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देवनागरी लिपि किसे कहते हैं | वर्ण व्यवस्था | देवनागरी लिपि की उत्पत्ति और विकास , विशेषता , महत्व
devnagari lipi ka vikas in hindi , देवनागरी लिपि किसे कहते हैं | वर्ण व्यवस्था | देवनागरी लिपि की उत्पत्ति और विकास , विशेषता , महत्व ?
देवनागरी लिपि का उद्भव एवं विकास
भारत में लिपि का प्रचार कब हुआ और उसका मूल स्रोत कहाँ था, इसे लेकर विद्वानों में मतभेद है। अधिकांश यूरोपीय विद्वान् मानते रहे हैं कि लिपि का प्रयोग और विकास भारत की अपनी चीज नहीं है, साथ ही यहाँ लिपि का प्रयोग काफी बाद में हुआ है। किन्तु वास्तविकता इसके विपरीत है। हमारे यहाँ पाणिनि की अष्टाध्यायी में लिपि, लिपिकर आदि शब्द हैं, जिनसे यह स्पष्ट पता चल जाता है कि उनके समय तक (5 वीं सदी ईस्वी पूर्व ) लिखने का प्रचार अवश्य हो चुका था। इसके अतिरिक्त भाषा के व्याकरणिक विश्लेषण की जो हमारी समृद्ध परम्परा मिलती है, वह भी लेखन के बिना संभव नहीं । यों तो वैदिक साहित्य में भी लेखन के होने के आभास यत्र-तत्र मिलते हैं । ऐसी स्थिति में यह मानना पड़ेगा कि भारत में लेखन का ज्ञान और प्रयोग बहुत बाद का नहीं है जैसा कि विदेशी विद्वान मानते रहे हैं।
भारत में प्राचीन लिपियाँ दो मिलती हैं: ब्राह्मी और खरोष्ठी । इनमें खरोष्ठी तो विदेशी लिपि थी जिसका प्रचार पश्चिमोत्तर प्रदेश में था जो उर्दू लिपि की तरह से बायें लिखी जाती थी । यह लिपि बहुत वैज्ञानिक और पूर्ण लिपि न होकर कामचलाऊ लिपि थी ।
ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति विवादास्पद है ।
(1) वूलर तथा देवर आदि इसे विदेशी लिपि से निकली मानते हैं । उदाहरण के लिए वूलर ने यह दिखाने का यल किया है कि ब्राह्मी के बाइस अक्षर उत्तरी सेमेटिक लिपियों से लिये गये तथा शेष उन्हीं के आधार पर बना लिये गये । (2) एडवर्ड थॉमस आदि के अनुसार द्रविड़ों को इस लिपि का बनाने वाला कहा जाता है। (3) रामशास्त्री पूजा में प्रयुक्त सांकेतिक चिह्नों से इसका विकास मानते हैं । (4) कनिंघम आदि के अनुसार आर्यों ने किसी प्राचीन चित्र लिपि के आधार पर इस लिपि को बनाया । हमारी समझ में हड़प्पा मोहनजोदड़ो में प्राप्त लिपि से इसका विकास हुआ है। ब्राह्मी लिपि के सम्बन्ध में ऊपर पाँच मत दिये गये हैं । ऐसी स्थिति में ब्राह्मी की उत्पत्ति का प्रश्न विवादास्पद ही माना जायगा ! भारत की प्राचीन लिपि ब्राह्मी का प्रयोग पाँचवीं सदी ईसवी पूर्व से लेकर लगभग तीन सौ पचास ईसवी तक होता रहा । इसके बाद इसकी दो शैलियों का विकास हुआ । (1) उत्तरी शैली (2) दक्षिणी शैली । उत्तरी शैली से चैथी सदी में ‘गुप्त लिपि‘ का विकास हुआ, जो पाँचवीं सदी तक प्रयुक्त होती रही । गुप्त लिपि से छठवीं सदी में श्कुटिल लिपिश् विकसित हुई जो आठवीं सदी तक प्रयुक्त होती रही । इस ‘कुटिल लिपि‘ से ही नवीं सदी के लगभग लिपि के प्राचीन रूप का विकास हुआ जिसे प्राचीन नागरी लिपि कहते हैं। प्राचीन नागरी का क्षेत्र उत्तर भारत है किन्तु दक्षिण भारत के कुछ भागों में भी यह मिलती है । दक्षिण भारत में इसका नाम श्नागरीश् न होकर नन्दिनागरी है। प्राचीन नागरी से ही आधुनिक नागरी गुजराती, महाजनी, राजस्थानी, कैथी, मैथिली, असमिया, बैंगला आदि लिपियाँ विकसित हुई हैं। कुछ विद्वान् कुटिल लिपि से भी प्राचीन नागरी तथा शारदा के अतिरिक्त एक और प्राचीन लिपि का विकास मानते हैं जिससे आगे चलकर असमिया, बँगला, मनीपुरी आदि पूर्वी अंचल की लिपियाँ विकसित हुई। प्राचीन नागरी से पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं सदी में आधुनिक नागरी लिपि विकसित हुई।
‘नागरी नाम‘
‘नागरी‘ नाम- कैसे पड़ा, इस बात को लेकर विवाद है । कतिपय मत ये हैं: (1) गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा विशेष रूप से प्रयुक्त होने के कारण यह श्नागरीश् कहलाई । (2) प्रमुख रूप से नगरों में प्रचलित होने के कारण इसका नाम नागरी पड़ा । (3) कुछ लोगों के अनुसार ललित विस्तार में उल्लिखित नागलिपि ही ‘नागरी‘ है, अर्थात् श्नागश् से नागर का सम्बन्ध है । (4) तांत्रिक चिह्न देव नागर से साम्य के कारण इसे देवनागरी और फिर संक्षेप में ‘नागरी‘ कहा गया । (5) देवनागर अर्थात काशी में प्रचार के कारण यह देवनागरी कहलाई तथा नागरी उसी का संक्षेप है । (6) एक अन्य मत के अनुसार मध्ययुग में स्थापत्य की एक शैली ‘नागर‘ थी जिसमें चतुर्भुजी आकृतियाँ होती थीं। दो अन्य शैलियाँ ‘द्रविड़‘ (अष्टभुजी या सप्तभुजी तथा बेसर) (वृत्ताकार) थीं । नागरी लिपि में चतुर्भुज अक्षरों (प म भ ग) के कारण इसे नागरी कहा गया । उपर्युक्त मतों में कोई भी बहुत प्रामाणिक नही है । अतः ‘नागरी‘ नाम की व्युत्पत्ति का प्रश्न अभी तक अनिर्णीत है।
नागरी का विकास
नवीं सदी से अब तक के नागरी लिपि के विकास पर अभी तक कोई भी विस्तृत कार्य प्रका. में नहीं आया।
नागरी लिपि के इस लगभग एक हजार वर्षों के जीवन में यों तो प्रायः सभी अक्षरों में न्यूनाधि रूप में परिवर्तन हुए हैं किन्तु इन परिवर्तनों के अतिरिक्त भी कुछ उल्लेखनीय बातें नागरी लिपि आई हैं: (क) सबसे महत्वपूर्ण बात है फारसी लिपि का प्रभाव । नागरी में नुकते या बिन्दु का प्रयो फारसी लिपि का ही प्रभाव है । फारसी लिपि मूलतः बिन्दुप्रधान लिपि कही जा सकती है क्योंकि उस अनेक वर्ण चिह्न (जैसे-बे-ऐ-ते-से, रे-जे-झे, दाल-जाल, तोय-जोय, स्वाद-ज्वाद, ऐन-गैन सीन-शीन) बिन्दु के कारण ही अलग-अलग हैं। नागरी लिपि में ऐसा कोई अन्तर प्रायः नहीं रहा है हाँ फारसी से प्रभाव ग्रहण करके कुछ परम्परागत तथा नवागत ध्वनियों के लिए नागरी में भी नुक का प्रयोग होने लगा है । जैसे ड-ड़, ढ-ढ़, क-क़, ख-ख़, ग-ग़, ज-ज़, फ-फ़। यही नहीं, मध्यर में कुछ लोग य-प दोनों को य जैसा तथा व ब को व लिखने लगे थे। इस भ्रम से बचने के लिए के लिपि में तो नियमित रूप से तथा कभी-कभी नागरी लिपि में भी य और व के लिए व का प्रयोग हो रहा है (ख) नागरी लिपि पर कुछ प्रभाव मराठी लिपि का भी पड़ा है। पुराने अ, ल आदि के स्थान पर अ-ल, या अि, अी, अ आदि रूप में सभी स्वरों के लिए अ का ही कुछ लोगों द्वारा प्रयोग वस्तु मराठी का प्रभाव है । (ग) कुछ लोग नागरी लिपि को शिरोरेखा के बिना ही लिखते हैं । यह गुजरात लिपि का प्रभाव है । गुजराती शिरोरेखा विहीन लिपि है । (घ) अंग्रेजी के पूर्ण प्रचार के बाद आफिस कॉलिज जैसे शब्दों में अँ को स्पष्टतः लिखने के लिए नागरी लिपि में ऑ का प्रयोग होने लगा है इसका चंद्राकार अंश तो कदाचित् पुराने चन्द्रबिन्दु से गृहीत है किन्तु यह प्रयोग अंग्रेजी प्रभाव से आ है । (ङ) नागरी- लेखन में पहले मुख्यतः केवल एक पाई या दो पाइयों या कभी-कभी वृत्त का विराम के रूप में प्रयोग करते थे। इधर अंग्रेजी विराम चिह्नों ने हमें प्रभावित किया है और पूर्ण विरामय छोड़कर सभी चिह्न हमने अंग्रेजी से लिये हैं। यों कुछ लोग तो पूर्ण विराम के स्थान पर भी पाई देकर अंग्रेजी की तरह बिन्दु का ही प्रयोग करते हैं । (च) उच्चारण के प्रति सतर्कता के कारण कभी-कभी हस्व ए हस्व ओ के द्योतन के लिए अब एँ, ऑ का प्रयोग भी होने लगा है । इस प्रकार फारसी, मराठी, गजराती, अंग्रेजी तथा ध्वनियों के ज्ञान ने भी नागरी लिपि को प्रभावित किया, फलतः न्यूनाधिक रूप में परिवर्तित और विकसित किया है।
अतः हम कह सकते हैं कि आधुनिक देवनागरी लिपि का विकास बारहवीं शताब्दी के निकट प्राचीन नागरी लिपि से हुआ । इस लिपि का प्रयोग हिन्दी के अतिरिक्त आधुनिक मराठी तथा नेपाली के लिये भी होता है । प्राचीन भाषाओं संस्कृत, पालि, प्राकृत के लिये भी इसी लिपि का प्रयोग होता था । देवनागरी लिपि आज स्वतंत्र भारत की राष्ट्र लिपि है।
देवनागरी लिपि के गुण-दोष
देवनागरी लिपि संसार की श्रेष्ठ लिपियों में से एक है। यह एक ध्वन्यात्मक लिपि है, जिसमें अक्षरात्मक एवं वर्णात्मक लिपियों की विशेषताएँ पायी जाती हैं । इसके गुण निम्न प्रकार हैंः
1. यह एक व्यवस्थित ढंग से निर्मित लिपि है।
2. इसमें ध्वनि प्रतीकों का क्रम वैज्ञानिक है। उनका अस्तित्व स्पष्ट और पूर्णतः विश्लेषणात्मक है।
3. अल्पप्राण एवं महाप्राण ध्वनियों के लिए अलग-अलग लिपि चिह्न हैं: यथा-क, ख।
4. स्वरों में इस्व और दीर्घ के लिए अलग-अलग चिह्न हैं तथा स्वरों की मात्राएँ निश्चित है।
5. प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग-अलग चिह्न हैं।
6. एक ध्वनि के लिए एक ही चिह्न है जबकि रोमन लिपि में एक ध्वनि के लिए एक से अधिक चिह्न प्रयुक्त होते हैं जैसे-क सूचक ध्वनि के लिए ज्ञ..ज्ञपजम काइट तथा ब्.ब्ंज ‘कैट‘ । इसी प्रकार इसमें एक ही लिपि चिन से दो ध्वनियाँ भी अंकित नहीं की जाती हैं । जैसे-न् से अ और उ–ठनज तथा च्नज.
7. एक लिपि चिन से सदैव एक ही ध्वनि की अभिव्यक्ति होती है जबकि रोमन लिपि में एक लिपि चिन से अधिक ध्वनियों की अभिव्यक्ति होती है। जैसे-ब् से क एवं स ध्वनियों का बोध होता है-ब्ंज कैट, ब्मदज सेन्ट ।
8. इसमें केवल उच्चरित ध्वनियाँ ही अंकित की जाती हैं। जबकि रोमन लिपि में अनुच्चरित ध्वनियों के लिए भी लिपि चिह्न है जैसे-ॅंसा में श्लश् का उच्चारण नहीं है किन्तु स् का प्रयोग है।
9. उर्दू लिपि में ‘स‘ ध्वनि के लिए तीन लिपि चिह्न हैं। ‘से‘, ‘स्वाद‘ तथा सीन । इसी प्रकार ज़ के लिए ‘जे़‘, ज़ाल, ज़ोय तथा ज्वाद अर्थात चार, या यदि ‘झे को भी मिला दें तो पाँच लिपि चिह्न हैं, त और ‘ह‘ के लिए भी दो (ते, तोय) दो (बड़ी हे, छोटी हे) हैं। यों मूल अरवी में इन सबका स्वतंत्र उच्चारण था किन्तु उर्दू में आकर वहाँ की वैज्ञानिकता अवैज्ञानिकता में परिवर्तित हो गयी है। इसी प्रसंग में अलिफ ‘अ‘ को भी व्यक्त करता है आ को भी, कभी-कभी इ (बिल्कुल उर्दू में बाल्कुल लिखते हैं) को भी। इसी प्रकार श्वावश् व, ऊ, ओ, औ को तथा ये ई, य, ए, ऐ आदि को। इसका परिणाम यह हुआ है कि कभी-कभी उर्दू पढ़ना टेढ़ी खीर हो जाता है । उर्दू लिपि के सम्बन्ध में इस प्रकार न पढ़े जाने या कुछ का कुछ पढ़े जाने के अनेक चुटकुले मशहूर हैं, जैसे-आलू ‘बुखारे दो तोले‘ किसी हकीम ने दवा के लिए लिखे तो दुकानदार ने उसे ‘उल्लू विचारे दो बोले‘ पढ़ लिया । इसी प्रकार ‘अब्बा अजमेर गये‘ को अब्बा आज मर गये या कोड़े को कूड़े आदि ।
10. सुपाठ्यता किसी भी लिपि के लिए अनिवार्य गुण है । इस दृष्टि से देवनागरी लिपि बहुत वैज्ञानिक लिपि है । रोमन की तरह इसमें डंस मल को माल, मैल या ।हींद को अघन, अगहन पढ़ने की परेशानी उठाने की संभावना ही नहीं है । उर्दू में भी जूता को जोता, जौता आदि कई रूपों में पढ़ने की गलती प्रायः हो जाती है किन्तु देवनागरी लिपि में यह अवैज्ञानिकता नहीं है ।
इस प्रकार अनेक दृष्टियों से देवनागरी लिपि काफी वैज्ञानिक भी है।
देवनागरी लिपि के दोष
देवनागरी लिपि में जहाँ अनेक गुण हैं, वहीं वैज्ञानिकता, त्वरालेखन, मुद्रण, टंकण आदि की दृष्टि से इसमें कुछ दोष अथवा त्रुटियाँ भी हैं जो निम्न प्रकार हैं-
1.नागरी लिपि की लिखावट जटिल है, क्योंकि स्वरों की कुछ मात्राएँ नीचे लगती हैं और कुछ ऊपर । इसके अतिरिक्त ‘रेफ‘ का विधान भी कठिनाई उत्पन्न करता है।
2. लिपि चिह्नों में अनेकरूपता है । जैसे-अः अ, णः ण, झः झ, लः ल आदि ।
3. कुछ चिह्नों के रूप, समान होने के कारण भ्रम उत्पन्न करते हैं जैसे-ख, र व अर्थात ख पढ़ते समय र, व भी प्रतीत होता है ।
4. पूर्ण रूप से वर्णनात्मक न होने के कारण इसके वैज्ञानिक विश्लेषण में कठिनाई उत्पन्न होती है । अर्द्ध अक्षरात्मक लिपि होने के कारण इसकी ध्वनियों का पूर्ण विश्लेषण नहीं हो पाता । जैसे-काम में क्, आ, म्, अ चार ध्वनियाँ हैं, किन्तु दो या तीन लिखी गयी हैं।
5.कुछ ऐसे चिह्नों का प्रयोग होता है, जिनसे सम्बन्धित ध्वनियाँ हिन्दी में नहीं हैं जैसे-ऋ, ऋ ष आदि ।
6. ‘र‘ के अनेक रूप प्राप्त होते हैं जैसे-राम, प्रकाश, राष्ट्र, कृष्ण, धर्म आदि जो अनावश्यक हैं।
7. ‘इ‘ स्वर की मात्रा व्यंजन से पूर्व लगाई जाती है जबकि इसका उच्चारण बाद में होता है।
8. संयुक्त अक्षरों की बनावट प्रम उत्पन्न करती है। जैसे-धर्मी में ‘र‘ का उच्चारण ‘म‘ से पूर्व होता है किन्तु लिखा ‘म‘ के बाद जाता है।
9. उच्चारण की दृष्टि से स्वरों की मात्राएँ व्यंजनों के पीछे लगनी चाहिए पर ये व्यंजनों के आगे, पीछे, ऊपर, नीचे लगती हैं।
10. वर्गों की अधिकता एवं मात्रा-विधान की जटिलता के कारण शीघ्र लेखन, मुद्रण, टंकण इत्यादि में विशेष कठिनाई होती है।
देवनागरी लिपि में सुधार
देवनामरी लिपि की त्रुटियों को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि देवनागरी लिपि में सुधार की आवश्यकता है । यों तो सुधार की दिशा के कई व्यक्तिगत, संस्थागत एवं प्रशासकीय प्रयत्न हुये हैं।
(1) व्यक्तिगत प्रयत्न
मुख्यतः चार व्यक्तियों ने इस दिशा में विशेष प्रयत्न किया । सर्वप्रथम सम्भवतः डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी ने नागरी लिपि की त्रुटियों का उद्घाटन किया तथा रोमन लिपि में देवनागरी वर्गों को लिखने का सुझाव दिया जो स्वीकृत नहीं किया जा सका । क्योंकि इसे स्वीकार करने से प्राचीन साहित्य से सम्बन्ध टूट जाएगा । जन सामान्य को सीखने में असुविधा होगी तथा अगली पीढ़ी को दो लिपियाँ सीखनी पड़ेंगी। साथ ही रोमन लिपि में भी सुधार करने पड़ेंगे।
श्रीनिवास जी ने महाप्राण श्हश् (ी) के लिए एक चिस्न (ब) के प्रयोग का सुझाव दिया । जैसे क से कृ=(ख) ग से गृ= (घ) आदि । इस सुझाव से भी देवनागरी लिपि में आमूल चूल परिवर्तन करना था अतः स्वीकार नहीं किया जा सका।
डॉ० गोरख प्रसाद ने मात्राओं को शब्दों में दाहिनी ओर लिखने तथा शिरोरेखा को हटाने का सुझाव दिया। इससे छपाई में तो सुविधा अवश्य होती परन्तु लिपि की कलात्मकता नष्ट होती थी साथ ही कुछ अक्षरों में समानता होने के कारण उन्हें पढ़ने में कठिनाई होती थी।
सावरकर बन्धुओं ने ‘अ‘ की बारह खड़ी को उपयोग में लाने का सुझाव दिया किन्तु यह भी स्वीकार नहीं किया जा सका ।
(2) संस्थागत प्रयत्न
ऐसे प्रयत्नों में तीन संस्थाओं के प्रयत्न विशेष रूप से उल्लेखनीय हैंः
(क) हिन्दी में साहित्य सम्मेलन प्रयाग ।
(ख) राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा ।
(ग) नागरी प्रचारिणी सभा काशी ।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से 1935 में महात्मा गांधी के सभापतित्व तथा काका कालेलकर के संयोजकत्व में जो सभा हुई उसके सुझाव थे-शिरोरेखा विहीन, मात्राओं का पंक्ति में पृथक लगाना जैसे-(देवता, आला), संयुक्ताक्षरों को उच्चारण क्रम में लिखना (परदेश को प्रदेश) अ की बारह खड़ी अ, आ, अि, जी, अ. सू आदि ।) पूर्ण अनुस्वर के लिए ‘ ° ‘ और अनुनासिकता के लिए बिन्दी ( ं ) का प्रयोग । किन्तु विद्वानों के पूर्ण सहयोग के अभाव में यह प्रयत्न भी असफल रहा। तत्पश्चात् इस समिति ने श्रीनिवास के ही उक्त सुझावों को स्वीकार किया।
इसी प्रकार राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा ने भी हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा प्रस्तावित सुझावों की पुष्टि ही नहीं की अपितु उसका प्रचार भी किया ।
(3) प्रशासकीय प्रयत्न
प्रशासकीय प्रयत्न तीन हैं.–‘‘हिन्दुस्तानी शीघ्र लिपि तथा लेखन पन्त समिति’’, उत्तर प्रदेश सरकार का प्रयत्न तथा आचार्य नरेन्द्रदेव समिति का प्रयत्न ।
इन तीनों में ठोस रूप से दिये गये प्रयत्न केवल नरेन्द्रदेव समिति के थे। इस समिति ने लिपि को जटिल, विकृत तथा अवैज्ञानिक रूप प्रदान करनेवाले सुझावों-अ की बारह खड़ी, शिरोरेखा विहीनता को अमान्य कर दिया तथा निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकार किये गयेः
(1) मात्राओं को पंक्ति में पृथक् लगाना (प्रदेश)
(2) अनुस्वार के लिए शून्य ‘ ° ‘ तथा अनुनासिकता के लिए ‘ ं ‘ (हंस, हंसना) ।
(3) संयुक्त रूप में वर्णों की खड़ी पाई को हटा देना । क फ के अतिरिक्त सबको हलन्त रूप
में लिखना (विद्वान)
(4) अ की जगह अ, ध की जगह घ, अ की जगह अ, क्ष की जगह श्क्षश् और त्र की जगह त्र का प्रयोग । तथा
(5) विशेष अक्षर के रूप में ‘ल‘ को स्वीकार किया गया ।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इनमें से कुछ सुधारों को स्वीकार कर अपनी पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से प्रचार करना चाहा परन्तु बहुत कुछ जनता द्वारा नहीं हुआ । अभी तक प्रायः प्राचीन रूप ही प्रचलित है।
इस प्रकार से हम देखते हैं कि देवनागरी लिपि वैज्ञानिक तथा अनेक गुणों से परिपूर्ण है परन्तु साथ में उसमें कुछ दोष भी हैं।
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