Genetic Material of Bacteria in hindi , जीवाणुओं के आनुवंशिक पदार्थ क्या है , किससे बना होता है

पढेंगे Genetic Material of Bacteria in hindi , जीवाणुओं के आनुवंशिक पदार्थ क्या है , किससे बना होता है ?

जीवाणुओं के आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material of Bacteria)

जीवाणुओं में केन्द्रक की उपस्थिति काफी समय पहले तक विवाद तथा मतभेद का विषय रही है। इनमें केन्द्रक न तो सामान्य प्रकाश सूक्ष्मदर्शी में देखा जा सकता है न ही सामान्य क्षारीय अभिरंजकों द्वारा अभिरंजित किया जा सकता है, किन्तु जीवाणुओं द्वारा आनुवंशिक नियमों का पालन करने के प्रमाण वैज्ञानिकों को ज्ञात थे। अतः यह मान्यता तो अधिकतर वैज्ञानिकों की थी कि सम्भवतः संरचनात्मक रूप से संगठित अवस्था में केन्द्रक (nucleus) न पाया जाता हो, क्रियात्मक रूप से अवश्य ही उपस्थित रहता है।

वैज्ञानिकों द्वारा केन्द्रक में उपस्थित DNA को फाल्गेन विधि (Feulgen method) से अभिरंजन करके तथा अन्य विधियों द्वारा अभिरंजन प्रयोगों से इस सम्बन्ध में यह प्रमाण जुटाये जा चुके हैं। कि जीवाणुओं में निश्चित रूप से कुछ विशिष्ट प्रकार की अन्तः कोशिक रचना पायी जाती है। ये विशिष्ट प्रकार की आनुवंशिक रचनाएँ “क्रोमेटिनिक काय” (chromatinic-bodies) कहलाती है। क्रोमेटिनिक काय विभिन्न जीवाणु कोशिकाओं में वृद्धि के दौरान अनेक प्रावस्थाओं में कुछ विभिन्नताएँ रखती हैं। ये काय जीवाणु की विखण्डन क्रिया के आरम्भ में सरलता से देखी जा सकती है। जीवाणु कोशिका में ये आनुवंशिक रचनाएँ अण्डाकार या लम्बवत् काय के रूप में सामान्यतः एक कोशिका में एक आवश्यक रूप से पायी जाती हैं। कुछ जीवाणुओं में ये क्रोमेटिन काय (chromatin bodies) दो या अधिक भी पायी जाती है। कुछ जीवाणुओं की कोशिका में ये काय ध्रुवों के निकट उपस्थित होती हैं अतः इन्हें कुछ वैज्ञानिकों ने ध्रुव काय (polar bodies) का नाम भी दिया है।

यूकैरियोट जन्तुओं की कोशिकाओं में केन्द्रक दोहरी इकाई झिल्ली, केन्द्रक झिल्ली (nuclear memberane) द्वारा घिरा रहता है। किन्तु जीवाणुओं में DNA को इस प्रकार की किसी झिल्ली द्वारा परिबद्ध नहीं किया जाता है। अतः जीवाणुओं में यह आनुवंशिक रचना न्यूक्लियोइड (nucleoid) अर्थात् केन्द्रकाय या क्रोमेटिन काय (chromatin body) के नाम से जानी जाती है एवं संगठन एवं उद्विकास की दृष्टि से प्राथमिक प्रकार (primitive type) की मानी जाती है। जीवाणु कोशिका में केन्द्रक झिल्ली के साथ-साथ केन्द्रिक (mucleolus), क्रोमोनिमेटा (chromonemata) तथा केन्द्रिक रस (nuclear sap) भी नहीं पाये जाते हैं।

न्यूक्लियोइड (Nucleoid)

जीवाणु कोशिकाओं में इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने पर केन्द्रकीय पदार्थ तन्तु (fibrillar) आकृति का दिखाई देता है जो DNA से बना रहता है। जीवाण्विक DNA को क्रोमोसोम (chromosome) अर्थात् गूणसूत्र भी कहते हैं। यूकैरिओटा जन्तुओं के गुणसूत्र में क्षारीय प्रोटीन्स (हिस्टोन) पाये जाते हैं जो जीवाणु गुणसूत्र में अनुपस्थित होते हैं। यद्यपि इनमें कुछ रिप्रेसर (repressor) प्रोटीन्स DNA से संलग्ल होते हैं। जीवाणु कोशिका में एक या अधिक केन्द्रकीय क्षेत्र पाये जाते हैं जिनमें एक ही प्रकृति के गुणसूत्र विद्यमान रहते हैं। अत: न्यूक्लियोइड अर्थात् केन्द्रक समान काय जीवाणु में एक या अधिक संख्या में जीवाण्विक कोशिकाद्रव्य में उपस्थित रहती है। न्यूक्लियोइड DNA की प्रतिकृति क्रियाओं (replication) के समय सामान्य से बड़े आमाप (size) के हो जाते हैं।

गुणसूत्र (Chromosomes )

जीवाणु कोशिका के केन्द्रक भाग में एक गुणसूत्र आवश्यक रूप से पाया जाता है। इसमें केन्द्रिक प्रोटीन हिस्टोन नहीं पाये जाते हैं। गुणसूत्र को ही DNA भी कहते हैं जो दो लड़ी समान रचनाओं या धागों (strands ) से रचित तन्तुकीय प्रकार की संरचना होती है। प्रत्येक गुणसूत्र गोलाकार आकृति रखता है जो महीन तन्तुओं से निर्मित होता है। यह तन्तु 1-2 मि.मी. लम्बा होता है गुणसूत्र के काट में यह 500-900 महीन धागे सदृश्य रचनाओं द्वारा अनेकों बार वलनित होकर पुष्प की जैसी आकृति से बना दिखाई देता है। स्पष्ट है कि DNA का अणु कोशिका की अपेक्षा हजारों गुना अधिक बड़ा होता है। (चित्र 9.1 ) चित्र में गुणसूत्र के दो मॉडल वृत्ताकार अवलग्नित अवस्था में तथा वलनित अवस्था में दर्शाये गये हैं। क्लनित मॉडल के चित्र में केवल 7 लूप दर्शाये गये हैं जबकि इनकी संख्या वास्तविक रूप में 12-90 तक होती है।

जीवाण्विक DNA में फॉस्फेट समूह के कुछ अवस्थाओं में पॉलीअमीन संलग्न पाये जाते हैं। पॉलीअमीन छोटे अणु होते हैं जिनमें अमीनों अम्ल समूह बहुलता लिये होते हैं। DNA का अणुभार लगभग 5 x 10 तथा लम्बाई 3000 या 3 x 10A° होती है। ई. कोलाई (Ecoli) का DNA तन्तु लगभग 1.5 nm लम्बा तथा 0.3 0.4nm व्यास का होता है जिसमें 4 x 106 झार युग्म (base pair) पाये जाते हैं।

ई. कोलाई (E. Coli) में गुणसूत्र एक वृत्तकार DNA अणु से बना होता है जो पूर्णतया वलनित अवस्था में रहता है। (चित्र 3.2) कुछ मात्रा में DNA प्लाज्माकला से कुछ बिन्दुओं अर्थात् स्थलों पर संलग्न अवस्था में भी पाया जाता है। इन संलग्न बिन्दुओं पर DNA की प्रतिकृति (replica) के संश्लेषण में आवश्यक एन्जाइम उपस्थित रहते हैं। कुछ अवस्थाओं में DNA, RNA तथा RNA प्रोटीन के साथ संलग्न स्थिति में भी पाया जाता है।

जीवाण्विक DNA की संरचना के वैज्ञानिकों ने मॉडल प्रस्तुत किये हैं। मॉडल (चित्र 9.3) के अनुसार DNA तन्तु 12 80 वलन रखता है, ये वलन अधिकुण्डलीय वलन (super coiled foldings) कहलाते हैं। कुण्डल के विभिन्न लूप प्रोटीन एवं RNA के क्रोड (core) द्वारा स्थिर रहते हैं। क्रोड DNA से संग्लन रहता है तथा विभिन्न वलनों की स्थिति को नियमित रखता है। इसी क्रोड क्षेत्र में प्रोटीन पाया जाता है। RNA नवीनतम अनुलेखित (transcribed) प्रकार का होता है जो एक तन्तुरूपी रचना के रूप में उपस्थित रहता है। प्रोटीन अधिकतर RNA पॉलीमरेज (polymease) प्रकार का होता है। DNA ase द्वारा DNA के लूप को काटने पर उस लूप के कुण्डल में शिथिलन हो जाता है किन्तु DNA के अन्य लूपों पर प्रभाव नहीं होता है।

चित्र 9.2 : ई. कोलाई के गुणसूत्र का इलेक्ट्रोन सूक्ष्मदर्शिक चित्र जीवाण्विक DNA में हिस्टोन्स प्रोटीन नहीं पाये जाते किन्तु कुछ क्षारीय प्रोटीन्स सूक्ष्म मात्रा में पाये जाते हैं जिन्हें HU, NS एवं DNA बन्धक प्रोटीन- II आदि नामों से जाना जाता है। वे लगभग समान प्रकार की दो पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला से बने होते हैं।

इनमें अर्धसूत्री एवं समसूत्री विभाजन की क्रियाएँ भी नहीं पायी जाती परन्तु मीजोसोम रखने वाले जीवाणुओं में DNA तथा मीजोसोम की झिल्ली के मध्य भी कुछ संलग्न बिन्दु (contact. point) पाये जाते हैं। कोशिका झिल्ली तथा मीजोसोम के वृद्धि होने पर मीजोसोम पृथक हो जाते हैं तथा DNA अणु भी इनके साथ खिंच कर अलग हो जाते हैं। यह क्रिया द्वि-विभजन (binary fission) के दौरान सम्पन्न होती है।

DNA अणुओं में सामान्यतः प्रयुक्त क्षारों एडीनीन (adenine), गुआनिन (guanine), थॉयमन (thymine) तथा साइटोसिन (cytosine) के अतिरिक्त कुछ मात्रा में मेथेलित क्षारक (methylated base) जैसे 6 मिथाइल अमीनोप्यूरिन तथा 5- मिथाइल साइटोसीन भी पाये जाते हैं।

प्लैज्मिड (Plasmids)

जैकब, शैफर तथा वॉलमेन (Jacob, Schaeffer and Wollman) ने 1960 में अधिका या एपीसोम (episome) नामक संरचना का जीवाणु कोशिका में पता लगाया। जीवाणु कोशिका में मुक्त रूप से उपस्थित आनुवंशिक अवयवों (genetic elements) या जीवाण्विक गुणसूत्र से समाकलित अवयवों (intergrated elements) को इन वैज्ञानिकों ने एपीसोम का नाम दिया।

लेडरबर्ग (Lederberg; 1952) ने जीवाणु कोशिकाओं में उपस्थित आनुवंशिक रचनाओं का प्लैज्मिड (plasmid) का नाम दिया। ये रचनाएँ स्वायत्त रूप में जननिक क्रियाएँ करने में सक्षम होती है। इन्हें संयुग्मन कारक (conjugation factor) या लैंगिक कारक ( sex factor) भी कहा जाता है। ये कारक संयुग्मन तथा आनुवंशिक पदार्थों को आदात्री कोशिकाओं (recepient cells) में स्थानान्तरण करने की क्षमता रखते हैं।

प्लैज्मिड (plasmid) वृत्ताकार आकृति की दोहरे तन्तुकीय DNA से बनी वे रचनाएँ होती हैं जो गुणसूत्र में पृथक अवस्था में जीवाणु कोशिका के भीतर उपस्थित रहती हैं । (चित्र 9.4) सामान्यतः यह आकार में एक वृत्ताकार द्विसूत्री DNA का एक अंश होती है। विश्रामावस्था में प्लैज्मिड भी अधि सर्पिल कुण्डली (super helical coil) के रूप में पाये जाते हैं। कुण्डली दायी दिशा से कुण्डलित रहती है। एक कुण्डली में 400-600 क्षारों के युग्म (bose pairs) पाये जाते हैं। इस प्रकार वक्रित प्रकार से व्यवस्थित DNA के अणु को सहसंयोजक बन्द वृत्ताकार DNA अर्थात् क्लोज्ड कोवेलेन्ट सर्क्यूलर DNA (covalently closed circular) CCC-DNA कहते हैं। स्पष्ट है कि यह भी दो तन्तुओं से रचित होता है। इसमें से एक सूत्र के अलग होने से CCC आकार के लूप खुलकर खुले वृत्ताकार आकार (open circular form) में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्लैज्मिड से संबंधित अर्थात् संलग्ल जीन (gene) अनेकों जैविक लक्षणों का निर्धारण करती है। इस प्रकार की जीन प्रत्येक प्लेज्मिड में 3-4 तक होती है। इनका कार्य गुणसूत्रीय जीन से भिन्न प्रकार का तथा अतिरिक्त प्रभार (additional charge) का होता है।

इनमें गुणसूत्रों की भाँति अपने समान प्रतिकृति बनाने की क्षमता पायी जाती है तथा कोशिका विभाजन के समय पृथक्करण द्वारा गुणसूत्र की एक प्रति प्रत्येक जीवाणु कोशिका में पहुँचायी जाती है। ये आणुवंशिक सूचनाओं का हस्तान्तरण करते हैं। केन्द्रीय गुणसूत्र की अपेक्षा ये हैं एवं इनके कार्य केन्द्रीय गुणसूत्र से भिन्न प्रकार का होता है। जीवाणु कोशिकाओं में ये लैंगिक बहुत कारक, प्रतिरोधक क्षमता कारक एवं अर्बुद (tumor) उत्प्रेरक कारक युक्त हो सकते हैं।

प्लैज्मिड को इनके कार्य के आधार पर दो भागों में विभक्त करते हैं :

(1) संयुग्मी प्लैज्मिड (Conjugative plasmids)

(2) असयुंग्मी प्लैज्मिड (Non conjugative plasmids)

(1) संयुग्मी प्लैज्मिड (Conjugative plasmids) : ऐसे प्लैज्मिड जिनमें पोषक कोशिका से आदात्री कोशिका को स्थानान्तरण संयुग्मन (conjugation) द्वारा निर्देशित करने के जीन पाये जाते हैं, संयुग्मी प्लैज्मिड कहलाते हैं। इनकी गतिशीलता (mobilization) की क्रिया अर्थात् स्थानान्तरण की क्रिया को भी स्वयं प्लैज्मिड ही प्रोत्साहित करते हैं। प्लैज्मिड ग्राही कोशिकाएँ पार – संयुग्मी (trans-conugants) कोशिकाएं कहलाती है।

(2) असंयुग्मी प्लैज्मिड (Non conjugative plasmid) : इनके द्वारा स्वयं का स्थानान्तरण संयुग्मन द्वारा सम्भव नहीं होता है।

संयुग्मी प्लैज्मिड का अणुभार 20 x 106 से अधिक होता है जबकि असंयुग्मी प्लैज्मिड अपेक्षाकृत छोटे होते हैं।

प्लैज्मिड का वर्गीकरण (Classification of Plasmids)

प्लैज्मिड को इनके द्वारा किये जाने वाले कार्यों के आधार पर 9 विभिन्न प्रकार के प्लैमिड में विभक्त किया गया है-

(i) स्थानान्तरण तथा लैंगिक कारक प्लैज्मिड (Transfer and sex factor plasmids) : वे प्लैज्मिड जो संयुग्मन द्वारा स्वयं के स्थानान्तरण तथा जीन का स्थानान्तरण दात्री से आदात्री कोशिकाओं को करते हैं, स्थानान्तरण प्लैज्मिड कहलाते हैं। ये असंयुग्मी प्लैज्मिड्स का स्थानान्तरण भी करते हैं जो संयुग्मी प्लैज्मिड्स से संलग्न होते हैं। कुछ प्लैज्मिड स्थानान्तरित होकर ग्राही कोशिका के गुणसूत्र से संलग्न हो जाते हैं। इन्हें लैंगिक कारक (sex factors) कहते हैं। प्रथम लैंगिक कारक F (sex factor F) ई. कोलाई (E. coli ) में K 12, वैज्ञानिकों द्वारा खोजा गया था। यह कोशिका में स्वतंत्र इकाई के रूप में अथवा गुणसूत्र से संयोजित अवस्था में उपस्थित रहता है। इन्हें ही एपीसोम (episome) नाम दिया गया है क्योंकि ये दोहरी भूमिका में पाये जाते हैं तथा सामान्य प्लैज्मिड से इस रूप में भिन्नता रखते हैं।

(ii) R-प्लैज्मिड (R-Plasmid) : जीवाणुओं के प्रति लगातार प्रतिरोधक औषधियों (antibiotics) प्रयोग करने पर इनमें प्रतिरोधी विभेद (resistant strain) विकसित करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। कुछ जीवाणुओं में इस क्रिया हेतु “जीन उत्परिवर्तन” (gane mutation) हो जाता है जो इन्हें प्रतिरोधक औषधियों के प्रति प्रतिरोधी (resistant) बनाता है। शिगेला (Shigella) प्रथम R – विभेद है जो सर्वप्रथम खोजा गया है। शिगैला डिसेन्ट्रिए (Shigella dysentriae) नामक जीवाणु पेचिश – उत्पन्न करता है। जापान में इसके नियंत्रण हेतु सल्फोनमाइड (sulphonamides) एवं अन्य प्रतिजैविक (antibiotic) औषधियाँ काम में लाई गयीं। ऐसे रोगी जिन्हें स्ट्रेप्टोमाइसीन (streptomycin), क्लोरेमफैनिकॉल (chloramphenicol), टैट्रासाइक्लिन (tetracycline) एवं सल्फोनेमाइड (sulphonamide) उपचार हेतु दी गयी थी इनमें इनके प्रतिरोधी जीवाणु उपस्थित पाये गये। इन प्रतिरोधी जीवाणुओं को सामान्य दवा – संवेदी जीवाणुओं से मिलाये जाने पर शिगैला के संवेदी जीवाणु प्रतिरोधी प्रकार में परिवर्तित हो गये। उपरोक्त परीक्षणों से यह बात सामने आयी कि प्रत्येक औषधि के प्रति रोधन क्षमता एक विशिष्ट जीन द्वारा निर्देशित होती है तथा उपरोक्त चार प्रकार के विशिष्ट जीन एक स्थानान्तरण में सक्षम प्लैज्मिड पर उपस्थित होती है। प्लैज्मिड पर उपस्थित एक अन्य जीन पोषक कोशिका द्वारा विशिष्ट प्रकार के पिलि (pili) के संश्लेषण पर प्रभाव डालती है। प्रतिरोधी स्थानान्तरण कारक (resistance-transfer factors) RTF दो प्रकार के खोजे जा चुके हैं। ये विभेदन लिंग कारक ( sex factor) F के साथ आन्तर क्रिया पर आधारित है। प्रथम Fit जननक्षमता निरोधी (fertility inhibitory ) कहलाती है यह एक निरोधी तत्व एवं F द्वारा तथा RTF के साथ पिलि के विकास में विरोध करता है। द्वितीय Fi-प्रकार कहलाता है यह स्वयं के पिलि के विकास का तो विरोध करता है किन्तु F के पिलि पर कोई प्रभाव नहीं रखता। अतः यदि रोगी की देह में जीवाणुओं में औषधि प्रतिरोधन उत्पन्न हो जाता है तो संवेदी जीवाणु भी इनके सम्पर्क में प्रतिरोध न क्षमता प्राप्त कर लेते हैं ऐसी स्थिति में औषधियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथा चिकित्सक को अन्य औषधि पर निर्भर होना आवश्यक हो जाता है।

  • स्तनियों में व्याधि उत्पन्न करने वाले प्लैज्मिड (Plasmids conferring pathogenecity to mammais) : ई. कोलाई, शिगैला, सालमोनेला और विब्रियों कॉलेरा ( coli, Shigella, Salmonella and Vbrio cholera) आन्त्रिक रोग पेचिश उत्पन्न करते हैं जो मनुष्य, सुअर तथा मवेशियों में तीन प्रकार के प्लैज्मिड पाये जाते हैं-

(अ) आन्त्रिक प्लैज्मिड (Enteric plasmids) : ताप स्थिर आविष (heat stable toxins ST) या ताप स्थिर तथा ताप अस्थिर (heat labile-LT) आविष (toxins) उत्पन्न करने वाले प्लैज्मिड पाये जाते हैं।

(ब) लयनकारी प्लैज्मिड (HLY-plasmids) : जो लाल रक्त कणिकाओं के लयन हेतु लयनकारी पदार्थ (haemolytic compounds) उत्पन्न करते हैं। जैसे- हीमोलाइसिन ।

(स) K-प्लैज्मिड (K-plasmids) : ये प्लैज्मिड जाति विशिष्ट प्रतिजन (antigens) कोशिका की सतह पर उत्पन्न करते हैं, जैसे मवेशियों में K-99 तथा सुअर में K – 88 एन्टीजन । एन्टीजन लम्बे तन्तुरूपी प्रोटीन होते हैं जो जीवाणुओं के सूक्ष्म पिलि को आवरित कर देते हैं।

(iv) Col प्लैज्मिड (Col plasmids) : ये प्रोटीन प्रतिजनी पदार्थ उत्पन्न करने वाले प्लैज्मिड है जो अन्य जीवाणुओं के लिए घातक ( lethal) होते हैं। ई. कोलाई ( E. coli) के कुछ प्रभेद (strain) जीवाणुनाशक (bacteriocins) संश्लेषण करने में सक्षम होते हैं। ये जीवाणुनाशक कॉलिसिन (colicins) भी कहलाते हैं।

(v) निम्नीकारी प्लैज्मिड (Degradative plasmids) : कुछ जीवाणुओं में मृत कार्बनिक पदार्थों को निम्नीकारी अवयवों में परिवर्तन करने की क्षमता पाई जाती है। मृत कार्बनिक पदार्थों का उपयोग ऊर्जा तथा जैविक संश्लेषणी क्रियाओं में उपयोग कर लिया जाता है। यह क्रिया किणवकीय होती है, जिसके संश्लेषण की सूचना प्लैज्मिड पर स्थित जीन पर रहती है। सूडोमोनैस (Pseudomonas ) के प्लैज्मिड पर लगभग 100 प्रकार के विभिन्न कार्बनिक पदार्थों के निम्नीकरण के जीन पाये जाते हैं।

(vi) पारद – प्रतिरोधी प्लैज्मिड (Mercury resistance plasmids) : आन्त्रिक जीवाणुओं जैसे स्यूडीमोनैस (Pseudomonas) तथा स्टेफाइलोकॉकस ऑरियस (Staphrylococcus aureus) के प्रभेदों के प्लैज्मिड अपने पोषक को भारी धातु के आयनों (heavy metal ions) द्वारा उत्पन्न आविष को सहन करन की क्षमता प्रदान करते हैं। ई. कोलाई (E. coli) तथा सालमोनेला (Salmonella) के प्लैज्मिड निकल, कोबाल्ट, पारा, आसीनेंट के प्रति पोषक को प्रतिरोधकता प्रदान करते हैं।

(vii) अर्बुद – प्रेरितकारी प्लैज्मिड (Tumour inducing plasmid) : एग्रोबेक्टीरियम ट्यूमीफेसीएन्स (Agrobacterium tumifaciens) मे एक वृहत प्लैज्मिड पाया जाता है जो द्विबीजपत्री पौधों में अर्बुद (tumour) उत्पन्न करता है ।

(viii) गुप्त प्लैज्मिड (Cryptic plasmids) : कम अणुभार युक्त वृत्ताकार DNA कुछ जीवाणुओं में किसी जैविक क्रिया के लिये उत्तरदायी नहीं पाये गये हैं, इन्हें गोपक या गुप्त प्लैज्मिड (cryptic plasmid) कहते हैं।

(ix) स्टेफाइलोकोकाई प्लैज्मिड (Staphylococcal plasmids) : स्टेफाइलोकोकाई ऑरियस (Staphylocous aureus) के प्लैज्मिड में भारी धातुओं के आयनों के प्रति प्रतिजैविक प्रतिरोधक, क्षमता उत्पन्न करने के गुण पाये जाते हैं। ये आन्त्रविष (enterotoxin) तथा लयनकारी पदार्थों संश्लेषण भी करते हैं। ये असंयुग्मी प्रकार के प्लैज्मिड्स हैं जो केवल स्टेफिलोकोकस विशिष्ट होते हैं।