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gibbs helmholtz equation in hindi गिब्स हेमोल्ट्स समीकरण क्या है महत्त्व Importance

जाने gibbs helmholtz equation in hindi गिब्स हेमोल्ट्स समीकरण क्या है महत्त्व Importance ?

ऊष्मागतिकीय साम्य व स्वतः परिवर्तता (अनुक्रमणीयता का मापदण्ड) (Criteria for Thermodynamic equilibrium and spontaneity (Irreversiblity)

एक तन्त्र साम्यवस्था में रहता है अगर इसके मापनीय गुण (Observable properties) समय के साथ परिवर्तित नहीं होते अर्थात् इसके दाब, ताप तथा आयतन स्थिर रहते हैं। dP = dV = dT = 0 हम जानते हैं कि उत्क्रमणीय प्रक्रम में परिवर्तन साम्य में रहता है। इस प्रकार उत्क्रमणीयता की शर्त ऊष्मागतिक साम्य की शर्त होगी। हम जानते हैं कि उत्क्रमणीय प्रक्रम के लिए

TdS – dE – w > 0…………………(172)

समीकरण (172) में समानता (=) उत्क्रमणीय परिवर्तन या साम्य अवस्था के लिए व असमानता (< (>) अनुत्क्रमणीय परिवर्तन के लिए आवश्यक शर्त है। लेकिन सभी अनुत्क्रमणीय परिवर्तन स्वतः परिवर्तित है अतः असमानता प्रक्रम के होने की शर्त है। समीकरण (172) में w यांत्रिक व अयांत्रिक कार्य को है अगर तन्त्र में P-V कार्य होता है तो

Tds dE PdV >0 ……………….(173)

(i) स्वतः परिवर्तता व साम्य के लिए एन्ट्रोपी पद में मापदण्ड (Criteria of spontaneity equilibrium in terms of Entropy):- यह शर्त लगाने पर कि तंत्र की ऊर्जा स्थिर रहती है समीकरण (173) में अर्थात् dE = 0 (Isodynamic प्रक्रम) तथा कोई यांत्रिक कार्य नहीं होता है अर्थात् dV=0 (isochoric change) समीकरण (170) को निम्न प्रकार लिख सकते हैं-

(TdS)E,V ≥0………………(174)

उत्क्रमणीय (Isodynamic) व ( Isochoric) प्रक्रम में एन्ट्रोपी परिवर्तन धनात्मक होता है। अतः अगर प्रक्रम स्वतः परिवर्तित होता है तो एन्ट्रोपी बढ़ती है तथा साम्य पर अधिकतम होती है।

(ii) स्वतः परिवर्तता व साम्य के लिए कार्य फलन पद (A) में मापदण्ड (Criteria of spontaneity and equilibrium in terms of Entropy)

अतः स्थिर ताप व स्थिर आयतन पर (समतापीय व समआयतनिक उत्क्रमणीय प्रक्रम में कार्यफलन

A का मान कम होता है व साम्य पर न्यूनतम होता है। अतः

(i) स्वत परिवर्तित (अनुत्क्रमणीय) के लिए (dA)T, V< 0

(ii) साम्य के लिए (dA)T.v = 0

(iii) मुक्त ऊर्जा पद में (In Terms of Free Energy G)

हम जानते हैं कि

अतः

dE का मान समीकरण (173) में रखने पर

समीकरण में स्थिर दाब व स्थिर ताप की शर्त लगाने पर

dP = 0 व dT = 0 अर्थात्

(-dG)P,T > 0

(dG) PT > 0………….. ..(179)

स्थिर दाब व स्थिर ताप पर उत्क्रमणीय प्रक्रम में मुक्त ऊर्जा कम होती जाती है तथा साम्य पर निम्न होती है। अतः (i) स्वतः परिवर्तता के लिए (dG)PT < 0 (ii) साम्य के लिए (dG) PT = 0

 मुक्त ऊर्जा में ताप व दाब द्वारा परिवर्तन (Variation of G with Temperature and Pressure)

ताप व दाब परिवर्तन से मुक्त ऊर्जा में होने वाला परिवर्तन निम्न प्रकार से ज्ञात किया जा सकता है। किसी तन्त्र की मुक्त ऊर्जा की परिभाषा समीकरण (165) द्वारा निम्न प्रकार की जाती है-

यह समीकरण G में ताप व दाब के साथ होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है। विभिन्न परिस्थितियों में समीकरण (182) अलग-अलग रूपों में व्यक्त की जा सकती है।

(i) इसी प्रक्रम में दाब स्थिर रहता है अर्थात् dP = 0, तो समीकरण (182) में रखने पर

चूंकि एन्ट्रोपी का मान हमेशा धनात्मक होता है इसलिये ऋणात्मक चिन्ह यह प्रदर्शित करता है कि। समदाबी रूपान्तरण (Isobaric Transformation) में ताप में वृद्धि से प्रक्रम की मुक्त ऊर्जा में कर्म होती है। चूंकि ठोसों की एन्ट्रोपी कम, गैसों की एन्ट्रोपी अधिक होती है, अतः समीकरण (165) से यर भी निष्कर्ष निकलता है कि ठोसों में ताप के साथ गिब्ज मुक्त ऊर्जा परिवर्तन की दर कम तथा गैस में अधिक होती है।

(ii) इसी प्रकार यदि प्रक्रम में ताप स्थिर रहता है अर्थात् dT = 0 है तो समीकरण (182) में रखने

चूंकि आयतन एक धनात्मक राशि है, अतः समीकरण (185) यह प्रदर्शित करती है कि समतापी रूपान्तरण में दाब वृद्धि से प्रक्रम की मुक्त ऊर्जा में वृद्धि होती है। चूंकि गैसों का मोलर आयतन ठोस तथा द्रवों की अपेक्षा अधिक होता है। अतः समीकरण (185) से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि गैसों में दाब के साथ मुक्त ऊर्जा परिवर्तन की दर अधिक होती है।

किसी तन्त्र की कुल ऊर्जा परिवर्तन समीकरण (185) को समाकलित करके प्राप्त की जा सकती है।

यदि G1, P1 तथा G2, P2 किसी तंत्र के क्रमशः प्रारम्भिक व अन्तिम मुक्त ऊर्जायें तथा दाब हों तो स्थिर ताप पर –

(i) ठोस तथा द्रवों के लिये जिनके आयतन पर दाब का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता आयतन स्थिर माना जा सकता है। 

हेल्मोल्ट ऊर्जा (A) में ताप व आयतन द्वारा परिवर्तन (Variation of A with Temperature and Pressure)

ताप व दाब परिवर्तन से हेल्मोल्टज ऊर्जा में होने वाला परिवर्तन निम्न प्रकार से ज्ञात किया जा सकता है। हम जानते हैं कि

A =E-TS

इसका अवकलन करने पर

dA = dE – Tds – SdT…………..(189)

ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के अनुसार

ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियमानुसार एक उत्क्रमणीय प्रक्रम के लिए

यह समीकरण A में ताप व आयतन के साथ होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है विभिन्न परिस्थितियों में समीकरण (192) अलग-अलग रूपों में व्यक्त की जा सकती है।

(i) जब आयतन निश्चित (स्थिर) हो अर्थात dV = 0 तो

 गिब्ज हेमोल्ट्स समीकरण (Gibbs-Helmholtz’s Equation) 

जैसा कि पूर्व में माना गया है, यदि G1 किसी तन्त्र की प्रारम्भिक अवस्था में ताप T पर मुक्त ऊर्जा है। यदि ताप को अनन्त सूक्ष्म मात्रा dT द्वारा बढ़ाया जाता है तो तन्त्र की मुक्त ऊर्जा G1 + dG1 हो जाती है। इसी प्रकार तन्त्र की अन्तिम अवस्था में मुक्त ऊर्जा G2 का मान ताप T + dT पर बढ़ कर G2+dG2 हो जाता है। समीकरण (183) द्वारा-

यह समीकरण गिब्ज हेल्मोल्ट्स समीकरण ( Gibbs – Helmholt’s Equation) कहलाती है। यह समीकरण उन सभी प्रक्रमों के लिये उपयोगी है जो कि स्थिर दाब पर होते हैं। यदि कोई प्रक्रम स्थिर आयतन पर होता है तो गिब्ज हेल्मोल्ट्ज समीकरण को निम्न प्रकार से लिखा जाता है-

 गिब्ज हेल्मोल्ट्ज समीकरण का महत्त्व (Importance of Gibb’s Helmeholtz Equation) 

(i) ये समीकरण सभी भौतिक परिवर्तनों पर लागू होती है।

(ii) समीकरण (200) व (201) उत्क्रमणीय प्रक्रमों पर भी समान रूप से लागू होती है क्योंकि इनमें प्रयुक्त राशियाँ G , H, A तथा E सभी अवस्था फलन है तथा प्रक्रम के पथ पर निर्भर नहीं करती है।

(iii) समीकरण (200) व (201) की सहायता से H तथा E के मान ज्ञात किए जा सकते हैं यदि G तथा A के मान तथा उनके ताप गुणांक ज्ञात हो ।

(iv) गिब्ज ऊर्जा पर ताप के परिवर्तन के प्रभाव को ज्ञात किया जा सकता है।

(v) गिब्ज हेल्मोल्ट्स समीकरण की सहायता से अभिक्रिया के ऊष्मा परिवर्तन को ज्ञात किया जा सकता है यदि गैल्वेनी सेल का विद्युत वाहक बल (emf) एवं ताप गुणांक ज्ञात हो

गिब्ज ऊर्जा की ताप पर निर्भरता (Température Dependence of the Gibbs Energy) 

गिब्ज ऊर्जा की ताप पर निर्भरता विभिन्न व्यंजको द्वारा व्यक्त की जा सकती है। समीकरण (148) द्वारा

यह जानने के लिये कि G/T का मान ताप पर किसी प्रकार से निर्भर करता हैG/T का स्थिर दाब पर ताप के संदर्भ में अवकलन किया जाता है ।

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