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राज्यसभा और लोकसभा में क्या अंतर है बताइए ? difference between rajya sabha and lok sabha in hindi

difference between rajya sabha and lok sabha in hindi राज्यसभा और लोकसभा में क्या अंतर है बताइए ? राज्य सभा :  राज्य सभा, जैसाकि इसके नाम से पता चलता है, राज्यों की परिषद अथवा कौंसिल आफ स्टेट्स है । यह अप्रत्यक्ष रीति से लोगों का प्रतिनिधित्व करती है क्योंकि राज्य सभा के सदस्य राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा चुने जाते हैं। संघ के विभिन्न राज्यों को राज्य सभा में समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। भारत में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों की संख्या ज्यादातर उसकी जनसख्या पर निर्भर करती है । इस प्रकार, उत्तर प्रदेश के जबकि राज्य सभा में 34 सदस्य हैं, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा आदि जैसे अपेक्षतया छोटे राज्यों का केवल एक एक सदस्य है। अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, दादर तथा नागर हवेली, दमन तथा दीव और लक्षद्वीप जैसे कुछ संघ राज्य क्षेत्रों की जनसंख्या इतनी कम है कि राज्य सभा में उनका प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता । संविधान के अधीन राज्य सभा के 250 से अनधिक सदस्य हो सकते हैं। इनमें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्य तथा 238 राज्यों और संघ-राज्य क्षेत्रों द्वारा चुने सदस्य होते हैं। इस समय राज्य के 245 सदस्य हैं। दिखिए परिशिष्ट 1 और रेखाचित्र 4)
लोक सभा की निर्धारित कार्यावधि 5 वर्ष की है,पर वह राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय भंग की जा सकती है, इसके विपरीत राज्य सभा एक स्थायी निकाय है और उसे भंग नहीं किया जा सकता। राज्य सभा के प्रत्येक सदस्य की कार्यावधि छः वर्षों की है, उसके सदस्यों में से यथासंभव एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक द्वितीय वर्ष की समाप्ति पर निवृत्त हो जाते हैं। सदस्यों की पदावधि उस तिथि से आरंभ हो जाती है जब भारत सरकार द्वारा सदस्यों के नाम राजपत्र में अधिसूचित किए जाते हैं। उपराष्ट्रपति, जो संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किया जाता है, राज्य सभा का पदेन सभापति होता है, जबकि उपसभापति पद के लिए राज्य सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से किसी सदस्य को निर्वाचित किया जाता है।

लोक सभा : दूसरा सदन, लोक सभा, हाउस आफ द पीपुल है। इसे जनता द्वारा प्रत्यक्ष रीति से चुना जाता है। भारत का नागरिक, जो 18 वर्ष से अन्यून आयु का हो, लोक सभा के लिए निर्वाचनों में मतदान करने का हकदार होगा, यदि उसे कानून के अधीन अन्यथा अनर्ह न कर दिया जाए । संविधान में उपबंध है कि लोक सभा के 530 से अनधिक सदस्य राज्यों में प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष रीति से चुने जाएंगे और 20 से अनधिक सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेंगे, जिनका निर्वाचन ऐसी रीति से होगा जिसे संसद विधि द्वारा उपबंधित करे। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति, आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए दो से अनधिक सदस्य मनोनीत कर सकता है । इस प्रकार सदन की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो, ऐसी संविधान में परिकल्पना की गई है । निर्वाचित किए जाने वाले सदस्यों की कुल संख्या को राज्यों के बीच ऐसी रीति से वितरित किया जाता है जिससे कि प्रत्येक राज्य के लिए आवंटित स्थानों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच यथासंभव ऐसा अनुपात रहे जो सब राज्यों के लिए समान हो । इस प्रयोजन के लिए जनसंख्या का आशय है वह जनसंख्या जो 1971 की जनगणना द्वारा सुनिश्चित की गई है। सन् 2000 तक लोक सभा में स्थानों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होगा ख्अनुच्छेद 81 (3), लोक सभा में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए जनसंख्या-अनुपात के आधार पर स्थान आरक्षित हैं। आरंभ में यह आरक्षण दस वर्ष के लिए था किंतु हर बार इसे दस वर्ष के लिए बढ़ा दिया जाता था। नवीनतम संशोधन के अंतर्गत अब यह पचास वर्ष के लिए अर्थात सन् 2000 तक के लिए है । (देखिए परिशिष्ट 2 तथा रेखाचित्र 5)
लोक सभा की कार्यावधि निर्धारित है जैसाकि संयुक्त राज्य अमेरिका में लोगों द्वारा निर्वाचित हाउस आफ रिप्रेजेंटिब्ज की और यूनाइटेड किंगडम में हाउस आफ कामंस की है। प्रतिनिधिक लोकतंत्र का उद्देश्य यह है कि सरकार वैध रूप से सत्तारूढ़ रहने के लिए समय समय पर जनादेश प्राप्त करती रहे । भारत में सदन की कार्यावधि उसकी प्रथम बैठक के लिए नियत तिथि से पांच वर्षों की है। पांच वर्षों की अवधि समाप्त हो जाने पर सदन स्वतः भंग हो जाता है। कुछ परिस्थितियों में सदन की पूर्ण कार्यावधि समाप्त होने से पूर्व ही इसे भंग किया जा सकता है। जब आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो तब संसद लोक सभा की कार्यावधि ऐसी अवधि के लिए बढ़ा सकती है जो एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं हो और उद्घोषणा के प्रवृत्त न रहने के पश्चात किसी भी दशा में उसकी कार्यावधि छः माह से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती।
वस्तुतया हुआ यह है कि प्रथम लोक सभा से लेकर नवीं लोक सभा तक किसी भी सदन ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। प्रत्येक सदन का कुछ समय पूर्व ही विघटन होता रहा है । आपात काल में जब लोक सभा का कार्यकाल बढ़ा दिया गया था तब वह बढ़ा हुआ कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। दोनों सदनों की सापेक्ष भूमिका संसद के दोनों सदनों का, सिवाय वित्तीय और मंत्रिमंडल के उत्तरदायित्त्व के मामलों के जो पूर्णतया लोक सभा के अधिकार क्षेत्र में हैं, सभी क्षेत्रों में समान शक्तियां एवं दर्जा प्राप्त है। राज्य सभा की शक्तियां निम्न प्रकार सीमित हैंः
(1) कोई धन विधेयक राज्य सभा में पेश नहीं किया जा सकता।
(2) राज्य सभा किसी धन विधेयक को अस्वीकृत करने अथवा उसमें संशोधन करने की सिफारिश ही कर सकती है। यदि ऐसा विधेयक चैदह दिनों की अवधि के भीतर लोक सभा को लौटाया नहीं जाता तो उसे उक्त अवधि के समाप्त हो जाने पर लोक सभा द्वारा पास किए गए रूप में दोनों सदनों द्वारा पास किया गया माना जाता है।
(3) कोई विधेयक धन विधेयक है अथवा नहीं, इसका फैसला लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
(4) राज्य सभा वार्षिक वित्तीय विवरण पर विचार कर सकती है । इसे अनुदानों की मांगों को अस्वीकृत करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
(5) राज्य सभा को मंत्रिपरिषद में अविश्वास का प्रस्ताव पास करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
परंतु इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि लोक सभा की तुलना में राज्य सभा कम महत्व रखती है अथवा इसे द्वितीय स्थान दिया जाता है। धन विधेयकों को छोड़कर अन्य सब प्रकार के विधेयकों के मामले में राज्य सभा की शक्तियां लोक सभा के बराबर हैं। कोई भी गैर-वित्तीय विधेयक अधिनियम बनने से पूर्व दोनों में से प्रत्येक सदन द्वारा पास किया जाना आवश्यक है। राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने, उपराष्ट्रपति को हटाने, संविधान में संशोधन करने और उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने जैसे महत्वपूर्ण मामलों में राज्य सभा को लोक सभा के समान शक्तियां प्राप्त हैं। राष्ट्रपति के अध्यादेशों, आपात की उद्घोषणा और किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के विफल हो जाने की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखना अनिवार्य है। किसी धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक को छोड़कर अन्य किसी भी विधेयक पर दोनों सदनों के बीच असहमति को दोनों सदनों द्वारा संयुक्त बैठक में दूर किया जाता है जिसमें मामले बहुमत द्वारा तय किये जाते हैं। दोनों सदनों की ऐसी संयुक्त बैठक का पीठासीन अधिकारी लोक सभा का अध्यक्ष होता है।
इसके अतिरिक्त संविधान के अधीन राज्य सभा को कुछ विशेष शक्तियां सौंपी गई हैं। यह घोषणा करने की शक्ति केवल राज्य सभा को प्राप्त है कि संसद के लिए राज्य सूची में वर्णित किसी विषय के संबंध में विधान बनाना राष्ट्रीय हित में होगा । यदि राज्य सभा इस आशय का संकल्प दो-तिहाई बहुमत से पास कर देती है तो संघीय संसद “राज्य सूची‘‘ में वर्णित किसी विषय के संबंध में भी संपूर्ण देश के लिए अथवा देश के किसी भाग के लिए विधान बना सकती है। इसके अतिरिक्त यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प द्वारा घोषणा करती है कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो संविधान के अधीन संसद को, विधि द्वारा, संघ और राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन के लिए उपबंध करने की शक्ति प्राप्त है।

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