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Fertilization & Non-fertilization definition types in hindi definition meaning अनिषेक जनन , आंतरिक , बाह्य निषेचन क्या है  के प्रकार परिभाषा निषेचन किसे कहते है ?

निषेचन (Fertilization):- नर तथा मादा युग्मकों के संयोजन की क्रिया को निषेचन कहते है। इससे द्विगुणित युग्मनज का मिर्माण होता है।

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  1. बाह्य निषेचन (External fertilization):- जब निषेचन की क्रिया शरीर के बाहर हो तो उसे बाहा्र निषेचन कहते है उदाहरण:- मेढक, अस्धील मछलियाँ

इस प्रकार के निषेचन हेतु जलीय माध्यम की आवश्यकता होती है इसमें नर युग्मक अधिक संख्या में उत्पन्न किये जाते है क्योकि स्थानान्तरण के दौरान बहुत युग्मकों के नष्ट होने की संभावना रहती है।

  1. आंतरिक निषेचन (Internal fertilization):-जबनिषेचन की क्रिया मादा शीरर के अन्दर होती है तो इसे आन्तरिक निषेचन कहते है।

उदाहरण:- अनुष्य, बन्दर

अनिषेक जनन(Non-fertilization):- बिना निषेचन के जनन की क्रिया को अभिषेक जनन कहते है। इसमें मादा युग्मक नर युग्मक से संयोजित हुये बिना ही युग्मनज में बदल जाता है।

उदाहरण:- रोटिकेश, मधुमक्खी, कुवर छिपकलियाँ एवं कुमक्षी

निषेचन (fertilization in hindi) : नर और मादा युग्मकों के संलयन की प्रक्रिया को निषेचन कहते है। आवृतबीजी पादपों में निषेचन का अध्ययन सर्वप्रथम स्ट्रासबर्गर (strasburger 1884) ने लिलियम में किया था।

आवृतबीजी पादपों में नर युग्मक परागकोष में स्थित परागकणों (नरयुग्मकोदभिद) में बनते है। इसी प्रकार बीजाण्ड में स्थित भ्रूणकोष मादा युग्मकोदभिद का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें विकसित अंड कोशिका मादा युग्मक को निरूपित करती है।
निषेचन की क्रिया के लिए यह आवश्यक है कि परागकण परागकोष से विमुक्त होकर अंडप के वर्तिकाग्र पर पहुँचे। परागकणों के परागकोष के विमुक्त होकर पुष्प की वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरण की क्रिया को परागण कहते है। परागकोष से मुक्त हुए परागकण विभिन्न साधनों जैसे कीट , जल , वायु और अन्य जन्तुओं के माध्यम से अंडप के वर्तिकाग्र पर पहुँचते है।
निषेचन की प्रक्रिया के संचालन के लिए नर और मादा युग्मकों का सम्पर्क में आना आवश्यक है अत: वर्तिकाग्र पर पहुँच कर , परागकण अंकुरित होते है जिससे परागनलिका का निर्माण होता है।
नर युग्मक को बीजाण्ड और भ्रूण कोष और इसमें उपस्थित मादा युग्मक अथवा अंड कोशिका तक ले जाने का कार्य परागनलिका के द्वारा किया जाता है इसलिए आवृतबीजी पौधों में निषेचन की प्रक्रिया को नाल युग्मनी माना जाता है।
परागनलिका वर्तिका से होकर बीजांड में प्रवेश करती है। यह बीजाण्ड में स्थित भ्रूणकोष में प्रवेश कर दोनों नर युग्मकों को मुक्त कर देती है। एक नर युग्मक अंडकोशिका से संलयित होकर युग्मनज का निर्माण करता है जबकि दूसरा नर युग्मक ध्रुवी केन्द्रकों या द्वितीयक केन्द्रक से संयुक्त होकर प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक बनाता है। इस प्रकार के निषेचन को द्विनिषेचन कहते है। जिसमें दोनों नरयुग्मक निषेचन में भाग लेते है।
आवृतबीजीयों में निषेचन क्रिया का अध्ययन अग्र बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
  1. परागकणों का अंकुरण
  2. परागनली की संरचना और वृद्धि
  3. परागनली का मार्ग
  4. परागनली का बीजाण्ड में प्रवेश
  5. परागनली का भ्रूणकोष में प्रवेश
  6. युग्मकों का विसर्जन
  7. युग्मक संलयन

1. परागकणों का अंकुरण (germination of pollen grains)

पूर्णतया विकसित होने के पश्चात् परागकोष के स्फुटन के द्वारा परागकण मुक्त हो जाते है। ये स्वतंत्र , परागकण विभिन्न वातावरणीय कारकों जैसे – तापक्रम , तेज धूप और शुष्कता आदि के प्रति पूर्णतया प्रतिरोधी होते है और आवश्यकतानुसार अवधि के लिए जीवनक्षम होते है। आवृतबीजी पुष्पों में परिपक्व जायांग के वर्तिकाग्र से एक चिपचिपा द्रव स्त्रावित होता है जिसमें परागण क्रिया द्वारा स्थानांतरित परागकण चिपक जाते है या अटक जाते है। यह स्त्रावित द्रव पिटुनिया में चिपचिपा और कॉस्मोस में म्यूसीलेजयुक्त और अन्य आवृतबीजी पौधों में जलरागी प्रोटीन से युक्त होता है। परागकण इस द्रव को अवशोषित करके फूल जाते है और इनके आयतन में वृद्धि होती है। इसके साथ ही इनका अपेक्षाकृत सख्त और दृढ़ बाह्यचोल नर्म हो जाता है और झिल्ली युक्त अन्त: चोल किसी एक जनन छिद्र से नलिकाकार अतिवृद्धि के रूप में बाहर आ जाता है। इस छोटी नलिका को जनन नलिका कहते है। बाद में यही नलिका आगे वृद्धि करके पराग नलिका बनाती है।
परागकण कोशिका के विभाजन से निर्मित जनन कोशिका जो कि विभाजन के द्वारा दो नर युग्मकों के निर्माण के लिए उत्तरदायी होती है , वह जनन कोशिका यदि परागकण में विभाजन नहीं करती है तो फिर इसका विभाजन पराग नलिका में होता है तथा दो नर युग्मक बनते है। वर्तिकाग्र के ऊपरी हिस्से पर वृद्धिशील पराग नलिका में आगे नलिका कोशिका और इसके पीछे जनन कोशिका के विभाजन से निर्मित दो नर युग्मक पाए जाते है।
वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद परागकण के अंकुरण अर्थात जनन नलिका के विकास में जो समय लगता है उसे अंकुरण काल कहते है। यह अंकुरण काल अथवा अवधि विभिन्न आवृतबीजी पौधों में भिन्न भिन्न हो सकती है , जैसे – रीसेडा में तीन घंटे , मक्का में पाँच मिनट , बीटा वलगेरिस में दो घंटे और गेराया इलिप्टिका में तीन दिवस का अंकुरण काल होता है। परागनलिका की लम्बाई भी विभिन्न आवृतबीजी पौधों में अलग अलग होती है। सामान्यतया यह वर्तिका की लम्बाई पर निर्भर करती है। कुछ पौधों जैसे बीटा वलगेरिस में परागनलिका की लम्बाई केवल कुछ मिलीमीटर तक की होती है जबकि मक्का में 45 सेंटीमीटर लम्बी परागनलिका देखी गयी है। सामान्यतया एक परागकण से केवल एक परागनलिका उत्पन्न होती है। इस प्रकार के परागकण को एकनलिकीय कहते है। जबकि कुछ पौधों जैसे – एल्थिया रोजिया में 10 और मालवा नेग्लेक्टा में चौदह परागनलिका पायी जाती है। ऐसे परागकणों को बहुनलिकिय कहते है।
यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बहुनलिकिय अवस्था में भी केवल एक ही परागनलिका क्रियाशील होती है। एमन्टफेरी वर्ग के सदस्यों में शाखित परागनलिका पायी जाती है और इस शाखित परागनलिका की वह शाखा आगे चलकर वृद्धि करती है , जिसमें नर युग्मक उपस्थित होते है। साथ ही ऐसे पौधे जिनमें परागकण का परागकोष से विसर्जन परागपिण्ड अथवा चतुष्कों के रूप में सामूहिक रूप से होता है। जैसे कैलोट्रोपिस और माइमोसा आदि में तो वहां वर्तिकाग्र पर एक साथ सभी परागकणों से परागनलिकाएँ उत्पन्न होती है।

वर्तिकाग्र के कार्य (function of stigma)

  1. किसी पुष्प के जायांग का वर्तिकाग्र एक ग्राही संरचना के रूप में कार्य करता है।
  2. इसके अतिरिक्त यह परागकण को पर्याप्त स्थान प्रदान करता है।
  3. अंकुरण हेतु नमी प्रदान करता है। जब तक परागनलिका वर्तिका में प्रविष्ट नहीं हो जाती तब तक उसे ये पर्याप्त नमी प्रदान करता है।

2. परागनली की संरचना और वृद्धि (path of pollen tube)

अंकुरण के पश्चात् सामान्यतया परागनली की समस्त अंतर्वस्तुए परागनलिका में आ जाती है। परागनली की वृद्धि उसके अग्र क्षेत्र द्वारा होती है और अधिकांश कोशिका द्रव्य इस क्षेत्र में एकत्र हो जाता है। परागनलिका के शेष भाग और स्वयं परागकण बड़ी रिक्तिका द्वारा भर जाता है। परागनलिका के अग्र भाग में कोशिका द्रव्य को सिमित रखने के लिए नलिका में केलोज प्लग बन जाते है। जैसे जैसे परागनली की वृद्धि होती है। केलोज प्लग बनते जाते है। इसलिए लम्बी परागनलिकाओं में अनेक केलोज प्लग थोड़े थोड़े अंतराल पर देखे जा सकते है और इनकी उपस्थिति से परागनलिका छोटे छोटे खण्डों में विभक्त हो जाती है। केलोज प्लग नलिका की भीतरी भित्ति पर एक वल्य के रूप में विकसित होते है जिनकी अभिकेन्द्री वृद्धि होती है और अन्तत: नली की अवकाशिका बंद हो जाती है।
परागनली के शीर्ष पर एक अर्धचन्द्राकर पारभाषी क्षेत्र पाया जाता है जिसे आच्छद ब्लॉक क्षेत्र कहते है। परागनली की वृद्धि समाप्त होने पर यह क्षेत्र अदृश्य हो जाता है। आच्छद क्षेत्र में कोशिकांगों का अभाव होता है। इस क्षेत्र के कोशिकाद्रव्य में अनेक छोटी रिक्तिकाएँ पायी जाती है जिनमें पोली सैकेराइड और RNA बहुतायत से पाए जाते है। आच्छद ब्लॉक के पीछे स्थित भाग के कोशिका द्रव्य में माइटोकोंड्रिया , गोलजीकाय , अन्त:द्रव्यी जालिका और लिपिड्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते है।
परागनलिका की भित्ति सेल्यूलोज और पेक्टिन की बनी होती है। आच्छद ब्लॉक क्षेत्र में पेक्टिन की अधिकता पायी जाती है और पीछे की तरफ इसकी मात्रा क्रमशः कम होती है। परागनली की वृद्धि एकदिशीय दिशा में अर्थात सदैव वर्तिकाग्र से अंडाशय की तरफ होती है। यह एकदिशीय वृद्धि संभवतः यांत्रिक , जलानुवर्ती और रसायनानुवर्ती कारकों के फलस्वरूप होती है। इसके अतिरिक्त परागनली के शीर्ष भाग में शरीर क्रियात्मक सक्रीय पदार्थों की सान्द्रता पायी जाती है जो इसकी एकदिशीय वृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है। परागनली जब वर्तिका के आधार पर पहुँचती है तो अंडाशय और बीजाण्ड का रसायनुवर्ती उद्दीपन इसे बीजाण्ड की तरफ आकर्षित करता है। इसके अतिरिक्त अनेक पौधों के बीजांड पर उपस्थित विशिष्ट संरचनाएँ जिन्हें सेतुक कहते है। परागनलिका की वृद्धि को बीजाण्डद्वार की तरफ प्रेरित करते है।