आजादी के बाद भारतीय विज्ञान का सारांश लिखिए , development of science and technology in india after independence in hindi

development of science and technology in india after independence in hindi आजादी के बाद भारतीय विज्ञान का सारांश लिखिए ?

स्वातंत्र्योत्तर काल में विज्ञान उन्नयन
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के कुछ दशकों के भीतर, वृहद् औपनिवेशिक साम्राज्य बिखर गए और भारत 1947 में स्वतंत्र हो गया। सिंधु घाटी सभ्यता काल से विरासत में प्राप्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सुदृढ़ परम्परा में मध्यकाल में तुर्कों तथा मुगलों एवं आधुनिक काल में अंग्रेजों के शासनकाल में जो गतिहीनता आ गई थी, उसे दूर करते हुए स्वातंत्र्योत्तर भारत में नीतियों एवं योजनाओं के सुचारू क्रियान्वयन के द्वारा फिर से जीवंत बनाया गया और उसे विकास के पथ पर अग्रसारित किया गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय इतिहास तथा तत्कालीन विश्व-व्यवस्था का गहन अध्ययन किया और उन्होंने अनुभव किया कि स्वतंत्र भारत के सर्वांगीण विकास के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास को प्राथमिकता प्रदान करना आवश्यक है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के आर्थिक तथा सामाजिक विकास मंें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के महत्व को भली-भांति समझते थे और अपनी इस समझ को उन्होंने हर संभव कार्य-रूप देने की कोशिश की। उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से विज्ञान संबंधी योजना के कार्यान्वयन के लिए 1958 में संसद में ‘वैज्ञानिक नीति’ का वक्तव्य रखा और, 1983 में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ‘प्रौद्योगिकी नीति’ की घोषणा की। फिर, 1958 की विज्ञान नीति और 1983 की प्रौद्योगिकी नीति के अनुरूप ही 1993 में ‘नई प्रौद्योगिकी नीति’ की घोषणा की गई। समय-समय पर घोषित नीतियों एवं विचार-विमर्श के उपरान्त निर्मित ठोस योजनाओं के कारण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का संतोषप्रद विकास संभव हो सका है और विकासमान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ने अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी विकास का सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। इस संदर्भ में बौद्धिक-सम्पदा नीति भी विशिष्ट तौर पर ध्यातव्य है।
राष्ट्रीय विज्ञान नीति
भारत विश्व का पहला ऐसा राष्ट्र है, जिसने वैज्ञानिक अनुसंधानों के संगठन एवं निर्देशन हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मंत्रालय की स्थापना 1951 में ही कर दी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न क्षेत्रों में उत्साहपूर्वक कार्य शुरू किया गया था, इस मंत्रालय द्वारा किए गए कार्यों को अभूतपूर्व सफलता मिली क्यांेकि वैज्ञानिकों एवं प्रौद्योगिकीविदों ने अपने प्रतिनिधित्व द्वारा इस मंत्रालय के कार्यों में सक्रिय सहयोग दिया था। मंत्रालय ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास एवं समर्थन का भार अपने ऊपर ले लिया।
यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1951 से लागू की गई विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के नियोजन तथा विकास को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है, तथापि सरकार द्वारा समय-समय पर घोषित की जागे वाली विज्ञान नीति का अपना विशिष्ट स्थान है।
विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष नीति-2013ः जैसाकि विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष (एसटीआई) वैश्विक रूप से राष्ट्रीय विकास के एक मुख्य चालक के रूप में उदित हुए हैं, हमें इन राष्ट्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु एक स्पष्ट भूमिका निभाने की जरूरत है। राष्ट्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष उद्यम को राष्ट्रीय विकास के केंद्र में होना चाहिए।
वैज्ञानिक अनुसंधान ने धन का प्रयोग ज्ञान के सृजन में किया और, समाधान प्रदायन द्वारा, नवोन्मेषों ने ज्ञान को संपत्ति एवं मूल्य में परिवर्तित कर दिया। इस प्रकार नवोन्मेष में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित समाधान निहित होते हैं जिन्हें अर्थव्यवस्था या समाज में सफलतापूर्वक लागू किया जाता है।
भारत ने 2010-2020 को ‘नवोन्मेष दशक’ के तौर पर घोषित किया है। सरकार ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष को बढ़ावा देने के लिए नीति पर बल दिया और एक राष्ट्रीय नवोन्मेष परिषद (एनआईसी) की भी स्थापना की। एसटीआई नीति-2013 लक्षित उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक होगी और यह भारतीय परिदृश्य में नवोन्मेष के वातावरण को स्थापित करेगी।
विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष नीति के मुख्य तत्व हैं
ऽ समाज के सभी वर्गें के मध्य वैज्ञानिक स्वभाव के विस्तार को बढ़ावा देना।
ऽ सभी सामाजिक संस्तरों से युवाओं के बीच विज्ञान के अनुप्रयोग हेतु कौशल संवर्द्धन करना।
ऽ कुशाग्र एवं बौद्धिक लोगों के लिए विज्ञान, अनुसंधान एवं नवोन्मेष में भविष्य बनाने हेतु पर्याप्त आकर्षक प्रयास करना।
ऽ विज्ञान के कुछ चुनिंदा अग्रणी क्षेत्रों में वैश्विक नेतृत्व हासिल करने के लिए अनुसंधान एवं विकास एवं विश्व स्तरीय अवसंरचनात्मक ढांचा स्थापित करना।
ऽ वर्ष 2020 तक भारत को विश्व की पांच शीर्ष वैज्ञानिक शक्तियों के बीच पदस्थापित करना।
ऽ विज्ञान, अनुसंधान एवं नवोन्मेष तंत्र के योगदान को समावेशी आर्थिक संवृद्धि एजेंडा से जोड़ना और उत्कृष्टता एवं प्रासंगिकता की अधिमान्यताओं से युग्मित करना।
ऽ अनुसंधान एवं विकास में गिजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाने के लिए माहौल का सृजन करना।
ऽ सफल प्रतिमानों की यहां पर प्रतिकृति लगाकर एवं साथ ही साथ नवीन लोक-गिजी सहभागिता (पीपीपी) संस्तरों की स्थापना द्वारा अनुसंधान एवं विकास परिणामों को सामाजिक एवं व्यावसायिक अनुप्रयोगों में परिवर्तित करने के समर्थ बनाना।
ऽ नवीन तंत्र के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित उच्च जोखिम नवोन्मेषों का बीजारोपण करना।
ऽ तकनीकी एवं आकार प्रभुत्व से परे संसाधन- अवशोषण, लागतपरक नवोन्मेषों से जुड़े रहना।
ऽ एक आक्रामक राष्ट्रीय नवोन्मेष तंत्र का सृजन करना।
नीति की महत्वाकांक्षाओं को वास्तविक रूप देने के लिए कुछ खास तंत्र को अपनाने की आवश्यकता है। इसमें समाज के सभी वर्गें के बीच वैज्ञानिक स्वभाव के प्रसार एवं प्रोत्साहन और सभी सामाजिक संस्तरों से युवाओं के बीच विज्ञान के अनुप्रयोग संबंधी कौशल में वृद्धि करना शामिल है। विज्ञान,शोध एवं नवोन्मेष में युवा प्रतिभा को भविष्य बनाने के लिए आकर्षित करने के प्रयास किए जागे चाहिए। उचित विज्ञान-प्रौद्योगिकी-नवोन्मेष आगतों एवं निवेशों द्वारा महिला सशक्तीकरण किया जागा चाहिए।
भारत एवं विदेशों में आर एंड डी केंद्रों में गिजी क्षेत्र के निवेश को सुसाध्य बनाना, लाभ में हिस्सेदारी के प्रावधान के साथ पीपीपी माॅडल पर व्यापक आर एंड डी सुविधाओं की अवस्थापना एवं संवर्द्धन करना, भारतीय आर एंड डी तंत्र में विभिन्न स्टेकहोल्डर्स की सहभागिता की अनुमति देना जैसी कुछ अन्य व्यवस्थाएं की जागी चाहिए।
संयुक्त पूंजी की व्यवस्था एवं नवोन्मेष वित्त व्यवस्था का समावेश करना बेहद आवश्यक होगा। खोजकर्ताओं एवं निवेशकों के बीच बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) की हिस्सेदारी, हरित मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान देते हुए नवोन्मेषों के व्यवसायीकरण हेतु अभिप्रेरण प्रदान करने पर बल देना होगा।
विज्ञान तकनीकी एवं नवोन्मेष में द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय दोनों ही सहयोग के माध्यम से अन्य देशों के साथ रणनीतिक भागीदारी एवं गठबंधन निर्मित करने पर बल देना होगा।
नीति में प्रस्तुत प्रस्तावों के क्रियान्वयन हेतु विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अकादमियों, उद्योग एवं व्यावसायिक समूहों के साथ परामर्श करने के अतिरिक्त विभिन्न सरकारी विभागों/मंत्रालयों और अभिकरणों के साथ परामर्श करने की आवश्यकता होगी। इसके अनुरूप, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने आगामी दो वर्षों के अंतग्रत प्रस्तावों के तीव्रता के साथ संचालन हेतु एक नीति क्रियान्वयन समूह गठित किया।
भारत ने 2010-20 को नवोन्मेष दशक के तौर पर घोषित किया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवोन्मेष नीति (एसटीआई) 2013 इस घोषणा को साकार करने की दिशा में उठाया गया कदम है और बदलते प्रसंग में विज्ञान एवं तकनीकी चालित नवोन्मेषों के परिदृश्य को स्थापित करने का लक्ष्य रखती है।
विज्ञान एवं नियोजन
भारत ने अनुसंधान एवं विकास नियोजन का अपना माॅडल तैयार किया है। वर्षों के प्रयत्नों से नियोजन प्रणाली ने दो प्रकार की प्रक्रिया अपनायी है। एक ओर, योजना आयोग से व्यापक नीति-निर्देश प्राप्त करना और दूसरी ओर, राष्ट्रीय एजेंसी, प्रयोगशाला एवं विश्वविद्यालय स्तर पर वैज्ञानिकों से विचार-विमर्श करता है, ताकि गिर्णय-निर्माण में वैज्ञानिक समुदाय की प्रभावी सहभागिता सुनिश्चित हो सके। इस प्रक्रिया के अंतग्रत निम्नलिखित चरण आते हैं
1- सरकार अपने प्राथमिकता वाले क्षेत्रों एवं नीति-निर्देशों की घोषणा करती है और अपने निर्देशांे से विभिन्न अनुसंधान-संस्थाओं एवं इकाइयों को परिचित कराती है।
2- विज्ञान एवं अनुसंधान विकास से जुड़े विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर विज्ञान की अलग-अलग शाखाओं के लिए अलग-अलग योजना का प्रारूप निर्मित करवाया जाता है।
3- विभिन्न संस्थाओं एवं संगठनों के प्रमुखों को योजना बनाने के लिए कहा जाता है और वे प्रमुख अपनी संस्था के अधीन कार्यरत वैज्ञानिकों को यह उत्तरदायित्व सौंप देते हैं।
4- इन योजनाओं को प्रयोगशाला स्तर पर जांचा-परखा जाता है और सम्बद्ध वैज्ञानिक सलाहकार समितियों की बैठक में इस पर विचार-विमर्श किया जाता है।
5- योजनाओं को अन्तिम रूप देने के पूर्व प्रयोगशाला स्तर पर, उसके बाद सलाहकार बोर्ड के स्तर पर, उसके बाद संगठन के स्तर पर, उसके बाद मंत्रालयीय स्तर पर और फिर योजना आयोग के स्तर पर जांचा-परखा जाता है और अन्ततः जो नीतियां एवं लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, उनके लिए योजना-राशि एवं सुविधाएं उपलब्ध करायी जाती हैं।
विभिन्न चरणों से गुजरने के कारण वैज्ञानिक नियोजन ठोस आधार प्राप्त भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास 525 526 भारतीय संस्कृति करता है और इसीलिए हम देखते हैं कि अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तीव्रगति से और ठोस विकास संभव हो पाया है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद भारत के तीव्र आर्थिक विकास के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास को प्राथमिकता प्रदान की गई और इससे सम्बद्ध विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए नियोजन की व्यवस्था की गई। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के महत्व को ध्यान में रखते हुए ही विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में इसे पर्याप्त स्थान दिया गया और इस क्षेत्र में पर्याप्त व्यय भी किया गया।
प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56)ः इस योजना के अंतग्रत कई नई राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के निर्माण के साथ ही अनुसंधान संस्थान की स्थापना पर भी बल दिया गया। इसी क्रम में 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग की स्थापना हुई। वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त प्रतिफलों को व्यावसायिक उत्पादन में रूपान्तरित कर इसके वाणिज्यीकरण को विशेष स्थान प्रदान किया गया। विभिन्न औद्योगिक इकाइयों को वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति सजग बनाया गया। इस योजना काल में विभिन्न प्रकार के संसाधनों के सर्वेक्षण तथा उनसे संबंधित अनुसंधान कार्य भी प्रमुखता से किए गए।
दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61)ः इस योजना में भी वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यक्रम में वृद्धि पर ही विशेष जोर दिया गया। विभिन्न प्रयोगशालाओं एवं अनुसंधान संस्थाओं में अनुसंधान करने के लिए व्यापक पैमाने पर सुविधाएं उपलब्ध करायी गयीं। प्रथम पंचवर्षीय योजना में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित अनुसंधानों को केवल राष्ट्रीय स्तर पर विकसित करने पर बल दिया गया था, किन्तु दूसरे योजना काल में इसे त्रिस्तरीय बना दिया गया तथा राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ क्षेत्रीय एवं राज्य स्तर पर भी अनुसंधानों को प्रोत्साहन प्रदान करने की दिशा में सार्थक पहल की गई। इस योजना काल में औद्योगिक एवं अन्य क्षेत्रों के अनुसंधानपरक आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए वैज्ञानिक संसाधनों के उत्पादन तथा उनके उपयुक्त क्षेत्र में उपयोग को वरीयता प्रदान की गई। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिक क्षेत्र में सहभागी लोगों को प्रशिक्षित करने और उनके उचित उपयोग की भी व्यवस्था की गयी। द्वितीय पंचवर्षीय योजना काल में ही मानकीकरण की ‘मैट्रिक व्यवस्था’ की शुरूआत की गयी।
तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66)ः इसमें मुख्यतः विभिन्न राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों एवं अन्य अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों एवं अनुसंधानकर्ताओं को बेहतर आर्थिक एवं संस्थागत सुविधाएं उपलब्ध कराने पर बल दिया गया और इस नीति को कार्यान्वित करने के लिए अनुसंधान के लिए दिए जागे वाले अनुदानों एवं छात्रवृत्तियों के कार्यक्रम में विस्तार किया गया। इन सभी सहायताओं और सुविधाओं को प्रदान करने का एकमात्र लक्ष्य विद्यमान अनुसंधान संस्थानों को सशक्त करना और वैज्ञानिक उपलब्धियां प्राप्त करना था। इन अनुसंधानों एवं निष्कर्षों को सम्बद्ध क्षेत्रों में उपयोग करने की योजनाएं विकसित की गईं। द्वितीय योजना में कृषि अनुसंधान के लिए निमित्त राशि में लगभग दुगुनी वृद्धि कर कृषि के क्षेत्र में व्यापक सुधार का प्रयास किया गया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विविध क्षेत्रों में प्रभावी क्रियान्वयन से 1961 से 1966 के मध्य लगभग 21 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत का अनुमान लगाया गया।
चैथी पंचवर्षीय योजना (1969-74)ः इस योजनावधि में विशिष्ट क्षेत्रों की पहचान कर उन क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास की गतिविधियों पर बल दिया गया। इस योजना काल में इस्पात, रसायन एवं यंत्रों के क्षेत्र में अनुसंधान कार्यक्रमों को तेज कर दिया गया और विभिन्न अनुसंधान संस्थानों में ऐसे प्रकोष्ठों की स्थापना की गई, जिनसे विभिन्न औद्योगिक इकाइयां आंकड़े एवं तकनीक प्राप्त कर सकें। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (ब्ैप्त्) के अधीन कार्य करने वाली संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य संस्थाओं से भी अपने अनुसंधानों का प्रतिवेदन निर्मित करने की अपेक्षा की गई। फिर, इस योजना में इस बात पर ध्यान दिया गया कि एक ही विषय पर एक ही प्रकार के अनुसंधान की गतिविधियां एक से अधिक प्रयोगशालाओं या अनुसंधान संस्थानों में न चलायी जाएं। आणविक ऊर्जा परियोजनाओं की स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर भी चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में विशिष्ट तौर पर बल दिया गया। इस योजना काल में अंतरिक्ष-अनुसंधान को भी पर्याप्त महत्व दिया गया और इस क्षेत्र में सक्रियता लाने की दिशा में प्रयत्न किए गए। इस योजना में अनुसंधान और विकास, प्राकृतिक संसाधन-सदृश क्षेत्रों में व्यय एवं अधिक योग्यता प्राप्त वैज्ञानिक एवं तकनीकी मानवशक्ति के प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुछ विसंगतियां दृष्टिगोचर हुईं और इसीलिए एक प्रभावी केन्द्रीय प्राधिकरण की स्थापना पर बल दिया गया। इसी योजनाकाल में 1971 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग तथा 1972 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विषय पर प्रथम राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गयी।
पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79)ः इस योजनावधि में नीतिगत स्तर पर वैज्ञानिक अनुसंधानों को मूल्यप्रभावी, उद्देश्य प्रेरित एवं समयान्वित बनाने की कोशिश की गई। क्षेत्रवार वितरण के क्रम में इस योजनाकाल में कृषि-क्षेत्र को प्राथमिकता प्रदान की गई। फसलों की बीमारियों पर नियंत्रण, सूखे क्षेत्र में कृषि की संभावना एवं अन्य कृषि तकनीकों के अनुसंधान को महत्व देते हुए अनेक शोध-संस्थाओं में वृहत् परियोजनाएं शुरू की गईं। प्राकृतिक संसाधनों की खोज एवं सर्वेक्षण पर भी बल दिया गया। अन्तरिक्ष कार्यक्रम एवं इलेक्ट्राॅनिक्सके विकास पर भी विशेष अभिरुचि दिखाई गई। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अन्तग्रत ‘राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिक सूचना-प्रणाली’ (NISSAT) की स्थापना की गई। इस प्रणाली की स्थापना का उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं सूचनाओं को सर्वसाधारण तक पहुंचाना था। कृषि, ऊर्जा, खनन, धातुकर्म, भारी इंजीनियरी और रसायन-सदृश महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता एवं परमाणु ऊर्जा,अन्तरिक्ष और इलेक्ट्राॅनिकी जैसे क्षेत्रों में प्रगति की दिशा में कदम उठाना इस योजना का लक्ष्य था।
छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85)ः इस योजनावधि में शिक्षा तथा विज्ञान के बीच सशक्त अंतर्संबंध विकसित करने पर ध्यान केन्द्रित किया गया। इस योजनाकाल में सै)ान्तिक पहलुओं की जगह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक पहलुओं पर बल दिया गया। इस योजनाकाल में पहली बार वैज्ञानिक दृष्टिकोण के निर्माण का लक्ष्य भी सम्मिलित किया गया। प्लाज्मा भौतिकी, प्रतिरक्षा विज्ञान, व्यावहारिक सूक्ष्म जैविकी आदि नूतन विषयों के क्षेत्र में भी व्यापक अनुसंधान के लिए योजनाएं निर्मित की गईं। इस योजनाकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से सम्बद्ध विभिन्न प्रकार की उपलब्धियों के ग्रामीण क्षेत्र में प्रयोग पर बल दिया गया। इस योजनावधि में ही सरकार द्वारा ‘प्रौद्योगिकी नीति घोषणा-पत्र’ (1983) जारी किया गया। वस्तुतः छठी पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के तीन दशकों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रारंभ किए गए कार्यों को सुदृढ़ आधार प्रदान करना था। इस योजनाकाल में सार्वजनिक क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का व्यय बढ़ाया गया।
सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90)ः इस योजनावधि में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने, उत्पादकता में वृद्धि और खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता लाने पर विशेष बल दिया गया। सूक्ष्म इलेक्ट्राॅनिक्स, टेलीमैटिक्स, रोबोटिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, समुद्र-विज्ञान, पृथ्वी.विज्ञान एवं अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी को विशेष वरीयता वाले क्षेत्र के रूप में चुना गया। विभिन्न सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में पहल की गई। इस योजनाकाल में विशेष लक्ष्यों को दृष्टि में रखते हुए प्रौद्योगिकी मिशनों की भी स्थापना की गई। वस्तुतः सातवीं पंचवर्षीय योजना में पर्यावरण एवं पारिस्थितिकीय विकास पर विशेष बल दिया गया। इसी योजना के आरम्भ में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की भी स्थापना हुई थी। सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर इस योजनाकाल में विशेष बल प्रदान किया गया और इसके लिए शिक्षण-संस्थाओं तथा अनुसंधान संस्थानों में तकनीकी सुविधाओं की उन्नति को प्राथमिकता प्रदान की गई।