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सहकारी क्षेत्र किसे कहते हैं | सहकारी क्षेत्र का अर्थ परिभाषा क्या है मतलब Cooperative sector in hindi
Cooperative sector in hindi meaning definition examples सहकारी क्षेत्र किसे कहते हैं | सहकारी क्षेत्र का अर्थ परिभाषा क्या है मतलब ?
सहकारी क्षेत्र
वे संगठन जहाँ जनता स्वैच्छिक रूप से आर्थिक हितों के अनुसरण के लिए योगदान करती हैं, सहकारी समितियाँ कहलाती हैं और इन्हें सामूहिक रूप से सहकारी क्षेत्र कहा जाता है। एक सहकारी समिति स्वैच्छिक, स्वतंत्र व्यावसायिक उपक्रम होती है जिसका गठन उद्यम के भागीदार सदस्यों की आम आवश्यकता (ओं) को पूरा करना होता है। ये उत्पादन, बाजार और सर्वोन्मुखी हो सकती हैं। संगठन की दृष्टि से सहकारिताएँ अन्य प्रकार के फर्मों से अलग होती हैं। निजी क्षेत्र के मामले में और यहाँ तक कि सार्वजनिक क्षेत्र के मामले में, व्यक्ति जिनका संसाधनों पर स्वामित्व होता है, व्यक्ति जो संसाधनों को नियंत्रित करते हैं और व्यक्ति जो अंतिम उपभोक्ता अथवा प्रयोक्ता होते हैं, सामान्यतया अलग-अलग सत्ता होते हैं। इस प्रकार, स्वामित्व नियंत्रण और उपयोग के घटक एकीकृत नहीं होते हैं। तथा, सहकारिता प्रकार के संगठन में उपरोक्त सभी तीन सत्ताएँ एक ही समूह का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरे शब्दों में, सहकारी प्रकार की व्यवस्था में, वे जो संसाधनों के स्वामी हैं, वे जिनका संसाधनों पर नियंत्रण हैं और वे जो तैयार वस्तुओं तथा सेवाओं का उपयोग करते हैं सभी एक और समान समूह के ही होते हैं। सहकारी क्षेत्र की इन्हीं विशेषताओं के कारण यह निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र से स्पष्ट रूप से अलग है। संगठन की प्रकृतिवश सहकारिताओं में सभी सहकारी एजेन्सियाँ प्रत्यक्ष तौर पर उत्तरदायी और जवाबदेह होती हैं।
यूरोपीय देशों (विशेषकर स्कैण्डिनेवियाई देशों), जापान, इजरायल, कनाडा और भारत में सहकारी प्रकार के संगठन, भले ही इनका स्वरूप अलग-अलग हो, अत्यन्त ही लोकप्रिय हैं। सहकारी फर्म पूर्व यू एस एस आर में अत्यधिक लोकप्रिय थे। पश्चिमी यूरोपीय देशों में उपभोक्ता सहकारी समितियाँ, कृषि सहकारी समितियाँ और अन्य प्रकार जैसे आवास, बैंकिंग तथा कर्मकारों की उत्पादक सहकारी समितियाँ अत्यधिक लोकप्रिय हैं। साहित्य से पता चलता है कि सहकारी विकास के कुछ सबसे बृहत् केन्द्रीकरण अभी भी पश्चिमी यूरोप में हैं। यू एस ए में, अधिकांश सहकारी संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित हैं और कृषि से संबंधित कार्यकलापों से जुड़े हुए हैं। जापान में, सहकारी समितियाँ मुख्यतया ग्रामीण स्वरूप की हैं, ये सुसंगठित तथा परस्पर भलीभांति जुड़ी हुई हैं और अधिकांश कृषक इन बहुउद्देशीय सहकारी समितियों के सदस्य हैं। सहकारी समितियों चाहे जिन देशों में भी हों अधिकांश मामलों में उन्होंने ग्रामीण और कृषक जनसंख्या की आवश्यकताओं की ही पूर्ति की है।
अन्तरराष्ट्रीय सहकारी मैत्री (आई सी ए) से सहकारी क्षेत्र के वर्चस्व के बारे में कुछ प्रभावशाली तथ्यों और आँकड़ों का पता चलता है। आई सी ए के अनुसार, स्वीडन के लगभग सम्पूर्ण दुग्ध उत्पादों का विपणन कृषक स्वामित्व वाली सहकारी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। इसी प्रकार, नार्वे के 75 प्रतिशत वनोत्पादों का प्रसंस्करण और विपणन सहकारी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। इटली में कुल शराब उत्पादन का 60 प्रतिशत हिस्सा सहकारी क्षेत्र से आता है। यह जानना रोचक होगा कि कृषकों की स्वामित्व वाली 14 सहकारी संस्थाओं का स्थान यू एस ए की सबसे बड़ी 500 निगमों में है। यहाँ कुछ और उदाहरण देना अनुपयुक्त नहीं होगा कि बोलिविया, केन्या और ब्राजील में क्रमशः चिकन का 60 प्रतिशत, गुलदाउदी (पाइरीथ्रम) का 87 प्रतिशत और कपास का 40 प्रतिशत विपणन सहकारी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। भारत में ही, अमूल डेयरी सहकारी संस्था भारत के दुग्ध उत्पादन के बड़े हिस्से का विपणन करती है।
भारत में सहकारी उद्यम कृषि उद्योग और सेवा क्षेत्रों में हैं। सहकारी संस्थाएँ कई क्षेत्रों में पाई जाती हैं। कार्य की दृष्टि से ये सहकारी संस्थाएँ विभिन्न उद्देश्यों जैसे विपणन, कच्चे मालों की आपूर्ति, साख इत्यादि के लिए कार्य करती हैं। सहकारी क्षेत्र में कुछ साख समितियाँ इस प्रकार हैं जैसे कृषि साख समितियाँ, औद्योगिक सहकारी बैंक, गैर-कृषि साख समितियाँ और राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक। कुछ विपणन संस्थाएँ भी हैं जैसे कपास, फल और सब्जी, तम्बाकू, नारियल के लिए सहकारी संस्थाएँ और सामान्य प्रयोजन विपणन समितियाँ भी हैं। मत्स्य सहकारी समितियों के साथ-साथ पशुधन उत्पादों जैसे दुग्ध, घी, मुर्गी पालन इत्यादि के लिए भी विभिन्न स्तरों पर सहकारी संस्थाएँ हैं। गन्ना के लिए आपूर्ति साख सहकारी समितियाँ और प्रसंस्करण सहकारी संस्थाएँ जैसे कपास ओटाई और संपीड़न सहकारी संस्थाएँ और कृषि प्रसंस्करण समितियाँ। असंख्य अन्य विभिन्न प्रकार की सहकारी संस्थाएँ हैं जिसमें शीतागार सहकारी संस्थाएँ, सिंचाई समितियाँ, ऊर्जा सहकारी संस्थाएँ, कृषि सहकारी समितियाँ, स्वास्थ्य सेवा सहकारी संस्थाएँ, दूर संचार सहकारी संस्थाएँ बुनकर सहकारी समितियाँ, अन्य
औद्योगिक सहकारी समितियाँ, सहकारी औद्योगिक सम्पदा, श्रम संविदा और निर्माण सहकारी समितियाँ, वन श्रमिक सहकारी समितियाँ, जनजातीय सहकारी संस्थाएँ, परिवहन सहकारी संस्थाएँ, इलैक्ट्रॉनिक सहकारी संस्थाएँ, महिलाओं की सहकारी संस्थाएँ, विद्यार्थियों की सहकारी संस्थाएँ, बहु-इकाई सहकारी संस्थाएँ और अन्य। सहकारी क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण नाम गुजरात में स्थित इंडियन फार्म फर्टिलाइजर कोओपरेटिव लिमिटेड (इफ्फको) और भारत में सहकारिता आंदोलन का सबसे अप्रतिम प्रतीक इस समय अमूल है जो न सिर्फ दुग्ध उत्पाद में अपितु घी, मक्खन, चीज, चॉकलेट, आइसक्रीम और अब पीजा में भी एक अजेय ब्राण्ड बन गया है।
बोध प्रश्न 4
1) ‘‘संयुक्त क्षेत्र‘‘ और ‘‘सहकारी क्षेत्र‘‘ में क्या अंतर है?
2) संयुक्त क्षेत्र की 3 कंपनियों और सहकारी क्षेत्र के 2 संगठनों का नाम बताइए?
सहकारी क्षेत्र के उद्देश्य
सहकारी संस्थाओं का उद्देश्य यथासंभव कम से कम खर्च पर अधिकतम संभव सेवा उपलब्ध कराना है। इस प्रकार सहकारी संस्थाएँ अधिकतम लाभ अर्जित करने के आर्थिक उद्देश्य का अनुसरण नहीं करती हैं। तथापि, कर लगाने के उद्देश्य से उन्हें निजी क्षेत्र के समान ही माना जाता है क्योंकि सहकारी संस्थाओं का आर्थिक हित होता है और उनकी प्रभावोत्पादकता की माप उन्हीं मानदंडों से की जाती है जिनसे निजी क्षेत्र की जाती है। सहकारी संस्थाओं का विचार समाज के निर्धन वर्गों में स्व सहायता की व्यवस्था का सृजन करना था। भारत में सहकारी आंदोलन का उद्देश्य न सिर्फ सहकारी समुदाय को सस्ती दर पर वस्तुएँ तथा सेवाएँ उपलब्ध कराना है अपितु सहकारी समुदाय में एकता और संसाधनों के सहयोग पूर्ण प्रबन्धन की भावना भरना है। सहकारी क्षेत्र को इस विश्वास के साथ बढ़ावा दिया गया है कि समाज के विशेष वर्ग अथवा अर्थव्यवस्था के विशेष क्षेत्र जिसकी आवश्यकता निजी क्षेत्र अथवा सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा संतोषप्रद ढंग से पूरी नहीं की जा सकती है, में इसकी पहुँच है तथा उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने की इसमें क्षमता है।
विकास और सीमाएँ
जब सहकारी आंदोलन की बात आती है तो भारत का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। भारत में अमूल का ‘‘टेस्ट ऑफ इंडिया‘‘ के रूप में अभियान न सिर्फ आज एक अजेय ब्रांड है अपितु इसने विश्व को यह दिखलाया है कि सहकारी उद्यम में क्या कर गुजरने की क्षमता है। नेशनल को-ओपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया के अनुसार, भारत में सहकारी संस्थाओं की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। नवीनतम आँकड़ों से पता चलता है कि इस समय कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 67 प्रतिशत इसके दायरे में आता है। राष्ट्रीय स्तर के 21 सहकारी फेडरेशन हैं और राज्य स्तर के 350 से अधिक सहकारी फेडरेशन हैं। सहकारी आंदोलन के विकास पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि 1998-99 में विभिन्न सहकारी संस्थाओं के सदस्यों की संख्या 209 मिलियन थी जो साठ के दशक के मध्य में मात्र 69 मिलियन थी। इसी प्रकार सहकारी संगठनों की संख्या साठ के दशक के मध्य में 3.4 लाख से बढ़ कर 1998-99 में 5 लाख से भी अधिक हो गई है। स्वरोजगार के सृजन की दृष्टि से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सहकारी क्षेत्र का हिस्सा
12.5 प्रतिशत है।
वर्षों के इस अपार विकास के बावजूद, भारतीय सहकारी क्षेत्र की अपनी समस्याएँ और बाधाएँ हैं । सहकारी संस्थाएँ सहकार नियमों और कानूनों से शासित होती हैं, को-ओपरेटिव रजिस्ट्रार और अन्य सरकारी नियमों द्वारा नियुक्त व्यक्तियों जैसे चेयरमैन और प्रबन्ध निदेशक के माध्यम से सरकार इनका प्रशासन देखती है। अनेक उदाहरण हैं जब सहकारी संस्थाओं के कार्यकरण में सरकारी प्राधिकारियों का अत्यधिक हस्तक्षेप हुआ है। सहकारी एजेन्टों के माध्यम से सहकारी संस्थाओं के स्व-प्रबन्धन का उद्देश्य तब पूरा नहीं होता है जब सरकारी तंत्र सहकारी संस्थाओं के दैनंदिन कार्यकरण में हस्तक्षेप करने लगते हैं। एक उदारीकृत शासन में, जब संगठन के अन्य प्रकार धीरे-धीरे बाजारोन्मुखी कार्य तंत्र अथवा प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं, सहकारी संस्थाओं का नियम और विनियम लचीला होना चाहिए और इसे सरकारी . नियंत्रणों तथा हस्तक्षेपों से स्वतंत्र होना चाहिए। इसके साथ ही संगठन की स्वैच्छिक और लोकतांत्रिक प्रकृति के मद्देनजर सहकारी संस्थाओं को स्व अनुशासन की भावना भरनी चाहिए जिससे कि वे अधिक प्रभावी और कार्यकुशल बन सकें।
विशेषकर विकासशील विश्व में, सहकारी क्षेत्रों से न सिर्फ यह आशा की जाती है कि वे सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के साथ बढ़ें अपितु उनके साथ कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा भी कर सकें। उनसे आशा की जाती है कि वे लाभ अर्जित करें तथा साथ ही विभिन्न सरकारी पाबंदियों तथा अनम्यताओं के अध्ययधीन होते हैं। विद्यमान व्यवस्था में, प्रचलित कानून सरकार को सहकारी संस्थाओं का नियंत्रण अपने हाथ में लेने का अधिकार प्रदान करती हैं। जो सहकारी संस्था के सदस्यों में जुड़ने की भावना, स्वतंत्रता की भावना और आत्मनिर्भरता की भावना बढ़ने से रोकते हैं। बहुधा सहकारी संस्थानों में उसी सहकारी क्षेत्र के अंदर स्वंय उनके बीच संलग्नता और बंधन का अभाव होता है तथा ये संसाधनों की अत्यधिक कमी की समस्या से भी ग्रस्त होते है। इसके साथ ही सहकारी संस्थाओं को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए समान अवसर नहीं हैं जबकि बड़ी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हो रहा है। तथापि, कुछ राज्यों जैसे आन्ध्र प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में नए कानूनों के रूप में इस दिशा में कुछ प्रयास हुए हैं।
बोध प्रश्न 5
1) सहकारी क्षेत्र जनता का हित साधन अधिक ठीक ढंग से किस तरह से करती है?
2) सहकारी क्षेत्र की सीमाएँ क्या हैं?
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