हिंदी माध्यम नोट्स
अद्वैत दर्शन के संस्थापक कौन है | अद्वैत सिद्धांत के संस्थापक का नाम क्या है founder of Advaita Philosophy in hindi
founder of Advaita Philosophy in hindi अद्वैत दर्शन के संस्थापक कौन है | अद्वैत सिद्धांत के संस्थापक का नाम क्या है ?
बोध प्रश्न 2
I) बताइए संघ किस प्रकार से धर्म संस्था (चर्च) से भिन्न है ? अपना उत्तर लगभग सात पंक्तियों में दीजिए।
II) अद्वैत सिद्धांत/दर्शन (Advaita Philosophy) के संस्थापक कौन थे?
III) आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों के नाम बताइए।
IV) एक धार्मिक संगठन के रूप में पंथ पर पाँच पंक्तियां लिखिए। यह मत से किस प्रकार मिलता-जुलता है ?
बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 2
I) संघ की स्थापना बुद्ध द्वारा की गई थी जिसका अर्थ होता है संगठन व समिति-कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए लोगो का एक स्थान पर एकत्र होना। संघ धर्म संस्था से इस प्रकार भिन्न है कि यह धर्मनिरपेक्ष प्रयोग सिद्ध तथा तर्कसंगत जीवन कुत्यों को निर्धारित करते नियमों का समूह है जो व्यक्ति को उसके जीवन में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। धम्म ईश्वर संबंधी रहस्य का उद्घाटन नहीं है अतः दोषमुक्त नहीं है।
II) आदि शंकराचार्य अथवा शंकर (जिस नाम से वे लोकप्रिय हैं) अद्वैत-दर्शन के संस्थापक हैं।
III) आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ निम्नलिखित स्थानों पर हैं-बद्रीनाथ, पुरी, द्वारका तथा श्रींगेरी।
IV) पंथ का विकास भक्ति आंदोलन की देन है। यह मुख्यतरू विरोध तथा सामाजिक सुधार का आंदोलन है।
पंथ जन्य आधारित वर्ग भेद, रूढ़िवादियों, औपचारिकताओं तथा हिन्दू धर्म व इस्लाम के कट्टरपन का विरोध करता है। अनुयायियों द्वारा अपने रीति रिवाजों का पालन, निशानकरण तथा अलग पहचान बनाई जाती है जो इस पर विशिष्टता की छाप लगाते हैं। अनुयायियों द्वारा एक साधारण व मितव्ययी तथा निर्गुण ईश्वर के प्रति समर्पित जीवन बिताने की अपेक्षा की जाती है।
पंथ व मत में समानता है क्योंकि मत की तरह ही पंथ की उत्पति प्रचलित धर्म की कुछ धारणाओं के विरोध से होती है। तथा मत की ही भांति पंथ भी व्यक्तिगत शुद्धिकरण तथा समर्पण पर बल देता है।
सार्वभौमिक विशेषताएं (Universal Features)
अपनी रीतियों के कारण विशिष्ट पहचान लिए धार्मिक समूह बंधुत्व व एकता की नयी भावना का प्रदर्शन करता है। फिर भी, यह स्थिति व कार्यप्रणाली पर आधारित भेदों से साम्य स्थापित करता है तथा वांछित अवस्थाओं की क्रिया पद्वति को सहन करता है।
क्रांतिकारी चरित्र लिए हुए धार्मिक समूह प्रतिष्ठित समाज को स्वीकार भी कर सकता है और यह इसका वैचारिक धरातल पर तिरस्कार भी कर सकता है ताकि समूह के अंदर समानता का रूख विकसित किया जा सके जैसा बौद्ध धर्म में हुआ। इसने रूढ़िवादी व परम्परागत समाज का विरोध किया तथा समानता को एक आदर्श रूप में अपनाया । धार्मिक समूह का आंतरिक ढ़ांचा एक सक्रिय प्रक्रिया है। यह दो स्तरों पर कार्य करता है। एक तरफ तो यह आंतरिक भिन्नताओं को समाप्त करता है तथा दूसरी तरफ अपने को संगठित व संस्थागत रूप प्रदान करता है।
धर्म संस्था(चर्च)-मत वर्गीकरण (The Church & Sect Typology)
जब कोई धार्मिक समूह अपने विश्वास व नीतियां निर्धारित करता है तथा संगठित रूप में इनको व्यवहार में लाता है तो वह निश्चित धार्मिक संगठन के रूप में सामने आता है। उसी समय धार्मिक समूह में आंतरिक मतभेदों के कारण, विभिन्न शाखाएं भी उभरती हैं। इस अनुभाग में हम धर्म संस्था, मत व पंथ की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करेंगे।
भारत में धार्मिक समूह (The Religious Groups in India)
हमने धार्मिक समूहीकरण की उत्पत्ति के बारे में अध्ययन किया तथा उन कारणों को भी जाना जो सामान्य रूप से धार्मिक समूहीकरण पर जोर देते हैं । इस अनुभाग में हम धार्मिक समूहीकरण को विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में समझने का प्रयास करेंगे।
हम निम्नलिखित का अध्ययन करेंगे:
ऽ मठ, मार्ग और संप्रदाय
ऽ संघ
ऽ मत
ऽ पंथ
मठ, मार्ग और संप्रदाय (Math, Marg and Sampradaya)
भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक धार्मिक समूह की उत्पत्ति प्रायः मठ में होती है। यहाँ प्रस्तुत संदर्भ में इसका अर्थ होगा- चामत्कारिक व्यक्ति तथा/अथवा समूह का ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारने/नकारने तथा मानव के सामाजिक अस्तित्व के अर्थ से जुड़ा विचार दृष्टिकोण। इस परिदृश्य के अनुसार ईश्वरीय अस्तित्व को नकारने वाला बौद्ध धर्म भी एक मठ है-बौद्ध मठ।
मार्ग (रास्ता) अनिवार्यतः मन से जुड़ी पूजा-उपासना की पद्वति द्वारा परिभाषित होता है। मार्ग प्रवर्तक तथा उसके उत्तराधिकारी तथा अनुयायियों का ईश्वर/धर्म तथा उनके स्वयं के संदर्भ में पारस्परिक संबंध को भी परिभाषित करता है। यह मठ की सामाजिक परिधि को भी परिभाषित करता है।
जब मठ-मार्ग का जटिल मिश्रण आस्था रखने वालों तथा प्रचारकों द्वारा समय व स्थान की सीमाएं पार करके अंध भक्ति रूप ज्ञान परंपरा के रूप में विकसित होता है तो यह संप्रदाय का रूप धारण कर लेता है। इस अंधविश्वास तथा इसकी व्याख्या के प्रति विरोध एक नए मठ का रास्ता तैयार करता है। हीनयान, महायान व वज्रयान संप्रदाय या बौद्ध मठ के रूप में जाने जाते हैं। एक परिकल्पना के अनुसार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धार्मिक समूह मठ, मार्ग और संप्रदाय की जटिल संक्रिया से उत्पन्न होते हैं। इस संक्रिया के फलस्वरूप सामाजिक इतिहास के विभिन्न कालों में धार्मिक समूहों की उत्पत्ति हुई है जिनमें से आदर्श रूप में हैं – संघ, मत, पंथ व समाज।
Recent Posts
Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic
Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…
Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)
Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…
Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise
Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…
Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th
Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…
विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features
continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…
भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC
भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…