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ego defensive function of attitude in hindi ? अहं रक्षात्मक कार्य क्या है ? अहं रक्षां युक्तियाँ मनोवृत्ति

अहं रक्षात्मक कार्य क्या है ? अहं रक्षां युक्तियाँ मनोवृत्ति ego defensive function of attitude in hindi ?
मनोवृत्ति के कार्य (Functions of Attitude)
मनोवैज्ञानिक काज का यह मानना है कि मनोवृत्ति द्वारा कुछ कार्य संपन्न किए जाते हैं और इन्हीं कार्यों के विश्लेषण से मनोवृत्तियों की बेहतर पहचान की जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ खास मनोवृत्तियों को तरजीह देता है क्योंकि इनसे उन्हें लक्ष्य-प्राप्ति में सहायता मिलती है अर्थात् उनका कार्य सिद्ध होता है। मनोवृत्ति के प्रमुख कार्य (वृत्तियां) ये हैंः
उपयोगितावादी/साधनात्मक कार्य (Utilitarian/instrumental Functions)ः साधनात्मक कार्य का अर्थ यह है कि जिस व्यवहार से व्यक्ति को लाभ या पुरस्कार मिलता है या फिर मिलने की संभावना रहती है, वह उसे बार-बार करने की कोशिश करता है लेकिन जिस व्यवहार से दण्ड मिलता है या फिर मिलने की संभावना भी होती है वह वैसे कार्य करने से परहेज करता है। यहां काज के कहने का अभिप्राय यह है कि जिन वस्तुओं अथवा व्यक्तियों से हमें पुरस्कार मिलता है या मिलने की संभावना होती है उनके प्रति हमारी मनोवृत्ति सकारात्मक होती है। दूसरी ओर, वैसे व्यक्ति या कार्य जिनसे हमें नुकसान का डर होता है उनके प्रति हमारी मनोवृत्ति सकारात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक बन जाती है। अतः यहां मनोवृत्ति का मुख्य कार्य यह है कि वह पुरस्कार पाने या दण्ड से बचने के एक साधन के रूप में काम करती है।
ज्ञान कार्य (Knowledge Question)ः मनोवृत्ति का ज्ञान से संबंधित कार्य भी महत्वपूर्ण है। हममें से प्रत्येक को अर्थपूर्ण, स्पष्ट तथा सार्थक ज्ञान की आवश्यकता होती है ताकि हम व्यावहारिक जीवन में समाज तथा देश-दुनिया के बारे में एक बेहतर समझ बना सके तथा उनसे सामंजस्य भी स्थापित कर सके। हमारी इस आवश्यकता को पूरा करने में मनोवृत्ति भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर मनोवृत्ति अनुकूल हो तो ऐसी स्थिति में मान में वृद्धि होने की गुंजाइश रहती है जबकि मनोवृत्ति के प्रतिकूल होने पर ज्ञानवर्धन की गुंजाइश नहीं रहती। किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना के प्रति सकारात्मक मनोवृत्ति रखने से व्यक्ति के अनुभवों में वृद्धि होती है क्योंकि उसमें जानने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
अहं रक्षात्मक कार्य (Ego Defensive Function)ः मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण कार्य है चिन्ता, निराशा तथा द्वन्द्व से व्यक्ति की रक्षा करना। अपने अहं रक्षा के लिए व्यक्ति कई बार अपनी वर्तमान मनोवृत्ति को बदल लेता है अर्थात् नई मनोवृत्ति विकसित कर लेता है और स्वयं के बारे में सत्य सुनने या जानने की उसमें क्षमता आ जाती है। वह जीवन के कटु सत्यों को भी आसानी से स्वीकार कर लेता है। इसे युक्तयाभास (त्ंजपवदंसप्रंजपवद) भी कहते हैं।
मूल्य अभिव्यंजक कार्य (Value Expressive Function)ः मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी है कि व्यक्ति इसके माध्यम से स्वयं को बेहतर तरीके से समझ पाता है। दूसरे शब्दों में, मनोवृत्ति का कार्य यह भी है कि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मूल्य के अनुकूल अपनी मनोवृत्ति में बदलाव लाता है तो उसे संतुष्टि मिलती है। अर्थात् मनोवृत्ति व्यक्ति को अपने मूल्य के अनुकूल व्यवहार करने को प्रेरित करती है और व्यक्ति स्वयं को दूसरों के समक्ष मूल्यों में अपनी व्यक्तिगत आस्था को बेहतर ढंग से अभिव्यंजित कर पाता है।
सामाजिक पहचान कार्य (Social Identity Function)ः सामाजिक पहचान कार्य का अर्थ यह है कि मनोवृत्ति के माध्यम से व्यक्ति को सामाजिक तौर पर एक पहचान भी मिलती है। यहां किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति उसके बारे में दूसरों को सूचना संप्रेषित करने का कार्य करती है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अगर गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत का तिरंगा झंडा खरीदता है तो यह संभव है कि उसने समाज में अपनी पहचान बनाने के उद्देश्य से ऐसा किया हो।

मनोवृत्ति एवं व्यवहार में संबंध (Influence of Attitude on Behaviour)
कई शोधों से यह संकेत मिला है कि अभिवृत्ति (मनोवृत्ति) व्यवहार को काफी हद तक प्रभावित करती है। हालांकि मनोवृत्ति एवं व्यवहार का संबंध थोड़ा जटिल अवश्य प्रतीत होता है और कई बार व्यवहार के आधार पर मनोवृत्ति के बारे में जानना कठिन होता है, परन्तु सत्य यही है कि हमारी मनोवृत्ति हमारे व्यवहार को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। स्वयं मनोवृत्ति को सर्वप्रथम एक विशेष तरीके के व्यवहार के रूप में ही परिभाषित किया जाता है। उदाहरण के लिए, अलपोर्ट ने भी मनोवृत्ति को परिभाषित करते हुए कहा है कि यह विशिष्ट वस्तुओं के प्रति विशेष रूपों से व्यवहार करने की प्रवृत्ति है। मनोवृत्ति न केवल व्यवहार की दिशा निर्धारित करती है बल्कि व्यवहार करने की शक्ति भी प्रदान करती है।
अत्याधुनिक शोधों से पता चला है कि व्यवहार पर मनोवृत्तियों के प्रभाव से व्यवहार में बदलाव के लिए कुछ खास कारक उत्तरदायी होते हैं। जोकि निम्नलिखित हैंः-
वास्तविक बनाम अभिव्यक्त मनोवृत्ति (True Versus Expressed Attitudes)
वास्तविक और अभिव्यक्त मनोवृत्ति हमेशा एक जैसे नहीं होते, अर्थात् ऐसा भी होता है कि व्यक्ति की वास्तविक मनोवृत्ति कुछ और होती है, परन्तु उसके क्रिया या व्यवहार से उसकी वह मनोवृत्ति नहीं बल्कि कुछ और ही मनोवृत्ति झलकती है। दूसरे शब्दों में, एक व्यक्ति द्वारा अभिव्यक्त वास्तविक मनोवृत्ति नहीं भी हो सकती है। व्यावहारिक जीवन में भी हम पाते हैं कि किसी खास मुद्दे पर या संवेदनशील परिस्थितियों में हम सोचते तो कुछ और हैं, परन्तु हमारी प्रतिक्रिया या हमारा वक्तव्य कुछ और होता है जो हमारी वास्तविक मनोवृत्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी दोनों मनोवृत्तियां अलग-अलग कारणों से प्रभावित होती हैं जिसके कारण हमारी अभिव्यक्त मनोवृत्ति तथा वास्तविक मनोवृत्ति में अंतर आ जाता है।

मनोवृत्ति विशेष बनाम सामान्य मनोवृत्ति (One Instance Versus Aggregate)
व्यवहार पर मनोवृत्ति से पड़ने वाला प्रभाव तब और स्पष्ट हो जाता है जब हम किसी व्यक्ति के किसी खास कार्य व्यवहार को न देख उसके सामान्य कार्य-व्यवहार का परीक्षण करते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी व्यक्ति के एक कार्य अथवा किसी एक वक्तव्य के आधार पर हम उस व्यक्ति की औसत मनोवृत्ति का मापन नहीं कर सकते हैं। कई शोधों में यह पाया गया है कि अगर हम किसी व्यक्ति की धर्म संबंधी सामान्य मनोवृत्ति को समझकर निश्चित रूप से यह अनुमान नहीं लगा सकते कि वह अमूक दिन धर्म संबंधी अमूक काम करेगा ही। उसकी धर्म संबंधी औसत मनोवृत्ति और उसके कार्य-व्यवहार के बीच कई ऐसे कारक आ जाते हैं जिसके कारण यह भी हो सकता है कि वह अपनी मनोवृत्ति को क्रियात्मक रूप न दे पाए। ऐसा भी हो सकता है कि एक व्यक्ति धर्मपरायण तो है, परन्तु वह मौसम, मनःस्थिति अथवा समयाभाव के कारण रोज पूजा-अर्चना करने मंदिर न जा पाए।

मनोवृत्ति व्यवहार-विशिष्टता का स्तर
( Level of Attitude Behaviour Specificity )
मनोवृत्ति-वस्तु ( Attitude object) के प्रति सामान्य व्यवहार तथा विशेष प्रकार के व्यवहार के संदर्भ में अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलकर आया है कि मनोवृत्ति व्यवहार को काफी हद तक प्रभावित करता है। मनोवृत्ति के आधार पर व्यवहार के बारे में पूर्वानुमान तभी लगाया जा सकता है जब किसी विशिष्ट वस्तु या स्थिति के संबंध में मनोवृत्ति तथा व्यवहार के बीच संगति हो। एक व्यक्ति मेक्सिकन व्यंजन खाना पसंद करता है या नहीं तथा वही व्यक्ति बाहर जाकर भोजन करना पसंद करता है या नहीं – ये दोनों बातें विशेष तथा सामान्य व्यवहार को परिलक्षित करते हैं और यह उस व्यक्ति की मनोवृत्ति से ही निर्देशित होता है। मनोवृत्ति वस्तु जितना विशेषीकृत होता जाएगा मनोवृत्ति एवं व्यवहार के बीच का संबंध उतना ही स्पष्ट होता जाएगा।

स्वजागरूकता (Self Awareness)
किसी व्यक्ति के व्यवहार पर इस बात का भी फर्क पड़ता है कि वह स्वयं अपनी मनोवृत्ति के प्रति कितना जागरूक है अर्थात अगर उसे अपनी मनोवृत्ति की बेहतर समझ है अथवा वह अपनी मनोवृत्ति के बारे में सजग है तो इसका स्पष्ट प्रभाव उसके व्यवहार पर पड़ेगा। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि एक व्यक्ति अपनी मनोवृत्ति के प्रति जितना कम भिज्ञ (सजग) होगा, उसकी मनोवृत्ति उसके व्यवहार में उतना ही स्पष्ट रूप से परिलक्षित होगी। कहने का अर्थ यह है कि अगर व्यक्ति अपनी मनोवृत्ति के प्रति सजग और उसके बारे में पूर्ण रूप से भिज्ञ है तो हो सकता है कि वह उसे कार्य-व्यवहार रूप देने में झिझके अथवा संकोच करे। दूसरी ओर अगर वह अपनी मनोवृत्ति के प्रति सजग नहीं है अथवा कम जागरूक है तो उसका व्यवहार अपेक्षाकृत बेहद स्वाभाविक होगा जिससे उसकी मनोवृत्ति का स्पष्ट रूप से पता लगाया जा सकता है।

मनोवृत्ति तीव्रता (Attitude Strength)
चूंकि मनोवृत्ति व्यवहार करने की तत्परता है, अतः मनोवृत्ति जितनी ही अधिक तीव्र अथवा प्रबल होगी व्यवहार में भी वह उतना ही स्पष्ट रूप से उभर कर आएगी। मनोवृत्ति चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक उसकी अपनी तीव्रता होती है, क्योंकि मनोवृत्ति के निर्माण में कई प्रकार के अनुभवों की भूमिका होती है। अतः मनोवृत्ति अगर तीव्र और प्रबल (प्दजमदेम) है तो वह निश्चित रूप से व्यवहार को प्रभावित करेगी।

मनोवृत्ति अभिगम्यता (Altitude Accessibility)
मनोवृत्ति प्रायः अवचेतन मन में निर्मित होती है। यह हमारे पूर्व अनुभवों एवं घटनाओं के कारण भी निर्मित होती है जो अचानक हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो जाती है। कई बार यह हमारे अन्तर्मन में होती है और स्वाभाविक रूप से हम उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। अर्थात् उस व्यवहार के लिए हम सजग होकर अपनी मनोवृत्ति के बारे में नहीं सोचते। अतः मनोवृत्ति हमारे व्यवहार को इस रूप में भी प्रभावित करती है कि कितनी तेजी और सहजता से हमारे अंतःस्थल में स्थित मनोवृत्ति को हम कार्य-व्यवहार रूप दे पाते हैं। अर्थात् जितनी सहजता से हम अपनी मनोवृत्ति को तलाश पाएंगे हमारा व्यवहार उतना ही स्वाभाविक व अबाधित होगा।

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