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बिरसा मुंडा विद्रोह कब हुआ था | बिरसा मुंडा कौन थे जीवन परिचय क्या है ? जयंती birsa munda andolan in hindi

(birsa munda andolan in hindi) बिरसा मुंडा विद्रोह कब हुआ था | बिरसा मुंडा कौन थे जीवन परिचय क्या है ? जयंती आन्दोलन क्या है ? नेतृत्व किस नेता ने किया था ?

बिरसा मुंडा विद्रोह (1895-1901)

बिरसा मंडा विद्रोह बिहार के छोटा नागपुर के सिंहभूम और रांची जनपदों के मंुडा आदिवासियों का सबसे लोकप्रिय आंदोलन है। ऊपर जिन आंदोलनों की चर्चा की गयी है. उनकी तरह यह आंदोलन भी बकुओं या बाहरी तत्वों-जमींदारों, व्यापारियों, सौदागरों और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ था। ये वर्ग अंग्रेजों के बनाये हुए थे ओरांव और मंुडा आदिवासी जिन क्षेत्रों में रहते थे उनमें अंग्रेजों की नीतियां लागू होने से पहले इन आदिवासियों की परंपरा से चली आ रही भूमि और सामाजिक रीतियां विद्यमान थी उनकी भूमि व्यवस्था ‘खंटकारी व्यवस्था‘ के नाम से जानी जाती थी। आदिवासियों का उनकी भूमि पर परंपरागत अधिकार था इस व्यवस्था में जमींदारों के लिए कोई स्थान नहीं था आदिवासी अपनी भूमि पर काम करते थे और अपने सरदारो का मुनाफा देते थे। 1874 आते-आते अंग्रेजों ने पारंपरिक खुंटकारी व्यवस्था को समाप्त कर उसकी जगह जमींदारी व्यवस्था लागू कर दी। जमींदारी व्यवस्था लागू होने से जमींदारों और रैयता (काश्तकारों) के वर्ग बन गये। अब आदिवासियों को जमींदारों को लगान देना पड़ता था और अगर वे लगान नहीं दे पाते थे तो उन्हें भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। जमींदार इन तरीकों से आदिवासियों का शोषण करते थे। वे आदिवासियों की भूमि पर आसपास के क्षेत्रों से किसान को ले आते थे और आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल कर देते थे, उन्हें पाशविक बल से तंग करते मैं, उनकी भूमि पर अतिक्रमण कर लेते थे, उनका लगान बढ़ा देते थे, सामूहिक लगान को व्यक्तिगत लगान में बदल देते थे, उनसे जबरन बेगार करवाते थे, उन्होंने शारीरिक प्रताड़ना देते थे, उनसे विभिन्न किस्म की वसूली करते थे, जैसे घोड़ा, पालकी, दुधारू गाय, किसी बच्चे के जन्मदिन या विवाह के मौके पर उपहार, और जमींदारों के परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु पर दान दक्षिणा।

अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण हो जाने के बाद आदिवासियों को लगान देने और अपनी दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं खरीदने के लिए नगद पैसों पर निर्भर करना पड़ता था इससे वे महाजनों पर निर्भर हो गये। महाजन आदिवासियों को दिये ऋण पर मनमाना ब्याज वसूल करते थे।

जमींदार, महाजन और सरकारी अधिकारी एक-दूसरे के साथ सांठगांठ करे आदिवासियों का शोषण करते थे यहां तक कि आदिवासियों की सामाजिक व्यवस्था भी अंग्रेजी नीतियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रही, बिना कोई पैसा लिये उन्हें न्याय देने वाली पंचायतों की जगह आधुनिक अदालतें आ गयीं। दिकुओं या बाहरी तत्वों के कारण होने वाले मुंडा आदिवासियों के शोषण और दमन और उनकी पारंपरिक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के गड़बड़ाने के अलबत्ता प्राकृतिक आपदाओं से भी उनके 1896-97 और 1898-1900 में पड़े दो अकालों ने उन्हें भुखमरी का मुंह दिखा दिया।

मुंडा आदिवासियों ने अपने दुःखों के लिए दिकुओं और मिशनरियों को जिम्मेवार माना इसलिये वे दिकुओं से घृणा करने लगे उनका मानना था कि उनके दुःखों का एक ही इलाज था वह यह कि दिकुओं को हटाकर अपना स्वयं का राज स्थापित किया जाये। बिरसा मुंडा विद्रोह से भी पहले, सरदार आंदोलन उन तमाम यूरोपियों के खिलाफ चला था जिन पर जमींदारों से मिली-भगत का संदेह था, उनमें मिशनरी भी थे और अधिकारी भी। इस आंदोलन का नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया।

बिरसा मुंडा 

बिरसा के जन्म की सही तिथि का पता नहीं है। सुरेश सिंह के अनुसार वह 1874 या 1875, में पैदा हुआ होगा। उसका जन्म एक गरीब मुंडा आदिवासी परिवार में, बांस की पाट्टियों वाले, बिना मिट्टी की लिपाई या सुरक्षित छत वाले एक घर में हुआ था। बजरू के जर्मन मिशन से निम्न प्राथमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह आगे पढ़ाई के लिए चाईबासा भेज दिया गया। चाईबासा में 1886 से 1890 तक का लंबा प्रवाम उसकी जिंदगी का निर्माणकारी दौर रखा। उसे मिशनरियों की आलोचना करने के अपराध में स्कूल से निकाल दिया गया। स्कूल से निकाला जाना उसकी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ था वह अक्सर कहा करता: ‘‘साहब, साहब एक टोपी है’’ (सभी गोरे, चाहे वे अंग्रेज हों या मिशनरी, एक सी टोपी पहनते हैं) मिशनरियों और सरकार के प्रति उनके दृष्टिकोण ने उसे मिशनरी विरोधी और सरकार विरोधी बना दिया, उसने शायद प्राथमिक स्तर तक पढ़ाई पूरी की। 1860 में उसके परिवार ने जर्मन मिशन के खिलाफ सरदार आंदोलन का अनुकरण करते हुए उसकी सदस्यता छोड़ दी।

वह 1891 में बंद गांव गया, जहां उसका संपर्क आनंद पौड़े से हुआ। आनंद पौड़े बंद गांव के एक जमींदार जगमोहन सिंह का मंुशी था। उसका वैष्णव धर्म और हिंदू महाकाव्यों में अच्छा दखल था और उसका सम्मान और प्रभाव था। मुंडा उससे प्रभावित हुआ, उसने जनेऊ धारण कर लिया, चंदन तिलक लगाने लगा और गोहत्या बंद करने की वकालत करने लगा। बिरसा एक ‘नबी‘ हो गया। उसने अपने आपको एक भगवान घोषित कर दिया। उसने अपने धर्म (विचारों) का प्रचार मुंडा आदिवासियों में किया। हजारों मुंडा उसके अनुयायी हो गये और बिरसाई कहलाये। उसने अपने अनुयायियों को उपदेश दिया कि वे दिन में तीन बार प्रार्थना करें, सफाई से रहें और एक-दूसरे के साथ प्रेम और सद्भाव बनाकर रहें. और सामूहिक प्रगति करें। उसने उन्हें अंग्रेज सरकार और विदेशियों के खिलाफ लामबंद किया और उन्हें उपदेश दिया। मृत्यु 9 जनवरी 1900 को जेल में हुई।

आंदोलन की प्रगति 

बिरसा आंदोलन की पृष्ठभूमि सरदार आंदोलन की पृष्ठभूमि जैसी ही थी बिरसा का उद्देश्य मुंडा आदिवासियों के लिए धार्मिक और राजनीतिक स्वाधीनता हासिल करना था। उसका मानना था कि इस उद्देश्य का दिकुओं द्वारा दमन को समाप्त करके और यूरोपीय (अंग्रेजों)को अपने क्षेत्र से बाहर निकाल कर या उन्हें मार कर हासिल किया जा सकता था, उसने बिरसा राज का ऐलान किया जिसमें बिरसा को छोड़ और किसी का आदेश नहीं माना जा सकता था। उसने मुंडा आदिवासियों से कहा कि वे लगान नहीं दें। सरकार ने 22, अगस्त, 1895 को बिरसा को गिरफ्तार करने का फैसला किया। बिरसा और दूसरे लोगों पर 19 नवम्बर, 1895 को दंगा करने का अभियोग लगा। उसे दो साल कैद की सजा हुई और रु. 50 जुर्माना देने का आदेश हुआ जाना न दे पाने की स्थिति में उसे छह महीने सश्रम कारावास (कैद) के अतिरिक्त सजा भी भुगतनी थी, लेकिन 22 जून, 1895 को की गयी एक अपील के आधार पर निचली अदालत के आदेशों में संशोधन किया गया और कैद की अवधि ढाई वर्ष से घटाकर दो वर्ष कर दी गयी। बिरसा की गिरफ्तारी से आंदोलन के सरकार विरोधी पूर्वग्रह ने जोर पकड़ लिया। 1895 के दंगों की भीषणता के बारे में खेरेंड हॉफमैन ने लिखा, ‘‘अगर सरकार ने तुरंत कार्यवाही न की होती तो, रांची के बाहर रहने वाले अधिकांश विदेशी मौत के घाट उतार दिये जाते।’’ इस आंदोलन के बारे में सुरेश सिंह ने कहा है, ‘‘सन् 1895 का आंदोलन एक अधूरी कहानी थी यह विद्रोह नहीं था बल्कि एक व्यापक आंदोलन की शुरुआत थी।’’

मुंडा आदिवासियों ने दिकुओं के खिलाफ बिरसा के नेतृत्व में एक बार फिर विद्रोह किया। ‘बिरसा राज की प्राप्ति केवल यूरोपीयों (अधिकारियों और मिशनरियों) से मुक्त दुनिया में ही संभव थी। बिरसा ने ऐलान किया कि मुंडा धरती के स्वामी थे। अंग्रेज गैर आदिवासियों को जमींदार नियुक्त करके उन (मुंडा आदिवासियों) से उनका देस छीन रहे थे। बिरसा ने मुंडा न देना बंद करें, भूमि पर लगान मुक्त कब्जा भूमि पर मुंडा आदिवासियों के पुराने अधिकारों को हासिल करें। रेवरेंड हॉफमैन के शब्दों में, “विदेशियों के प्रति चाहें वे हिंदू हों या यूरोपीय, पुरा जनन था।’’ यह उल्लेखनीय है कि यह आंदोलन उन बाहरी तत्वों के खिलाफ था जो शोषक वर्गों के सदस्य थे। आंदोलन में उन वर्गों को निशाना नहीं बनाया गया जो थे तो बाहरी तत्व लेकिन निचले वर्गों के सदस्य थे, अर्थात् मजदूर दस्तकार, जुलाहे, बढ़ई, नाई आदि।

इस आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया। ये पूर्व निश्चित दिन बड़े दिन की पूर्व संध्या (24 दिसम्बर, 1899) को शुरू हुआ। इसका निशाना जमींदार, ठेकेदार, पुलिस और सरकारी अधिकारी थे। आदिवासियों में बाहरी तत्वों पर अपने पारंपरिक हथियारों-धनुष-बाण से हमला किया और उनके घरों को आग लगा दी। आंदोलन के लिए जो दिन जो मौका चुना गया था वह ईसाईयों, यूरोपीयों और जर्मन मिशनरियों के प्रति उसकी घृणा का प्रतीक था। बिरसाई चिल्लाते थे, ‘काले ईसाईयों को काट डालो, गोरे ईसाईयों को काट डालो‘ जल्दी ही आंदोलन ‘सामान्य हो गया था’‘ बिसाईयों की लकड़ी के ठेकेदारों से झड़प हुई, उन्होंने 6. जनवरी, 1900 को एक ठेकेदार को मार डाला। 5 जनवरी, 1900 को उन्होंने सिपाहियों को  मारा और चैकीदारों पर हमला किया। 6 जनवरी, 1900 को उनकी मठभेड उपआयुक्त से हुई। 7 जनवरी, 1900 को उन्होंने एक सिपाही को मार डाला। जल्दी ही सरकार ने जवाबी कार्यवाही की। सरकार ने 13 जनवरी से 26 जनवरी तक गश्त और तलाशी अभियान छेड़ा।

28 जनवरी को दो अगुआ मुंडा सरदारों और 32 अन्यों उनकी जायदाद की कुर्की के बाद आत्म समर्पण कर दिया। पुलिस ने 3 फरवरी, 1900 को बिरसा को गिरफ्तार कर लिया। वह बीमारी हैजा और कमजोरी से ग्रस्त था। उसकी मृत्यु 9 जनवरी, 1900 को भयंकर दस्त. से हुई। गिरफ्तार मुंडा आदिवासियों पर निर्ममता से मुकदमा चलाया गया। मंुडा (बिरसाईयों) के मुकदमे की खबर देते हुए कलकत्ता के एक अखबार के संवाददाता ने लिखा, ‘‘मझे लगभग तीस वर्षों का अनुभव है। मैंने पहले कभी अंग्रेजी न्याय के विचारों से मेल न रखने वाली ऐसी कोई कार्यचाही नहीं देखी जैसी कि मंुडा आदिवासियों के दंगों के मामले में देखने को मिली।’’ गिरफ्तार मुंडा आदिवासियों को जेल में डाल दिया गया, उन्हें मौत की सजा सनायी गयी मुकदमे के नतीजे ने मुंडा आंदोलन को कमजोर कर दिया।

आंदोलन का प्रभाव 

बिरसा मंडा आंदोलन का प्रभाव उनकी समस्याओं के प्रति सरकार के रवैये पर पड़ा। अधिकारियों ने भूमि के रिकार्ड तैयार करने की आवश्यकता महसूस की जिससे वे आदिवासियों के हितों की रक्षा कर सकें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सरकार ने 1902 और 1910 के बीच आदिवासियों के लिए सर्वेक्षण और भूमि बंदोबस्त अभियान चलवाये। सरकार ने अनिवार्य बेगार व्यवस्था समाप्त करने का निश्चय किया और मंदरी खतकारी व्यवस्था को मान्यता देने वाले काश्तकारी कानून (अधिनियम) 1903 को पारित किया। सरकार ने छोटा नागपुर काश्तकारी कानून (1908) भी पारित किया।

बिरसा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नायक बन गया। उसके आंदोलन ने भविष्य के सामाजिक, धार्मिक और धार्मिक आदिवासी आंदोलनों को प्रेरणा दी। इन आंदोलनों ने आदिवासियों में चेतना या जागृति का विकास करने में योगदान किया। वर्स डे स्कूल के बिरसाईयों और धरना भगतों ने 1920 के दशक में राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के लिये वे इस तरह प्रार्थना करते थेः.

‘‘है पिता पाना, सीमा पर दुश्मनों को बाहर निकालो,

चुडैलों और प्रेतात्माओं को बाहर निकलो,

अंग्रेजी सरकार को बाहर निकालो।’’

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और फार्वर्ड ब्लॉक ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में बिरसाईयों का समर्थन लेने के लिए बिरसा के नाम का आह्वान किया। कांग्रेस और फार्वर्ड ब्लॉक दोनों ने 1940 में बिरसा दिवस मनाया।

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