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Categories: sociology

सहानुभूति और समानुभूति में अंतर क्या है , अर्थ क्या है Difference between sympathy and empathy in Hindi

Difference between sympathy and empathy in Hindi सहानुभूति और समानुभूति में अंतर क्या है , अर्थ क्या है किसे कहते है परिभाषा लिखिए ?

वस्तुनिष्ठता (Objectivity)

सिविल सेवा अर्थात् सार्वजनिक पद से जुड़े किसी लोक सेवक के संदर्भ में वस्तुनिष्ठता का अभिप्राय यह है कि लोक सेवक अपने मंत्रियों को ऐसी सूचना या सलाह दे अथवा स्वयं इस प्रकार से निर्णय ले जो प्रमाणिक हो तथा सही विकल्पों एवं तथ्यों पर आधारित हो अर्थात् मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिए जाएं न कि व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या फिर भावना या आदेश से वशीभूत होकर।

समानुभूति (Empathy)

समानुभूति का शाब्दिक अर्थ है समान अनुभूति। जैसा कि इस शब्द से ही स्पष्ट है, समानुभूति का अभिप्राय किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह स्वयं को दूसरों की जगह रखकर (अर्थात् स्वयं को दूसरों की परिस्थिति से जोड़कर) उसकी भावनाओं इच्छाओं, विचारों तथा कार्यकलापों को समझता है और महसूस करने की कोशिश करता है। समानुभूति तभी संभव है जब व्यक्ति में स्वयं अपनी भावनाओं और इच्छाओं को समझ पाने अथवा पहचान पाने की क्षमता हो अर्थात् एक व्यक्ति दूसरे के प्रति समानुभूति तभी प्रकट कर सकता है जब वह स्वयं अपनी भावनाओं को समझ पाने तथा उसे स्वीकार कर पाने में सफल हो। अन्यथा दूसरों के प्रति समानुभूति जताना संभव नहीं हो सकता।

समानुभूति की महत्ता (Significance of Empathy)

समानुभूति को एक सार्वभौम गुण के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह अन्य सद्गुणों जैसे-
प्रेम, दयालुता, करुणा, संवेदनशीलता, सहिष्णुता आदर तथा सहमति आदि से भी जुड़ा हुआ है। परन्तु समानुभूति को इस रूप में सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है कि यही वह सद्गुण है जो किसी व्यक्ति के नैतिक व चारित्रिक विकास का आधार है। समानुभूति को सामाजिक एकता व समरसता के लिए भी आवश्यक माना गया है। एक सामाजिक व्यक्ति होने के नाते यह जरूरी है कि हम सब अपने में इस सद्गुण को विकसित करें ताकि इस जटिल समाज में हमारा निर्वाह संभव हो सके।

सहानुभूति बनाम समानुभूति (Sympathy and Empathy)

सहानुभूति और समानुभूति दो अलग-अलग शब्द हैं जिनके अर्थ में भी कुछ स्पष्ट अंतर है। सहानुभूति एवं समानुभूति दोनों का ही संबंध महसूस करने से है। लेकिन जब हम किसी के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हैं तो इसका अर्थ यह है कि हम उसके लिए दुखी होते हैं या उस पर दया दिखलाते हैं, लेकिन वास्तविक रूप से हम यह नहीं समझ पाते कि जिसके लिए हम दुख प्रकट और दया प्रकट कर रहे हैं, वास्तव में वह व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है। अर्थात् हम उसकी वास्तविक मनोदशा को नहीं समझ पाते जिसके लिए हम सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं। समानुभूति में यह बात नहीं होती। समानुभूति स्थिति प्रदर्शित करने के दौरान हम स्वयं को दूसरी की स्थिति में सोचकर उसकी मनोदशा को महसूस करने की कोशिश करते हैं अर्थात् यह जानने का प्रयास करते हैं कि जिस व्यक्ति के प्रति हम समानुभूति प्रदर्शित कर रहे हैं वह वास्तव में कैसा महसूस कर रहा होगा। इस तरह हम उसकी मनोदशा को कुछ हद तक समझ पाते हैं।

सहिष्णुता (सहनशीलता) (Tolerance)

सहिष्णुता का अर्थ है अनुमोदन रखते हुए समरसता बनाए रखना। वस्तुतः जब हम किसी व्यक्ति, विचार, सिद्धान्त विश्वास या आदर्श के विषय में सहिष्णुता की बात करते हैं तो इससे हमारा तात्पर्य यही होता है कि हम उसे सहन कर रहे हैं। किसी भी वस्तु को सहन करने की इस क्रिया में यह तथ्य अनिवार्यतः निहित रहता है कि हम वास्तव में उसके प्रति अनुमोदन की भावना रखते हैं परन्तु उसके प्रति व्यक्ति की इस सहिष्णुता के अनेक कारण हो सकते हैं जिनमें उसकी विनम्रता, वैचारिक उदारता, दूसरों के लिए सम्मान की भावना, दमन अथवा शक्ति के प्रयोग की व्यर्थता, कुछ रियायतें देकर दूसरों के साथ समझौता करने की इच्छा आदि प्रमुख हैं। इनमें से कोई भी कारण मनुष्य में सहिष्णुता की भावना उत्पन्न कर सकता है। सहिष्णुता के उपर्युक्त अर्थ को कुछ उदाहरणों द्वारा भली-भांति समझा जा सकता है। बहुत से ईश्वरवादी व्यक्ति निरीश्वरवाद के तीव्र विरोधी होते हुए भी निरीश्वरवादियों के प्रति सहिष्णुता का दृष्टिकोण रखते हैं। इसी प्रकार यद्यपि अनेक व्यक्ति अन्य धर्मों अथवा संप्रदायों को पसंद नहीं करते, फिर भी व्यावहारिक जीवन में उनके प्रति सहिष्णु या सहनशील बने रहते हैं।

सहिष्णुता की महत्ता (Significance of Tolerance)

सहिष्णुता के महत्व व उसकी उपयोगिता को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि इसके द्वारा मानवाधिकार, बहुलवाद, लोकतंत्र, सामाजिक-समरसता तथा कानून के शासन को बनाए रखने
में मदद मिलती है। सहिष्णुता वस्तुतः हठधर्मिता, मतान्धता तथा सम्पूर्णतावाद जैसी भावनाओं का निषेध करती है तथा मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले सिद्धान्तों व तथ्यों में विश्वास प्रकट करती है। परन्तु इससे यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि सहिष्णुता का अर्थ सामाजिक अन्याय के प्रति सहनशील होना या फिर अपनी स्वयं की धारणा या विश्वास को त्याग देना है। वस्तुतः सहिष्णु होने का अभिप्राय इस तथ्य को स्वीकार करना है कि जिस प्रकार हमें अपने विचार या सिद्धान्त के प्रति लगाव एवं आस्था है वैसे ही दूसरों को भी अपने विचार या सिद्धान्त के प्रति आस्था रखने का अधिकार है। सहिष्णुता के द्वारा हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि समाज में विभिन्न, भाषा, धर्म, संस्कृति, मूल्य व प्रवृत्ति के लोगों को एक साथ समरसता पूर्वक जीने का अधिकार है ताकि शांति एवं सद्भाव कायम रहे। सहिष्णुता इस बात का भी संकेत है कि हमें अपने विचारों को दूसरों पर जबरन थोपना नहीं चाहिए।

करुणा एवं संवेदनशीलता (Compassion)

करुणा एवं दया काफी कुछ समानुभूति से साम्य रखता है परन्तु कुछ मायने में यह समानुभूति से एक कदम आगे है। सामान्यतः करुणा एवं दया का अर्थ है दूसरों के दुख एवं तकलीफ को महसूस कर उसके प्रति दया प्रदर्शित करना जैसा कि समानुभूति में होता है। परन्तु करुणा और संवेदनशीलता के दौरान हम न सिर्फ दूसरों की तकलीफ को समझते हैं बल्कि हमारी तीव्र इच्छा यह भी रहती है कि हम उस दुख तकलीफ से दूसरों को मुक्ति भी दिलाएं अथवा कम से कम इस दिशा में कुछ प्रयास अवश्य करें। अतः करुणा व संवेदनशीलता में समानुभूति का तत्व तो सम्मिलित रहता ही है परन्तु यह सिर्फ दया प्रकट करने तक सीमित नहीं रहता। करुणा व संवेदनशीलता में हम दूसरों के कष्ट के प्रति इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि हम उस कष्ट के निवारण के लिए कुछ करने को प्रेरित हो उठते हैं। विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों में करुणा (Compassion) को एक महान सद्गुण माना गया है और लगभग सभी धार्मिक सम्प्रदायों में इसे महानतम सद्गुणों में से एक के रूप में स्वीकार किया गया है। करुणा में निहित लक्षणों को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है-
ऽ करुणामय व्यक्ति में दूसरों को कष्ट से मुक्ति दिल की तीव्र इच्छा रहती है।
ऽ करुणामय व्यक्ति दूसरों की मदद इसलिए नहीं करता है क्योंकि ऐसा करना उसकी बाध्यता है, बल्कि ऐसा वह अपनी इच्छा से करता है।
ऽ करुणामय व्यक्ति दूसरों की तकलीफ को समझता है और महसूस करने की कोशिश करता है।
ऽ करुणामय व्यक्ति दूसरों के प्रति समानुभूति प्रदर्शित करता है।
ऽ करुणामय व्यक्ति अपनी दयालुता के बदले दूसरों से कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखता।
ऽ करुणामय व्यक्ति दूसरों की मदद इसलिए करता है क्योंकि वह यह समझता है कि शायद वे लोग उतने भाग्यशाली नहीं है जितना वह स्वयं है।

समानुभूति एवं करुणा (Empathy and Compassion)

समानुभूति करुणा का ही एक रूप है और इसकी महत्ता इसलिए है क्योंकि इसके बिना हम कभी यह महसूस नहीं कर सकते कि अन्य व्यक्ति किस मनोदशा में है। अगर हम ऐसा नहीं महसूस नहीं कर सकते तो फिर हम दूसरों के लिए फिक्रमंद भी नहीं हो सकते। जब हम स्वयं को दूसरों की वास्तविक स्थिति से जोड़कर देखते हैं तो हमें उस व्यक्ति की मदद करने की प्रेरणा मिलती है अगर वह कठिन परिस्थिति में है या फिर किसी प्रकार का दुख झेल रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम यह समझ पाते हैं कि अगर उस व्यक्ति की मदद नहीं की गई तो उसे भी वही परिणाम भुगतना पड़ सकता है जो हमें भुगतना पड़ा था। इसी वजह से हम खुद को रोक नहीं पाते बल्कि दुख झेल रहे व्यक्ति की मदद के लिए आतुर हो जाते हैं। अतः समानुभूति और करुणा में गहरा संबंध है परन्तु समानुभूति पहले की अवस्था है और करुणा बाद की अवस्था और करुणामय होने के लिए समानुभूति का होना अनिवार्य है क्योंकि तभी हम दूसरों की मदद के लिए कुछ करने को उद्यत हो पाएंगे।

राजनीतिक तटस्थता तथा आचार संहिता
राजनीतिक तटस्थता एवं प्रशासनिक कुशलता बनाए रखने के लिए तथा सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए सिविल सेवा आचरण कानून के तहत सरकार द्वारा सिविल सेवकों के लिए आचार संहिता बनायी गयी है। इस आचार संहिता के अंतर्गत निम्नलिखित बातें शामिल हैंः
ऽ भारत में किसी भी सरकारी लोक सेवक को किसी भी राजनीतिक संगठन का सदस्य होने तथा किसी भी राजनीतिक आंदोलन या कार्य में भाग लेने या उसके लिए चन्दा लेने या उसे किसी प्रकार की सहायता देने का निषेध किया गया है।
ऽ प्रत्येक सिविल सेवक का यह कत्र्तव्य होगा वे अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य ऐसे किसी भी प्रकार के व्यापार, बीमे अथवा किसी भी प्रकार की गतिविधि में संलिप्त होने से रोके जो सरकार द्वारा बनाए गए कानून के मुताबिक अवैध हो अथवा जिससे सरकार में किसी प्रकार की कुव्यवस्था फैलने का डर हो। पुनः प्रत्येक सिविल सेवक का यह भी कर्तव्य होगा कि यदि वे अपने परिवार के सदस्यों को ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि करने से रोक पाने में अक्षम हो तो वे इस बात की सूचना सरकार को यथाशीघ्र दें।
ऽ लोक सेवकों का यह कत्र्तव्य होगा कि किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने से बचें अर्थात् सरकारी कर्मचारी, संसद, विधानमंडल या स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में भी भाग नहीं ले सकते। इसके अलावा वे किसी भी राजनीतिक दल के लिए प्रचार अभियान में भी हिस्सा नहीं ले सकते।
ऽ प्रत्येक सिविल सेवक का यह कत्र्तव्य होगा कि वे सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना न करे और अपने कर्तव्य के अतिरिक्त प्रेस या रेडियो से कोई संपर्क न रखें। वे किसी प्रकार भी अधिकृत सूचना न दे और सरकार के किसी गोपनीय रहस्य को प्रकट न करे।
ऽ प्रत्येक सिविल सेवक ऐसे किसी चुनाव में मतदान कर सकते हैं जिसके लिए वे योग्य है परन्तु मतदान के क्रम में वे ऐसा कोई भी संकेत न दे जिससे यह पता चले कि उनका राजनीतिक रुझान क्या और क्यों है।
ऽ प्रत्येक सिविल सेवक का यह कत्र्तव्य होगा कि वे ऐसी कोई सूचना, रिपोर्ट या दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं करेंगे जिससे-
 समकालीन केन्द्र या राज्य सरकार की किसी भी समसामयिक नीति की आलोचना हो या फिर उसका गलत तरीके से विरोध हो।
 केन्द्र और राज्य सरकार के रिश्तों में कड़वाहट आए।
 केन्द्र सरकार तथा बाहर के किसी देश की सरकार के बीच रिश्तों में किसी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना बने।

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