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Effusion and Molecular Beams in hindi निःसरण तथा आण्विक पुंज क्या है समझाइये

जानेंगे Effusion and Molecular Beams in hindi निःसरण तथा आण्विक पुंज क्या है समझाइये ?

मैक्सवेल बंटन फलन के अनुप्रयोग (Applications of Maxwell’s Distribution Function)

(i) औसत चाल (Average speed)

(ii) वर्ग-माध्य-मूल चाल (Root mean square speed) : किसी निकाय में अणुओं के औसत के वर्गमूल को वर्ग माध्य मूल चाल कहते हैं। यदि अणुओं की वर्ग माध्य मूल चाल Cmax है तो

(iii) अधिकतम प्रसंभाव्य चाल (Most probable speed) : किसी निकाय में सर्वाधिक अणु जिस चाल से गति करते हैं उसे अधिकतम प्रसंभाव्य चाल कहते हैं। गणितीय रूप से, अधिकतम प्रसंभाव्य चाल c = Cm पर

अब पुनः औसत चाल, वर्ग माध्य मूल चाल और अधिकतम प्रसंभाव्य चालों पर विचार करें तो पाते हैं कि एक निश्चित ताप पर इनके आपेक्षिक परिमाण हैं :

इन तीनों चालों को चित्र 5.2-1 में प्रदर्शित किया गया है।

ऊर्जा बंटन फलन (Energy Distribution Function )

c चाल से गतिमान, द्रव्यमान m के एक अणु की स्थानांतरण गतिज ऊर्जा

E =mc2/2

मैक्सवेल बंटन फलन में घातांक स्थानांतरण ऊर्जा तथा राशि kT का (ऋणात्मक) अनुपात है। मैक्सवेल के प्रारंभिक कार्य के पश्चात् बोल्ट्जमान द्वारा प्रस्तुत व्यापकीकरण में मैक्सवेल बंटन फलन जो केवल स्थानांतरण गतिज ऊर्जा से सम्बद्ध है, एक अधि क व्यापक फलन की विशेष अवस्था है। अतः ऊर्जा बंटन फलन मैक्सवेल-बोल्ट्जमान फलन कहलाता है। बहुधा वे अणु जिनकी स्थानांतरण गतिज ऊर्जा किसी परास E तथा E + dE के मध्य होती है, उनकी संख्या को ज्ञात करने के लिए समीकरण

(1) का अवकलन कर c व dc का मान ऊर्जा E के रूप में लिखते हैं

यहाँ संकेतन dnc को dnE में परिवर्तित कर दिया है क्योंकि अब बंटन फलन को ऊर्जा E के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। इस समीकरण (3) को ऊर्जाओं के वितरण का फलन कहते हैं। E/kT के फलन के रूप में ऊर्जा वितरण फलन dNE /dE का एक आरेख चित्र 5.3-1 में दिया है। .: समीकरण ( 3 ) से ऊर्जा परास E तथा E + dE के मध्य अणुओं की ऊर्जा होने की प्रायिकता

इस ऊर्जा बंटन फलन से निम्न निष्कर्ष निकाल सकते हैं :

(i) जब E = 0 तो P(E) = 0 अर्थात् अणुओं की ऊर्जा शून्य होने की प्रायिकता शून्य होती है। E << KT हो तो इस स्थिति में अणुओं की संख्या चरघातांकी रूप से कम होती है। (ii) अणुओं की संख्या जिनकी ऊर्जा E तथा E + dE के बीच होती है अणुओं के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है अर्थात् समान ऊर्जा परास में सभी गैसों के अणुओं की संख्या समान होती है। (iv) अधिकतम प्रसंभाव्य ऊर्जा : वह ऊर्जा जिसके संगत अणुओं की संख्या अधिकतम होती है, अधिकतम प्रसंभाव्य ऊर्जा कहलाती है। अधिकतम प्रसंभाव्य ऊर्जा E = Em की स्थिति पर

अतः निकाय की अधिकतम प्रसंभाव्य ऊर्जा KT/2 होती है और यह केवल ताप पर निर्भर करती है।

(v) अधिकतम प्रसंभाव्य ऊर्जा की स्थिति पर अधिकतम प्रायिकता का मान ज्ञात करने के लिए समीकरण (4) में E = KT/2 रखने पर,

(vi) जै जैसे ताप का मान बढ़ता है, अधिकतम प्रसंभाव्य ऊर्जा का मान बढ़ता है परन्तु अधिकतम प्रायिकता का मान चित्र के अनुसार घटता है ।

अतः निकाय की माध्य गतिज ऊर्जा ताप के अनुक्रमानुपाती होती है।

निःसरण तथा आश्विक पुंज (Effusion and Molecular Beams)

आवेशित कणों के पुंज को प्राप्त करने के लिए विद्युत या चुम्बकीय क्षेत्रों का उपयोग किया जाता है विद्युत या चुम्बकीय क्षेत्र आवेशित कणों को त्वरित कर सकते हैं तथा इनके द्वारा कणों का फोकसन भी संभव होता है। यदि कण अनावेशित या उदासीन हैं जैसे अणु या परमाणु तो उनके पुंज प्राप्त करने के लिए उपर्युक्त विधि का उपयोग नहीं किया जा सकता। आणविक पुंज प्राप्त करने के लिए एक सरल विधि निःसरण (effusion) है। यदि किसी पात्र में साम्यावस्था में गैस स्थित है और उस पात्र की एक दीवार में सूक्ष्म छिद्र या रेखा छिद्र कर दिया जाये तो पात्र के बाहर गैस का दाब निरंतर पंपन द्वारा कम रखने पर गैस के कुछ अणु छिद्र से बाहर निकलेंगे और समान्तर छिद्र युक्त बाधिकाओं (baffles) का उपयोग कर समांतरित आणविक पुंज (collimated molecular beam) प्राप्त किया जा सकता है चित्र (5.4 – 1 ) । बाधिकाओं में छिद्रों का व्यास घट हुए क्रम में रखा जाता है। इसके अतिरिक्त बहुधा चांदी जैसे पदार्थों का आणविक पुंज प्राप्त करना होता है जो सामान्य ताप पर ठोस अवस्था में होते हैं अत: पात्र C का ताप इतना अधिक रखना पड़ता है कि पात्र में उच्च वाष्प दाब उत्पन्न हो और इसके लिये पात्र एक छोटी भट्टी के रूप में होता है।
में पात्र की दीवार में छिद्र इतना छोटा बनाया जाता है कि अणुओं के निष्कासन से पात्र में स्थित गैस की साम्यावस्था
नगण्य प्रभाव पड़े। यदि बाहर निकलने वाला अणु जितना समय छिद्र के निकट व्यतीत करता है, उस समय में वह अन्य अणुओं से संघट्ट न कर पाये तो उपर्युक्त अवस्था प्राप्त हो सकती है। यदि छिद्र का आकार D है, अणु का

माध्य मुक्त पथ है व अणु की माध्य चाल है तो D/c << l/c

D << l इस प्रकार दीवार में छिद्र की उपस्थिति से यदि गैस की साम्यावस्था विक्षुब्ध नहीं होती है तो छिद्र से प्रति एकांक समय प्रति एकांक क्षेत्रफल निष्कासित होने वाले अणुओं की कुल माध्य संख्या Jo वही होगी जो एकांक समय में एकांक क्षेत्रफल पर टकराने वाल अणुओं की होती है। सरल रूप में सन्निकटत
Jo = nc/6 ……..(1) जहाँ n प्रति एकांक आयतन अणुओं की संख्या है। यथार्थ परिकलन के अनुसार यह संख्या निम्न होती है : Jo =nc/4 ….(2) यदि हम केवल उन अणुओं पर विचार करें जिनकी चाल c व c + dc के मध्य है तो छिद्र के एकांक क्षेत्रफल से एकांक समय में निकलने वाले ऐसे अणुओं की संख्या होगी
छिद्र से बाहर निकलने वाले अणुओं का दिशा में भी वितरण होता है । छिद्र पर अभिलम्ब से θ कोण पर प्रति एकांक समय प्रति एकांक घन कोण अणुओं की संख्या cos θ के अनुक्रमानुपाती होती है अर्थात् लम्ब की दिशा में (θ = 0, पर) अधिकतम होती है तथा स्पर्शरेखीय दिशा में (θ = 90° पर) हासित होकर शून्य हो जाती है। यदि भट्टी अथवा पात्र C में गैस का ताप T है तो आदर्श गैस की परिकल्पना के अनुसार
इस प्रकार निःसरण दर अणुओं के द्रव्यमान पर निर्भर होती है। हल्के अणुओं की माध्य चाल भारी अणुओं के अपेक्षाकृत अधिक होती है अतः हल्के अणुओं का निःसरण सरलता से होता है। इस गुण का उपयोग समस्थानिकों (isotopes) का अलग-अलग करने में किया जा सकता है। यदि गैस के पात्र को सूक्ष्म छिद्रों से युक्त ढक्कन से बन्द किया जाय और पात्र के बाहर निर्वात् रखा जाय तो अनेक चरणों में निःसरण के पश्चात् पात्र में अधिक आणविक भार के समस्थानिक की आपेक्षिक सांद्रता अधिक हो जायेगी व पात्र के बाहर से पंपन द्वारा एकत्रित गैस में हल्के समस्थानिक की सांद्रता अधिक होगी। इस विधि से यूरेनियम के सरलता से विखण्डन योग्य समस्थानिक U235 को यूरेनियम, जिसमें U238 अधिक होता है, से पृथक किया जा सकता है। इसके लिये UF 6 (यूरेनियम हैक्साफ्लोराइड) जो सामान्य ताप पर गैसीय अवस्था में होती है उसका उपयोग किया जाता है।
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