जीवाणु क्या है ? (bacteria in hindi) , जीवाणु कोशिका की संरचना , जीवाणु में जनन परिचय , महत्व

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(bacteria in hindi) सबसे बड़ा जीवाणु कौन सा है , जीवाणु क्या है ? जीवाणु कोशिका की संरचना , जीवाणु में जनन परिचय , महत्व ? परिभाषा बैक्टीरिया का वर्गीकरण ?

जीवाणु (bacteria in hindi) : जीवाणुओं का अध्ययन बैक्टीरियोलॉजी अथवा जीवाणु विज्ञान कहलाता है। लिनियस ने जीवाणुओं को वर्मिस वंश में रखा। नगेली ने उन्हें शाइजोमाइसिटीज के अंतर्गत वर्गीकृत किया।

ये एक कोशिकीय , सूक्ष्मदर्शीय सर्वव्यापी जीव है।

सूक्ष्मजैविकी विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत सूक्ष्मजीवों और उनकी प्रतिक्रिओं का अध्ययन किया जाता है।

एंटोनी वाल ल्यूवेनहॉक को “जीवाणु विज्ञान का जनक ” और रॉबर्ट कोच को आधुनिक सूक्ष्मजैविकी का जनक कहा जाता है।

ये कोशिका भित्ति युक्त सबसे छोटे प्रोकैरियोट्स है। इन्हें पौधों के अत्यधिक विशिष्ट एक कोशिकीय समूह में रखा गया है। ये जन्तुओ से भिन्न होते है क्योंकि इनमे एक दृढ कोशिका भित्ति पाई जाती है और इनमे विटामिन संश्लेषण की क्षमता होती है। जीवाणुओं को सर्वप्रथम एंटोनी वाँन ल्यूनहॉक (एक डच , लेंस निर्माणक) ने सन 1683 में देखा और उन्हें “एनिमलक्यूल्स” नाम दिया। लुईस पाश्चर (1822-95) ने जीवाणुओं का विस्तृत अध्ययन किया तथा रोगों का जीवाणु सिद्धान्त प्रतिपादित किया। एरनबर्ग ने 1829 में जीवाणु शब्द प्रस्तुत किया। रॉबर्ट कोच (1881) ने पाया कि कुछ रोग जैसे – मानव में ट्यूबरकुलोसिस (तपेदिक) और हैजा मवेशियों में एंथ्रेक्स आदि जीवाणुओं के कारण उत्पन्न होते है। लिस्टर ने एंटीसेप्टिक शल्य क्रिया का प्रारंभ किया।

उन्होंने शल्य क्रिया के उपकरणों को रोगाणुविहीन करने हेतु कार्बोलिक अम्ल का प्रयोग किया। पाश्चुरीकरण सिद्धान्त का प्रतिपादन लुईस पाश्चर द्वारा किया गया था।

(1) जीवाणुओं का आकार : जीवाणु की लम्बाई 3 से 5 माइक्रोंस (1u = 1/1000 मिलीमीटर अथवा लगभग 1/25000 इंच) होती है। जीवाणुओं की कुछ स्पीशीज का व्यास लगभग 15u है।

सबसे छोटा जीवाणु डाइलिस्टर न्यूमोसिन्टिस (0.15 – 0.3 u) है।

हाल ही में खोजा गया सबसे बड़ा जीवाणु एपुलोपिसियम फिशेलसोनी है जो 0.3 mm लम्बा होता है (इससे पहले कॉकरोच में बेसीलस ब्यूटसचली और स्पाइरिलम बोल्यूटेन्स को सबसे बड़ा जीवाणु समझा जाता था।)

(2) जीवाणुओं की आकृति : जीवाणु निम्न प्रकार के रूपों में पाए जाते है –

कोकाई (ग्रीक : कॉकस = बैरी) : इनकी आकृति गोल अथवा अण्डाकार होती है। एकल रूप में पाए जाने पर ये “माइक्रोकॉकस” (जैसे – माइक्रोकॉकस ) ; युग्मों में पाए जाने पर “डिप्लोकॉकस ” (डिप्लोकॉकस न्यूमोनी) ; चार के समूह में टेट्राकॉकस , श्रृंखला के रूप में पाए जाने पर स्ट्रेप्टोकॉकस (जैसे – स्ट्रेप्टोकॉकस लैक्टिस) ; अंगूर के समान गुच्छो में पाए जाने पर स्टेफिलोकॉकस ओरियस और 8 अथवा 64 के घनाकार समूहों में पाए जाने पर “सर्सिना” (जैसे – सर्सिना) कहलाते है।

बेसिलाई : ये छड़ाकार जीवाणु है जिनमें फ्लैजिला उपस्थित अथवा अनुपस्थित रहता है। ये एकल रूप में (बेसिलस) ; युग्मो के रूप में (डिप्लोबेसिलस) अथवा श्रृंखला के रूप में (स्ट्रेप्टोबेसिलस) पाए जाते है।

विब्रिओज : ये छोटे और कौमा (,) अथवा किडनी के समान आकृति वाले होते है। इनके एक सिरे पर फ्लैजिलम होता है , अत: ये चलनशील होते है। विब्रिओ जीवाणुओं की कोशिका में एक मोड़ पाया जाता है। जैसे – विब्रिओ कॉलेरी।

स्पाइरुलम : ये जीवाणु सर्पिलाकार या कॉर्क – स्क्रू की भाँती कुंडलित रहते है। इसका सर्पिलाकार रूप समान्यत: दृढ होता है और इसके एक अथवा दोनों सिरों पर दो अथवा अधिक फ्लैजिला पाए जाते है। जैसे – स्पाइरुलम स्पाइरोकीट इत्यादि।

फिलामेंट अथवा तन्तु : इन जीवाणुओं का शरीर कवकों के मायसीलिया की भाँती तन्तुवत होता है। इनके तन्तु बहुत छोटे होते है। जैसे – बोगियोटोआ थीयोथ्रिक्स आदि।

वृन्त युक्त : इन जीवाणुओं के शरीर में एक वृन्त पाया जाता है। जैसे – कॉलोबैक्टर।

मुकुलित : इन जीवाणुओं का शरीर विभिन्न स्थानों पर फूला रहता है। जैसे – रोड़ोमाइक्रोबियम।

(3) फ्लैजिलेशन अथवा कशाभिक विन्यास : फ्लैजिला की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर जीवाणु निम्नलिखित प्रकार के होते है –

एट्राइकस : इन जीवाणुओं में फ्लैजिलम अनुपस्थित रहता है। जैसे : पाश्चुरेला पेस्टिस , लैक्टोबेसिलस।

मोनोट्राइकस : इन जीवाणुओं में एक सिरे पर एक फ्लैजिलम पाया जाता है। जैसे – विब्रिओ कॉलेरी।

लोफोट्राइकस : इन जीवाणुओं के एक सिरे पर एक फ्लैजिला का समूह पाया जाता है। जैसे – स्पाइरीलम वोल्यूनटेन्स।

एम्फीट्राइकस : इन जीवाणुओं के दोनों सिरों पर एक फ्लैजिला का एक समूह पाया जाता है। जैसे – नाइट्रोसोमोनास।

पेरिट्राइकस : इन जीवाणुओं के सम्पूर्ण शरीर पर अनेक फ्लैजिला पाए जाते है। जैसे – ई. कोलाई , क्लोस्ट्रिडियम टिटेनाई।

जीवाणुओं का रंजन (staining of bacteria)

  1. साधारण रंजन: केवल एक विलयन द्वारा जीवाणुओं को रंजित करके स्थायी “स्मीयर” के रूप में प्राप्त करना “साधारण रंजन” कहलाता है।

कोशिकाएँ प्राय: एक समान रूप से रंजित होती है।

  1. ग्राम रंजन: इस तकनीक की खोज हैन्स क्रिश्चियन ग्राम (1884) ने की थी। यह एक विशिष्ट तकनीक है , जिसके द्वारा जीवाणुओं को ग्राम धनात्मक और ऋणात्मक समूहों में बाँटा जाता है। इसमें जीवाणुओं को क्रिस्टल वॉयलेट के दुर्बल क्षारीय विलयन द्वारा रंजित किया जाता है। अब जीवाणुओं की रंजित स्लाइड को 0.5% आयोडीन विलयन से उपचारित करते है। तत्पश्चात इसे जल अथवा एसीटोन अथवा 95% एथिल एल्कोहल से धोते है। जो जीवाणु पर्पल रंग ग्रहण करते है , वे ग्राम धनात्मक और जो जीवाणु विरंजित हो जाते है , वे ग्राम ऋणात्मक कहलाते है। प्राय: ग्राम धनात्मक जीवाणुओं की कोशिका भित्ति , ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं की अपेक्षा सरल प्रकृति की होती है। ई. कोलाई एक ग्राम-ve (ऋणात्मक) जीवाणु है। ग्राम निगेटिव जीवाणुओं को एक अन्य स्टेन सेफ्रेनिन की सहायता से देखा जा सकता है।

ग्राम +ve बैक्टीरिया : उदाहरण : न्यूमोनोकॉकस , स्ट्रेप्टोकॉकस , स्टेफिलोकॉकस , बेसिलस , क्लोस्ट्रिडियम , माइकोबैक्टीरियम , स्ट्रेप्टोमाइसिस।

ग्राम -ve बैक्टीरिया : उदाहरण – साल्मोनेला , स्यूडोमोनास , इशरिकिआ , हीमोफिलस , हैलिकोबैक्टर , विब्रियो , राइजोबियम।

ग्राम – पॉजिटिव ग्राम – निगेटिव
1.       कोशिका भित्ति मोटी (250-300 A) कोशिका भित्ति पतली (100-150 A)
2.       कोशिका भित्ति समांग कोशिका भित्ति विषमांग
3.       कोशिका भित्ति में केवल एक पर्त कोशिका भित्ति में 3 पर्त
4.       कोशिका भित्ति अधिक दृढ कोशिका भित्ति अपेक्षाकृत कम दृढ़
5.       कोशिका भित्ति म्यूकोपेप्टाइड (80%) द्वारा निर्मित कोशिका भित्ति लाइपोप्रोटीन , लाइपो पोलीसैकेराइड और म्यूकोपेप्टाइड द्वारा निर्मित
6.       टीकोइक अम्ल (5-10) उपस्थिति टीकोइक अम्ल अनुपस्थित
7.       बीजाणु निर्माणक रूप सम्मिलित कोई बीजाणु निर्माणक रूप नहीं
8.       ध्रुवीय फ्लैजिलम प्राय: अनुपस्थित ध्रुवीय फ्लैजिलम प्राय: उपस्थित
9.       Mg राइबोन्यूक्लियेट उपस्थित Mg- राइबोन्यूक्लियेट अनुपस्थित
10.    एक्सोटोक्सिंस निर्माण कर सकते है एंडोटोक्सिस निर्माण कर सकते है
11.    पेनिसिलिन के प्रति संवेदनशील पेनिसिलिन के प्रति असंवेदनशील
12.    पेप्टाइड में L-लायसीन उपस्थित पेप्टाइड में डाइएमीनो पामिलिक अम्ल उपस्थित
13.    O एंटीजन अनुपस्थित O एंटीजन उपस्थित

जीवाणु कोशिका की संरचना (structure of bacterial cell)

  1. कैप्सूल: अनेक जीवाणुओं की कोशिका भित्ति के बाहर एक स्लाइमी कैप्सूल पाया जाता है। यह कैप्सूल पोलीसैकेराइड्स से निर्मित होता है। और इसमें नाइट्रोजनी पदार्थ (एमीनो अम्ल) भी उपस्थित रहते है। यह स्लाइमी पर्त मोटी हो जाने पर कैप्सूल कहलाती है। कैप्सूल का निर्माण करने वाले जीवाणु कैप्सुलेटेड अथवा वाइरुलेंट जीवाणु कहलाते है।

कैप्सूल प्राय: परजीवी रूपों में पाया जाता है। जैसे – बेसिलस एन्थ्रेसिस , डिप्लोकॉकस न्यूमोनी , मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस।

यह जीवाणुओं को फैगोसाइटोसिस और एंटीबायोटिक्स से सुरक्षा प्रदान करता है। कैप्सूल कोशिका को विघटन या विषाणुओं के आक्रमण से भी सुरक्षित रखता है। कैप्सुलेटेड जीवाणु में प्राय फ्लैजिला अनुपस्थित होता है तथा ये एट्राइकस कहलाते है।

कैप्सुलेटेड जीवाणु चिकनी कॉलोनियो का निर्माण कर S प्रकार बैक्टीरिया कहलाते है। जो कि अत्यधिक वायरुलेंट होते है। जबकि दुसरे प्रकार के जीवाणु नॉन कैप्सुलेटेड कहलाते है तथा यह रफ कॉलोनी का निर्माण कर R जीवाणु कहलाते है।

  1. कोशिका भित्ति: सभी जीवाणु कोशिकाएँ एक सुदृढ और सशक्त कोशिका भित्ति से घिरी रहती है। अत: इन्हें पादपों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है। कैप्सूल के अन्दर कोशिका भित्ति उपस्थित रहती है। जीवाणुओं की कोशिका भित्ति का निर्माण पोलीसैकेराइड्स , प्रोटीन्स और लिपिड्स से होता है।

जीवाणुओं की कोशिका भित्ति में शर्करा के दो महत्वपूर्ण व्युत्पन्न NAG और NAM (N – एसिटिल ग्लूकोसामाइन और N एसिटिल म्यूरेमिक अम्ल ) पाए जाते है। इसके अतिरिक्त इसमें L अथवा D एलानिन , D ग्लुटामिक अम्ल और डाइएमीनोपिमेलिक अम्ल भी पाए जाते है।

जीवाणुओं की कोशिका भित्ति का एक अद्वितीय घटक पेप्टाइडोग्लाइकेन अथवा म्यूकोपेप्टाइड अथवा म्यूरिन (म्यूकोपोलीसैकेराइड + पोलीपेप्टाइड से निर्मित ) है।

पेप्टाइडोग्लाइकेन में NAG और NAM ; छोटी पेप्टाइड श्रृंखलाओं और अमीनो अम्लों के क्रॉस ब्रिजेज द्वारा परस्पर जुड़े रहते है।

ग्राम -ve जीवाणुओं की कोशिका भित्ति की बाह्य सतह लाइपोपोलीसैकेराइड्स से और ग्राम +ve जीवाणुओं की कोशिका भित्ति टीकोइक अम्ल से निर्मित होती है।

ग्राम -ve जीवाणुओं की अपेक्षा ग्राम +ve जीवाणुओं की कोशिका भित्ति अधिक मोटी होती है और उसमे लिपिड्स की मात्रा भी कम होती है। लाइसोजाइम एंजाइम जीवाणु की कोशिका भित्ति को घोल देता है।

  1. प्लाज्मा झिल्ली: प्रत्येक जीवाणु कोशिका में कोशिका भित्ति के ठीक नीचे (अन्दर) प्लाज्मा झिल्ली स्थित रहती है। यह एक पतली , प्रत्यास्थ और वर्णात्मक पारगम्य झिल्ली है , इनका निर्माण फास्फोलिपिड्स और प्रोटीन्स की बड़ी मात्रा से और पोलीसैकेराइड्स की कुछ मात्रा से होता है लेकिन इसमें स्टेरोल्स का अभाव होता है। इनमे श्वसन एंजाइम्स पाए जाते है , यह इनका विशेष गुण है।

मीजोसोम : प्लाज्मा झिल्ली की आंतरिक सतह पर (प्राय: मध्य बिंदु पर) कुछ वृत्तीय कुंडलित रचनाएँ पाई जाती है , जिन्हें मीजोसोम्स कहते है। वस्तुतः ये प्लाज्मा झिल्ली के अंतर्वलन है। मीजोसोम्स में श्वसन एन्जाइम्स (जैसे – ऑक्सीडेजेज और डिहाइड्रोजिनेजेज) पाए जाते है , जो श्वसन में सहायता करते है। इस कारण मीजोसोम्स को “जीवाणु कोशिका का माइटोकोंड्रिया” अथवा कोंड्रियोइड्स भी कहते है। ग्राम +ve जीवाणुओं में मीजोसोम्स अधिक सुस्पष्ट होते है।

ये संयुग्मन और डीएनए रेप्लिकेशन के दौरान डीएनए को ग्रहण करते है।

मीजोसोम , कोशिका विभाजन के दौरान पट निर्माण में योगदान करते है।

  1. कोशिकाद्रव्य और कोशिकाद्रव्वीय अंतर्वस्तुए: कोशिकाद्रव्य एक जटिल , जलीय तरल अथवा अर्ध तरल मैट्रिक्स (आधार – द्रव्य) है जो कार्बोहाइड्रेट्स , विलेय प्रोटीन्स , एन्जाइम्स , को-एन्जाइम्स , विटामिन्स , लिपिड्स , खनिज लवणों और न्यूक्लिक अम्लों से बना होता है। कोशिकाद्रव्य के कार्बनिक पदार्थ कोलाइडी अवस्था में रहते है।

कोशिकाद्रव्य राइबोसोम्स की उपस्थिति के कारण कणिकामय होता है। जीवाणु में राइबोसोम्स (70s) पोलीराइबोसोम के रूप में पाए जाते है। जीवाणुओं में झिल्लीकृत कोशिकांग जैसे – माइटोकोंड्रिया , एन्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम , गोल्जीकाय , लाइसोसोम्स , रिक्तिकाएँ आदि अनुपस्थित रहते है। कुछ प्रकाश संश्लेषी जीवाणुओं में प्लाज्मा झिल्ली से बड़े वैसिकुलर थायलेकोइड्स की उत्पत्ति होती है , जिनमे प्रोटीन्स और बैक्टीरियोक्लोरोफिल की प्रचुर मात्रा विद्यमान रहती है।

वोल्यूटिन कणिकाएँ : इन्हें सर्वप्रथम स्पाइरुलम वोल्युटेंस जीवाणु में खोजा गया। इन्हें मेटाक्रोमेटिक कणिकाएं भी कहते है , जो पोलीफास्फेट से निर्मित होती है। वोल्यूटिन कणिकाएँ , फास्फेट के संचित स्रोत की भाँती कार्य करती है।

पोली β – हाइड्रोक्सी ब्युटाइरिक एसिड ग्रेन्युल्स अथवा PHB : यह वसा जैसे पदार्थ के बहुलकीकरण से बनी कणिकाएँ है जो क्लोरोफॉर्म में विलेय होती है तथा प्राय: वायवीय जीवाणुओं विशेषकर उच्च कार्बन निम्न नाइट्रोजन युक्त संवर्धन परिस्थितियों में पाई जाती है। ये कणिकाएँ कार्बन और ऊर्जा के संचित स्रोत की भाँती कार्य कर सकती है।

ग्लायकोजन और सल्फर कणिकाएँ : ग्लायकोजन को पोलीसैकेराइड कणिकाएँ भी कहा जाता है। ये आयोडीन के साथ भूरे रंग से रंजित होती है। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में ये गहरे रंग की कणिकाओं के समान दृष्टिगोचर होती है।

  1. न्युक्लियोइड: यह जीनोफोर , नग्न केन्द्रक , आद्य केन्द्रक भी कहलाता है। इसमें केन्द्रकीय पदार्थ (डीएनए) उपस्थित होता है। जो जीवाणुओं का डीएनए डबल हेलिकल और वृत्तीय होता है। यह कुछ प्रारूपिक प्रोटीन्स (पोलेमीन्स) से घिरा रहता है लेकिन हिस्टोन प्रोटीन से नहीं। जीवाणुओं में हिस्टोन (क्षारीय) प्रोटीन्स अनुपस्थित रहती है। आभासी अथवा विसरित केन्द्रक को न्युक्लियोइड अथवा जीनोफोर कहा जाता है।
  2. प्लाज्मिड: अनेक जीवाणुओं (जैसे – ई. कोलाई) में सामान्य डीएनए गुणसूत्रों के साथ , अतिरिक्त गुणसूत्रीय आनुवांशिक (डीएनए की) रचनाएँ पाई जाती है , जिन्हें प्लाज्मिड्स कहते है। प्लाज्मिड्स छोटे , वृत्तीय , द्विसूत्री DNA अणु होते है। प्लाज्मिड डीएनए स्वतंत्र रूप से विभाजन करता है , अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये रखता है तथा अनेक महत्वपूर्ण जींस का वहन कर सकता है। प्लाज्मिड शब्द लैडरबर्ग (1952) द्वारा प्रस्तुत किया गया था। कुछ प्लाज्मिड्स , जो जीवाणुओं के DNA गुणसूत्रों से संयोजित रहते है , उन्हें एपिसोम्स कहते है।

प्लाज्मिड के प्रकार

(i) F – कारक अथवा उर्वरता कारक : यह आनुवांशिक पदार्थ के स्थानान्तरण के लिए उत्तरदायी होता है।

(ii) R – कारक अथवा प्रतिरोधक कारक : यह औषधियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।

(iii) col कारक (colicinogenic factor) : जो कॉलीसीन्स उत्पन्न करते है जो दुसरे जीवाणु को नष्ट करते है (कॉलीसीन्स उत्पन्न करने वाले जीवाणु के अलावा)

  1. फ्लैजिला अथवा कशाभिका: ये सूक्ष्म , धागेनुमा जीवद्रव्यीय उपांग है जो कोशिका भित्ति और स्लाइमी पर्त (फ्लैजिलेटेड जीवाणु कोशिकाओं की) से होकर निकलते है। ये जीवाणुओं को तरल माध्यम में तैरने हेतु सहायता करते है।

जीवाणुओं के फ्लैजिला सर्वाधिक आद्य होते है। प्रत्येक फ्लैजिला एक पतले फाइब्रिल से निर्मित होता है जो यूकैरियोटिक कोशिका के फ्लैजिला 9+2 तन्तु संरचना के विरुद्ध होता है। फ्लैजिलम पूर्णतया फ्लैजिलिन प्रोटीन से निर्मित होता है।

प्रत्येक उप इकाई का व्यास लगभग 40-50A है। ये उप इकाइयाँ एक खोखले अक्ष के परित: व्यवस्थित रहती है। एक फ्लैजिलम की लम्बाई 4.5 u और व्यास 120-185 A होता है। फ्लैजिलम एक विशिष्ट शीर्षस्थ हुक द्वारा कोशिका झिल्ली से जुड़ा रहता है। यह हुक एक आधारीय काय से संयोजित रहता है , जिसे ब्लीफेरोप्लास्ट कहते है। जीवाणुओं के फ्लैजिलम को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है – बेसल ग्रेन्यूल , हुक और फिलामेंट।

  1. पिलाई अथवा फिम्ब्री: जीवाणु कोशिका की सतह पर कुछ सूक्ष्म रोम सदृश बहि:वृद्धियाँ (फ्लैजिला के अतिरिक्त) पाई जाती है , जिन्हें पिलाई कहते है। ये पिलिन प्रोटीन से निर्मित होती है। इनकी लम्बाई 0.5-2 माइक्रो मीटर और व्यास 3 से 5 माइक्रोमीटर होता है। ये 8 प्रकार की होती है – I , II , III , IV , V , VI , VII , और F

I और F म लिंग अथवा सेक्स पिलाई कहलाती है। ये सभी ग्राम -ve जीवाणुओं और कुछ ग्राम +ve जीवाणुओं में पाई जाती है। फिम्ब्री बैक्टीरिया को ठोस सतह से चिपकाने में भी भाग लेते है।

पिलाई का कार्य गति से सम्बंधित नहीं है लेकिन इनके द्वारा जीवाणु कोशिकाओं के संयोजन में सहायता की जाती है। कुछ लिंग-पिलाई संयुग्मन नलिकाओं की भाँती कार्य करती है , जिनसे होकर एक कोशिका का डीएनए , दूसरी कोशिका तक पहुँच जाता है।