डेविसन जर्मर प्रयोग , डेविसन जर्मन का प्रयोग (davisson germer experiment in hindi)

(davisson germer experiment in hindi) डेविसन जर्मर प्रयोग , डेविसन जर्मन का प्रयोग : डेविसन और जर्मर ने द्रव्य के तरंग व्यवहार की पुष्टि की। 1924 डी ब्रोग्ली ने द्रव्य के द्वेत प्रकृति के बारे में बताया था इसके अनुसार द्रव्य गतिशील अवस्था में तरंग की तरह और स्थिर अवस्था में कण की तरह व्यवहार करता है , इलेक्ट्रान या द्रव्य के तरंग व्यवहार की डेविसन और जर्मर ने अपने इस प्रयोग से पुष्टि की।

प्रयोगिक व्यवस्था

डेविसन और जर्मर के पूरे प्रयोग को एक निर्वात चैंबर में बंद रखा जाता है ताकि इस प्रयोग में इलेक्ट्रानों का विक्षेपण या बिखराव हो तो वे प्रयोग से बाहर न जाए और बंद चैम्बर में रहे।
इस प्रयोग के मुख्य भाग निम्न है –
1. इलेक्ट्रॉन गन : इस भाग में एक टंगस्टन का फिलामेंट (तंतु) लगा रहा है जिसे गर्म करने पर यह इलेक्ट्रान का पुंज उत्सर्जित करता है , अर्थात इस भाग द्वारा इलेक्ट्रानों का उत्सर्जन होता है।
2. स्थिर विद्युत कण त्वरक : इस भाग में दो विपरीत आवेशित प्लेट्स लगी रहती है अर्थात इस में धनात्मक तथा ऋणात्मक प्लेट लगी रहती है जो इससे जाने वाले इलेक्ट्रान पुंज को त्वरित कर देती है।
3. समान्तरकारी छिद्र : इस भाग में सीधा एक छोटा छिद्र बना होता है , इसका कार्य होता है इलेक्ट्रान पुंज को सीधी रेखा में और त्वरण के साथ गति करवाना।
4. लक्ष्य : लक्ष्य के लिए एक निकल क्रिस्टल की प्लेट रखी होती है जिस पर यह त्वरित इलेक्ट्रान पुंज आपतित होती है।
5. डिटेक्टर : इलेक्ट्रान पुंज लक्ष्य निकल क्रिस्टल से टकराकर सीधा डिटेक्टर पर पहुचता है , इसे आप ऊपर दिखाए गए चित्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है।

प्रायोगिक विचार या उद्देश्य

त्वरित इलेक्ट्रान पुंज जब निकल क्रिस्टल पर गिरती है तो ये निकल के दो परतों द्वारा परावर्तित होती है , यदि परिणाम में सुपोषी या विनाशी व्यतिकरण प्रदर्शित हो जाता है तो इसका तात्पर्य है कि कण या द्रव्य तरंगों की तरह व्यवहार करते है।

कार्यविधि

तंतु को जब गर्म किया जाता है तो यह तंतु इलेक्ट्रान पुंज उत्सर्जित करता है जो त्वरक द्वारा त्वरित हो जाता है तथा समान्तरकारी छिद्र द्वारा एक सीधी रेखा के रूप में छिद्र से निकलता है और निकिल क्रिस्टल प्लेट पर टकराता है , टकराने के बाद यह इलेक्ट्रान पुंज सभी दिशाओं में विवर्तित हो जाता है , विवर्तित पुंजो में एक पुंज डिटेक्टर (संसूचक) पर पहुँचती है जो एक धारामापी से जुड़ा हुआ है।
डिटेक्टर (संसूचक) की अलग अलग स्थिति पर इलेक्ट्रान पुंज की तीव्रता का मान नोट करते है और इलेक्ट्रान पुंज की तीव्रता व संसूचक (डिटेक्टर) के कोण θ के मध्य ग्राफ खींचते है जो निम्न प्रकार प्राप्त होता है –
यह मान सतत प्राप्त नहीं होता है , बल्कि इस पर इसका मान अधिकतम और न्यूनतम के रूप में प्राप्त होता है निम्न प्रकार –
विवर्तन कोण θ = 50 पर शिखर प्राप्त होता है जो त्वरक विभव बढ़ाने पर पहले बढ़ता है और V = 54 वोल्ट पर या शिखर  सर्वाधिक हो जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।
डेविसन – जर्मर प्रयोग द्वारा विवर्तित कोण θ तथा उससे सम्बद्ध विभवान्तर V का मान प्राप्त होता है।
डी ब्रोगली के अनुसार इलेक्ट्रान से सम्बद्ध तरंग दैर्ध्य –
जबकि डेविसन – जर्मर विश्लेषण द्वारा ज्ञात इलेक्ट्रान से सम्बद्ध तरंग दैर्ध्य
दोनों तरंग दैर्ध्य के मान लगभग समान है अत: डी ब्रोग्ली की परिकल्पना सही थी। और हमने ऊपर देख लिया कि कण तरंग की तरह व्यवहार करता है।

द्रव्य तरंगे अथवा दे ब्रोग्ली तरंग , गुण , द्रव्य तरंगों की तरंग दैर्ध्य (theory of matter waves de broglie in hindi)

(theory of matter waves de broglie in hindi) द्रव्य तरंगे अथवा दे ब्रोग्ली तरंग , गुण , द्रव्य तरंगों की तरंग दैर्ध्य : सन 1925 में फ़्रांस के वैज्ञानिक लेविस डी ब्रोग्ली ने द्रव्य के द्वेती प्रकृति के बारे में बताया था , उन्होंने बताया कि जिस प्रकार विकिरणों की द्वैत प्रकृति होती है ठीक उसी प्रकार द्रव्य की भी द्वेत प्रकृति होती है।

उन्होंने द्रव्य की द्वैत प्रकृति को निम्न परीक्षणों के आधार पर दिया –

पूरा ब्रह्मांड द्रव्य (matter) का तथा विद्युत चुम्बकीय तरंगों का बना होता है और इसी रूप में पूरे ब्रह्माण्ड की ऊर्जा विद्यमान रहती है अत: स्वभाविक है कि द्रव्य तथा विद्युत चुम्बकीय तरंगों को आपस में एक दुसरे रूप में बदला जा सकता है।

डी ब्रोग्ली के द्रव्य के द्वेत स्वभाव के सिद्धांत में उन्होंने यह बताया कि जब कोई द्रव्य गति करता है तो गति करते हुए द्रव्य तरंग की तरह व्यवहार करता है तथा चूँकि यह द्रव्य गतिशील अवस्था में तरंग की तरह व्यवहार करता है अत: इस स्थिति में द्रव्य व्यतिकरण , विवर्तन आदि घटना भी प्रदर्शित करता है।

जब द्रव्य स्थिर अवस्था या विराम अवस्था में रहता है तो यह कण की तरह व्यवहार करता है।

इस प्रकार द्रव्य द्वेत प्रकृति प्रदर्शित करता है , गतिशील अवस्था में द्रव्य को दे ब्रोग्ली तरंग या द्रव्य तरंगे कहा जाता है।

डी ब्रोग्ली तरंगों की तरंग दैर्ध्य

माना किसी फोटोन की ऊर्जा निम्न है –

E=hυ=hc/λ            – – (1)

यहाँ h = प्लांक नियतांक = 6.626 070 150 x 10-34 J⋅s

c =  प्रकाश का वेग , v = फोटोन की आवृत्ति , λ = फोटोन की तरंग दैर्ध्य

फोटोन की स्थिर अवस्था या विराम अवस्था में द्रव्यमान शून्य होता है लेकिन गतिशील अवस्था में आइन्स्टाइन के आपेक्षिकता सिद्धांत द्वारा ऊर्जा का मान निम्न होगा –

E=mc2 – – (2)

समीकरण 1 और समीकरण 2 को हल करने पर फोतों का संवेग

P=mc=hc/cλ=h/λ    – – (3)

या डी-ब्रोगली तरंगों की तरंग दैर्ध्य निम्न होगी –

λ = h/p 

ध्यान दे कि फोटोन को हमने माना है लेकिन हम यहाँ फोटोन के स्थान पर पदार्थ का कण मान रहे है जिसका द्रव्यमान m है और p संवेग है उस स्थिति में इस कण का λ निम्न होगा .

द्रव्य तरंगों के गुण 

द्रव्य तरंग निम्न गुण प्रदर्शित करती है –

  • सूत्र से देख सकते है कि जिन कणों का भार अधिक होता है उनकी डी ब्रोग्ली तरंग दैर्ध्य छोटी होती है।
  • जो कण जितने अधिक वेग से गति करता है उसकी तरंग दैर्ध्य उतनी ही अधिक छोटी होती है।
  • जब कोई कण स्थिर अवस्था में होता है तो उससे सम्बद्ध तरंग दैर्ध्य शून्य होती है अत: जब कण गतिशील हो उससे सम्बद्ध तरंग दैर्ध्य तभी परिभाषित है।

एनोड किरण , धन किरणें क्या है , कैनाल किरण , एनोड किरणें (anode rays in hindi)(positive or canal rays)

(anode rays in hindi) एनोड किरण , धन किरणें क्या है , कैनाल किरण , एनोड किरणें : याद रखिये कि ये तीनों एक ही प्रकार की किरणें है एनोड किरणों को ही धन किरणें या कैनाल किरण (positive ray or canal ray) कहा जाता है।

विसर्जन नलिका के सिरों पर जब कम दाब पर उच्च विभवान्तर आरोपित किया जाता है तो एक किरणों की धारा (बीम) या बौछार एनोड से कैथोड इलेक्ट्रोड की ओर गति करती है , इन किरणों को ही एनोड किरणें या धन किरणें या कैनाल किरण कहा जाता है।

ये किरणें धनावेशित आयनों का एक पुंज होता है तो एनोड से कैथोड की और चलती है।

एनोड या धन किरणों की खोज यूजीन गोल्डस्टीन (Eugen Goldstein) द्वारा की गयी थी।

ऐनोड या धन या कैनाल किरणों के कुछ विशेष गुण होते है जो इन किरणों को बाकी अन्य प्रकार की किरणों से भिन्न बनाते है जो निम्न है –

गुण (Properties)

  • ये किरणें सीधी रेखा में गति करती है।
  • ये किरणें चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा विक्षेपित हो जाती है।
  • इन किरणों की आयनीकरण की क्षमता कैथोड किरणों की तुलना में बहुत अधिक होती है।
  • ये एलुमिनियम की पतली चादर की पार कर सकती है लेकिन इनकी भेदन क्षमता कैथोड किरण की तुलना में कम होती है।
  • ये किरणें प्रतिदीप्त और स्फुरदीप्ती उत्पन्न कर देती है।
  • जब इलेक्ट्रान व धन किरणें समान वेग से गतिशील हो तो हम पाएंगे की इस स्थिति में धन किरणों की गतिज ऊर्जा का मान इलेक्ट्रान की गतिज उर्जा से अधिक होती है।
  • धन किरण विद्युत क्षेत्र से विक्षेपित हो जाती है।
  • धन किरणों की चुम्बकीय क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र द्वारा विक्षेपित होने की दिशा , कैथोड किरणों के विपरीत दिशा में होती है , यह गुण दोनों प्रकार की किरणों में अंतर को दर्शाती है।

मिलिकन का तेल बूंद प्रयोग (millikan oil drop experiment in hindi)

(millikan oil drop experiment in hindi) मिलिकन का तेल बूंद प्रयोग : सन 1909 में रॉबर्ट मिलिकन और हार्वे फ्लेचर ने इलेक्ट्रॉन पर उपस्थित आवेश का मान ज्ञात करने के लिए एक प्रयोग किया जिसे तेल बून्द प्रयोग कहते है।
सामान्यत कोई भी तेल की बूंद , अपने द्रव्यमान के कारण गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से नीचे गिर जाती है , लेकिन यदि इस तेल की बूंद को आवेशित कर दिया जाए तो इस तेल की बूंद के गुरने को विद्युत क्षेत्र द्वारा रोका जा सकता है क्यूंकि इस स्थिति में विद्युत बल , द्रव्यमान बल को संतुलित कर देता है।
आरोपित विद्युत बल का मान तेल की बूंद के आकार पर निर्भर करता है , यदि तेल की बुँदे अधिक बड़ी अर्थात अधिक द्रव्यमान वाली है तो इन्हें संतुलित करने के लिए अधिक विद्युत बल आरोपित करना पड़ता है।
तेल की बूंद का द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए इन्होने हवा के श्यानता का उपयोग किया जो स्ट्रोक के नियम का पालन करती है।

गणना : जब तेल की बूंदें आवेशित होने के कारण इनका द्रव्यमान बल (W) , विद्युत बल (F) से संतुलित हो जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है –

चूँकि इस स्थिति में बूंद संतुलित अवस्था में है अर्थात कही भी गति नहीं कर रही है तो इसका तात्पर्य है कि विद्युत बल का मान द्रव्यमान बल के बराबर होगा।
F = Eq
यहाँ F = विद्युत बल , E = आरोपित विद्युत क्षेत्र , q = तेल की बूंदों पर विद्युत आवेश
W = mg
यहाँ W = बूंदों के भार के कारण बल , m = बूंदों का द्रव्यमान , g = गुरुत्वीय त्वरण
बूंदों का द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए हवा की श्यानता का का उपयोग किया गया जिसमे उन्होंने स्ट्रोक के नियम की पालना की।

श्यानता बल D = 6πηvr
यहाँ n = हवा की श्यानता , r = बूंद की त्रिज्या , v = बूंद की गति
यहाँ विद्युत क्षेत्र को आरोपित नहीं किया जाता है , बूंदों को स्वतंत्र रूप से गिरने दिया जाता है।
विभिन्न प्रकार की गणना करने के बाद मिलिकन ने इस प्रयोग के आधार पर इलेक्ट्रान का आवेश ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र दिया –

यहाँ q = इलेक्ट्रान पर आवेश
n = श्यानता गुणांक
Vg = बूंदों का सीमांत वेग (विद्युत क्षेत्र की अनुपस्थिति में)
Ve = बूँदों का सीमांत वेग (विद्युत क्षेत्र की उपस्थिति में)
V = प्लेटों पर आरोपित विभवान्तर का मान
d = प्लेटों के बीच का अन्तराल
p = तेल की बूंद का घनत्व
σ = वायु का घनत्व
g = गुरुत्वाकर्षण त्वरण
E = विद्युत क्षेत्र

थॉमसन विधि द्वारा इलेक्ट्रॉन के विशष्ट आवेश (e/m) का मान (Thomson’s method – specific charge (e/m) in hindi)

(Thomson’s method – specific charge (e/m) of an electron in hindi) थॉमसन विधि द्वारा इलेक्ट्रॉन के विशष्ट आवेश (e/m) का मान ज्ञात करना : सन 1897  में जे.जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के लिए अर्थात इलेक्ट्रान के विशिष्ट आवेश का मान ज्ञात किया।

इलेक्ट्रॉन का विशिष्ट आवेश : इकाई द्रव्यमान पर उपस्थित आवेश को विशिष्ट आवेश कहते है , इसे e/m सूत्र द्वारा लिखा जाता है।
परिभाषा के लिए m = 1 तो विशिष्ट आवेश = e हो जाता है।
अत: इकाई द्रव्यमान पर उपस्थित आवेश के मान को ही विशिष्ट आवेश कहा जाता है।
थॉमसन ने बताया कि इलेक्ट्रॉन का विशिष्ट आवेश का मान अर्थात e/m का मान विसर्जन नलिका में इस्तेमाल की गयी गैस और इलेक्ट्रोड की प्रवृति पर निर्भर नहीं करता है।
सिद्धांत : कैथोड किरणें , चुम्बकीय क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र के द्वारा विक्षेपित हो जाती है और इसी का प्रयोग इस विधि में e/m का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
विद्युत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र एक दुसरे से लम्बवत होते है अत: इनके मध्य इलेक्ट्रॉन पर कार्यरत कुल बल का मान शून्य होता है। इस स्थिति में इलेक्ट्रॉन की गति चुम्बकीय क्षेत्र और विद्युत क्षेत्र दोनों के लम्बवत होता है।
प्रयोगों के आधार पर पाया गया कि e/m का मान नियत रहता है।
संरचना : एक नलिका में तंतु पर उच्च विभव आरोपित किया जाता है ताकि उच्च विभवान्तर के कारण यह इलेक्ट्रान पुंज उत्सर्जित करे , आगे चुम्बकीय क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र के लिए दो प्लेट लगाईं जाती है जिनकी सहायता से चुम्बकीय व विद्युत क्षेत्र उत्पन्न किया जाता है।
कार्यविधि :  इलेक्ट्रान , दोनों ही क्षेत्रों के लम्बवत गति करता है और ये दोनों क्षेत्र एक दुसरे के लम्बवत होते है अत: जब कोई इलेक्ट्रान बीम (पुंज) इन दोनों क्षेत्रों के लम्बवत गति करता है तो यह अविक्षेपित रहता है।
माना इलेक्ट्रान v वेग से दोनों क्षेत्रों के मध्य गति करता है , इस स्थिति में इलेक्ट्रान पर कार्यरत बल का मान शून्य होता है अत: इस स्थिति में इलेक्ट्रान पर लगने वाला विद्युत क्षेत्र के कारण विद्युत बल और चुम्बकीय क्षेत्र के कारण लगने वाला चुम्बकीय बल का मान समान है।
अर्थात
चुम्बकीय बल = विद्युत बल
जब विद्युत क्षेत्र न हो केवल चुम्बकीय क्षेत्र हो तो यह इलेक्ट्रान का पथ परिवर्तित हो जाता है , माना r इलेक्ट्रानों के पथ की त्रिज्या है तो
r = mv/eB
या
e/m = v/rB
समीकरण में v का मान समीकरण 2 से रखने पर
e/m =
E/rB2
इस समीकरण में आरोपित विद्युत क्षेत्र E , चुम्बकीय क्षेत्र B तथा r का मान रखकर हल करने पर थोमसन को विशिष्ट आवेश e/m का मान प्राप्त हुआ। 
प्रयोग के द्वारा थोमसन को e/m अर्थात इलेक्ट्रान के विशिष्ट आवेश का मान 1.7 X 1011 c/kg प्राप्त हुआ।

कैथोड किरण : कैथोड किरणों की खोज किसने की , गुण क्या है , केथोड किरणें नलिका (cathode rays in hindi)

(cathode rays in hindi) कैथोड किरण : कैथोड किरणों की खोज किसने की , गुण क्या है , केथोड किरणें नलिका : जब किसी विसर्जन नलिका में निम्न दाब पर गैस उपस्थित हो और इस नली के सिरों पर बहुत अधिक मान का विभवान्तर आरोपित किया जाए तो कैथोड से एनोड की तरफ इलेक्ट्रोन की धारा या बौछार निकलती है , विसर्जन नलिका में कैथोड से एनोड की तरफ चलने वाले अधिक चाल के ऋणात्मक कणों को कैथोड किरण कहते है।

इसके अलावा जब किसी इलेक्ट्रान नलिका में किसी फिलामेंट को गर्म किया जाता है तो इस फिलामेंट से भी इलेक्ट्रान की धारा निकलती है अर्थात इससे भी इलेक्ट्रान उत्सर्जित होते है इन ऋणात्मक कणों को भी कैथोड किरणें कहा जता है।

परिभाषा : कैथोड किरणें इलेक्ट्रोनों की एक धारा होती है जो विसर्जन नलिका में कैथोड एलेक्ट्रोड़ से एनोड एलेक्ट्रोड़ की ओर गति करती है। अत: कैथोड किरणें अत्यधिक गतिशील ऋणात्मक कणों का समूह होता है और ये ऋणात्मक कण इलेक्ट्रान होते है। ये कण विसर्जन नलिका के कैथोड इलेक्ट्रोड से उत्सर्जित होते है और अत्यधिक वेग से एनोड इलेक्ट्रोड की तरफ गति करते है।

कैथोड किरणों की खोज किसने की (who invented cathode rays in hindi)

कैथोड किरण की खोज सन 1870 में ब्रिटिश भौतिक वैज्ञानिक सर विलियम क्रुक द्वारा की गयी थी।
कैथोड किरणों के कुछ विशेष गुण होते है जिनके द्वारा उन किरणों को आसानी से पहचाना जाता है और उन्हें इन गुणों के आधार पर विभिन्न प्रकार के दैनिक चीजों में प्रयोग में लाया जाता है अर्थात नए नए उपकरण बनाये जाते है जिनसे दैनिक जीवन और अधिक सुविधाजनक बने।
आइयें हम कैथोड़ किरणों के गुणों का अध्ययन करते है।

कैथोड किरणों के गुण (properties of cathode rays)

यहाँ हम कैथोड किरण के विभिन्न गुणों का अध्ययन करते है।
  • केथोड किरणें सीधी रेखाओं में गति करती है।
  • ये किरण चुम्बकीय क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र द्वारा विक्षेपित हो जाती है।
  • ये किरणें विसर्जन नलिका में भरी हुई गैस की प्रकृति तथा इलेक्ट्रोड की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती है।
  • कैथोड किरणें कम मोटाई वाली चादर को आसानी से भेद सकती है अत: इनकी भेदन क्षमता भी अधिक होती है।
  • जब कैथोड किरणों को अधिक परमाणु भार और अधिक गलनांक वाले लक्ष्य पर डाला जाता है तो ऐसे लक्ष्य से टकराकर ये किरणें X किरणें उत्पन्न करती है।
  • चूँकि इन कैथोड किरणों की गति बहुत अधिक होती है अत: इनकी गति के कारण इनमे गतिज ऊर्जा का मान भी बहुत अधिक होता है जो अधिक यांत्रिक दाब के लिए उपयुक्त है।
  • कैथोड किरणों द्वारा व्यतिकरण तथा विक्षेपण की घटना प्रदर्शित की जाती है इसलिए हम कह सकते है कि कैथोड किरणें तरंगों की तरह व्यवहार करती है।
  • यदि किसी पदार्थ पर कैथोड किरणों को डाला जाए तो वह पदार्थ गर्म हो जाता है।
  • इन किरणों का वेग और संवेग अधिक होता है और यह सीधी रेखा में गति करती है , इसलिए यह अपने मार्ग में अपारदर्शी चीजों की छाया बना देती है जिसका उपयोग चिकित्सा में किया जा सकता है।

विद्युत विसर्जन नलिका , गैस विद्युत विसर्जन , गैसों में विद्युत विसर्जन (electric gas discharge tube in hindi)

(electric discharge gas tube in hindi) विद्युत विसर्जन नलिका , गैस विद्युत विसर्जन , गैसों में विद्युत विसर्जन : गैस के विद्युत विसर्जन का बहुत अधिक महत्व होता है , इसकी सहायता से परमाणु के बारे में कई जानकारी मिलती है तथा इसके अलावा इसका उपयोग करके लाइट (प्रकाश/चमक) उत्पन्न की जाती है , अर्थात इसका उपयोग क्र विभिन्न प्रकार के लैंप बनाये जाते है साथ ही कई रंग का प्रकाश वाला लैंप भी आसानी से बनाया जा सकता है।
कम दाब और कम विभवान्तर पर गैस विद्युत की कुचालक की तरह व्यवहार करती है इसका कारण यह है कि कम दाब और कम विभंवातर पर गैस में कोई भी मुक्त धनायन या ऋणायन उपस्थित नहीं होते है जिससे गैस में विद्युत का चालन संभव नहीं होता है।

गैस में विद्युत विसर्जन (electric discharge through gas)

सामान्य ताप तथा दाब पर जब लगभग एक सेंटीमीटर पर रखे दो एलेक्ट्रोड़ पर उच्च विभवान्तर आरोपित किया जाता है इन दोनों इलेक्ट्रोड के बीच में विद्युत प्रवाह चिंगारियों के रूप में होने लगता है , गैस में इस प्रकार के विद्युत प्रवाह को विद्युत विसर्जन कहते है।
यहाँ उच्च विभंवातर का तात्पर्य है कि दोनों एलेक्ट्रोड़ के मध्य लगभग 20 Kv या इससे अधिक का विभवान्तर स्थापित करने आवश्यक है तभी गैस में विद्युत विसर्जन संभव है। क्यूंकि कम विभवान्तर पर गैस कुचालक की तरह व्यवहार करती है।
गैस में विद्युत विसर्जन देखने के लिए हम निम्न प्रयोग करते है –
चित्रानुसार एक विसर्जन नलिका लेते है और इसके दोनों सिरों पर बहुत अधिक मान का विभंवातर स्थापित करते है , जब दाब का मान बहुत कम होता है तो नलिका में कोई विसर्जन नहीं होता है।
लेकिन जैसे जैसे दाब को बढाया जाता है तो नलिका के अन्दर चमक उत्पन्न होने लगती है और धीरे धीरे और अधिक दाब बढाने पर इस चमक का मान अधिक होता जाता है , लगभग 10 मिमी (Hg) दाब पर नली में एक इलेक्ट्रोड से दुसरे एलेक्ट्रोड़ की तरफ टेढ़ी मेढ़ी लाल रंग की चिंगारी चलती हुई दिखाई देने लगती है और चट-चटाने की आवाज स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगती है।
विसर्जन नलिका में गैस के विद्युत विसर्जन के कारण जो रंग उत्पन्न होता है वह इस बात पर निर्भर करता है कि नलिका में कौनसी गैस उपस्थित है। अर्थात अलग अलग गैस के कारण अलग अलग रंग की चमक या चिन्गारी या प्रकाश उत्पन्न होती है।
जसे हमने अलग अलग गैसों के लिए कौनसा रंग उत्पन्न होगा वह चित्र में दिखाया है –

प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव , प्रकाश में डाप्लर प्रभाव (doppler effect of light in hindi)

(doppler effect of light in hindi) प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव , प्रकाश में डाप्लर प्रभाव : जब प्रकाश स्रोत या प्रेक्षक के मध्य आपेक्षिक गति होती है तो प्रेक्षक को प्रकाश की आवृति में परिवर्तन महसूस होता है।

अर्थात जब प्रकाश स्रोत और प्रेक्षक एक दुसरे से दूर गति करते है तो प्रेक्षक को प्रकाश की आवृत्ति घटती हुई प्रतीत होती है तथा जब प्रकाश स्रोत व प्रेक्षक एक दुसरे की तरफ गति करती है तो प्रेक्षक को प्रकाश की आवृत्ति का मान बढ़ता हुआ प्रतीत होता है।
प्रकाश स्रोत व प्रेक्षक के मध्य इस आपेक्षिक गति के कारण प्रकाश की आवृत्ति में होने वाले इस आभासी परिवर्तन की घटना को प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव की घटना कहते है।
पहले डाप्लर प्रभाव की घटना ध्वनि में देखी गयी थी लेकिन बाद में इसे प्रकाश के लिए प्रयोगों द्वारा 1901 में देखा गया , हालांकि प्रकाश तरंगे ,ध्वनी तरंगों से भिन्न होते है अर्थात दोनों के गुण भिन्न होते है जैसे प्रकाश का वेग ध्वनि तरंगों की तुलना में बहुत अधिक होता है , ध्वनि तरंगों को स्थानांतरित करने के लिए माध्यम की आश्यकता होती है लेकिन प्रकाश बिना माध्यम के भी गति कर सकता है आदि।
उदाहरण : जब कोई व्यक्ति हाथ में एक टोर्च (प्रकाश स्रोत) लेकर आपकी तरफ आता  है या आप इस टोर्च की तरफ गति करते है तो आपको लगता है की प्रकाश की तीव्रता या आवृति बढती है और जब आप इस टोर्च से दूर गति करते है तो आपको यह महसूस होता है कि प्रकाश कम होता जाता है अर्थात प्रकाश की आवृत्ति कम होती जाती है , इसे प्रकाश के डोपलर प्रभाव का एक उदाहरण कह सकते है।
माना प्रकाश स्रोत व प्रेक्षक के मध्य V वेग से आपेक्षिक गति हो रही है तथा तथा वास्तविक आवृत्ति v हो और आपेक्षिक गति के कारण अर्थात डोपलर प्रभाव के कारण आभासी आवृत्ति v’ हो तो v’ अर्थात प्रकाश की आभासी आवृत्ति का मान निम्न सूत्र से ज्ञात कर सकते है –

 

यहाँ V/C = प्रेक्षक तथा प्रकाश स्रोत के मध्य की आपेक्षिक गति (V) तथा प्रकाश की चाल (C) का अनुपात है।
अर्थात V = आपेक्षिक गति
C = प्रकाश का वेग
डॉप्लर प्रभाव के कारण आभासी तरंग दैर्ध्य का मान निम्न सूत्र के द्वारा ज्ञात किया जाता है –

यहाँ λ = जब प्रकाश स्रोत व प्रेक्षक स्थिर अवस्था में है तब स्रोत की तरंग दैर्ध्य का मान है।
नोट : ये ऊपर वाले दोनों समीकरण सूत्र तब लागू है जब प्रकाश स्रोत प्रेक्षक से दूर गति करते है।
जब प्रकाश स्रोत व प्रेक्षक एक दुसरे के पास गति कर रहे हो 
आभासी आवृत्ति =

इसी प्रकार आभासी तरंग दैर्ध्य =

डॉप्लर प्रभाव के उपयोग या अनुप्रयोग (uses or Applications of Doppler Effect of Light)

1. वाहन की गति मापने के लिए : रोड के किनारे पुलिस अफसर किसी वाहन का स्पीड का मान ज्ञात करने के लिए एक मशीन का उपयोग करते है यह मशीन डोपलर प्रभाव पर आधारित रहती है।
इस मशीन द्वारा गतिशील वाहन पर रेडियो आवृत्ति की तरंग भेजी जाती है यह तरंग वाहन से टकराकर वापस इस मशीन पर आती है चूँकि वाहन गतिशील है अत: उसकी तरंग की आवृत्ति का मान परिवर्तित हो जाता है , जितना अधिक परिवर्तन होता है उस वाहन की स्पीड उतनी ही अधिक होती है , वाहन किस स्पीड पर चल रहा है इसकी गणना एक कम्पूटर पर होती है जो आवृत्ति में परिवर्तन के आधार पर गतिशील वाहन की स्पीड की गति बता देता है।
2. चिकित्सा में भी डोपलर प्रभाव के उपयोग से कई इलाज या जांच की जाती है जैसे सोनोग्राफी , इकोकार्डीयोग्राम आदि डोपलर प्रभाव पर आधारित है।
3. हवाई जहाज आदि की गति की गणना भी डोपलर प्रभाव के आधार पर की जाती है।
4. सूर्य की घूर्णन चाल तथा तारों का वेग आदि सभी डॉप्लर प्रभाव के आधार पर ज्ञात किये जाते है।

निकोल प्रिज्म क्या है , निकॉल प्रिज्म ,संरचना , सिद्धांत ,कार्यविधि  (nicol prism in hindi , working , structure)

(nicol prism in hindi , working , structure) निकोल प्रिज्म क्या है , निकॉल प्रिज्म : निकोल प्रिज्म एक प्रकार की प्रकाशिक युक्ति है जिसका उपयोग कर प्रकाश को समान तीव्रता के दो लम्बवत और ध्रुवित प्रकाश पुंज के रूप में विभक्त करती है।
निकोल प्रिज्म केलसाइट क्रिस्टल का बना हुआ होता है , इसकी सहायता से E-किरण तथा O-किरण को आपस में पृथक किया जाता है।

 

निकोल प्रिज्म का सिद्धांत (principle of nicol prism)

यह द्वि-अपवर्तन द्वारा प्रकाश के ध्रुवण के सिद्धान्त पर कार्य करता है , इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी सामान्य प्रकाश या अध्रुवित प्रकाश को किसी विशेष प्रकार के क्रिस्टल जैसे केलसाइट , क्वार्टज़ या टूरमैलीन आदि में से गुजारा जाता है तो प्रकाश समान तीव्रता के के दो लम्बवत और ध्रुवित प्रकाश पुंजों में बंट जाता है।
अर्थात अध्रुवित प्रकाश O-किरण और E-किरण के ध्रुवित प्रकाश में विभक्त हो जाता है।
O-किरण (ordinary ray) , साधारण प्रकाश किरण होती है और यह स्नेल के नियम का पालन करती है।
E-किरण (extraordinary ray) को असाधारण प्रकाश किरण कहते है और यह स्नेल का नियम की पालना नहीं करती है।
O-किरण के लिए अपवर्तनांक का मान 1.688 होता है।
E-किरण के लिए अपवर्तनांक का मान 1.486 होता है।
दोनों के अपवर्तनांक अलग होते है अर्थात दोनों के कम्पन्न की दिशा अलग अलग होती है , लेकिन इससे निकलने के बाद वे समान्तर मार्ग अनुसरण करती है भले ही उनके तल लम्बवत हो।

निकोल प्रिज्म की संरचना (Construction of Nicol Prism)

यह केलसाइट क्रिस्टल की बनी होती है , इसकी लम्बाई का मान इसकी चौड़ाई से लगभग तीन गुना रखा जाता है।
इसके किनारों को इस प्रकार काटा जाता है की वो 68° और 112° हो जाए।
अब चित्रानुसार इनकी सतहों को तिरछा काट दिया जाता है , अब इन दोनों तिरछी काटी हुई सतहों को केनेडा बालसम नामक पदार्थ से पोलिश कर दी जाती है , केनेडा बालसम पदार्थ का अपवर्तनांक 1.55 होती है जो O-किरण और E-किरण के अपवर्तनांक के मध्य होती है।

निकोल प्रिज्म की कार्यविधि (Working of Nicol Prism)

जब कोई सामान्य प्रकाश को इस पर आपतित किया जाता है तो यह दो भागों में बंट जाता है O-किरण और E-किरण।
आगे के सिरे पर केनेडा बालसम के पदार्थ का लेप किया हुआ है जिसका अपवर्तनांक O-किरण और E-किरण के मध्य में होता है अर्थात इसका अपवर्तनांक E-किरण से अधिक होता है और O-किरण से कम होता है।
अत: स्पष्ट है कि केनेडा बालसम पदार्थ O-किरण के लिए विरल माध्यम की तरह व्यवहार करता है और E किरण के लिए सघन माध्यम की तरह व्यवहार करता है।
जब O-किरण केनेडा बालसम की परत में प्रवेश करती है तो प्रकाश सघन से विरल माध्यम में प्रवेश कर रहा है और जब आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक रखा जाए तो O-किरण का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन हो जाता है।
केवल E-किरण ही प्रिज्म से बाहर निकलती है जैसा चित्र में दर्शाया है।
इस प्रकार दोनों प्रकार की किरण अलग अलग प्राप्त होती है अर्थात सामान्य प्रकाश E-किरण और O-किरण के रूप में प्राप्त होता है।

ध्रुवित प्रकाश प्राप्त करने की चार विधियाँ (4 methods of producing polarized light in hindi)

(4 methods of producing polarized light in hindi) ध्रुवित प्रकाश प्राप्त करने की चार विधियाँ : जैसा कि हम सब जानते है कि सामान्य प्रकाश को अध्रुवित प्रकाश कहते है क्यूंकि सामान्य प्रकाश की विद्युत चुम्बकीय तरंगे एक से अधिक तल में कम्पन्न करती है , जब सामान्य प्रकाश को किसी विशेष विधि द्वारा ध्रुवित प्रकाश में बदला जाता है तो अब यह ध्रुवित प्रकाश केवल एक तल में कम्पन्न करता है अर्थात ध्रुवित प्रकाश की तरंगे केवल एक तल में कम्पन्न करती है।

अध्रुवित प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश में बदलने की विधि को ध्रुवण कहते है।

हम यहाँ अध्रुवित प्रकाश (सामान्य प्रकाश) को ध्रुवित प्रकाश में बदलने के चार तरीकों का अध्ययन करेंगे।

1. पोलेरॉइड के द्वारा प्रकाश का ध्रुवण (Polarization by using Polaroid Filter)

यह सबसे अधिक काम में ली जाने वाली विधि है अर्थात इस विधि द्वारा सबसे अधिक अध्रुवित प्रकाश को ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित किया जाता है , जैसा कि हम जानते है कि अध्रुवित (सामान्य) प्रकाश की तरंगें दो तलों में कम्पन्न करती है।  पोलेरॉइड फ़िल्टर एक तल के कम्पन्न को ब्लाक कर देता है जो पोलेरॉइड के लम्बवत होता है और दुसरे तल की कम्पन्न की तरंगों को गुजरने देता है जो इस पोलेरॉइड के तल के समान्तर होती है।  इस प्रकार इस पोलेरॉइड से निकलने वाली तरंगे केवल तल में कम्पन्न करती है अर्थात अध्रुवित प्रकाश ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है।

2. परावर्तन द्वारा ध्रुवण (Polarization by Reflection)

अधातु की सतह का उपयोग परावर्तन विधि द्वारा ध्रुवण के लिए किया जाता है , इसके अलावा पारदर्शी माध्यम के द्वारा भी ध्रुवण संभव है। जब किसी अधातु सतह पर कोई प्रकाश आपतित होता है और यदि यह एक विशेष कोण पर आपतित हो तो परावर्तन के बाद जो प्रकाश प्राप्त होता है वह ध्रुवित प्रकाश होता है , इस विधि को परावर्तन द्वारा ध्रुवण कहते है।

3. अपवर्तन द्वारा ध्रुवण (Polarization by Refraction)

इस विधि में प्रकाश की अपवर्तन विधि का प्रयोग किया जाता है , जब कोई प्रकाश तरंगें किसी एक सतह से दूसरी सतह में प्रवेश करता है तो प्रकाश अपना मार्ग परिवर्तित कर लेती है इसे प्रकाश का अपवर्तन कहते है। जब प्रकाश की तरंगे किसी विशेष सतहों से अपवर्तित होती है तो निर्गत प्रकाश ध्रुवित प्रकाश होता है।
कुछ विशेष क्रिस्टल होती है जैसे केल्साईट , जब कोई प्रकाश इन पर गिरता है तो इसके कारण प्रकाश में द्वि अपवर्तन की घटना घटित होता है जिससे निर्गत प्रकाश दो भागों में बंट जाता है जो ध्रुवित प्रकाश की तरंगे है।

4. द्विवर्णता विधि (Polarization by dichroism)

यह विधि है जो हमने पोलेरॉइड द्वारा ध्रुवित प्रकाश प्राप्त करने में काम में ली , इसमें विशेष प्रकार के क्रिस्टल का उपयोग किया जाता है जिसमे यह गुण होता है कि यह विशेष प्रकार के प्रकाश को अवशोषित कर लेता है और एक विशेष प्रकार के प्रकाश को इससे गुजरने देता है , यह निर्गत होने वाला प्रकाश ध्रुवित प्रकाश होता है और इस विधि को द्वि वर्णता विधि द्वारा प्रकाश को ध्रुवित करना कहलाता है।