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वन नीति क्या है | भारत की पहली वन नीति की घोषणा 1988 का मुख्य आधार क्या है forest policy 1988 in hindi
forest policy 1988 in hindi वन नीति क्या है | भारत की पहली वन नीति की घोषणा 1988 का मुख्य आधार क्या है ?
वन नीति, राजकीय नियंत्रण और वनों में प्रवेश पर रोक
सन् 1854 में अंग्रेजों द्वारा शासित भारत की पहली वन नीति की घोषणा के साथ वनों के सामुदायिक संसाधन के रूप में उपयोग के प्रति मान्यता में परिवर्तन आया। यह प्रवृत्ति स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी बनी रही और अब यह प्रवृत्ति इस हद तक प्रबल होती जा रही है जिन लोगों ने शताब्दियों तक वनों को सामुदायिक संसाधन के रूप में स्वीकार किया उन्हें अब वनों का शत्रु समझा जाने लगा है। ऐसा क्यों हुआ? इसी बात को हम इकाई के इस भाग में समझने का प्रयास करेंगे।
वन नीति और राजकीय स्वामित्व
ब्रिटिश वन नीति, 1854 और उसके बाद की 1988 तक की सभी वन नीतियों का पहला लक्षण है। वनों पर राज्य का स्वामित्व। ऐसी नीतियों के चलते वन संसाधन उन समुदायों के लिए पराए हो गए जिन्होंने इसे एक सामुदायिक संसाधन के रूप में परिरक्षित करके रखा था। आरंभ में, 1854 की ब्रिटिश वन नीति का उद्देश्य वनों से इमारती लकड़ी प्राप्त करना था जिसका उपयोग उन्होंने एक तो मुख्य रूप से राजस्व अर्जित करने के लिए किया। दूसरे, उन्हें देशों में औपनिवेशिक युद्धों के लिए जहाज बनाने के लिए लकड़ी की जरूरत थी। बाद में रेलवे स्लीपरों के लिए भी इनकी आवश्यकता हुई। वे ब्रिटेन तथा दक्षिण अफ्रीका के अपने अन्य उपनिवेशों के वनों को पहले ही समाप्त कर चुके थे और उन्हें अब भारत से और अधिक इमारती लकड़ी की जरूरत थी। इसके फलस्वरूप वन नीति के अंतर्गत वनों को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर दिया गया। अब वे वन जनजातीय लोगों और दूसरे वनवासियों के लिए जीवन के सहायक तंत्र नहीं रहे।
इस नीति के अंतर्गत तथाकथित “वनों की वैज्ञानिक प्रबंध व्यवस्था‘‘ को लागू करने का प्रयास किया गया। इसका सीधा मतलब वनों से अधिक से अधिक राजस्व अर्जित करना था। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर उन्होंने लोगों के जीवन संबल के लिए उपयोगी वृक्ष जातियों के बजाय ऐसी वृक्षों की जातियों को लगाया गया जिनसे ज्यादा राजस्व मिले । “वैज्ञानिक प्रबंध व्यवस्था‘‘ को सुनिश्चित करने के लिए डाइट्रिक थेंडिस नामक जर्मन को प्रथम महावननिरीक्षक नियुक्त किया गया। लोगों के उपभोग के लिए कुछ ग्राम वन क्षेत्र अलग छोड़ दिए गए बाकी वनों को आरक्षित वन घोषित कर दिया गया जिन पर सरकार का नियंत्रण था। इस विभाजन को लागू करने से पूर्व लोगों की आवश्यकताओं के बारे में कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया। अधिकांश मामलों में जितना वन क्षेत्र लोगों के लिए छोड़ा गया था वह उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसके अलावा, लोगों को जंगल से फूल, फल और व्यक्तिगत उपयोग के लिए जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने के कुछ अधिकार दिए गए (गाडगिल 1983 रू 166-69)।
राज्य और जनता के बीच संघर्ष
राजकीय स्वामित्व की इस प्रवृत्ति के साथ एक ओर तो राज्य और लोगों के बीच संघर्ष की शुरुआत हुई, दूसरी ओर लोगों की वनों से दूरी बढ़ गई। जैसे-जैसे पेड़ों की कटाई से वृक्षारोपण कम हुआ और ब्रिटिश शासकों की वनों से राजस्व की आवश्यकता में वृद्धि हुई, इस संघर्ष में भी तेजी आई। यह बात सन् 1897 की वन नीति से स्पष्ट हो गई। इस वन नीति के दस्तावेज में पहले जिसे लोगों का अधिकार कहा गया था जिन्हें बदलकर “अधिकार और विशेषाधिकार‘‘ कर दिया गया। धीरे-धीरे लोगों के अधिकारों को कम महत्त्व दिया जाने लगा और उनकी आवश्यकताओं को विशेषाधिकार के रूप में ग्रहण किया जाने लगा। उनके इस नजरिए को सन् 1927 के भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act, 1927) में कानूनी रूप प्रदान कर दिया गया। पिछले दस्तावेजों की अपेक्षा इस दस्तावेज में कहीं अधिक स्पष्ट रूप से वनवासियों को सरकारी सम्पत्ति में अनधिकृत रूप से प्रवेश करने वालों के रूप में वर्णित किया गया।
स्वाधीनता के बाद की राष्ट्रीय वन नीति
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद ऐसी आशा की जा सकती थी कि जब भारत की अपनी सरकार स्थापित हो गई है तो इस नीति में बदलाव आएगा। वास्तव में, आजादी के बाद इस प्रवृत्ति ने और अधिक जोर पकड़ा। स्वाधीनता के बाद पहली वन नीति में, जिसे राष्ट्रीय वन नीति, 1952, कहा गया, ‘‘अधिकार और विशेषाधिकार‘‘ को बदलकर ‘‘अधिकार और रियायतें‘‘ कर दिया गया। इसमें संदेह नहीं कि इस वन नीति में लोगों के हितों की सुरक्षा, पर्यावरण संबंधी आवश्यकताओं तथा औद्योगिक और राजस्व संबंधी आवश्यकताओं के बारे में उल्लेख किया गया। परंतु इसमें भी अधिकारों के बजाय “रियायतों‘‘ को महत्त्व दिया गया। इन अधिकारों की सूची मंडल वन अधिकारी (डी.एफ.ओ.) के पास रहती थी जिसके बारे में जनता को कभी-कभी ही बताया जाता था। वनवासियों की आवश्यकताओं को वन की मालिक, सरकार से मिली रियायतें माना गया। दूसरी ओर, राष्ट्रीय वन नीति उद्योगों के हितों के अनुकूल बनी रही और वनों का प्रबंध उद्योगों के हितों को ध्यान में रखकर किया जाता रहा (फर्नाडिस 1988 रू 88-91)। इसके परिणाम इस प्रकार रहे:
प) उद्योग और वन प्रबंध
वन नीति की यह प्रवृत्ति समझ में आने वाली बात है। राजस्व अर्जित करने के स्रोत के साथ-साथ, हमारे देश में राष्ट्रीय विकास में औद्योगीकरण का विशेष महत्त्व रहा है। इसमें वन और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों को कच्चे माल के रूप में लिया जाता है। इसलिए इनकी उत्पादकता को अधिक से अधिक बढ़ावा देना जरूरी समझा जाता है। औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए, वह भी विशेष रूप से, पिछड़े क्षेत्रों के (वन क्षेत्र पिछड़े क्षेत्र ही समझे जाते हैं)
औद्योगीकरण को महत्त्व देने के लिए औद्योगिक कच्चे माल पर बहुत अधिक आर्थिक रियायतें दी गई थीं। उदाहरण के तौर पर, 1970 के दशकमध्य में कर्नाटक में एक औद्योगिक उपयोग के लिए बाँस की कीमत कागज-मिलों के लिए 15ध्- रुपये प्रति कल्पित (notional) टन यानी बाँसों की 2400 मीटर तक की लंबाई) थी जबकि बाजार में उसकी कीमत 1200ध्- रुपये प्रति टन थी। 1981-82 में भी मध्य प्रदेश की कागज मिलों को चार मीटर बाँस 54 पैसे में मिलता था जबकि उसका बाजार भाव 2ध्- रुपये से भी अधिक था (फर्नाडिस, मेनन तथा वीगा 1988: 204-207)।
इसका परिणाम हय हुआ कि उद्योगपतियों को कच्चा माल इतना सस्ता मिला कि वनों की कटाई के बाद उनका फिर से वन लगाने में कोई स्वार्थ नहीं उपजा। इसके अलावा, उन्होंने पुराने अंकुरों से नए अंकुरों के निकलने (coppicing) की प्रौद्योगिकी को अधिकांशतः का उपयोग कम खर्च और अधिकाधिक लाभ पाने के लिए किया। इसलिए उन्होंने प्रायः वनों का पूर्ण रूप से सफाया करने की पद्धति का सहारा लिया। यानी उन्होंने पूरे भूभाग से सभी पेड़ों और बाँसों को काट डाला। इसके अतिरिक्त उद्योगपतियों ने इन पेड़ों को काटना शुरू किया जो गाँव के सबसे नजदीक थे क्योंकि बाँस उठाने के लिए वहाँ तक उद्योगपतियों के वाहन सरलता से जा सकते थे। किसी ने भी इस बात का ध्यान नहीं रखा कि इन पेड़ों से गाँव के लोग अपनी आवश्यकता की सामग्री प्राप्त कर लेते थे। जब गाँव के आसपास के पेड़ समाप्त हो जाने पर दूसरे क्षेत्र के पेड़ों और बाँसों को काटा गया। भारत की 175 कागज मिलों में 50 प्रतिशत वन संसाधनों का इस्तेमाल होता है। दूसरी ओर, स्थानीय लोग अपनी आवश्यकता के वन संसाधनों से वंचित रह जाते हैं। देश की 45 लाख हैक्टेयर वन भूमि का उपयोग बाँधों, खानों और उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक ढाँचे को विकसित करने में हुआ है।
पप) औद्योगिक निवृक्षीकरण और लोगों का दारिद्रीकरण
अपने गाँवों के पास के जंगलों के पेड़ों की पूर्ण रूप से कटाई से धीरे-धीरे गाँव के लोग अपने आहार और रोजमर्रा की आवश्यकताओं से वंचित हो चुके हैं। इसके कारण से गरीब होते चले गए हैं। इससे दुष्चक्र शुरू हुआ है जिससे वन और लोगों के बीच चले जा रहे सहजीवी संबंध टूट गए हैं। गरीबी के कारण वनवासी लोग साहूकारों के चंगुल में पड़ गए। यह लगभग तभी से हुआ जब से उद्योगपतियों ने वन संसाधन का उपयोग शुरू किया। जैसे-जैसे वन क्षेत्र जनजातीय लोगों की पहुँच से बाहर होते गए, वैसे-वैसे उनकी गरीबी और ऋणग्रस्तता बढ़ती गई। धीरे-धीरे उनकी जमीन पर साहूकारों का कब्जा हो गया। फलतः वे झूम खेती पर अधिकाधिक निर्भर हो गए तथा उन्होंने वन की जमीन का जरूरत से ज्यादा दोहन शुरू कर दिया। जनसंख्या में वृद्धि के कारण उनकी समस्या और भी निकट हो गई। उन बातों के सम्मिलित प्रभाव के कारण 30 वर्ष पूर्व झूम खेती का जो चक्र 18-20 वर्षों के बीच था, वह घटकर उड़ीसा में छह साल, उत्तर-पूर्व में 12 साल और पश्चिमी भारत के बहुत से हिस्सों में केवल 3 वर्ष रह गया है। अब जनजातियों के बहुत से लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए जलाऊ लकड़ी बेचने का धंधा करते हैं या लकड़ी के ठेकेदारों या तस्करों के पास दिहाड़ी पर मजदूरी करने लग गए हैं।
अब वह देखा जा सकता है कि वनवासी लोग, खासकर जनजातीय लोग, पहले अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वन संसाधन का उपयोग करते समय उसके परिरक्षण का पूरा ध्यान रखते थे। आज वे अपनी आजीविका के लिए उस संसाधन को नष्ट कर रहे हैं। पहले वे वनों पर सकारात्मक रूप से निर्भर थे। आज उद्योगपतियों द्वारा शुरू किए गए गरीबी और ऋणग्रस्तता के दुष्चक्र के कारण जनजातीय लोग वन उत्पादों से वंचित हो गए हैं। अब उन्हें लाचार होकर जीवन-निर्वाह के लिए वनों को नष्ट करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, हम कहें कि वे जीने के लिए वनों का अतिदोहन या विनाश करते हैं। उद्योग की ओर से वनों के इस प्रबंध और नियंत्रण के कारण लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करने से पहले आइए हम इसके पर्यावरण संबंधी परिणामों पर भी एक दृष्टि डालें।
बोध प्रश्न 2
1) भारत में वनों के संबंध में कौन से मुख्य ब्रिटिशकालीन कानून बने और उनका अधिनियमन क्यों किया गया?
2) राष्ट्रीय वन नीति के फलस्वरूप जनजातीय संस्कृति में परिवर्तन होने से कैसा दुष्चक्र बन गया? स्वाधीनताप्राप्ति के बाद के किन कारणों से यह दुष्चक्र शुरू हुआ?
बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) ब्रिटिश वन नीति का एक प्रमुख उपाय वनों के संबंध में सरकारी स्वामित्व को लागू करना था। दूसरा उपाय वन संसाधनों के “वैज्ञानिक प्रबंध‘‘ को लागू करना था। तीसरा उपाय वनों में लोगों के अधिकार की संकल्पना था। उन उपायों को लागू करने का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को राजस्व के स्रोत के रूप में दूसरे देशों में होने वाले औपनिवेशिक युद्धों में प्रयोग हेतु जहाज निर्माण के लिए और बाद में रेलवे की स्लीपर उपलब्ध कराने के लिए इमारती लकड़ी उपलब्ध कराना था।
2) भारत की स्वतंत्रता के बाद वन नीति ने औद्योगीकरण के लिए वनों के उपयोग को बढ़ावा देने की नीति को जारी रखा। साथ ही इसमें वन उत्पादों के जनसामान्य द्वारा प्रयोग को कम महत्त्व दिया गया। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि जो लोग पहले अपनी आवश्यकताओं के लिए वन-उत्पादों पर निर्भर थे, वे गरीब हो गए। इसके परिणामस्वरूप वे साहूकारों के चंगुल में फँसकर कभी न समाप्त होने वाले ऋणों के दुष्चक्र में पड़ गए।
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