असंगत द्वितीयक वृद्धि क्या है | असंगत द्वितीयक वृद्धि किसे कहते है | कारण | anomalous secondary growth in hindi

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anomalous secondary growth in hindi असंगत द्वितीयक वृद्धि क्या है | असंगत द्वितीयक वृद्धि किसे कहते है | कारण ?

प्रस्तावना : द्विबीजपत्री तनों में अन्त: पुलीय और अन्तरापूलीय कैम्बियम मिलकर एक सतत वलय बनाते है। यह कैम्बियम वलय तने के केन्द्रीय भाग की तरफ द्वितीयक जाइलम और बाहर की तरफ द्वितीयक फ्लोयम बनाती है। कैम्बियम की इस सक्रियता से द्वितीयक फ्लोयम और जाइलम के पूर्ण सिलिंडर बनते है। कुछ द्विबीजपत्री तनों में द्वितीयक वृद्धि की इस सामान्य प्रक्रिया में विचलन पाया जाता है , जिससे असंगत संरचना का विकास होता है और इसे असंगत द्वितीयक वृद्धि कहते है। सामान्य द्वितीयक वृद्धि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार है –

1. अन्त: पूलीय कैम्बियम का फ्लोयम और जाइलम के मध्य में पाया जाना।

2. अन्तरापूलीय कैम्बियम पट्टिकाओं का अन्त: पूलीय कैम्बियम के तल पर अवस्थित होना।

3. अंत: पूलीय और अंतरापूलीय कैम्बियम द्वारा मिलकर सतत संवहन केम्बियम की वलय का निर्माण और इसका जीवन पर्यंत क्रियाशील रहना।

4. संवहन केम्बियम के द्वारा बाहर की तरफ द्वितीयक फ्लोएम और भीतर की तरफ द्वितीयक जाइलम का निर्माण करना।

5. रम्भ के बाहरी क्षेत्र में केवल कॉर्क केम्बियम का बनना और यहाँ संवहन कैम्बियम का निर्माण किसी भी स्थिति में नहीं होता।

परन्तु कुछ द्विबीजपत्री पौधों के तनों में उपर्युक्त सामान्य प्रक्रिया के अनुसार द्वितीयक वृद्धि संचालित नहीं होती अपितु इनमें अनेक प्रकार की विसंगतियाँ द्वितीयक वृद्धि के दौरान पायी जाती है। प्रमुख विसंगतियाँ निम्नलिखित प्रकार से है –

1. कैम्बियम की असामान्य स्थिति (unusual position of cambium)

2. कैम्बियम की असामान्य कार्यप्रणाली (abnormal functioning of cambium)

3. संवहनी कैम्बियम के अतिरिक्त कैम्बियम वलयों का निर्माण (accessory cambial rings)

उपर्युक्त विसंगतियों को लिए हुए तने में जो द्वितीयक वृद्धि की प्रक्रिया होती है उसे ही असंगत द्वितीयक वृद्धि कहते है।

असंगत द्वितीयक वृद्धि के कारण और उपयोगिता

सामान्य परिस्थितियों में यह देखा जाता है कि प्रकृति में किसी भी वस्तु का निर्माण निरर्थक अथवा बिना कारण नहीं होता। अत: द्विबीजपत्री पौधों में और इसके साथ ही अन्य सभी संवहनी पौधों में होने वाली असंगत द्वितीयक वृद्धि के प्रमुख कारण और इसकी उपयोगिता निम्नलिखित प्रकार से हो सकती है।
हेबरलेंट के अनुसार असंगत द्वितीयक वृद्धि अधिकांशत: प्राय: बहुवर्षीय शाकीय पौधों , वल्लरियों अथवा बेलों और काष्ठीय आरोही पौधों (कठलता) में होती है। इन पौधों में असंगत द्वितीयक वृद्धि के परिणामस्वरूप मृदुतक और फ्लोयम ऊतक अधिक मात्रा में बनते है। इन कोमल ऊतकों की तने में उपस्थित के कारण इन पौधों के तने तेज हवाओं का दबाव वेग और जिस सहारे यह आरोही पौधे चढ़ते है उसके कर्तन को सहन करने में समर्थ हो जाते है। दूसरे शब्दों में असंगत द्वितीयक वृद्धि के कारण बनने वाले कोमल ऊतक इन तनों के लिए एक प्रकार से प्रघात अवशोषक का कार्य करते है और इनको टूटने से बचाते है। उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इसी पारिस्थितिकी अनुकूलन को विकसित करने के लिए इन पौधों में संभवतः असंगत द्वितीयक वृद्धि प्रारंभ हुई होगी। उपर्युक्त विचारधारा के अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि असंगत द्वितीयक वृद्धि के कारण बनने वाली द्वितीयक संरचना केवल कैम्बियम के असामान्य लक्षणों को ही प्रदर्शित करती है।
कटर के अनुसार असांगत द्वितीयक वृद्धि के प्रमुख कारणों में से एक कारण यह है कि इसमें एधा की स्थिति तो सामान्य होती है लेकिन इनकी सक्रियता के कारण बनने वाले फ्लोयम और जाइलम ऊतकों का रूपान्तरण मृदुतक अथवा संचयी ऊतक में हो जाता है। जड़ों में जैसे चुकंदर आदि में खाद्य पदार्थो के संग्रह के लिए अधिकाधिक मात्रा में संचयी ऊतकों के निर्माण हेतु असंगत द्वितीयक वृद्धि होती है। अत: इनका विन्यास असाधारण प्रकार का होता है।
विभिन्न प्रकार के द्विबीजपत्री पौधों में कठलताएँ और आरोही लताएँ आदि के नाम उल्लेखनीय है जिनमें असामान्य द्वितीयक वृद्धि पायी जाती है।

असामान्य द्वितीयक वृद्धि की प्रकार (types of anomalous secondary growth)

सामान्यतया कैम्बियम की असामान्य स्थिति या असामान्य कार्यशैली के फलस्वरूप असंगत द्वितीयक वृद्धि होती है। संवहनी पौधों में विशेषकर द्विबीजपत्री तनों में विभिन्न कारणों से जो असंगत द्वितीयक वृद्धि होती है , उनके कुछ प्रमुख उदाहरणों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित प्रकार से है –
1. कैम्बियम की असामान्य स्थिति (unusual position of cambium) : कुछ द्विबीजपत्री पौधों के तने में कैम्बियम सामान्य स्थिति में नहीं होती इसलिए उसके द्वारा बनने वाले द्वितीयक संवहन ऊत्तको की आकृति भी अलग हो जाती है।
(i) कैम्बियम का वलनों और कटको में विभक्त हो जाना : इस प्रकार की कैम्बियम संरचना के द्वारा संचालित द्वितीयक वृद्धि का सर्वप्रथम अध्ययन शैन्क नाम वैज्ञानिक द्वारा एक आरोही पौधे थिनोइया स्कैन्डेस में किया गया था। इस पादप में युवावस्था में ही तने की आंतरिक संरचना में कैम्बियम अनेक वलनो और कटको के रूप में बंटा हुआ होता है। जब द्वितीयक वृद्धि प्रारंभ होती है तो प्रत्येक उभरी हुई गोलाकार कटक रुपी संरचना अलग होकर तने में अनेक स्थानों पर स्वतंत्र रूप से पृथक द्वितीयक ऊतक बनाती है। इस प्रकार अलग अलग उभारों और कटको में स्थित असामान्य कैम्बियम के द्वारा संवहन ऊतकों के निर्माण से परिपक्व तना अनेक पालियों में विभेदित दिखाई देता है।
(ii) कैम्बियम की अलग अलग पट्टिकाओं का निर्माण : सेपींडेसी कुल के दो आरोही पौधों क्रमशः सेरजानिया इक्थायोक्टोना और पालीनिया के तने में कैम्बियम अनेक पृथक पट्टियों के रूप में होती है। पट्टियाँ एकल संवहन पूल अथवा कुछ संवहन पूलों को घेर लेती है।
द्वितीयक वृद्धि के प्रारंभ होने पर प्रत्येक संवहन समूह की कैम्बियम पट्टिका एक सम्पूर्ण वलय में विकसित हो जाती है। इस प्रकार परिपक्व तने की आंतरिक संरचना में अनेक कैम्बियम वलय अपनी सक्रियता के द्वारा बाहर की तरफ द्वितीयक फ्लोयम और अन्दर की तरफ द्वितीयक जाइलम बनाती है। परिणामस्वरूप परिपक्व तने में अनेक संवहन स्ट्रेंड पृथक कैम्बियम वलयों से घिरे हुए बन जाते है। कुछ समय के बाद प्रत्येक स्ट्रेंड की पेरीडर्म (परित्वक) भी अलग अलग बन जाती है। कैम्बियम की इस असामान्य स्थिति के कारण प्रोढ़ तना अनेक छोटे छोटे तनों से मिलकर बना हुआ प्रतीत होता है। इसकी यह अवस्था एक ऐसे मोटे रस्से के समान प्रतीत होती है जो कि अनेक पतली रस्सियों को गुंथकर बना।
(iii) कुछ अन्य उदाहरणों जैसे बाहिनिया लैंग्सडोफिर्याना में कैम्बियम अनेक पट्टिकाओं में विभक्त होता है लेकिन इसके विभक्त होने के कारण बिल्कुल अलग है। यहाँ द्वितीयक वृद्धि में कैम्बियम के द्वारा फ्लोयम और जाइलम दोनों में ही मृदुतक कोशिकाओं का निर्माण बहुतायत से होता है।
इनकी तुलना में अन्य संवहन कोशिकाएं जैसे फ्लोयम में चालनी तत्व और जाइलम में वाहिनिकाएं और वाहिकाएं कम संख्या में बनती है। परिणामस्वरूप मृदुतक कोशिकाओं के दबाव से कैम्बियम फटकर अनेक छोटी छोटी पट्टिकाओं में बंट जाता है और तने की बाह्य रूपरेखा पूर्णतया विरूपित हो जाती है।

2. कैम्बियम की असामान्य कार्यशैली (abnormal functioning of cambium)

इस प्रकार की विसंगती प्राय: ऐसी कैम्बियम वलय में देखने को मिलती है जहाँ केम्बियम की स्थिति तो पूर्णतया सामान्य होती है लेकिन इसकी कार्यशैली पूर्णतया असामान्य होती है। इस प्रकार की असंगत द्वितीयक वृद्धि अनेक काष्ठीय आरोही पौधों के तनों में पायी जाती है। यहाँ केम्बियम की असामान्य कार्यशैली की वजह से कई बार विच्रित्र आकृति की द्वितीयक संरचनाओं का निर्माण हो जाता है।
(A) विदीर्ण जाइलम का परिवर्धन (development of fissured xylem) : एरिस्टोलोकिया की विभिन्न प्रजातियाँ और वाइटिस में तने की आंतरिक संरचना में पूर्ण कैम्बियम वलय का निर्माण होता है। जब द्वितीयक वृद्धि प्रारंभ होती है तो यह सम्पूर्ण कैम्बियम वलय सभी स्थानों पर द्वितीयक संवहन ऊतक अर्थात बाहर की तरफ द्वितीयक फ्लोएम और भीतर की तरफ द्वितीयक जाइलम नहीं बनाती अपितु इस कैम्बियम वलय का अधिकांश भाग बाहर और भीतर दोनों तरफ मृदुतकी कोशिकाएँ बनाता है जिससे सुस्पष्ट और चौड़ी मज्जा रश्मियाँ विकसित हो जाती है। द्वितीयक संवहन ऊतक संवहन इधर उधर छितराये हुए संवहन बंडलों के रूप में दिखाई पड़ते है। यह भी कहा जा सकता है कि एरिस्टोलोकिया और वाइटिस के तने की कैम्बियम वलय में केवल अंत:पूलिय कैम्बियम ही द्वितीयक संवहन ऊतक अर्थात अन्दर द्वितीयक जाइलम और बाहर द्वितीयक फ्लोएम बनाता है। परिणामस्वरूप फ्लोयम की अनेक उभरी हुई उर्मियों जैसी आकृतियाँ तने की संरचना में दिखाई पड़ती है जबकि अन्तरपूलीय केम्बियम अन्दर और बाहर दोनों ओर मज्जा रश्मियों के रूप में केवल मृदुतक कोशिकाएँ बनाता है। इस प्रकार एरिस्टोलाकिया के तने में द्वितीयक वृद्धि के परिणामस्वरूप अंत्यंत चौड़ी और सुस्पष्ट मज्जा रश्मियों का पाया जाना एक महत्वपूर्ण असंगति है।

(B) जाइलम और फ्लोयम की असामान्य वृद्धि (uneven growth of xylem and phloem)

सिसलपिनेसी कुल के बोहिनिया रूबीजिनोसा नामक सदस्य के तने में असंगत द्वितीयक वृद्धि के कारण द्वितीयक रम्भ की आकृति में अनेक उभार और खाँचे बन जाते है। यह अवस्था एधा वलय की असामान्य कार्यशैली अर्थात इसकी सक्रियता में परिवर्तनशीलता के कारण उत्पन्न होती है। कुछ स्थानों पर कैम्बियम बहुत अधिक सक्रीय होता है और संवहन ऊतकों का निर्माण (अर्थात बाहर की ओर द्वितीयक फ्लोयम और भीतर की तरफ द्वितीयक जाइलम का निर्माण) बहुत अधिक मात्रा में करता है जबकि शेष स्थानों पर यह अपेक्षाकृत कम मात्रा में सक्रीय होता है। जिसमें अत्यधिक कम मात्रा में संवहन ऊतक बनते है। परिणामस्वरूप द्वितीयक संवहन सिलिंडर की आकृति अनियमित उभारों और खांचो में विभेदित दिखाई देती है।
बोहिनिया स्क्लेंडेंस में कैम्बियम की असामान्य कार्यशैली की वजह से तने की बाह्य रूपरेखा चपटी पट्टिका के समान हो जाती है। यहाँ केम्बियम वैसे तो वलय के रूप में पाया जाता है लेकिन क्षैतिज स्थिति में आमने सामने दो सम्मुख बिन्दुओ पर यह अधिक सक्रीय होता है जबकि अन्य स्थानों पर यह पूर्णतया निष्क्रिय अवस्था में रहता है अर्थात किसी प्रकार के द्वितीयक ऊतकों का निर्माण नहीं करता। परिणामस्वरूप जब दो स्थानों पर ही द्वितीयक वृद्धि होती है तो परिपक्व तने की बाह्यरूप रेखा एक चपटी पट्टी के समान दिखाई पड़ती है।