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गांधार शैली एवं मथुरा शैली कला की विशेषताएं बताइए , gandhara art and mathura styles in hindi

gandhara art and mathura styles in hindi गांधार शैली एवं मथुरा शैली कला की विशेषताएं बताइए ? गान्धार कला पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें। मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।

कुषाण काल
साम्राज्यवाद का कुषाण युग, इतिहास का एक महानतम आंदोलन रहा, यह उत्तर पूर्वी भारत तथा उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान, (वर्तमान अफगानिस्तान) तक फेला था। ईसवीं की पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी के बीच कुषाण एक राजनीतिक सत्ता के रूप में विकसित हुए और उन्होंने इस दौरान अपने राज्य में कला का बहुमुखी विकास किया। भारतीय कला जगत का परिपक्व युग यहीं से प्रारंभ होता है।
कनिष्क-प्रथम, जो कुषाण राज परिवार का तीसरा सदस्य था, ने अपने शासन काल में पूर्ण रूप से आधिपत्य स्थापित किया और उसके शासनकाल में बौद्ध धर्म और बौद्ध कला, सांस्कृति गतिविधियों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार और विकास हुआ। कुषाण शासनकाल में कुषाण कला के दो मुख्य क्षेत्र थे। कलात्मक गतिविधियों का केंद्र उत्तर-पश्चिम की काबुल घाटी के क्षेत्र का गांधार अंचल और पेशावर के आसपास का ऊपरी सिंधु क्षेत्र मथुरा में जहां हेलनी और ईरानी कला का विकास हुआ और उत्तर भारत में कुषाणों की शीतकालीन राजधानी भी भारतीय शैली की कला का प्रचलन रहा।
कुषाण कला की जो सबसे प्रमुख बात रही, वह यह थी कि उसने सम्राट को एक दैवीय शक्ति के रूप में ही प्रतिपादित किया। कई संदर्भों से इस बात को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनमें एक उदाहरण तो कुषाण शासन काल के सिक्के हैं। इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण आश्रम हैं, जिनसे पता चलता है कि सम्राट को किस तरह दैवीय शक्ति के रूप में प्रचारित किया जाता था। पहले बौद्ध कलाकार अपनी कलाकृतियों में बुद्ध के अस्तित्व और उनकी उपस्थिति का ही मुख्यरूप से रेखांकन करते थे, वहीं कुषाण शासनकाल में बुद्ध को एक मानवीय रूप में प्रस्तुत किया गया। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि बुद्ध की पहली मूर्ति कहां बनी। अधिकांश भारतीय शिक्षाशास्त्रियों की राय है कि बुद्ध की पहली मूर्ति मूल रूप से मथुरा में ही बनायी गयी न कि गांधार में जैसा कहा जाता है।
गांधार शैलीः गाध्ंाार मूर्ति कला की सबसे उत्कृष्ट मूर्ति वह है जिसमंे बुद्ध को एक योगी के रूप में बैठे हुए दिखाया गया था। एक सन्यासी के वस्त्र पहने, उनका मस्तक इस तरह से दिखायी दे रहा है जैसे उसमें आध्यात्मिक शक्ति बिखर रही हो, बड़ी-बड़ी आंखें, ललाट पर तीसरा नेत्र और सिर पर उभार। ये तीनों संकेत यह दिखाते हैं कि वह सब सुन रहे हैं, सब देख रहे हैं और सबकुछ समझ रहे हैं। यद्यपि बुद्ध के ये तीनों रूप विदेशी कला द्वारा भी प्रभावित हैं। बहरहाल शुद्धरूप से भारतीय प्रतीत होती यह मूर्ति यह दर्शाती है कि कला घरेलू और विदेशी तत्वों का मिलाजुला रूप है। गांधार क्षेत्र की कला में कला के जो महत्वपूर्ण तत्व हैं और उनकी जो शक्ति है वह उत्तर पश्चिमी भारत की बौद्ध कला में देखी जा सकती है और यह प्राचीन देवताओं का प्रतिनिधित्व एवं उनके रूप दिखाती हैं। इसी तरह का प्रभाव खुदाई से निकले पत्थरों में भी देखा जा सकता है, यह पत्थर चाहे अपनी कलात्मक शैली या अपने दैवीय रूप को दिखाते हों लेकिन, उनका रोमन वास्तुकला से साम्राज्यवादी समय से ही गहरा संबंध रहा है, मूर्ति की स्थिति,शरीर का आकार और उसका वास्तु ढांचा स्पष्टतः रोमन माॅडल पर ही आधारित है।
गांधार स्थापत्य कला की अनेक कला कृतियां बुद्ध के जीवन काल से जुड़ी हुई हैं अथवा बुद्ध की अन्य भावभंगिमाओं को लेकर बनायी गयी हैं। बुद्ध की मूर्तियों में अधिकांशतः उन्हें हमेशा सन्यासी वस्त्रों में ही दिखाया गया है, जिनके बाल छोटे थे। बोधिसत्व अथवा बौद्ध सन्यासियों को शरीर के ऊपरी भाग में निःवस्त्र दिखाया जाता रहा जो लुंगी, गमछा और आभूषण पहने रहते थे, उनके बाल लंबे दिखाये गये हैं। एशिया की सभी बौद्ध कलाओं में, (बुद्ध, जिन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया, अथवा बोधिसत्व, जो इस लक्ष्य की प्राप्ति के पथ पर थे) उक्त चीजें परिलक्षित हैं। भारतीय संदर्भ में गांधार की शैली एक अलग रंग लिये हुए है। गुप्त काल की बुद्ध मूर्तियों में आध्यात्मिक छवि का अभाव है तथापि यह कहना न्यायोचित होगा कि वे मूर्तियां, सुंदर, सुसज्जित एवं सजीवता लिये हुए हैं।
गांधार शैली के विकास के दो चरण हैं पहला पत्थर निर्मित मूर्ति कला का चरण तथा दूसरा महीन प्लास्टर निर्मित मूर्ति कला का चरण, जोकि चैथी शताब्दी में भी अनवरत रहा।
गानधार स्थापत्य के प्राचीनतम स्मारक तक्षशिला तथा उसके समीपस्थ क्षेत्रों में प्राप्त हुए हैं। स्थापत्य की दृष्टि से तक्षशिला में सबसे महत्वपूर्ण स्तूप ‘धर्मराजिका’ था जिसे अब चीर स्तूप कहते हैं। यह गोलाकार स्तूप एक ऊंची मेधि पर निर्मित था जिसके चारों दिशाओं में चार सोपान बने हैं। इस स्तूप के निर्माण में प्रस्तर का प्रयोग किया गया है।
पश्चिमोत्तर भारत के गानधार प्रदेश में जिस समय ‘गांधार वास्तु शैली’ का उद्भव हुआ, उस कालखण्ड के समकालीन शताब्दियों में मध्य दक्षिण भारत में ईंटों द्वारा निर्मित स्तूप, काष्ठ निर्मित चैत्यशाला तथा शैलकत्र्त विहारों का निर्माण बौद्ध-धर्म के हीनयान सम्प्रदाय की प्रचलित परम्पराओं के अनुरूप हो रहा था। परंतु इस क्षेत्र में एक भिन्न प्रकार का ‘कला आंदोलन’ प्रारम्भ हुआ। वास्तव में जो कला शैली आज गानधार वास्तु के नाम से प्रसिद्ध है वह यवन, पार्थियन, सीथियन, तथा भारतीय संस्कृतियों का मिश्रित स्वरूप है। अतः भारत की तत्कालीन बौद्ध कला भी इससे प्रभावित हुई क्योंकि उस समय तक वह जिस ‘मानवकृति विहीन’ केवल प्रतीकवादी शैली का अनुसरण कर रही थी उसे यथार्थ रूप में एक तर्कसंगत एवं वास्तविकतावादी शैली का नवीन आधार प्राप्त हो गया। परिणामस्वरूप ‘बौद्ध वास्तु एवं मूर्तिकला’ अपने नवीन कलेवर में विकसित हुई और बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठापित करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इस क्षेत्र के बहुसंख्यक ध्वंसावशेषों से यह परिलक्षित होता है कि यहां कभी बौद्ध धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर रहा होगा।
कुषाणकालीन गानधार शैली का प्रमुख विषय था बुद्ध एवं बोधिसत्व की मूर्तियों का निर्माण। उल्लेखनीय है कि कई पाश्चात्य विद्वान बुद्ध-मूर्ति के प्रथम निर्माण का श्रेय गानधार कला को ही देते हैं। उनका अभिमत है कि यूनानी प्रभाव के कारण गानधार शिल्पियों ने सर्वप्रथम ‘बुद्ध प्रतिमा’ का आविष्कार किया तदन्तर समकालीन मथुरा कला में उसका अनुसरण किया गया, परंतु इस तथ्य की प्रामाणिकता पुष्ट साक्ष्यों के अभाव में संदिग्ध है। गानधार कला की विषय-वस्तु में बुद्ध एवं बोधिसत्व की मूर्तियों के अतिरिक्त प्रस्तर फलकों पर बुद्ध के जीवन तथा उनके धर्म संबंधी प्रमुख घटनाओं से मुक्त दृश्यों को रूपायित किया गया है। जैसे मायादेवी की लुम्बिनी यात्रा, बुद्ध जन्म, महाभिनिष्क्रमण, सम्बोधि, धर्म चक्र प्रवर्तन, महापरिनिर्वाण, बौद्ध देवी.देवता, माया, गौतमी, प्रजापति, ब्रह्मा,शक्र, मार, कुबेर आदि। यथार्थ रूप में गानधार कला में बौद्ध कला का क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यापक है।
गानधार शैली गानधार क्षेत्र में पल्लवित एवं विकसित होने के कारण इस कला को ‘गानधार कला’ कहा जाता है। इसके मुख्य केन्द्र नगरहार (आधुनिक जलालाबाद), हड्डा, बामियान, ओहिन्द, उद्भाण्ड (अफगानिस्तान) तथा पेशावर जिले के शाहजी.की-ढेरी, तख्ते-ए-बाही, पुरुषपुर, पुष्कलावती-चारसद्दा, सहरी-बहलोल, जमालगढ़ी, माणिक्याला (रावलपिण्डी जनपद) एवं तक्षशिला आदि थे।
गानधार कला की विशेषताएंः

⚫ इस शैली का मुख्य विषय बुद्ध तथा बौद्ध धर्म संबंधी वृत्तातों का दृश्यांकन तथा ब्राह्मण एवं जैन धर्म संबंधी मूर्तियों का अभाव।
⚫ यह यूनानी प्रभाव से उत्पन्न होने पर भी आंतरिक एवं बाह्य रूप से भारतीय है।
⚫ इस शैली की मूर्त रचना में ‘भूरे तथा स्लेटी’ रंग के पत्थरों का प्रयोग किया गया है, यद्यपि चूने तथा बालू के मिश्रण से तैयार प्लास्टर से भी बुद्ध मूर्तियों की रचना की गई।
⚫ गांधार शैली में ऊंचे घुटने तक के जूते, चुन्नटदार अधो वस्त्र, महीन सलवटों दार वस्त्र, विशेष महत्वपूर्ण हैं। इन यूनानी वस्त्रों को गौतमबद्ध, बोधिसत्व अथवा माया देवी की मूर्तियों पर देखा जा सकता है।
⚫बुद्ध को मूंछ युक्त प्रदर्शित करना गानधार कला की विशिष्टता है, क्योंकि मथुरा अथवा किसी अन्य भारतीय शैली में बुद्ध की मूंछे नहीं बनाई गई हैं।
⚫विशिष्ट केश-विन्यास तथा बुद्ध के शीश पर घुंघराले बालों का चलन भी गानधार कला में प्रारम्भ हुआ।
⚫गानधार शैली के उदय के पूर्व ‘भारतीय मूर्ति विधान’ में प्रभा मण्डल का अभाव था, इसका स्पष्ट प्रयोग गानधार शैली में ही प्रारम्भ हुआ।
⚫‘हेलेनिस्टिक कला’ के प्रभाव के कारण बुद्ध प्रतिमा के शरीर सौष्ठव पर विशेष ध्यान के परिणामस्वरूप इन मूर्तियों की ‘मुख-मुद्रा प्रायः भाव शून्य प्रतीत होती है।
⚫गानधार कला की मूर्तियों की शैली भारतीय है परंतु इनके कलाकार यूनानी थे। इसलिए यह कला दो संस्कृतियों का मिश्रण है।
गानधार शैली, कलात्मकता,शैली सामाग्री तथा अभिव्यक्ति के रूप में उत्कृष्ट एवं मौलिक है। बुद्ध की मूर्तियों में गानधार शैली के सम्यक दर्शन होते हैं। बुद्ध की प्रतिमा में लक्षणों तथा भावों में अंतर मिलता है। चारसदा के समीप स्वार ढेरी से प्राप्त बुद्ध मूर्ति में प्रभामण्डल नहीं है। संभवतः बुद्ध की प्रतिमा में ‘प्रभामण्डल’ का निर्माण एवं संघाटी में सिलवटों का निरूपण हेलेनिस्टिक काल की यूनानी कला एवं रोमन कला के अनुकरण से आरंभ हुआ। उल्लेखनीय है कि गानधार शैली के पूर्व भारतीय मूर्ति विधान में ‘प्रभामण्डल’ का प्रयोग उपलब्ध नहीं था।
कश्मीर स्थापत्य के प्राचीनतम खण्डहर हरवान तथा उष्कुर से प्राप्त हुए हैं। ये सम्भवतः गानधार वास्तुशैली के अंतग्रत तख्त-ए-बाही में प्राप्त विहारों के समान है। त्रिभुजाकार छज्जे तथा उनके नीचे बने त्रिदलीय मिहिराभ मंदिरों की पिरामिडीय आकार वाली छतें तथा खड़ी धारियों वाले स्तम्भ जो यूनानी शास्त्रीय कालीन या डोरिक व आयनिक स्तंभों की याद दिलाते हैं, जो इस शैली की विशेषताएं हैं।
पगजीर नदी के तट पर बसे कपिशा कुषाणों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी और पुरातात्विक दृष्टि से यह अफगानिस्तान का सर्वाधिक प्राचीन एवं महत्वपूर्ण नगर है। यहां बहुत से दंत फलक प्राप्त हुए हैं। उत्खनन में हाथी दांत की कला-कृतियों के अतिरिक्त कनिष्क के प्रासाद क्षेत्र से कुछ शीशे एवं कांसे की कृतियां मिली हैं जिन पर यूनानी प्रभाव है।
तक्षशिला से प्राप्त अन्य वास्तु स्मारकों में ‘जाण्डियाल का मंदिर’ भी अपना प्रमुख स्थान रखता है। यह मंदिर दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना गया है तथा इसकी स्थापत्य रचना यूनानी वास्तु से प्रभावित है। इस मंदिर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके बरामदे के स्तम्भों के शीर्ष ‘कोरिन्थियन शैली’ के होकर ‘आयोनिक’ शैली के अनुरूप निर्मित हैं। इनकी स्तम्भ-नालें एक ही पत्थर में न बनाकर यूनानी ढंग से छोटे-छोटे बेलनाकार खण्डों को डमरुओं द्वारा जोड़कर निर्मित किए गए हैं।
मथुरा शैलीः ईसा काल की प्रथम तीन शताब्दियां मथुरा शैली मूर्तिकला का स्वर्णिम काल हैं। महायान बौद्ध धर्म के नये आदर्शों ने तत्कालीन मूर्ति शिल्पकारों को प्रेरित किया था। भारतीय पुरातत्वशास्त्रियों के अनुसार, बुद्ध मूर्तियों का निर्माण इस शैली के कलाकारों का महान योगदान है। इन मूर्तियों में प्रयुक्त पत्थर सफेद-लाल था, जो शताब्दियों तक अपनी उत्कृष्ट कलात्मक गुणवत्ता के रूप में विद्यमान रहा। यह शैली जैनों, ग्रीकों एवं रोमनों की शैलियों से भी प्रभावित थी। जैन शैली द्वारा प्रभावित एक स्तूप की रेलिंग में चित्रित एक आकर्षक महिला, की आकृति जो अत्यधिक आभूषणों से युक्त है, प्राचीन भारतीय कला की यादगार और उल्लेखनीय कलाकृति। सन्यास और धर्मपरायणता के संदर्भ में मठ की इन मूर्तियों में कहीं भी अश्लीलता और कामोत्तेजना की भावभंÛिमा नहीं दिखाई देती है।
भारतीय कला के इतिहास, मथुरा की कुषाण कला में इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसने प्रतीकवाद और मूर्ति शिल्पवाद को अपनाया और बाद में उसे स्वीकार कर लिया। उदाहरण के लिए, पहली बार मथुरा में देवी.देवताओं की मूर्तियों की रचना की गयी। बुद्ध मूर्तियों का प्रभाव चारों ओर फैला और चीन के कला केंद्रों तक पहुंचा। इस शैली की कुछ उल्लेखनीय कलाकृतियों में वेमा कदफीज और कनिष्क की मूर्तियां, महिलाओं के चित्र सहित अनेक रेलिंग स्तंभ, बैठे हुए कुबेर एवं ध्यानरत बौद्ध प्रतिमाएं, प्रमुख हैं।
आधुनिक काल के मथुरा जनपद का भौगोलिक क्षेत्र प्राचीन शूरसेन राज्य के नाम से प्रख्यात था। जिस प्रकार गानधार क्षेत्र में विकसित कला को ‘गानधार कला’ से सम्बोधित किया गया, उसी प्रकार मथुरा क्षेत्र में पल्लवित एवं विकसित कला को मथुरा कला कहते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि कुषाणकालीन शिल्पी ‘तक्षण कला’ में अनुपम कौशल प्राप्त कर चुके थे, परिणामस्वरूप उन्होंने बुद्ध एवं बोधिसत्वों का ही मूर्तन नहीं किया अपितु समसामयिक वैष्णव, शैव-देवताओं, जैन-तीर्थंकरों तथा कुषाण वंशीय शासकों की मूर्तियों का भी निर्माण करके अपनी कला की सार्थकता सिद्ध करने में सफल रहे। मथुरा कला की मूर्तियों में सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत को देखा जा सकता है। यथार्थ रूप में ‘सहिष्णुता’ इस कला की आत्मा कही जा सकती है। सम्भवतः यही मुख्य कारण है कि बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण धर्म की मूर्तियों को समान स्थान दिया गया है। यहां की मूर्तियां विशेषतया मथुरा, सारनाथ तथा कोलकाता के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। मथुरा कुषाणकाल में ‘बुद्ध एवं बोधिसत्व’ की मूर्तियों के निर्माण के एक प्रधान केंद्र के रूप में लोकप्रिय हो गया था। संभवतः इसलिए यहां से निर्मित मूर्तियों की उत्तर, मध्य तथा पूर्वी भारत में मांग थी। पेशावर, कौशाम्बी, श्रावस्ती, सारनाथ, पटना, राजग्रह, सांची, लुम्बिनी तथा बंगाल प्रान्त के बेरचम्पा आदि स्थलों से प्राप्त मूर्तियां इसकी लोकप्रियता की परिचायक हैं। मथुरा तथा गानधार शैलियों में बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण सर्वप्रथम कहां हुआ? दोनों शैलियों से उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मत प्रतिपादित किया जा सकता है कि बुद्ध तथा बोधिसत्व की प्रतिमाओं का निर्माण कार्य संभवतः दोनों कलाओं में साथ-साथ प्रारंभ हुआ।
मथुरा कला अपनी मौलिकता, सुंदरता तथा रचनात्मक विविधता एवं बहुसंख्यक सृजन के कारण भारतीय कला में विशिष्ट स्थान रखती है। मथुरा कला में बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के साथ-साथ वैष्णव एवं शैव देवताओं तथा जैन-तीर्थंकरों एवं कुषाण वंशीय शासकों की मूर्ति निर्माण को भी इसमें समावेशित किया गया। ज्ञातव्य है कि इन सभी धर्मों से संबंधित ‘‘विषय-वस्तुओं का चयन’’ केवल धार्मिक आधार पर ही नहीं अपितु समसामयिक सामाजिक जीवन को भी शिल्पकारों ने अपने विषयों के अंतग्रत समुचित स्थान प्रदान किया है। इसके अतिरिक्त मथुरा कला में यक्ष-यक्षी नाग-नागी,एवं मही माता (मातृदेवी) जैसे श्रीलक्ष्मी, गजलक्ष्मी वसुधारा, अम्बिका, महिषासुरमर्दिनी एवं हारीति आदि सप्तमातृकाओं को भी समायोजित किया गया है।
मथुरा शैली की विशेषताएंः

⚫ सफेद चित्तिदार लाल पत्थर से निर्मित मूर्तियों का निर्माण हुआ, जो प्रस्तर भरतपुर एवं सीकरी में बहुतायत से मिलते हैं।
⚫गानधार शैली में बैठी हुई बुद्ध-मूर्तियां पद्मासन अथवा कमलासन पर हैं जबकि मथुरा शैली में बुद्ध सिंहासनासीन हैं तथा पैरों के समीप सिंह की आकृति है।
⚫मथुरा शैली की मूर्तियों के ‘मुख पर आभा’ एवं प्रभामण्डल है तथा दिव्यता एवं आध्यात्मिकता की अभिव्यंजना विशेष उल्लेखनीय है।
⚫इस शैली में शरीर का धड़ भाग नग्न, वस्त्रहीन है। दाहिना हाथ ‘अभय मुद्रा’ में और वस्त्र सलवटों युक्त है।
⚫मथुरा शैली की एक विशिष्टता है कि इसकी मूर्तियां ‘आदर्श प्रतीक’ भाव युक्त हैं।
⚫इस शैली की मूर्तियां विशालता के लिए विख्यात हैं।
⚫मथुरा शैली की मूर्तियां पृष्ठालंबन रहित, बनावट गोल तथा ‘मस्तक मण्डित हैं मस्तक ऊर्जा से अलंकृत एवं श्मश्रु रहित है।
⚫मथुरा कला में भाव की कल्पना एवं अलंकरण की नीति सर्वथा भारतीय है।
⚫जैन तीर्थंकर, बुद्ध, बोधिसत्व एवं कुछ ब्राह्मण धर्म के देवी.देवताओं का प्रथम बार अंकन हुआ है।
ऐसा प्रतीत होता है कि कुषाण काल में ‘सप्तमातृका पूजा’ के रूप में देवी के विविध अवतारों को भी मान्यता प्राप्त थी। तद्नुसार धार्मिक आचार्यों ने उसकी नवीन व्याख्या प्रस्तुत की और मथुरा शिल्पियों ने ‘सप्त-मातृका’ की कल्पना को मूर्तिरूप प्रदान किया। इनमें ब्रह्मा की वाराही, नृसिंह की नरसिंही तथा यम की चामु.डा विशेष उल्लेखनीय है। प्रारम्भिक काल में ये बिल्कुल सादी दिखलाई गई परंतु कालान्तर में इन्हें ‘मातृका-पट्टों’ में आयुध एवं वाहन के साथ अंकित किया जागे लगा। इस प्रकार मथुरा कला में कुषाण-युगी शिल्पियों ने लक्ष्मी, गजलक्ष्मी, महिषमर्दिनी दुग्र, हारीति एवं सप्त-मातृकाओं की बहुसंख्यक मूर्तियों का अंकन किया।
जैसाकि इससे पूर्व यह उल्लेख किया गया है कि मथुरा कुषाणकाल में धार्मिक सहिष्णुता का एक अद्वितीय केंद्र था। यहां के प्रतिमा फलकों में उत्कीर्ण अर्द्धनारीश्वर, चतुर्भुजी विष्णु, गजलक्ष्मी एवं कार्तिकेय की प्रतिमाएं इसकी परिचायक हैं। मथुरा कला के अध्ययन से यह भी प्रमाणित होता है कि कुषाण काल में जैन, बौद्ध एवं ब्राह्मण धर्मों के मतावलम्बियों में कितना पारस्परिक सौहार्द था। अतएव यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि मथुरा की मूर्तिकला अपनी मौलिक उद्भावनाओं, सामंजस्य, प्रवणता तथा चारुत्व की विविधता के कारण भारतीय कला में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ‘परिचायिका’ के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

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