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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश क्या है | FDI की परिभाषा किसे कहते है foreign direct investment in hindi

foreign direct investment in hindi प्रत्यक्ष विदेशी निवेश क्या है | FDI की परिभाषा किसे कहते है अर्थ के लाभ प्रकार , व्याख्या कीजिये |

बहुराष्ट्रीय संगठनों के स्वरूप
एक बहुराष्ट्रीय उपक्रम का स्वामित्व अथवा नियंत्रण और प्रबन्धन निजी अथवा सार्वजनिक (राज्य-स्वामित्व और राज्य प्रबन्धन) तौर पर हो सकता है। बहुराष्ट्रीय उपक्रमों की परिसम्पत्तियों का स्वामित्व तथा इनका प्रबन्धन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है।

(प) सिर्फ एक देश की सत्ता के स्वामित्व में हो और वह इनका प्रबन्धन करती हैं

(पप) राष्ट्रीय नियंत्रण में हो किंतु अन्तरराष्ट्रीय तौर पर स्वामित्व और प्रबन्धन में होती है और

(पपप) अन्तरराष्ट्रीय तौर पर इनका स्वामित्व और प्रबन्धन हो।

इनके संगठन के तरीके के आधार पर बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों का विभिन्न स्वरूप विश्व में देखने को मिलता है। सभी बहुराष्ट्रीय उपक्रमों की एक मुख्य विशेषता यह होती है कि उनके मूल्य संवर्द्धन कार्यकलाप राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार चलती हैं। बहुराष्ट्रीय कार्यकलाप का सबसे सरल स्वरूप अन्तरराष्ट्रीय बिक्री है जिसमें फर्म अपने देश में उत्पादन करता है और किसी अन्य देश में बेचता है। दूसरा, उनका विपणन कारोबार भी सीमाओं के आर-पार चलते है। इस प्रकार वे न सिर्फ उत्पादन में अपितु विपणन कारोबार में भी अन्तरराष्ट्रीय प्रचालन के अंग हैं। बाजार और उत्पादन के प्रति उनकी विश्व व्यापी अथवा भूमंडलीय दृष्टि होती है।

बहुराष्ट्रीय कार्यकलाप का सर्वाधिक प्रमुख स्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अथवा पूर्ण स्वामित्व वाली विदेशी अनुषंगी है। ओ ई सी डी परिभाषा को उद्धृत करते हुए विश्व निवेश रिपोर्ट के अनुसार ‘‘प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की परिभाषा एक अर्थव्यवस्था में निवासी सत्ता (प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक अथवा मूल कंपनी) प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक के अलावा अर्थव्यवस्था में निवासी उपक्रम (एफ डी आई उपक्रम अथवा सम्बद्ध उपक्रम अथवा विदेशी सम्बद्धता) के निवेश जिसमें दीर्घकालीन संबंध निहित होता है तथा स्थायी हित और नियंत्रण को परिलक्षित करता है।‘‘ दूसरे शब्दों में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उस समय होता है जब एक देश की कोई कंपनी किसी दूसरे देश में अवस्थित एक संगठनात्मक सत्ता की स्वामित्व हासिल करने के लिए निवेश करता है। अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई एम एफ) ने अपने सांख्यिकीय प्रयोजनों के लिए विदेशी निवेश की परिभाषा प्रत्यक्ष रूप में की है यदि निवेशक की किसी उपक्रम में कम से कम 10 प्रतिशत शेयर हिस्सेदारी है। वस्तुतः किसी भी सत्ता के लिए प्रबन्धन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए 10 प्रतिशत शेयर हिस्सेदारी पर्याप्त है। तथापि, कभी-कभी कम शेयर रखने वाली सत्ता भी प्रबन्धन में काफी सक्रिय भूमिका निभाती है जबकि अधिक शेयर रखने वाली सत्ता भी प्रबन्धन में निष्क्रिय भूमिका निभाना पसन्द करती है। ‘‘पूर्ण स्वामित्व वाली विदेशी अनुषंगी कंपनियों‘‘ के मामले में, जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है किसी विशेष देश की फर्म किसी दूसरे देश में अनुषंगी के रूप में निवेश करती हैं जिसमें इसका अनुषंगी कंपनी पर पूरा-पूरा नियंत्रण होता है। इस मामले में, इसके स्वामित्व में कोई परिवर्तन निहित नहीं होता है; इस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान में हस्तांतरित संसाधनों पर मूल फर्म का पूरा-पूरा नियंत्रण बना रहता है। इस तरह का इक्विटी प्रबन्धन होता है जिसमें मूल फर्म (मूल देश का फर्म) के पास अपने नियंत्रणाधीन संसाधनों को हस्तांतरित करने का अधिकार होता है। भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का उदाहरण सोनी इंडिया, एल जी इत्यादि हो सकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का दूसरा स्वरूप स्थानीय फर्म का अधिग्रहण (विदेश में) अथवा इसका विलय करना है। अन्तरराष्ट्रीय अथवा सीमा-पार विलय के मामले में दो विभिन्न विलयकारी फर्मों (स्थानीय और विदेशी फर्म) की परिसम्पत्तियाँ और प्रचालन एक नई वैधानिक सत्ता को जन्म देती हैं जबकि सीमा-पार अधिग्रहण के मामले में परिसम्पत्तियों का नियंत्रण, स्वामित्व अधिकार और अधिग्रहित फर्म का प्रबन्धन अधिग्रहण करने वाली विदेशी फर्म को हस्तांतरित हो जाता हैं।

पूरे भूमंडल में प्रचलित बहुराष्ट्रीय संगठन का दूसरा उल्लेखनीय स्वरूप अन्तरराष्ट्रीय संयुक्त उद्यम है। इस प्रकार के संगठन में मूल देश की फर्म मेजबान देश में विद्यमान फर्म के साथ संयुक्त उद्यम की स्थापना करती है। एक नई सत्ता की स्थापना होती है जिसमें दो या दो से अधिक सहभागी फर्म का इक्विटी पूँजी के इतने बड़े हिस्से पर नियंत्रण रहता है कि कंपनी में वह निर्णायक भूमिका निभा सके। अन्तरराष्ट्रीय अथवा सीमा-पार संयुक्त उद्यम में सम्मिलित आर्थिक सत्ता दो या दो से अधिक देशों का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं। भारत में बिड़ला यामहा, डी सी एम टोयोटा, मोदी जेरॉक्स, काइनेटिक होण्डा, महिन्द्रा ब्रिटिश टेलीकॉम इत्यादि जैसे कुछ अन्तरराष्ट्रीय संयुक्त उद्यम हैं। संगठन का एक अन्य महत्वपूर्ण स्वरूप विदेशी अल्पसंख्यक शेयर पूँजी है।

बहुराष्ट्रीय संगठनात्मक व्यवस्थाओं पर स्वामित्व की दृष्टि से देखने के साथ-साथ यदि इस पर अधिक व्यापक परिदृश्य में देखा जाए तो बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों में अनेक अन्य संगठनात्मक स्वरूप सम्मिलित हैं। आज के विश्व में, कारोबारी संबंध के विभिन्न स्वरूपों ने बहुराष्ट्रीय उपक्रमों की परिभाषा को व्यापक बना दिया है। यदि कारोबारी संबंधों पर भी विचार किया जाए तथा यदि गैर-इक्विटी व्यवस्थाओं की भी इसके साथ गणना की जाए तब वास्तविक विश्व में कम से कम 5 विभिन्न प्रकार के बहुराष्ट्रीय संगठन दिखाई पड़ते हैं। ये हैं: लाइसेन्सिंग, फ्रेंचाइजिंग; मैनेजमेण्ट कॉन्ट्रैक्ट्स (प्रबन्धन संविदा), टर्नकी उद्यम, इंटरनेशनल सब-कॉन्ट्रैक्टिंग (अन्तरराष्ट्रीय उप-संविदा) स्ट्रेटेजिक एलायंसेज (रणनीतिक गठबंधन), इत्यादि। संगठन के इन सभी स्वरूपों में इक्विटी भागीदारी शामिल नहीं है, इस प्रकार वित्तीय पूँजी पर कोई स्वामित्व अथवा नियंत्रणकारी अधिकार नहीं होता है। तथापि, कारोबार के स्वरूप के अनुसार मूल फर्म (मूल देश की फर्म) संसाधनों और क्षमताओं जैसे प्रौद्योगिकी, पेटेन्ट्स, प्रबन्धन दक्षता, उद्यमिता इत्यादि के ऊपर अपना नियंत्रण रख सकती है जो उन्हें कतिपय लाभ पहुंचा सकता है।

बोध प्रश्न 3
1) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ डी आई) की परिभाषा बताइये?
2) बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों के विभिन्न स्वरूपों की पहचान कीजिए?
3) भारत में पाँच अन्तरराष्ट्रीय संयुक्त उद्यमों का नाम बताइये और इन उद्यमों में सम्मिलित बहुराष्ट्रीय
कंपनियों/निगमों की पहचान कीजिए?

 प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के निर्धारक
अनेक प्रकार के कारकों की क्रिया और प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप फर्म बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों में शामिल होते हैं। ऐसे कतिपय प्रेरक कारक हैं जिसके कारण फर्म सीमा-पार निवेश करते हैं। बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है। एक, विदेश या अन्तरराष्ट्रीय उत्पादन का उद्देश्य और दूसरा, बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों की आर्थिक और व्यवहारवादी निर्धारकों की पहचान करना। सर्वप्रथम फर्म अन्तरराष्ट्रीय उत्पादन क्यों करती हैं अथवा विदेशी उत्पादन के उनके उद्देश्य क्या हैं, पर चर्चा की जाएगी। तत्पश्चात् बहुराष्ट्रीय उपक्रमों के आर्थिक और व्यवहारवादी निर्धारकों की व्याख्या की जाएगी। उसके बाद विदेश में प्रत्यक्ष निवेश के उत्तरदायी कारकों और बाधाओं पर चर्चा की जाएगी।

वर्तमान साहित्य के अनुसार, तीन मुख्य उद्देश्यों जैसे ‘‘संसाधन प्राप्त करने के उद्देश्य‘‘, ‘‘बाजार प्राप्त करने के उद्देश्य, और दक्षता-प्राप्त करने के उद्देश्य‘‘ से फर्म विदेश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने के लिए प्रेरित होती है। सीमा पार उद्यम करने का तात्कालिक उद्देश्य कतिपय संसाधनों का अधिग्रहण करना है जो कम वास्तविक लागत पर उपलब्ध है तथा इस उपक्रम को निश्चित लाभ प्राप्त होता है। लम्बे समय तक प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। ऐतिहासिक विवरणों से पता चलता है कि कुछ विकसित देशों के आरम्भिक निवेशकों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पीछे मुख्य उद्देश्य खनिजों और प्राथमिक उत्पादों के विश्वसनीय स्रोत की उपलब्धता रहा है। यद्यपि कि समय बीतने के साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए प्रेरक के रूप में प्राकृतिक संसाधनों के महत्त्व में कमी आई है किंतु इसका महत्व पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के अलावा, फर्म कम लागत पर उत्पादन के अवसर खोजते हैं। इस प्रकार, अनेक मूल्य संवर्द्धन कार्यकलापों में सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मुख्य निर्धारक है। बाजार खोजने का उद्देश्य भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि फर्म – विशेष बाजार में बने रहना तथा विकास करना चाहती है। इस प्रकार एक फर्म विद्यमान बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहना चाहती है अथवा अपने बाजार का विस्तार करना चाहती है। इसलिए, बहुराष्ट्रीय कार्यकलाप, अभी तक अछूते नए बाजार अथवा जब बाजार में प्रवेश का वैकल्पिक मार्ग जैसे निर्यात, लाभप्रद नही रह जाता है, तब उसमें सीधे प्रवेश का प्रयास करती है। इस प्रकार अछूते नए बाजार के अवसर और/अथवा और अधिक विस्तार का अवसर फर्मों को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अन्य प्रकार के बहुराष्ट्रीय कार्यकलाप के लिए अन्य प्रमुख प्रेरक बड़े पैमाने की मितव्ययिता का लाभ उठाना और भौगोलिक रूप से बिखरे हुए कार्यकलापों के समान शासन के माध्यम से अवसर और जोखिम का बँटवारा होता है।

साहित्य में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अनेक सिद्धान्त हैं। अन्तरराष्ट्रीय उत्पादन की सबसे प्रसिद्ध व्याख्या जो शिक्षा के क्षेत्र में भी लोकप्रिय है वह है, डनिंग का ‘‘इक्लेकटिक पाराडिग्म‘‘ (चयनशील प्रतिमान)। यद्यपि कि चयनशील प्रतिमान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की व्याख्या करता है लेकिन यह विदेशों में प्रवेश के विभिन्न प्रकारों के बीच भेद नहीं करता है। यह मुख्य रूप से ग्रीनफील्ड उद्यमों की व्याख्या करता है। डनिंग के चयनशील प्रतिमान से पता चलता है कि जब निम्नलिखित तीन कारक एक साथ विद्यमान रहते हैं तब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होता है अर्थात् (प) स्वामित्व आपेक्षिक लाभ जैसे पेटेण्ट, स्वामित्व प्रौद्योगिकी इत्यादि, (पप) मेजबान देशों की अवस्थिति लाभ जैसे मेजबान देश में बृहत् बाजार अथवा स्थानीय संसाधनों का कम लागत इत्यादि और (पपप) अन्तरराष्ट्रीयकरण लाभ। पहला कारक फर्म आपेक्षिक निर्धारक को प्रदर्शित करता है, जबकि अवस्थिति संबंधी लाभ विशेष देश से जुड़ा होता है जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह कुछ विशेष देशों की ओर ही होता है न कि सभी देशों की ओर। इस प्रकार स्वामित्व, अवस्थिति और अन्तरराष्ट्रीयकरण प्रतिमान से निम्नलिखित प्रश्नों का हल निकलता है जैसे (क) कौन से फर्म प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करते हैं, (ख) फर्म प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहाँ करते हैं और (ग) वे बेचने की बजाए प्रत्यक्ष निवेश के माध्यम से अपने लाभ को आभ्यंतरिक क्यों करना चाहते हैं। इस प्रकार कारकों का समूह उत्पादन का स्वरूप और बाजार में आपूर्ति और सेवा व्यवस्था को निर्धारित करता है।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, शुद्ध उद्देश्यों के अलावा, कुछ कारक आकृष्ट करने वाले और कुछ विदेशों में निवेश के लिए प्रेरक कारक होते हैं जिसके कारण फर्म अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर निवेश करने के लिए आकर्षित होती हैं। फर्मों को आकृष्ट करने वाले कारक जो इस दिशा में कार्य करते हैं वे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए विभिन्न देशों द्वारा बनाए गए नीतिगत ढाँचे हैं। यह साधारण-सी बात है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का किसी देश की ओर प्रवाह तब तक नहीं हो सकता है जब तक कि संबंधित देश सजग रूप से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अपनी ओर आकर्षित नहीं करे अथवा इसके प्रवाह को सुगम बनाए। इस प्रकार देशों को पर्याप्त रूप से खुला होना चाहिए और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अन्तर्वाह की अनुमति देकर वे अवसर का सृजन करते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए समुचित प्रेरक तंत्र होना चाहिए। नीतियाँ जो हर तरह से अर्थात् प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी अन्तरराष्ट्रीय समझौता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, संयुक्त उद्यम इत्यादि के अनुकूल होती हैं अधिक बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों अथवा भागीदारी को आकर्षित करती हैं। प्रशुल्क (टैरिफ) और कर-रहित बाधाओं से संबंधित व्यापार नीतियाँ भी अन्तरराष्ट्रीय निवेश और मूल्य संवर्धित कार्यकलाप के प्रवाह के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक मेजबान देश की व्यापार नीति के अनुसार कोई फर्म वहाँ निर्यात करने, अथवा लाइसेन्स देने अथवा प्रत्यक्ष निवेश करने पर विचार कर सकती है। घरेलू कर नीति एक अन्य पहलू है जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह को निर्धारित करती है। इन सबके साथ-साथ अनेक देशों में निजीकरण के उपाय जो खासकर 1990 के दशक से शुरू हुए हैं ने भी बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों को बढ़ावा दिया है। इस प्रकार निजीकरण की नीति जो सरकार की खुलेपन और कतिपय क्षेत्रों से अपना हाथ खींचने की मंशा प्रकट करती है, प्रत्यक्ष विदेशी ष्निवेश के प्रवाह को निर्धारित करती है। दूसरा संबंधित मुद्दा बाजार की संरचना विशेषकर प्रतिस्पर्धा तथा विलय और अधिग्रहण से संबंधित घरेलू नीति है। विदेशी अनुषंगी कंपनियों को लक्ष्य करके बनाई गई नीतियाँ और कंपनी खोलने तथा बंद करने के नियम भी प्रत्यक्ष घरेलू निवेश के लिए महत्त्वपूर्ण निर्धारक हैं। बहुराष्ट्रीय निवेशकों को निष्पक्ष और समभाव व्यवहार सहित समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए घरेलू नीतियाँ तथा निवेश संबंधी विवादों के निबटारे के लिए अन्तरराष्ट्रीय साधन का प्रावधान प्रत्यक्ष निवेश को सुगम बनाता है तथा बहुराष्ट्रीय कार्यकलापों को बढ़ावा देता है। कतिपय निवेश विनिर्दिष्ट सकारात्मक उपायों के अलावा नीति संबंधी मामले जैसे निवेश का सृजन करने वाले क्रियाकलाप, निवेश प्रोत्साहनों, निवेश उपरान्त सेवाओं और सुगम निवेश सुविधाओं जो प्रशासनिक तथा नौकरशाही की जटिलताओं से मुक्त हों और आवश्यक आधारभूत संरचना के प्रावधान के माध्यम से निवेश को बढ़ावा देना बाह्योन्मुखी प्रत्यक्ष निवेश के लिए महत्त्वपूर्ण कारक बनता जा रहा है। अंततः बहुराष्ट्रीय प्रचालनों के लिए जो चीज सबसे जरूरी है वह है घरेलू राजनीतिक तथा आर्थिक स्थायित्व।

उपर्युक्त विश्लेषण की एक कठिनाई यह है कि यह मेजबान देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह को सुगम बना सकता है किंतु क्या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होगा अथवा नहीं होगा निश्चित तौर पर अन्य पहलुओं/कारकों पर भी निर्भर करता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अथवा बहुराष्ट्रीय अनुकूल नीतिगत ढाँचा एक आवश्यक शर्त हो सकता है किंतु यह किसी विशेष देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के वास्तव में होने के लिए पर्याप्त नहीं भी हो सकता है।

बाहर की ओर प्रेरित करने वाला सर्वाधिक प्रमुख कारक घरेलू बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा है जो फर्म को विदेशी भूभागों में उद्यम करने को बाध्य करता है। इसके साथ, कतिपय कार्यकलाप हैं जिसमें उत्पादन के चरणों को भौतिक रूप से अलग किया जा सकता है।विशेषकर इस प्रकार के कार्यकलापों में उत्पादन के विशेष चरण के लिए उपलब्ध सस्ते श्रम वाले देशों में उत्पादन स्थल स्थापित करना भूमंडलीय परिदृश्य बन गया है। उदाहरण के लिए, कम्प्यूटर उद्योग में, उत्पादन के श्रम प्रधान चरणों, को कम लागत वाले विनिर्माण आधारों में हस्तांतरित किया जा रहा है और उत्पादन के महत्त्वपूर्ण चरणों को मूल देश में ही कार्यरूप दिया जा रहा है। विदेशी भूमि में उद्यम स्थापित करना कभी-कभी इसलिए जरूरी हो जाता है कि कतिपय देशों में जहाँ पहले निर्यात करके माँग पूरी की जाती थी द्वारा खड़ी की गई प्रशुल्क (टैरिफ) बाधाओं से बचा जा सके। इस परिदृश्य में, सबसे अच्छा विकल्प विदेश में प्रत्यक्ष निवेश करना है। 90 के दशक के भूमंडलीकरण की धारा और निजीकरण के उपायों के साथ एक अन्य घटना जो त्वरित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा दे रही है, निवेश के लिए द्विपक्षीय समझौता और बढ़ती हुई क्षेत्रीय अखंडता है तथा प्रदेश के अंदर व्यापारिक कारोबार के लागत को कम करने के लिए व्यापार को बढ़ावा देना है।

बोध प्रश्न 4
1) वे मुख्य उद्देश्य क्या हैं जिसके कारण एक फर्म अन्तरराष्ट्रीय उत्पादन करती है?
2) ‘‘चयनशील प्रतिमान‘‘ किससे संबंधित है?
3) मेजबान देश की 5 अलग-अलग घरेलू नीतियों की पहचान कीजिए जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकता है?

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