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अपोहन , विद्युत अपोहन , अतिसूक्ष्म निस्पंदन , कोलोडीयन , पेप्टन / पेप्टीकरण , अणुसंख्यक गुण , विद्युत कण संचालन
Dialysis in hindi , कोलोडीयन , पेप्टन / पेप्टीकरण , अणुसंख्यक गुण , विद्युत कण संचालन , अपोहन , विद्युत अपोहन , अतिसूक्ष्म निस्पंदन :-
ब्रेडिंग आर्क विधि / विद्युत विघटन विधि : इस विधि द्वारा Cu , Ag , Au , Pt आदि धातुओ के कोलाइडी विलयन बनाये जाते है।
एक आयताकार पात्र में धातु की दो छड़े लेकर उन्हें परिक्षेपण माध्यम में डुबो देते है , दोनों छड़ो को विद्युत स्रोत से जोड़ देते है। विद्युत धारा प्रवाहित करने पर धातु की छड़े अत्यधिक गर्म हो जाती है जिससे धातु वाष्प अवस्था में बदल जाती है। यह वाष्प परिक्षेपण माध्यम के सम्पर्क में आकर कोलाइडी आकार के कणों में बदल जाती है , सम्पूर्ण पात्र को हिम मिश्रण रख देते है।
पेप्टन / पेप्टीकरण : ताजा बने अवक्षेप में विद्युत अपघट्य की उचित मात्रा डालने पर कोलाइडी विलयन बनाने की क्रिया को पेप्टन कहते है। जिस पदार्थ द्वारा यह क्रिया की जाती है उसे पेप्टीकर्मक कहते है।
उदाहरण : Fe(OH)3 के ताजा अवक्षेप में FeCl3 मिलाने पर फेरिक हाइड्रोक्साइड का कोलाइडी विलयन बनता है।
व्याख्या : अवक्षेप Fe(OH)3 के कण अपनी सतह पर FeCl3 से प्राप्त Fe3+ आयनों को अधिशोषित कर लेते है जिससे प्रत्येक कण धनावेशित हो जाता है |
ये धनावेशित आयन एक दूसरे को प्रतिकर्षण करते है तथा परिक्षेपण माध्यम में फ़ैल जाते है जिससे कोलाइडी विलयन प्राप्त होता है |
Fe(OH)3 + Fe3+ = Fe(OH)3Fe3+
कोलाइडी विलयन का शोधन : कोलाइडी विलयन में विद्युत अपघट्य के आयनों की अशुद्धियाँ होती है | इन आयनों की अधिकता के कारण कोलाइडी कणों का स्कंदन हो जाता है अत: विद्युत अपघट्य के आयनों को हटाना जरुरी है | कोलाइडी विलयन का शोधन निम्न विधियों से किया जाता है –
- अपोहन: कोलाइडी विलयन में उपस्थित विद्युत अपघट्य की अशुद्धियो का जन्तु झिल्ली में से विसरित होना अपोहन कहलाता है |
जन्तु झिल्ली से बनी थैली (अपोहन) में अशुद्ध कोलाइडी विलयन भरकर उसे चित्रानुसार जल से भरे पात्र में लटका देते है |
विद्युत अपघट्य के आयनों का आकार छोटा होने के कारण वे जन्तु झिल्ली से बनी थैली में से बाहर निकल आते है जबकि कोलाइडी कणों का आकार बड़ा होने के कारण वे बाहर नहीं निकल पाते |
- विद्युत अपोहन: अपोहन की क्रिया में चार-पांच दिन लगते है , इस क्रिया की गति को बढाने के लिए जल से भरे पात्र में 2 इलेक्ट्रॉड लगाकर विद्युत धारा प्रवाहित करते है जिससे विद्युत अपघट्य के आयन विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर शीघ्रता से चले जाते है |
- अतिसूक्ष्म निस्पंदन: साधारण फ़िल्टर पात्र के छिद्रों का आकार बड़ा होता है , इसे कोलोडीयन में भिगोकर बाहर निकालकर सुखा लेते है | इससे छिद्रों का आकार छोटा हो जाता है | इन छिद्रों में से विद्युत अपघट्य के आयन तो बाहर निकल जाते है परन्तु कोलाइडी कण फ़िल्टर पत्र के ऊपर ही शेष रह जाते है |
प्रश्न : कोलोडीयन क्या है ?
उत्तर : ईथर तथा एल्कोहल के मिश्रण में 4% नाइट्रो सेल्युलोस के विलयन को कोलोडीयन कहते है |
कोलाइडी विलयन के गुण
- विषमांगी प्रकृति: कोलाइडी विलयन में दो प्रावस्थाएं होती है –
(ii) परिक्षेपण माध्यम
अत: कोलाइडी विलयन विषमांगी होते है |
- अणुसंख्यक गुण :वे गुण जो अणुओं की संख्या पर निर्भर करते है उन्हें अणुसंख्यक गुण कहते है |
वास्तविक विलयन में कणों की संख्या अधिक होती है अत: इन विलयनो के लिए अणुसंख्यक गुण के मान अधिक होते है |
कोलाइडी विलयन में कणों की संख्या कम होती है क्योंकि कोलाइडी कण कई परमाणु या अणुओं के झुण्ड के रूप में पाए जाते है अत: इन विलयनो के लिए अणुसंख्यक गुणों का मान कम होता है |
- रंग: कोलाइडी विलयन रंगीन होते है , इनका रंग प्रकिर्णित प्रकाश की तरंगदैधर्य पर निर्भर करता है | प्रकीर्णित प्रकाश की तरंग दैर्ध्य कणों के आकार पर निर्भर करती है | जैसे स्वर्ण सोल का रंग लाल होता है | जैसे जैसे कणों का आकार बढ़ता जाता है वैसे वैसे प्रकिर्णित प्रकाश की तरंग दैर्ध्य भी बदल जाती है जिससे स्वर्ण सोल का रंग बैंगनी , नीला अंत में स्वर्णिम हो जाता है |
- ब्राउनियन गति: कोलाइडी कण परिक्षेपण मध्य में zig-Zag गति करते है , इस गति को ब्राऊनियन गति कहते है |
व्याख्या : कोलाइडी कणों से परिक्षेपण माध्य के अणु लगातार टकराते रहते है जिससे यह कण परिणामी बल की दिशा में गति करता है | जब ये कोलाइडी कण किसी दूसरे कोलाइडी कण से टकराते है तो ये अपनी दिशा को परिवर्तित कर लेते है |
नोट : परिक्षेपण माध्य की श्यानता अधिक तथा कोलाइडी कणों का आकार बडा होने पर ब्राऊनियन गति कम हो जाती है |
- टिंडल प्रभाव: जब किसी कोलाइडी विलयन में प्रकाश पुंज गुजारा जाता है तो प्रकाश पुंज के लम्बवत देखने पर प्रकाश पुंज का पथ चमकीला दिखाई देता है इसे टिंडल प्रभाव कहते है तथा चमकीले पथ को टिंडल शंकु (कोन) कहते है |
उदाहरण : जब अन्दर कमरे में प्रकाश पुंज को गुजारा जाता है तो धुल के कण चमकते दिखाई देते है |
उदाहरण : सिनेमा होल में जब प्रोजेक्टर की सहायता से पर्दे पर प्रकाश डाला जाता है तो प्रकाश पुंज का पथ चमकीला दिखाई देता है |
व्याख्या : कोलाइडी कण प्रकाश को अवशोषित कर उसे चारो ओर प्रकिर्णित करते है जिससे वे चमकते हुए दिखाई देते है |
प्रश्न : वास्तविक विलयन टिंडल प्रभाव नहीं दर्शाते , क्यों ?
उत्तर : वास्तविक विलयन के कणों का आकार छोटा होता है , ये प्रकाश को अवशोषित तो कर लेते है परन्तु उसे चारों प्रकिर्णित नहीं कर पाते |
प्रश्न : टिंडल प्रभाव प्रदर्शित करने की दो आवश्यक शर्ते लिखो |
उत्तर : कोलाइडी कणों का व्यास प्रकाश की तरंगदैधर्य से अधिक कम नहीं होना चाहिए |
परिक्षिप्त प्रावस्था व परिक्षेपण माध्यम के अपवर्तनांक में अधिक अंतर होना चाहिए |
- आवेश: समस्त कोलाइडी कणों पर एक जैसा आवेश होता है | ये एक दुसरे को प्रतिकर्षित करते है तथा परिक्षेपण माध्यम में वितरित रहते है | कोलाइडी कणों पर आवेश निम्न दो कारणों से आता है -\
(i) विद्युत विघटन विधि में धातुएँ इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणावेशित सोल बनाती है |
(ii) अवक्षेप के कण उभयनिष्ठ आयनों को अपनी तरह पर अधिशोषित कर लेते है |
जैसे : 1. AgNO3 के विलयन बूंद बूंद करके KI का विलयन डालते है तो AgI के कण बनाते है ये कण परिक्षेपण माध्यम में उपस्थित Ag+ आयन को अपनी सतह पर अधिशोषित कर लेते है जिससे धनावेशित सोल बनता है |
AgI/Ag+
- जब KI के विलयन बूंद बूंद करके AgNO3का विलयन डालते है तो AgI के कण बनते है , ये कण परिक्षेपण माध्यम में उपस्थित I–आयन को अपनी सतह पर अधिशोषित कर लेते है जिससे ऋणावेशित सोल बनता है |
AgI/I–
नोट : अधिशोषित आयनों की परत स्थायी रूप से जुडी होती है , इसे स्थायी परत कहते है | इस परत के चारो ओर वितरित आवेशित आयनों की एक दुसरे परत होती है | इसे विसरित परत कहते है , दोनों परतों के मध्य उत्पन्न विभव को जिटा विभव है |
धनावेशित सोल व ऋणावेशित सोल :
| धनावेशित सोल | ऋण आवेशित सोल |
| 1. जल योजित ऑक्साइड उदाहरण : Fe2O3.xH2O Al2O3.xH2O Cr2O3.xH2O | धातु तथा धातु सल्फाइड उदाहरण : Cu , Ag , Au , Sb2S3 , As2S3 |
| 2. क्षारीय रंजक उदाहरण : मेथिलिन ब्लू TiO2 हीमोग्लोबिन | अम्लीय रंजक उदाहरण : इओसिन , कागोरेड , गोंद , स्टार्च , जिलेटिन मिटटी |
- विद्युत कण संचालन: जब किसी कोलाइडी विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो कोलाइडी कण अपने से विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर गति करते है इसे विद्युत कण संचलन कहते है |
आकार की कांच की नली लेकर उसमे As2S3 सोल (ऋणावेशित) लेकर उसमे Pt के दो इलेक्ट्रोड लेकर उसमे विद्युत धारा प्रवाहित करते है जिससे ऋण आवेशित कोलाइडी कण धन इलेक्ट्रोड की (एनोड) ओर गति करते है |
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