दुष्क्रिया अर्थ क्या है | समाजशास्त्र में दुष्क्रिया किसे कहते है परिभाषा dysfunction in hindi meaning

By   December 29, 2020

dysfunction in hindi meaning दुष्क्रिया अर्थ क्या है | समाजशास्त्र में दुष्क्रिया किसे कहते है परिभाषा ?

प्रश्न : I) दुष्क्रिया क्या है? सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में उसके महत्व का वर्णन आठ पंक्तियों में कीजिए।

उत्तर : I) दुष्क्रिया एक घटना या क्रिया का परिणाम है जो एक समाज की प्रकार्यात्मकता, एकता एवं स्थायित्व पर विरोधी प्रभाव डालती है। सिद्धांत की इस प्रवृत्ति को कि एक समाज की प्रत्येक वस्तु सद्भाव तथा एकीकरण के लिए कार्य करती है, यह प्रत्यय रोकता है। सामाजिक दुष्क्रिया प्रणाली के एक भाग की, किसी प्रकार्यात्मक आवश्यकता की पूर्ति के लिए विशिष्ट अपर्याप्तता है।

शब्दावली
प्रतिमानहीनता: सर्वप्रथम, इस शब्द का प्रयोग एमिल दुर्खीम ने एक समाज में प्रमाणहीनता तथा व्यक्तियों में समाज के अभाव के संकेतक के रूप में किया था। ऐसी स्थिति में, एक व्यक्ति या समूह यह निर्णय नहीं ले पाता कि क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए।
दुष्क्रिया: किसी घटना या क्रिया के परिणाम जो एक समाज की प्रकार्यात्मकता, एकता तथा स्थायित्व पर विरोधी प्रभाव डालते हैं।

सत्याग्रह: अन्याय के प्रति शांतिपूर्ण एवं सत्यशील प्रतिरोध।

प्रतिमान: इस प्रत्यय का शाब्दिक अर्थ शब्द के स्वर परिवर्तन या भिन्न-भिन्न शब्दों के मध्य एक व्याकरणीय संबंध से है। सामाजिक विज्ञान में इसका प्रयोग थामस एस. क्यून ने 1962 में विचारों के लीक से हटने अथवा विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन के अर्थ में किया था।

सामूहिक चेतना: दुर्खीम ने इस प्रत्यय के, फ्रांसीसी प्रतिरूप ‘‘ला कांस्यन्स क्लेक्टीव‘‘ का प्रयोग सामान्य विश्वासों एवं समाज के स्वीकृत प्रमाणों जो सामाजिक एकात्मकता का संवर्धन करते हैं, के लिए किया था।

परकीयकरण: इसका अर्थ पृथक्करण, अजनबीपन अथवा विच्छिन्नता से है। इस अवधारणा का प्रयोग हीगेल ने किया था परंतु एक समाजशास्त्रीय प्रत्यय के रूप में इसे कार्ल माक्र्स ने विकसित किया।

पूँजीवाद: एक आर्थिक व्यवस्था जिसके तत्व उत्पादन के साधनों का वैयक्तिक स्वामित्व, प्रतिस्पर्धा, निर्बाध बाजार तथा लाभ की एक प्रबल अभिप्रेरणा है।

साम्यवाद: एक सामाजिक दर्शन के रूप में, आर्थिक सेवाओं तथा उत्पादन के भौतिक साधनों के सार्वजनिक स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करता है। इसका विश्वास राज्य द्वारा नियंत्रण तथा सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व में है।

विघटन: इस प्रत्यय का अर्थ सामाजिक व्यवस्था या उसकी क्रियाओं में विच्छेद से है।

सारांश
इस इकाई का विषय प्रवेश सामाजिक रूपांतरण तथा सामाजिक समस्याओं के पारस्परिक संबंध पर विचार से होता है। सामाजिक समस्याओं को समझने के लिए पूर्वकालीन तथा आधुनिक दृष्टिकोण तथा उनके बीच अंतर का वर्णन इस इकाई में किया गया है। आपने प्रकार्यवादी, माक्र्सवादी दृष्टिकोणों एवं गांधीवादी विचारों तथा उनकी अपर्याप्तता की जानकारी विस्तार से प्राप्त कर ली है। इसके उपरांत विकास तथा उसके द्वारा जनित समस्याओं की प्रतिमानों का भी वर्णन किया गया है। इस इकाई के अंतिम भाग में सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रदान करने में राज्य की क्रियाओं की परिसीमाओं पर हमने प्रकाश डाला है।

 

उद्देश्य
प्रथम इकाई में हमने सामाजिक रूपांतरण एवं समस्याओं की व्याख्या की। प्रथम इकाई को पढ़ने के बाद आपने इन दोनों संप्रत्ययों एवं इनके संबंध को समझ लिया होगा।

अब इकाई 2 में हम सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के विभिन्न दृष्टिकोण एवं विकास की प्रतिमानों की परिचर्चा कर रहे हैं। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:

ऽ सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के विभिन्न दृष्टिकोण समझ सकेंगे;
ऽ प्रकार्यवादी, माक्र्सवादी एवं गांधीवादी दृष्टिकोणों के मूल निरूपण की व्याख्या कर सकेंगे;
ऽ इन दृष्टिकोणों की अपर्याप्तता का परीक्षण कर सकेंगे;
ऽ सामाजिक-आर्थिक विकास के प्रकार्यात्मक पक्षों का अर्थ एवं वैकल्पिक दृष्टिकोणों की आवश्यकता समझ सकेंगे;
ऽ विकास की विभिन्न प्रतिमानों का वर्णन कर सकेंगे; तथा
ऽ राज्य की भूमिकाओं एवं राज्य के हस्तक्षेप को स्पष्ट कर सकेंगे।

 प्रस्तावना
रूपांतरण के प्रत्यय से आप इकाई 1 में परिचित हो चुके हैं। सभी समाजों में किसी न किसी रूप में मंद या तीव्र परिवर्तन होता है। उन समाजों में जहाँ रूपांतरण की प्रक्रिया मंद होती है, बदलती हुई दशाओं से समायोजन करने में कठिनाइयाँ कम होती हैं। कुल मिलाकर, सामाजिक रूपांतरण की मंद प्रक्रिया जनजातीय एवं कृषिक संरचनाओं में दिखाई देती है, जबकि नगरीय – औद्योगिक सामाजिक संरचना में, जिनके नगर, उच्च प्रौद्यागिकी, आधुनिक उत्पादन, उपभोक्तावाद, परिवहन एवं संचार के त्वरित साधन, प्रवासन, गतिशीलता, अनामता, द्वितीयक समूह एवं अवैयक्तिक संबंध विशेष लक्षण हैं, यह प्रक्रिया अधिक तीव्र होती है।

सामाजिक रूपांतरण के त्वरित होने से उत्पन्न तनाव और समाज की अपने संरचनात्मक ढाँचे को बदलती हुई दशाओं के अनुकूल पुनः ढालने की आंशिक अयोग्यता का होना भी या तो सामाजिक व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियों को सशक्त करता है या नए तनाव या समस्याएँ पैदा करता है।

नगरीकरण का उदाहरण लेकर इस बिंदु की व्याख्या की जा सकता है। नगरीकरण, एक प्रक्रिया के रूप में, सामाजिक रूपांतरण का एक महत्वपूर्ण सूचक है। साथ ही यह प्रक्रिया सामाजिक समस्याएँ जैसे निर्धनता, बेकारी, नगरों में अत्यधिक भीड़, आवास का अभाव, नगरीय सुविधाओं की कमी, अवैयक्तिक संबंध, गंदी बस्तियाँ तथा ऐसा पर्यावरण जो बाल अपराध, अपराध तथा समाज विरोधी क्रियाओं को जन्म देती है। एक सामाजिक प्राणी के रूप में मानव एक ओर त्वरित सामाजिक रूपांतरण का सामना करता है और दूसरी ओर सामाजिक रूपांतरण से जनित सामाजिक समस्याओं के उचित हल ढूँढने का सतत प्रयास करता है।

यह स्पष्ट है कि सामाजिक समस्याएँ समाजों को दुष्प्रभावित करती हैं तथा उनकी प्रकृति को समझने और उत्तर प्राप्त करने के लिए यह सार्थक होगा कि विभिन्न समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों की व्याख्या की जाए तो सामाजिक समस्याओं की प्रकृति एवं उनकी उत्पत्ति को समझने के क्रम में विकसित हुई हैं। इस बिंदु पर ध्यान रखना होगा कि समाज का संबंध सामान्य एवं असामान्य दोनों दशाओं से है। समाज सुखी परिवारों से उतना ही संबंधित है जितना कि दुखी या समस्याओं से ग्रसित परिवारों से। समाजशास्त्र का एक विद्यार्थी सामाजिक समस्याओं का अध्ययन इसलिए करता है ताकि वह असमान्य सामाजिक दशाओं को जो सामाजिक प्रकार्यात्मक पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, अच्छी तरह समझा सके। सामाजिक एवं वैयक्तिक समस्याओं में निकट संबंध है। वे समस्याएँ जिनकी प्रकृति का आभास वैयक्तिक है जैसे बीमारी, वैयक्तिक हिंसा, कुपोषण, आदि सामाजिक दशाओं से जुड़ी हुई हैं जो हजारों व्यक्तियों को, उसी प्रकार की जीवन स्थितियों में पीड़ित करती हैं।