पाठ्यचर्या किसे कहते हैं ? पाठ्यचर्या के प्रकार , अर्थ , की विशेषताएं curriculum definition in hindi

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curriculum definition in hindi meaning पाठ्यचर्या किसे कहते हैं ? पाठ्यचर्या के प्रकार , अर्थ , की विशेषताएं क्या है ?

प्रश्न 1. पाठ्यचर्या को परिभाषित कीजिये। यह पाठ्यक्रम से किस प्रकार भिन्न है ? सेकेण्डरी स्तर के रसायन शास्त्र की विषय वस्तु के चयन एवं संगठन के लिए आप किन प्रमुख बातों को ध्यान में रखेंगे ?
Define curriculum.k~ How is it dffierent from syllabus ?k~ What mall considerations would you keep in mind while choosing and organising Chemistry content for secondary classes ?
उत्तर-रसायन विज्ञान के पाठ्यक्रम के चयन एवं संगठन के निम्न सिद्धान्त होते है
1. बाल केन्द्रीयता का सिद्धान्त-पाठ्यक्रम बाल केन्द्रित अर्थात् बालक की आवश्यकताओं व रुचि के अनुरूप होना चाहिए।
2. क्रियात्मकता का सिद्धान्त- क्रियात्मकता बालकों का एक प्रमुख गुण है। बालकों के सामने ऐसा पाठ्यक्रम रखना चाहिए जिससे उनमें क्रियाशीलता के गुण विकसित हो सकें।
3. दूरदर्शिता का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए कि वह बालकों को भविष्य के लिए तैयार करे। उनको भावी जीवन हेतु एवं उच्च कक्षाओं में अध्ययन हेतु मार्गदर्शन दे सके।
4. संरक्षिता का सिद्धान्त-रसायन विज्ञान के पाठ्यक्रम के चयन में यह भी ध्यान रखना आवश्यक होता है कि वह सभ्यता, समाज की आंकाक्षाओं व संस्कृति पर किसी भी प्रकार का आघात न करें।
5. सदभावना का सिद्धान्त-पाठ्यक्रम विद्यार्थियों की क्रियाओं को उनके वातावरण से सम्बन्धित करने तथा प्रजातांत्रिक मूल्यों को विकसित करने में सक्षम हो।
6. लचीलेपन का सिद्धान्त-किसी भी पाठ्यक्रम का यह प्रमुख गुण होता है। पाठ्यक्रम लचीला होना चाहिए अर्थात् उसमें से किसी बिन्दु को निकाला व नया बिन्दु आसानी से जोड़ा जा सके।
7. जीवनोपयोगी होने का सिद्धान्त-पाठ्यक्रम का यह प्रमुख गुण है। अगर छात्रों को पढ़ाया गया पाठ्यक्रम जीवनोपयोगी नहीं होगा तो उसका शिक्षण व्यर्थ है।
8. सहसम्बन्ध व समन्वय का सिद्धान्त–एक अच्छा पाठ्यक्रम वह होता है जिसका अन्य विषयों से सह सम्बन्ध हो। छात्र तभी अच्छा अधिगम कर सकते हैं जब विषयों को समग्र रूप में पढ़ाया जाए।
9. अवकाश के सदुपयोग का सिद्धान्त-छात्रों के पास काफी समय ऐसा होता है जिसमें उसे कुछ रुचि का कार्य करना होता है। पाठ्यक्रम में ऐसा प्रावधान होना चाहिए जिससे वह पाठ्यक्रम में से रुचिपूर्वक स्वयं कार्य कर सके।
इस प्रकार पाठ्यक्रम को संगठित एवं चयन करने को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण निम्न होते हैं-
1. शिक्षण के उद्देश्य-पाठ्यक्रम के चयन को प्रभावित करने में सबसे प्रमुख कारण शिक्षण के उद्देश्य हैं। उद्देश्यों के अनुसार ही पाठ्यक्रम का चयन किया जाता है। अतः यह कारक पाठ्यक्रम को प्रभावित करता है।
2. छात्रों का आयु स्तर-जो पाठ्यक्रम चयन किया जा रहा है वह उस आयु स्तर के अनुकूल है या नहीं यह सबसे मुख्य कारक है। अतः आयु स्तर पठ्यक्रम को प्रभावित करता
3. छात्रों का मानसिक स्तर-छात्रों के आयु स्तर के साथ उनके मानसिक स्तर, पारिवारिक पृष्ठभूमि, समुदाय की पृष्ठभूमि आदि का ध्यान भी पाठ्यक्रम चयन में रखना आवश्यक होता है। अतः छात्रों का मानसिक स्तर भी पाठयक्रम को प्रभावित करता है।
4. पाठ्यवस्तु की प्रकृति-पाठ्यवस्तु उद्देश्यों की पूर्ति करती है या नहीं यह ध्यान देना अति आवश्यक है। अतः यह भी पाठ्यक्रम संगठन को प्रभावित करती हैं।
5. विषय का अन्य विषय से सहसम्बन्ध- रसायन विज्ञान को विज्ञान की अन्य शाखा जैसे- जीव विज्ञान भौतिक विज्ञान, कृषि विज्ञान, गणित आदि से सम्बन्धित करते चाहिए। अतः सहसम्बन्ध पाठ्यक्रम संगठन को प्रभावित करता है।
6. ज्ञान का सदपयोग-पाठ्यक्रम में चुने गये प्रकरणों का छात्र सदुपयोग कर सकते है या वे केवल किताबी ज्ञान ही रहेंगे यह ध्यान देना आवश्यक है । पाठ्यक्रम में ज्ञानोपा प्रभाव रखे जाने चाहिए।
7. क्रियाशीलता-बालक स्वभाव से ही क्रियाशील होते हैं। अतः पाठ्यक्रम क्रियाशीलता पर बल देना चाहिए।
8. अग्रदर्शिता-पाठ्यक्रम का निर्माण भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। अतः अग्रदर्शिता भी पाठ्यक्रम संगठन को प्रभावित करती है।
9. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास-रसायन विज्ञान पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जिस छात्रों में शैक्षणिक दृष्टिकोण विकसित हो सके।
10. विशेषज्ञों के विचार एवं सुझाव-पाठ्यक्रम निर्माण में विशेषज्ञों व वरिष्ठ अध्यापकों के सुझावों पर भी विचार करना चाहिए।

प्रश्न 2. आपके प्रदेश में वर्तमान विज्ञान पाठ्यक्रम की क्या कमियां हैं? इन कमियों को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए।
What are the short ceniuys of science syllabus in your state ?k~ Give suggestions to overcome them.
उत्तर-वर्तमान पाठ्यक्रम के प्रमुख दोष-(Major Defects of Present Curriculum)- रसायन विज्ञान के वर्तमान पाठ्यक्रम का यदि बारीकी से विश्लेषण किया जाये तो कह कहना असत्य न होगा कि वर्तमान पाठ्यक्रम तथ्यों का अमनोवैज्ञानिक तरीके से व्यवस्थाहीन संग्रह है जिसकी आलोचना भी की गई है। लेकिन कुछ कारणों से इसे त्यागा नहीं जा सका, क्योंकि अनुभव-केन्द्रित पाठ्यक्रम का तुलना में विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम सरल होता है तथा जिसका मूल्यांकन भी सहजता से किया जा सकता है। वर्तमान पाठ्यक्रम र पुनरावलोकन से निम्न दोष प्रकट होते हैंः-
1. यह विषय-केन्द्रित तथा प्रसंगगत है। सैद्धान्तिक पक्ष पर अधिक बल देता है, जिसन कारण शिक्षक किसी एक पुस्तक पर आधारित होकर व्याख्यान देकर पाठयक्रम को पूर्ण देता है, जिसमें विद्यार्थी की रुचियां व क्रियाकलापों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। किताबी व घिसे-पिटे तरीके से दिये गये ज्ञान की व्यवहारिक उपयोगिता समाप्त हो जात है।
2. रसायन विज्ञान शिक्षण के व्यापक उद्देश्यों व लक्ष्यों की प्राप्ति इस पाठयक्रम से नहीं हो पाती है।
3 पाठ्यक्रम परीक्षा के बोझ से दबा हुआ है जिसके परिणामस्वरूप शिक्षक तथा छात्र दोनों ही कुछ चुने हुए बिन्दुओं और प्रसंगों को ही परीक्षा के लिये तैयार कर लेते हैं । परीक्षा में छात्र उस रटी हुई विषयवस्तु को कितना लिख पाता है उससे ही उसका मूल्यांकन हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया परीक्षक तथा परीक्षार्थी के बीच आंख-मिचैनी बन कर रह जाती है।
4. रसायन विज्ञान का सम्बोध अभी भी पाठ्यक्रम में विदेशी के समान रसायन विज्ञान के बहुत से विशिष्टता के क्षेत्र हैं जिनकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। शिक्षण से हमारा उद्देश्य वैज्ञानिकों का निर्माण करना नहीं है बल्कि बालकों में सूझबूझ तथा वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रति प्रशंसात्मक अभिवृत्ति का विकास करना है जिससे उन्हें पूर्ण जीवन के लिए तैयार किया जा सके।
5. वर्तमान पाठ्यक्रम में लचीलेपन का अभाव है तथा यह वास्तविक जीवन से अछूता है। समाज की तथा बालक की आवश्यकताओं को भी पूर्ण नहीं करता है।
6. प्रसंगों की बहुतायत से विषय वस्तु की गहनता नष्ट हो गई है और ज्ञान उथला या सतही रह गया है।
7. इसमें विज्ञान के विविध क्रिया-कलापों, जैसे-विज्ञान क्लब, विज्ञान अभिरुचियां आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। विज्ञान के द्वारा व्यक्ति बहुत कुछ मनोरंजन कर सकता है, परन्तु पाठ्यक्रम में इसका अभाव है।
पाठ्यक्रम में सुधार हेतु सुझाव-उपर्युक्त दोषों के कारण वर्तमान पाठ्यक्रम में शीघ्र ही पुनर्निर्माण की आवश्यकता है जिसके लिए निम्न सुझाव दिये गये हैं
1. पाठ्यक्रम विभिन्न आयु वर्ग तथा दैनिक जीवन की रुचियों से सम्बन्धित व समाज की आवश्यकताओं से जुटा हुआ हो।
2. विषय सामग्री पर अधिकार को ही परिणति न मानकर शिक्षण में चिन्तन को बढ़ावा दिया जाये।
3. जो विषय-वस्तु बालकों को अध्ययन के लिये दी जाये वह रुचिकर, ज्ञानवर्धक तथा गहन होनी चाहिये।
4. ज्ञान, कौशल तथा अभिवृत्तियों के विकास के लिये प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान कराये जायें।
5. पाठ्यक्रम लचीला हो, जिसको बालक तथा समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुकूल बदला जा सके।
6. इसके अन्तर्गत विविध प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक क्रियाकलाप सम्मिलित हो जो ज्ञान, कौशल, रुचियों और अभिवृत्तियों को विकसित कर बालक के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण के साथ समायोजन में सहायता प्रदान कर सके।
7. पाठयक्रम में ऐसी विषय-वस्तु को भी सम्मिलित किया जाना चाहिये जो महान वैज्ञानिकों के त्याग तथा सराहनीय कार्यों के प्रति प्रशंसा भाव उत्पन्न कर सके।
8. पाठ्यक्रम में कठिनाई, स्तर, समय, उपकरण तथा शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यार्थियों के संतोष का भी ध्यान रखा जाये।
9. पाठ्यक्रम इकाइयों में बंटा हुआ होना चाहिये और प्रत्येक इकाई प्रतिदिन की प्रमुख समस्या से जुड़ी होनी चाहिये।
10. वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोगी व महत्वपूर्ण स्थानों के भ्रमण के लिये भी स्थान होना चाहिये।