दक्षेस का पूरा नाम क्या है | दक्षेस किसे कहते है , परिभाषा , स्थापना , लक्ष्य उद्देश्य कार्य dakshesh in hindi

By   October 3, 2020

dakshesh in hindi दक्षेस का पूरा नाम क्या है | दक्षेस किसे कहते है , परिभाषा , स्थापना , लक्ष्य उद्देश्य कार्य मुख्यालय कहाँ स्थित है ?

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस)
ढाका में सन् 1985 में हुए राज्याध्यक्षों अथवा सरकार प्रमुखों की शिखर बैठक में हुए राज्याध्यक्षों अथवा सरकार प्रमुखों की शिखर बैठक में सार्क के गठन की औपचारिक घोषणा की गई थी। दक्षिण एशिया के सात देशों- बंगलादेश, भूटान, भारत, मालद्वीप, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका- में क्षेत्रीय सहयोग को लेकर बहस उसी समय से चलनी शुरू हो गयी थी। जब 1980 के मई महीने में बंगलादेश के भूतपूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय जिया उर्रहमान ने ऐसे संघटन के निर्माण की दिशा में पहल की थी, कहा बताया जाता है कि नेपाल के राजा वीरेन्द्र भी ऐसा ही विचार कर रहे थे।

लक्ष्य और उद्देश्य
सार्क घोषणा-पत्र की धारा 1 के अनुसार 1985 में अंगीकार किया गया। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नाकिंत हैं:-
क) दक्षिण एशिया के लोगों के सुख तथा उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ावा देना,
ख) क्षेत्र में आर्थिक विकास,सामाजिक उन्नति था सांस्कृतिक विकास को तेज करना,
ग) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना तथा उसे और मजबूत करना,
घ) एक दूसरे की समस्याओं के प्रति पारस्परिक विश्वास, समझ व सम्मान पैदा करने में योगदान करना,
च) आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में सक्रिया साझेदारी और पारस्पारिक सहायता को बढ़ावा देना,
छ) दूसरे विकासशील देशों के साथ सहयोग को मजबूत करना,
ज) साझे हितों के मामले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारस्परिक सहयोग को मजबूत करना, तथा
झ) सामान्य लक्ष्यों व उद्देश्यों वाले दूसरे अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।

संरचना एवं कार्य
प) राज्याध्यक्ष एवं सरकार प्रमुख का अर्थ रू शिखर सम्मेलन सार्क की सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है जिसकी सामान्यतया साल में एक बार बैठक होती है। अब तक ढाका (1985), बंगलौर (1986), काठमाण्डू (1987), इस्लामाबाद (1988), माले (1990) कोलम्बो (1991), ढाका (1993) तथा दिल्ली (1995) में सार्क सम्मेलन आयोजित किये जा चुके हैं। 1989, 1992 तथा 1994 में कोई शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हुआ।
पप) मंत्रिपरिषद में सदस्य राज्यों के विदेश मंत्री सदस्य के रूप में होते हैं। सामान्यतया साल में इसकी दो बैठकें होती हैं। यह मुख्य रूप से नीतियों का निर्माण, सहयोग कार्यक्रमों की समीक्षा आदि का काम करती हैं।
पपप) स्थायी समिति में सदस्य राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। स्थायी समिति के मुख्य सरोकार हैं- सर्वोच्च निगरानी व सहयोग करना, संसाधनों को जुटाना, सहयोग के नये क्षेत्रों की पहचान आदि करना। वैसे तो जरूरत पड़ने पर इसकी बैठक कभी भी हो सकती है किन्तु साल में कम से कम दो बार तो अवश्य ही होती है।
पअ) तकनीकी समितियों में सदस्य राज्यों को प्रतिनिधि होते हैं। ये समितियाँ अपने अपने क्षेत्रों के कार्यक्रमों को कार्यान्वयन, समन्वयन, तथा उनकी निगरानी की जिम्मेवार होती है। ये नियमित रूप से अपनी रपटे स्थायी समिति को भेजती है।
अ) कार्य-समिति का निर्माण स्थायी समिति कर सकती है। यह समिति परियोजनाओं के कार्यान्वयन का कार्य करती है। सदस्य राज्य इसके सदस्य होते हैं। सदस्यों की संख्या दो से अधिक होती है किंतु किसी भी हालत में सभी राज्य इसके सदस्य नहीं हो सकते।
अप) सचिवालय, जिसका गठन 1987 में हुआ था, में महासचिव तथा अन्य दूसरे स्टाफ होते हैं। यह कार्यक्रमों के समन्वयन व कार्यान्वयन के कार्यों की निगरानी करता है तथा सार्क के विविध अंगों की बैठकों को आयोजित करता है। यह काठमांड में अवस्थित है।

उपलब्धियाँ और संभावनाएँ
यद्यपि सार्क के गठन के दस वर्ष पूरे हो चुके हैं, किंतु अन्य क्षेत्रीय संगठनों की तरह यह भी उतना सफल नहीं हो सका है जितना इसे होना चाहिए था। सार्क के एजेंडे के जिन मुद्दों पर आम सहमति थी, न केवल उनकी प्रगति बहुत धीमी रही है बल्कि असंतोषप्रद भी रही है। सार्क के लक्ष्यों व उद्देश्यों के कार्यान्वयन में सहयोग व समन्वयक की भी भारी कमी रही है। मौजूदा हालात के कारणों की तलाश करना कोई मुश्किल काम नहीं है। पूरा क्षेत्र जातीय तनावों से ग्रस्त है- कहीं तमिलों व सिंघलों के बीच तनाव है तो कहीं आसमियों व बांगलादेशियों के बीच तो कहीं हिंदुओं व मुसलमानों के बीच । इन सभी तनावों में भारत, जो कि इस क्षेत्र का केंद्र हैं, लिप्त रहता आया है। यही नहीं, सदस्य राज्यों के बीच इतिहासजन्य पारस्परिक अविश्वास, गलत धारणा व नासमझी रही है। भारत में पाकिस्तान के जातीय तनावों के बारे में कौन नहीं जानता। तमिलों के सवाल पर भारत व श्रीलंका के संघर्ष तथा नेपाल का भारत पर उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोप तनाव के दूसरे कारण रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत की विशालता से क्षेत्र के दूसरे देश इस शंका से पीड़ित रहते हैं कि कहीं भारत उन पर अपना प्रभुत्व न कायम कर लें। हालांकि दक्षिण एशिया पर आज कोई बाहरी खतरा नहीं है, तथापि पाकिस्तानी आंतकवादियों का सीमापार से भारत में आना जाना पहले पंजाब में और अब कश्मीर में असल क्षेत्रीय सहयोग के मार्ग में बाधा पहुँचाता रहा है। इसकी वजह से दोनों देशों के बीच लगातार तनाव बना रहा है, मुठभेड़, सैनिक चेतावनी व छायायुद्ध की वारदातें भी होती रही है।

इन समस्याओं के बावजूद सार्क लगातार घनिष्ट सहयोगी की ओर बढ़ता रहा है। ढाका में संपन्न हुए सानवें शिखर सम्मेलन से वास्तव में पारस्परिक सहयोग की नयी जमीन मिली है। इसी सम्मेलन में साप्टा। साउथ एशियन प्रिफेरेन्शियल ट्रेड एग्रीमेंट के गठन का फैसला लिया गया जो क्षेत्र में व्यापार उदारीकरण की दिशा मे एक ठोस कदम है। साप्टा जनवरी 96 से प्रभावी है किन्तु सितम्बर 96 तक साप्टा के अंतर्गत अंतः क्षेत्रीय व्यापार की शुरूआत ढाँचागत सुविधाओं के अभाव, सूचना की कमी तथा सदस्य वालों का बीच उच्च सीमा शुल्क की वजह से नहीं हो सकी थी। अंतर्राज्यीय व्यापार के लिए सीमाओं को खोलने के प्रयास सफल नहीं हो सके हैं। क्योंकि पाकिस्तान और बांगलादेश के व्यापारियों को डर है कि ऐसा करने से उनके उद्योग प्रतियोगिता में पिछड़ जायेंगे।

कि सार्क अभी शुरूआती अवस्था में हैं, अतः कोई इससे शीघ्र परिणाम की आशा नहीं कर सकता। भी, अपनी सीमाओं में सार्क ने क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में कुछ प्रगति की है। यहाँ पर वीसा जेम्पशन, इन्डोर्समेंट फैसिलिटी विशेष उल्लेखनीय है। क्षेत्र के नागरिकों के बीच संपर्क को बढ़ावा के लिए इस सुविधा के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, राष्ट्रीय संसद के सदस्यों, राष्ट्रीय दमिक संस्थाओं के अध्यक्षों, उनकी पत्नियों तथा आश्रित बच्चों को वीसा की छूट प्रदान की गयी है। यह व्यवस्था 1 मार्च 1992 से लागू है। इस सुविधा के तहत वे बगैर वीसा के सार्क क्षेत्र में यात्रा कर सकते हैं।