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संविधानवाद की अवधारणा क्या है ? संविधान और संविधानवाद में अंतर बताइए constitutionalism and constitution in hindi

difference between constitution and constitutionalism in hindi संविधानवाद की अवधारणा क्या है ? संविधान और संविधानवाद में अंतर बताइए ?
संविधान क्या है?
किसी देश का संविधान उसकी राजनीतिक व्यवस्था का वह बुनियादी सांचा-ढांचा निर्धारित करता है जिसके अंतर्गत उसकी जनता शासित होती है। यह राज्य की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे प्रमुख अंगों की स्थापना करता है, उनकी शक्तियों की व्याख्या करता है, उनके दायित्वों का सीमांकन करता है और उनके पारस्परिक तथा जनता के साथ संबंधों का विनियमन करता है।
लोकतंत्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है। आदर्शतया जनता ही स्वय अपने ऊपर शासन करती है। किंतु, प्रशासन की बढ़ती हुई जटिलताओं तथा राष्ट्र रूपी राज्यों के बढ़ते हुए आकार के कारण प्रत्यक्ष लोकतंत्र अब संभव नहीं रहा। आजकल के प्रतिनिधिक लोकतंत्रों में जनता इस बात का निर्णय करती है कि उस पर किस प्रकार से तथा किसके द्वारा शासन हो। जनता अपनी प्रभुसत्ता का सबसे पहला तथा सबसे बुनियादी अनुप्रयोग तब करती है, जब वह अपने आपको एक ऐसा संविधान प्रदान करती है जिसमें उन बुनियादी नियमों की रूपरेखा दी जाती है जिनके अंतर्गत राज्य के विभिन्न अंगों को कतिपय शक्तियां अंतरित की जाती हैं और जिनका प्रयोग उनके द्वारा किया जाता है।
संघीय राज्य व्यवस्था में संविधान अन्य बातों के साथ साथ एक ओर परिसंघीय या संघ-स्तर पर और दूसरी ओर राज्यों या इकाइयों के स्तर पर राज्यों के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का निरूपण, परिसीमन और वितरण करता है।
किसी देश के संविधान को इसकी ऐसी आधारविधि भी कहा जा सकता है, जो उसकी राज्य व्यवस्था के मूल सिद्धांत विहित करती है और जिसकी कसौटी पर राज्य की अन्य सभी विधियों तथा कार्यपालक कार्यों को उनकी विधिमान्यता तथा वैधता के लिए कसा जाता है।
प्रत्येक संविधान उसके संस्थापकों एवं निर्माताओं के आदर्शों, सपनों तथा मूल्यों का दर्पण होता है। वह जनता की विशिष्ट सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रकृति, आस्था एवं आकांक्षाओं पर आधारित होता है।
संविधान को एक जड़ दस्तावेज मात्र मान लेना ठीक नहीं होगा क्योंकि संविधान केवल वही नहीं है, जो संविधान के मूलपाठ में लिखित है। संविधान सक्रिय संस्थानों का एक सजीव संघट्ट है। यह निरंतर पनपता रहता है, पल्लवित होता रहता है। हर संविधान इसी बात से अर्थ तथा तत्व ग्रहण करता है कि उसे किस तरह अमल में लाया जा रहा है। बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि देश के न्यायालय किस प्रकार उसका निर्वचन करते हैं तथा उसे अमल में लाने की वास्तविक प्रक्रिया में उसके चारों ओर कैसी परिपाटियां तथा प्रथाएं जन्म लेती हैं।
संवैधानिक विधि
संवैधानिक विधि सामान्यतया संविधान के उपबंधों में समाविष्ट देश की मूलभूत विधि की द्योतक होती है। विशेष रूप से इसका सरोकार राज्य के विभिन्न अंगों के बीच और संघ तथा इकाइयों के बीच शक्तियों के वितरण के ढांचे की बुनियादी विशेषताओं से होता है। किंतु आधुनिक संवैधानिक विधि में, खासतौर पर स्वाधीन प्रतिनिधिक लोकतंत्रों में, मूल मानव अधिकारों और नागरिकों तथा राज्य के परस्पर संबंधों पर सर्वाधिक बल दिया जाता है। इसके अलावा, संवैधानिक विधि के स्रोतों में संविधान का मूल पाठ ही सम्मिलित नहीं होता बल्कि इसमें सवैधानिक निर्णयजन्य विधि, परिपाटियां और कतिपय सवैधानिक उपबंधों के अंतर्गत बनाए गए अनेक कानून भी सम्मिलित होते हैं।
संविधानवाद
संविधानवाद एक ऐसी राज्य व्यवस्था की संकल्पना है, जो संविधान के अतर्गत हो तथा जिसमें सरकार के अधिकार सीमित और विधि के अधीन हों। स्वेच्छाचारी, सत्तावादी अथवा सर्वाधिकारवादी जैसे शासनों के विपरीत, संवैधानिक शासन प्रायः लोकतांत्रिक होता है तथा लिखित संविधान के द्वारा नियमित होता है। लिखित संविधान में राज्य के विभिन्न अंगों की शक्तियों तथा उनके दायित्वों की परिभाषा तथा सीमाकन होता है। लिखित संविधान के अतर्गत स्थापित सरकार सांकुश सरकार ही हो सकती है। लेकिन, यह भी संभव है कि किन्हीं देशों मे-ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं-लिखित संविधान तो हों लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था न हो। कहा जा सकता है कि उनके पास संविधान हैं कितु वहा पर संविधानवाद नही है। ऐसे भी उदाहरण हैं, जैसे ब्रिटेन, जहां लिखित संविधान नहीं किंतु लोकतंत्र और संविधानवाद है।

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