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concept of geomorphology in hindi भू-आकृति विज्ञान की संकल्पनाएँ क्या हैं ? एकरूपातावाद की संकल्पना
भू-आकृति विज्ञान की संकल्पनाएँ क्या हैं ? concept of geomorphology in hindi ?
भू-आकृति विज्ञान की संकल्पनाएँ
(CONCEPT OF GEOMORPHOLOGY)
भू आकृति विज्ञान एक विस्तृत विषय है। जिसमें भू आकृतिक चिन्तन व विकास तथा स्थलरूपाों को विभिन्न युगों प्रकमों आदि का अध्ययन किया जाता है। भू आकृति विज्ञान से संवाधिक अनेक विद्वानों ने अपनी सकल्पनाएँ प्रस्तुत की है उनमें से डब्ल्यू.डी.थार्नबरी की संकल्पना का हम यहाँ अध्ययन करेंगे।
(1) एकरूपातावाद की संकल्पना :- एकरूपातावाद की संकल्पना में थार्नबरी में स्पष्ट किया है कि वर्तमान समय में जो भूगर्भिक प्रक्रम तथा नियम कार्यरत हैं, वे ही समस्त भूगर्भिक इतिहास में कार्यरत थे परन्तु उनकी सक्रियता में अन्तर था। प्रस्तुत संकल्पना वर्तमान समय में श्मॉडर्न ज्यॉलजीश् का आधारभूत सिद्धान्त है, जिसे श्एकरूपातावादश् के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम स्काटिश भूगर्भवेत्ता जेम्स हटन द्वारा 1785 में किया गया। प्लेफेयर ने 1802 में उसका परिमार्जित रूपा प्रस्तुत किया और आगे चलकर चर्ल्स ल्येल ने उसे अपनी पुस्तक श्प्रिंसिपुल्स ऑव ज्यॉलजीश् में भरपूर स्थान दिया।
हटन का यह दावा कि भूगर्भिक प्रक्रम सदैव समान रूपा से सक्रिय थे, भ्रामक है। इस तरह यह स्पष्ट होता है कि हटन ने अपने सिद्धान्त को काफी संकुचित अर्थों में प्रयुक्त किया है। कार्बानिफरस तथा प्लीस्टीसीन युगों में हिमकाल के कारण हिमानी अपरदन अन्य कारकों की अपेक्षा अधिक सक्रिय थे। साथ ही साथ आज के हिमानी की तुलना में भी उक्त दो युगों में हिमनद अधिक सक्रिय थे। इसका कारण जलवायु का स्थायी न होना ही है। जैसा वर्तमान समय में जलवायु का वितरण है, वैसा ही वितरण भूपटल पर सदैव नहीं था। जहाँ पर आज आर्द्र जलवायु है और जलीय प्रक्रम सक्रिय हैं, वहाँ पर पहले शुष्क मरुस्थलीय जलवायु रह चुकी है, जहाँ पर पवन क्रियाशील था।
प्रक्रम का स्वरूपा
यद्यपि प्रक्रमों के कार्य की मात्रा में अन्तर हो सकता है परन्तु उनके कार्य करने के सामान्य स्वभाव में समरूपाता ही मिलती है। यदि नील नदी ने ईसा पूर्व डेल्टा का निर्माण किया तो वर्तमान समय में भी नदियाँ डेल्टा का निर्माण कर रही है। यदि प्लीस्टोसीन हिमकाल के समय विस्तृत घाटी हिमनद ने अनेक प्रकार के अपरदनात्मक तथा निक्षेपात्मक स्थलरूपाों का निर्माण किया तो वर्तमान समय में भी उच्च पर्ततों पर स्थित घाटी हिमनद उसी तरह के कार्य में सक्रिय हैं। यदि भूमिगत जल ने भूपटल के चूना प्रस्तर वाले भागों में पर्मियन तथा पेन्शलवेनियन युगों में अपने घुलनकार्य द्वारा सिंक होल, डोलाइन, युवाला तथा कार्ट स्थलाकृति का निर्माण किया तो वे वर्तमान समय में भी संयुक्त राज्य अमेरिका पूर्ववर्ती यूगोस्लाविया, फ्रांस, जूरा पर्वत, भारत के रोहतास चूना प्रस्तर क्षेत्र, देहरादून के सहस्त्रधारा आदि पर उसी तरह से कार्यरत है। इसी तरह सभी प्रक्रमों को विषय में उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
भूगर्भिक प्रक्रमों का चक्रीय रूपा
भूपटल को प्रभावित करने वाले प्रक्रम प्रायः चक्रीय रूपा में कार्य करते हैं। हटन ने बताया कि प्रकृति का स्वभाव क्रमितश् होता है। अर्थात् प्रकृति का विकास क्रमित रूपा में सम्पादित होता है। उन्होंने बताया कि प्रकृति अत्यधिक व्यवस्थित आनुषांगिक तथा युक्तियुक्त होती है। विध्वंस का प्रतिफल रचना तथा का प्रतिफल विध्वंस हुआ करता है। हटन ऐसे प्रथम भू वैज्ञानिक थे जिन्होंने बतलाया कि पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास चक्रीय रूपा में सम्पादित होता है। चट्टानों का निर्माण उदाहरण स्वरूपा प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रत्येक भूगर्भिक प्रक्रम अपने पिछले इतिहास में कई चक्र पूर्ण कर चुके हैं, परन्तु यह बताना कि अमुक भूगर्भिक प्रक्रम कब पहली बार कार्यरत हुआ था तथा जो प्रक्रम इस समय कार्यरत है उनका अन्त कब होगा, नितान्त कठिन कार्य है।
(2) चट्टानों की संकल्पना (Concept of Rocks) : अगर हम चट्टानों के वर्तमान रूपा का, चाहे उनका निर्माण किसी भी रूपा में किसी भी समय हुआ हो, भूगर्भिक अध्ययन करें तो यह पता चलता है कि किसी चट्टान विशेष का कब और किस परिस्थिति में किस रूपा में निर्माण हुआ। इस आधार पर भूगर्भिक इतिहास का पता लगाया जा सकता है। इसी कारण यह कहा जाता है कि ‘‘चट्टान भूगर्भिक इतिहास की पुस्तकें हैं तथा जीवावशेष उनके पृष्ठ हैं।‘‘
अनेक पर्यवेक्षणों के आधार पर यह प्रमाणित सा हो चला है कि चट्टानों के निर्माण की क्रिया एक पूर्ण चक्र के रूपा में घटित हुई है तथा होती भी है। पृथ्वी के ऊपरी भाग के निर्माण एवं विनाशकारी भूगर्भिक क्रियाओं में भी प्रायः चक्रीय क्रिया का आभास होता हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी वर्तमान घर्षित पर्वत को लिया जाय जो कि अपने पेनीप्लेन की अवस्था में पहुंच चुका है तो उसके अध्ययन से पता चलेगा कि प्रारम्भ में वह समतल भाग रहा होगा तथा बाद में भूगर्भिक उत्थान के कारण उसमें उभार आ गया होगा जिस कारण सतह से उसकी ऊँचाई अधिक होगी। इस तरह का उभार तथा कटाव द्वारा नीचा होना कई चक्र के रूपा में घटित हुआ होगा अब हम यहाँ चट्टानों के विविध प्रकारों व उनकी विशेषताओं को विस्तृत अध्ययन करेंगे।
(i) आग्नेय चट्टान :– चट्टानों की निर्माण क्रिया में भी चक्रीय सिद्धान्त लागू होता है। जब पृथ्वी की उत्पत्ति हुई तो पृथ्वी तप्त एवं तरल अवस्था में थी। उसकी धीरे-धीरे ठंडा होने से प्रथम आग्नेय शैल का निर्माण हुआ। बाद में इस चट्टान के विघटन तथा वियोजन से प्राप्त अवसाद नदी, वायु ग्लेशियर तथा सागरीय तरंगों द्वारा उपयुक्त स्थानों पर जमा कर दिये गये। फलस्वरूपा परतदार चट्टानों का निर्माण हुआ। वर्तमान पर्यवेक्षणों के आधार पर यह प्रमाणित हो चुका है कि जब दबाव का प्रभाव अत्यधिक होता है तो अत्यधिक ताप के कारण रूपाान्तरित शैल का पुनः ‘अति रूपाान्तरण‘ होता है। इस कारण मौलिक रूपाान्तरित शैल पिघल कर लावा का रूपा धारण कर लेती है जो कि शीतल होने पर जमकर ठोस रूपा धारण कर पुनः आग्नेय शैल बन जाती है।
(ii) परतदार चट्टान : आग्नेय चट्टानों के निर्माण के बाद उसके पुनः विघटन तथा वियोजन से प्राप्त चट्टानों के चूर्ण के जमाव से परतदार चट्टान का निर्माण हुआ। ताप एवं दबाव के कारण इसका रूपाान्तरण होकर रूपाान्तरित शैल का निर्माण होता है। इसके बाद दो सम्भावनायें हो सकती हैं। प्रथम, या तो रूपाान्तरित शैल के विघटन तथा वियोजन से प्राप्त मलवा के जमाव से पुनः परतदार शैल का रूपा हो सकता है तथा निर्माण का चक्र शीघ्र पूर्ण हो सकता है। दूसरा, रूपाान्तरित शैल का पुनः रूपाान्तरण के कारण द्रव रूपा हो सकता है जो ठोस होकर आग्नेय बन जायेगी।
(iii) रूपाांतरित चट्टान : रुपांतरित चट्टान आग्नेय तथा परतदार दोनों प्रकार की हो सकती है। इस चट्टान का निर्माण भी निम्न प्रकार से हुआ होगा-
1. परतदार शैल से
रूपाान्तरित शैल → परतदार शैल → रूपाान्तरण
2. रूपाान्तरित शैल → अति रूपाान्तरण के
कारण आग्नेय शैल → परतदार शैल
→ रूपाान्तरित शैला
इस प्रकार यह प्रमाणित हो चुका है कि आग्नेय चट्टान पृथ्वी की सबसे पुरानी प्राचीन चट्टानें हैं। वर्तमान समय में जिन प्राचीनतम आग्नेय शैलों का पता लग सका है उनका भी प्रवेश या अतिक्रमण प्राचीन परतदार चट्टानों में पाया जाता है। इससे यह प्रकट होता है कि वर्तमान समय की ज्ञात प्राचीनतम आग्नेय शैल ही प्रथम आग्नेय शैल नहीं है वरन् उसके पहले की भी परतदार शैल मिलती है। इस आधार पर यह निर्णय लिया जा सकता है कि प्राचीनतम आग्नेय शैल का पता अब तक नहीं लग सका है। हो सकता है उसका रूपा बदल गया हो।
‘‘चट्टानें, चाहे आग्नेय हों, या परतदार, एक तरफ पृथ्वी के इतिहास की हस्तलिपि तैयार कर है, दूसरी तरफ समकालीन दृश्यावली के लिए आधार प्रस्तुत करती हैं‘‘-ऊलरिज तथा मार्गन। स्काटली के प्रमुख भूगर्भवतेत्ता जेम्स हटन ने चट्टानों के सहारे भूगर्भिक इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के लि अनेक पर्यवेक्षण करके भगीरथ प्रयास किया तथा सन् 1785 ई. में अपने प्रमुख सिद्धान्त ‘‘वर्तमान भत की कुंजी है‘‘ का प्रतिपादन किया।
वर्तमान समय में किसी चट्टान विशेष का निर्माण विशेष प्रकार के भौगोलिक पर्यावरण तथा जलवाय सम्बन्धी दशाओं में होता है। अगर इसी प्रकार के गुणों से सम्पन्न प्राचीन चट्टान पायी जाती है तो यह बताया जा सकता है कि उस चट्टान का निर्माण वर्तमान जलवायु सम्बन्धी दशाओं एवं भौगोलिक पर्यावरण के समान ही दशाओं में हुआ होगा।
इसी प्रकार जहाँ पर लावा का विस्तार पाया जाता है तो यह प्रकट होता है कि किसी न किसी समय उक्त स्थान ज्वालामुखी का उद्गार हुआ होगां। प्रायद्वीप भारत की काली मिट्टी का क्षेत्र यह प्रकट करता है कि यहाँ पर क्रीटैसियस युग में ज्वालामुखी उद्गार के कारण वृहद् लावा प्रवाह हुआ था जिस कारण लावा की एक मोटी परत 3 लाख वर्गमील क्षेत्र में बिछा दी गई। नमक की चट्टान का निर्माण सागरीय खारे जल के वाष्पीकरण के कारण होता है। भारत के थार रेगिस्तान में नमक की चट्टानें तथा खारे जल की झीलें पायी जाती हैं। इससे यह साफ स्पष्ट होता है कि प्रारम्भ में राजस्थान सागर की गोद में था तथा कुमायूँ के पास लाइमस्टोन का पाया जाना प्रमाणित करता है कि सागर का विस्तार वर्तमान गढ़वाल तथा कुमायूँ तक था तथा शिवालिक नदी सिन्धु की खाड़ी, जो कि गढ़वाल के पास थी, में गिरती थी। बाद में सागर के पीछे हटने के कारण राजस्थान का आविर्भाव हुआ है।
हिमानी द्वारा जमाव किये जाने वाले भागों में गोलाश्म मृत्तिका प्रमुख है। अगर किसी स्थान पर चट्टानों के बीच अथवा नीचे गोलाश्म मृतिका के अवशेष पाये जाते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उक्त स्थान पर कभी हिमानी का फैलाव हुआ होगा जो कि वर्तमान समय में हट गया है, परन्तु उसका अवशेष अब भी चट्टानों के बीच वर्तमान है।
इसी प्रकार भारत की चट्टानों के मुख्य चार वर्ग माने जाते हैं 1.आर्कियन वर्ग, 2. पुराना वर्ग, 3. द्रवीदियन वर्ग, 4. आर्यन वर्ग। इनमें आर्कियन वर्ग में दो क्रम पाये जाते हैं- (i) आर्कियन क्रम तथा (ii) धारवाड़ क्रम तथा आर्यन वर्ग में गोडवाना क्रम प्रमुख हैं इनमें धारवाड़ क्रम तथा गोंडवाना क्रम की चट्टानों पर हिमानीकरण का प्रभाव नजर आता है। इससे प्रमाणित होता है कि जैसे उत्तरी गोलार्द्ध में प्लीस्टोसीन युग में एक विस्तृत हिमचादर का विस्तार हुआ था उसी प्रकार कार्बानिफरस युग में दक्षिणी गोलार्द्ध में हिमाच्छादन हुआ था, जिसका प्रभाव प्रायद्वीपीय भारत पर पाया जाता है।
चट्टानों के अवशेष जिनसे चट्टान की निर्माण क्रिया तथा निर्माण काल का पता लगाया जाता है को ‘चट्टान अवशेष‘ कहा जाता है। इसी प्रकार मौसम तथा जलवायु सम्बन्धी अनेक लक्षण चट्टानों पर विद्यमान रहते हैं जिनके आधार पर यह बताया जा सकता है कि उस समय जलवायु एवं मौसम सम्बन्धी दशाएँ कैसी थीं। इस प्रकार के चिन्ह अथवा अवशेष भाग को ‘मौसम अवशेष‘ कहते हैं।
वर्तमान समय में उपर्युक्त स्थान (अन्टार्कटिका को छोड़कर) दक्षिणी ध्रूव से पर्याप्त दूर है। फिर यह कैसे सम्भव हो सकता था कि हिमानी का विस्तार राजस्थान तक हो जाता। इस समस्या का समाधान वेगनर ने किया है। प्रारम्भ में सभी स्थल भाग एक रूपा में संलग्न थे जिसे पैंजिया कहा गया। यह एक ही सागर श्पैन्थालासाश् से घिरा था। वर्तमान दक्षिणी ध्रूव कार्बनिफरस युग में दक्षिणी अफ्रीका के नैटाल में स्थित डर्बन के पास था तथा भूमध्य रेखा उत्तरी यूरोप से होकर गुजरती थी। इस प्रकार कार्बनिफरस युग में आसानी से हिमावरण का विस्तार उक्त स्थानों पर हो गया। बाद में श्महाद्वीपीय प्रवाहश् के कारण स्थल भाग एक दूसरे से अलग हो गये तथा इस हिमानी का प्रभाव आज दूरस्थ भागों में पाया जाता है।
इस समय भारत एवं ग्रेट ब्रिटेन की जलवायु में उल्टा सम्बन्ध है। प्रथम की जलवायु उष्णार्द्र तथा दसरे की शीतल है। चट्टानों के अध्ययन से पता चला है कि कार्बानिफरस युग में ठीक इसके विपरीत दशा थी। उस समय ग्रेट ब्रिटेन में कोयले का जमाव हुआ था। कोयले का जमाव दलदली वनस्पति तथा जंगलों से होता है। इससे प्रकट होता है कि कार्बानिफरस युग में, जब कि प्रायद्वपीय भारत हिमावरण से आच्छादित था, ग्रेट ब्रिटेन की जलवायु उष्णार्द्र रही होगी। ग्रीनलैण्ड में प्राचीन चट्टानों में वनस्पतियों के ऐसे अवशेष मिले हैं जो कि उष्णार्द्र जलवायु में पनप सकती हैं। अतः ग्रीनलैण्ड की जलवायु भी उष्णार्द्र रही होगी। यदि जलवायु चक्र के परिवर्तन को प्रमाणित करने के लिए भारत से उदाहरण लिया गया जाय तो बात और स्पष्ट हो जाती है। इस तरह का परिवर्तन गोंडवाना क्रम को चट्टानों में पाया जाता है। बिहार एवं उड़ीसा में गोंडावाना क्रम की कोयले की तहें पायी जाती हैं। तालचीर कोयले की तह के नीचे गोलाश्म मृतिका पायी जाती है। तालचीर कोल सीम गोंडवाना क्रम का प्राचीनतम जमाव है। इससे प्रकट होता है कि गोंडवाना क्रम का प्राचीनतम जमाव है। इससे प्रकट होता है कि गोंडवाना क्रम की चट्टान के निर्माण के पूर्व हिमाच्छादन हुआ था तथा जलवायु ठंडी थी। इसके बाद कोयले का पाया जाना उष्ण एवं आर्द्र जलवायु को प्रदर्शित करता है। इस कोयले की तह के बाद “iron stone shale” चट्टान की परत पायी जाती है। इस प्रकार का जमाव उष्ण एवं शुष्क जलवायु में होता है। इससे प्रकट होता है कि उष्णार्द्र जलवायु के बाद शुष्क जलवायु का आगमन हुआ होगा।
इतना ही नहीं चट्टान की विभिन्न सतहों द्वारा भी भूगर्भिक इतिहास का पता चलता है । यदि कहीं पर परत के ऊपर परत का क्रमिक जमाव होता रहा है तथा वलन की क्रिया द्वारा अगर उनमें परिवर्तन नहीं हुआ है तो यह साफ स्पष्ट है कि निचली तह सबसे अधिक पुरानी होगी तथा ऊपरी तह सबसे नवीन। परन्तु प्रायः ऐसा होता ही नहीं हैं यदि विभिन्न तहों का वलन पड़ गये हों या झुकाव हो गया हो तो उनका वास्तविक क्रम बताना कठिन होता है। कभी-कभी ऊपर का वलन कटाव द्वारा कट जाता है तथा वहां पर पुनः दूसरा जमाव होने लगता है परन्तु दोनों सतहों में असम्बद्धता पाई जाती है। इस प्रकार की असम्बद्धता को असमविन्यास कहते हैं। इस असम्बद्धता से चट्टानों के इतिहास का कुछ हद तक पता लगाया जा सकता है।
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