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चार्ल्स मिशेल de l एपी (Charles Michèle de l’Epée in hindi)

(Charles Michèle de l’Epée in hindi) चार्ल्स मिशेल de l एपी : क्या आप जानते है कि गूगल ने डूडल पर जिस महान हस्ती को लगाया है वे कौन है ? नहीं जानते तो कोई बात नहीं है आज हम इनके बारे में बताने जा रहे है।

आपने कभी देखा है कि कोई भी कानों से न सुन पाने वाला व्यक्ति सामने वाले की बात को कैसे समझे या समझ पाता है ? आज कल एक चिन्ह प्रणाली उपयोग में लायी जाती है जिसकी सहायता से हम अपनी पूरी बात किसी बहरे व्यक्ति को समझा सकते है।

इस चिन्ह प्रणाली या इशारों वाली भाषा में इतनी क्षमता है कि हम अपनी पूरी बात किसी कानों से न सुन पाने वाले को सुना सकते है।

याद रखिये जिस महान व्यक्ति ने अपनी सपूर्ण जिन्दगी बहरे लोगो के जीवन को सुविधा जनक बनाने में बिताई वो “चार्ल्स मिशेल de l एपी” है।

इनको बहरों का पिता भी कहा जाता है , क्यूंकि जितना इन्होने किया है वो एक पिता ही कर सकता है या दूसरों शब्दों में कहे तो इनके प्रयास से बहरे लोगों के लिए एक भाषा का निर्माण किया गया जिसके द्वारा वे हमारी बात एक सामान्य इन्सान की तरह समझ सकते है और अगर सामने वाला व्यक्ति भी बहरा है तो भी दो बहरे व्यक्ति चिन्ह प्रणाली की भाषा का उपयोग करके बात करे सकते है।

चार्ल्स मिशेल de l एपी का जीवनी (biography of Charles Michèle de l’Epée)

इनका जन्म 24 सितम्बर 1712 को हुआ था तथा इनकी मृत्यु 23 दिसंबर 1789 को हुआ था , इनका जन्म फ़्रांस के वर्सालिस में हुआ था तथा इनकी मौत मात्र 77 साल की उम्र में फ़्रांस के पेरिस में हुआ था।
वे एक परोपकारी शिक्षक थे अर्थात उन्होंने मानवता के लिए कई कार्य किये और ऐसा करने के लिए लोगों को शिक्षा दी ताकि लोग भी परोपकारी के कार्य में लगे और मानवता को आगे बढ़ाएं।
उन्होंने फ्रांस में बहरे लोगों के लिए विश्व का पहला स्कूल खोला और इन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन बहरें लोगों के जीवन को और अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए यापन किया तथा पहली चिन्ह प्रणाली भाषा का निर्माण किया ताकि बहरे लोग आपस में बात कर सके अर्थात बहरे लोगों को भी अपनी बात को समझाया जा सके।
इन्होने बहरें लोगों के लिए जो कृत्रिम इशारों की भाषा का निर्माण किया था उसे फ़्रांस की चिन्ह भाषा कहा जाता है , कई सालों बाद इनकी भाषा को आसान और सुविधाजनक होने के कारण अमेरिका द्वारा भी अपनाया गया।

चार्ल्स मिशेल de l एपी का प्रारंभिक जीवन

इनका जन्म बहुत धनी परिवार में हुआ था , इनके पिता फ़्रांस के किंग (Louis XIV) के पास वास्तुकार का कार्य करते थे , इस बात से हम अनुमान लगा सकते है कि इनके परिवार के पास धन की कोई नहीं थी और एक सक्षम परिवार था।
लेकिन उनका मकसद इंसानियत के लिए कुछ करना तथा मानवता के लिए अपना जीवन यापन करना था , उन्होंने प्रारम्भ में कैथोलिक पादरी के लिए पढाई की लेकिन बनने के लिए मना कर दिया।
बाद में इनका ध्यान दानशील कार्यों की तरफ अधिक हो गया , इसलिए वे पेरिस के गरीब लोगों के लिए दानशील कार्य करने लग गए और उनके जीवन को उभारने की बहुत कोशिश की।
वहां उन्होंने दो बहरी बहनों को आपस में इशारों में बात करते देखा तो सोचा क्यों न बहरे लोगों की भी एक भाषा बना दी जाए ताकि ये भी अपनी बातों की समझ सके और दो बहरें व्यक्ति भी आपस में बात कर सके।
तब 1760 में उन्होंने बहरें व्यक्तियों के लिए स्कूल खोल दिया क्यूंकि वे मानते थे कि इनकी भी भाषा होनी चाहिए और इसके लिए इस भाषा की शिक्षा इनको दी जानी चाहिए।
आज उनके कार्यों के लिए उनको बाहरों का पिता (fathers of deaf) या बहरों की भाषा का पिता कहते है।
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