय, प्रान्तीय तथा स्थानीय – विधायी निकायों के सभी स्तरों पर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण और 73 वें तथा 74 वें संविधान संशोधन अनुच्छेदों ने महिलाओं तथा अन्य पिछड़े वर्गों को भी ग्राम पंचायतों व नगरपालिकाओं में अपने लिए आरक्षित सीटों पर निर्वाचित होने में सक्षम बनाया है। ये वर्ग न सिर्फ विभिन्न विधायी निकायों हेतु चुने गए हैं अपितु मुख्यमंत्री, मंत्री तथा देश के राष्ट्रपति भी बने हैं। राजनीति-शास्त्री आशुतोष वार्ष्णेय तर्क प्रस्तुत करते हैं कि चुनावी प्रक्रियाओं में दलित व अन्य पिछड़े वर्ग जैसे समूहों का पदार्पण होने से भारत और अधिक लोकतांत्रिक हो गया है। फिर भी, महिलाओं का प्रवेश इतना आसान नहीं रहा है। वस्तुतः, अधिकतर मामलों में, खासकर ग्राम पंचायतों में, निर्वाचित महिला-सदस्य अपने परिवारों के पुरुष-सदस्यों की परोक्षी ही हैं। परन्तु चुनावों का लोकतांत्रिक सत्त्व सामाजिक व आर्थिक असमानताओं, अपराध तथा भ्रष्टाचार के कारण प्रभावित होता है। वे जिनके अख्तियार में संसाधन नहीं है, अपराधियों आदि से कोई संबंध नहीं हैं, चुनाव लड़ना अथवा कभी-कभी मतदान करना भी कठिन समझते हैं। सामान्यतः राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशियों को टिकट इस आधार पर दिया जाता है कि क्या वे गिनती में अधिक से अधिक जातियों व समुदायों का समर्थन जुटा सकते हैं और पर्याप्त संसाधनों पर नियंत्रण कर सकते हैं। यहाँ तक कि निर्वाचक भी जाति व समुदाय के आधार पर मतदान करते हैं। बड़ी संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं अथवा उनके विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हैं। संसदीय, राज्य विधानसभाओं तथा परिषदों, और पंचायतों तथा नगरपालिकाओं – सभी स्तरों पर चुनावों में राजनीतिज्ञों तथा अपराधियों के बीच संबंध रहता है। अब ऐसे अन्तर्सम्बन्ध षड्यन्त्रकारी हो गए हैं, खासकर नब्बे के दशक से। यह लोकतांत्रिक मूल्यों की गिरती साख को प्रतिबिम्बित करता है । इकाई 32 में आप यह भी पढ़ेंगे कि वी.एन. वोहरा उप-समिति ने भी इंगित किया है कि अपराधियों, नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों के बीच अन्तर्सम्बन्ध विद्यमान है। अपराध, जाति, साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार की अकाट्य भूमिका के कारण ही लोगों की वास्तविक समस्याएँ – कानून व व्यवस्था, विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, मौलिक, जन-आवश्यकताएँ दूसरे दर्जे में डाल दी जाती हैं । यद्यपि ये मामले प्रत्येक चुनाव में राजनीतिज्ञों द्वारा उठाये भी जाते हैं, यह मुख्यतः शब्दाडम्बर के रूप में ही किया जाता है।
बोध प्रश्न 3
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) भारत में चुनावों का समाज के कमजोर वर्गों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
2) भारत में निर्वाचक नीतियों की मुख्य अड़चनें क्या हैं?
बोध प्रश्न 3 उत्तर
1) भारत में चुनावों ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों, अन्य पिछड़े वर्गों व महिलाओं जैसे कमजोर वर्गों को अपने प्रतिनिधि चुनने, और खुद को भी प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने द्वारा लोकतांत्रिक निर्णयन में भाग लेने में सक्षम बनाया है। इसने भारत में लोकतंत्र को मजबूत किया है।
2) भारत में चुनावी राजनीति में मुख्य अड़चनें हैं – अपराध, काला-धन, भ्रष्टाचार, और सामाजिक व आर्थिक असमानताएँ।
सारांश
श्चुनाव लोकतांत्रिक राज्य का एक अभिन्न भाग हैं। भारत में प्रत्येक व्यस्क नागरिक, जो 18 वर्ष की आयु पार कर चुका है चुनावों में भाग लेने का अधिकार रखता है। चुनाव भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित किए जाते हैं। 1952 से स्वतंत्र भारत में अनेक चुनाव कराए जा चुके हैं – संसद, राज्य विधानसभाओं तथा परिषदों, और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को चुनने के लिए। इन्होंने दलितों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं समेत समाज के सभी वर्गों को अपने प्रतिनिधि चुनने और प्रतिनिधियों के रूप में चुने जाने हेतु सक्षम बनाया है। यह चुनावों तथा सामाजिक परिवर्तन के बीच सकारात्मक सम्बन्ध का एक संकेत है। लेकिन भारत में चुनावों का लोकतांत्रिक सत्त्व अपराध, धन तथा अन्य अनुचित साधनों की बढ़ती भूमिका द्वारा बिगड़ गया है। कुल मिलाकर भारत में चुनावों ने सामाजिक बदलाव लाने में अत्यधिक योगदान दिया है।
कुछ उपयोगी पुस्तकें
मित्रा, एस के तथा चिरियनकन्दाथ, जेम्स (सं.), इलैक्टॉरल पॉलिटिक्स इन इण्डिया: ए चेन्जिंग लैण्डस्केप, सेग्मेण्ट जुनस, नई दिल्ली, 1992 ।
मित्रा, एस.के. तथा सिंह, बी.बी. (सं.), डिमोक्रेसी एण्ड सोशल चेन्ज इन इण्डिया: ए कॉस सेक्शनल अनॉलिसिस ऑव दि इलेक्टोरेट, सेज पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली. 1999।
भामभ्री, सी.पी., इलेक्शन्स 1991: ऐन् अनॉलिसिल, बी.आर. पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन, दिल्ली, 1991 ।
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