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Categories: इतिहास

अहमदाबाद की स्थापना किसने की थी , ahmedabad was founded by in hindi

पढ़िए अहमदाबाद की स्थापना किसने की थी , ahmedabad was founded by in hindi ?

अहिच्छत्र (28°22‘ उत्तर, 79°8‘ पूर्व)
अहिच्छत्र वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में रामनगर के समीप स्थित है। यह एक महाजनपदकालीन नगर है जो उत्तरी पांचाल नामक महाजनपद की राजधानी था। यह स्थल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर चैथी ईस्वी तक की विभिन्न विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है।
अहिच्छत्र प्राचीन काल में उत्तर भारत के व्यापारिक मार्ग का एक महत्वपूर्ण स्थल था, जो तक्षशिला एवं पाटलिपुत्र को आपस में जोड़ता था। यह एक महत्वपूर्ण जैन स्थल भी था तथा जैन तीर्थंकर पाश्र्वनाथ ने यहां की यात्रा की थी। ऐसा अनुमान है कि मौर्य शासक अशोक ने यहां एक स्तूप भी निर्मित करवाया था। यहीं से पहली बार चित्रित धूसर मृदभाण्ड तथा उत्तरी काले चित्रित मृदभाण्ड प्राप्त किए गए थे।
तांबे एवं लोहे की विभिन्न निर्मित सामग्रियों के अतिरिक्त यहां से पांचालों, कुषाणों एवं अच्युतों (समुद्रगुप्त के शिलालेख में उल्लिखित) के तांबे के सिक्के भी प्राप्त किए गए हैं। यहां उत्खनन में 16वीं शताब्दी का भगवान शिव का एक मंदिर भी मिला है।
यहां से टेराकोटा की विभिन्न वस्तुएं मिली हैं तथा टेराकोटा (मिथुन आकृति एक अग्रणी वर्ग बनाती है।) के साथ ही शुंगकालीन वस्तुएं भी प्राप्त की गई हैं।
यहां से गुर्जर प्रतिहारों की आदिवाराह प्रकार की 200 मुद्राओं की प्राप्ति के साथ ही यह अनुमान लगाया जाता है कि प्रारंभिक मध्यकाल का यह एक महत्वपूर्ण स्थल रहा होगा।

अहमदाबाद (23.03° उत्तर, 72.58° पूर्व)
अहमदाबाद (वर्तमान गुजरात में) की स्थापना जफर खान के पौत्र अहमद शाह प्रथम (1411-42) ने की थी। जफर खान ने ही 1398 में तैमूर के आक्रमण के उपरांत गुजरात में क्षेत्रीय स्वतंत्र राज्य की स्थापना की थी।
अहमदाबाद की इमारतें इण्डो-इस्लामी प्रभावों से युक्त हैं तथा इनमें गुजराती-हिन्दू परम्पराओं का प्रशंसनीय सम्मिश्रण परिलक्षित होता है। जामी मस्जिद अहमदाबाद की एक महत्वपूर्ण इमारत (स्थापत्य) है, जिसका निर्माण अहमदशाह ने स्वंय कराया था। इस इमारत में मध्यकालीन स्थापत्य के सुंदर नमूने दिखाई देते हैं। श्तीन दरवाजाश् भी एक महत्वपूर्ण स्मारक है, जो अहमदशाह के मकबरे के प्रवेश के ठीक पूर्व में निर्मित है। रानी सिपरिस की मस्जिद 1514 में बनी। यह एक छोटी किंतु खूबसूरत इमारत है।
1572 में अहमदाबाद पर अकबर ने आक्रमण कर आधिपत्य स्थापित कर लिया तथा मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर इसे 15वां सूबा बना दिया।
जहांगीर इस शहर को पसंद नहीं करता था तथा इसे श्गर्दाबादश् (धूल का शहर) कहकर पुकारता था। कालांतर में अहमदाबाद मराठों के आधिपत्य में आ गया। ब्रिटिश काल एवं स्वतंत्रयोत्तर काल में यह नगर सूती वस्त्र उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा।

अहमदनगर (19.05° उत्तर, 74.48° पूर्व)
अहमदनगर वर्तमान महाराष्ट्र में स्थित है, जिसकी स्थापना मलिक अहमद ने की थी। मलिक अहमद बहमनी शासकों के अधीन चुनार का राज्यपाल था। 1490 में यह स्वतंत्र राज्य बन गया तथा यहां निजामशाही वंश की स्थापना हुई। 1530 में निजामशाही वंश के शासकों ने इसे अपनी राजधानी बनाया तथा यह दक्षिण भारत के प्रमुख शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।
दक्कन में प्रभाव एवं नियंत्रण की स्थापना के परिप्रेक्ष्य में अकबर ने इसके महत्व को समझा तथा इस पर आक्रमण कर इसे मुगल साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न किया किंतु यहां की शासक चांदबीबी के प्रशंसनीय प्रतिरोध के कारण से अकबर के प्रारंभिक प्रयास निष्फल हो गए। बाद में 1600 में पुनः मुगलों ने यहां आक्रमण किया तथा इसे अधिग्रहित करने में सफलता पाई।
यह एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था तथा यहां से कई गुहा मंदिर भी प्राप्त किए गए हैं। अंतिम मुगल शासक औरंगजेब की 1707 में अहमदनगर में ही मृत्यु हुई थी।

एहोल (16°1‘ उत्तर, 75°52‘ पूर्व)
एहोल कर्नाटक राज्य के बीजापुर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। यह पश्चिमी चालुक्यों के अधीन कला व स्थापत्य के केंद्र के रूप में विकसित हुआ। वातापी के राजधानी बनने से पहले एहोल ही पश्चिमी चालुक्यों की राजधानी थी। चालुक्य काल के ऐहोल मंदिर भारत के प्राचीनतम डिजाइन वाले मंदिरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यद्यपि वर्तमान में ये खंडहर बन गए हैं, फिर भी ये स्थापत्य की सुविकसित दक्कन शैली का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इनमें से एक है लाड खान का मंदिर जो कि पंचायतन शैली में बना है। इस मंदिर का नाम एक मुस्लिम भक्त के नाम पर रखा गया है जो यहां रहता था और जिसे एक साथ फकीर व शहजादा दोनों उपनामों से जाना जाता था। इसमें मंदिर के आंतरिक भाग की ओर मुख किए हुए नंदी की पत्थर की मूर्ति है। एक पत्थर की बनी सीढ़ी है जो मंदिर की छत की ओर जाती है जिसमें शिव, सूर्य तथा विष्णु की क्षतिग्रस्त प्रतिमाएं हैं।
मेगुति मंदिर को प्रायः एहोल का प्राचीनतम मंदिर तथा भारत के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माना जाता है। चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति का अभिलेख इस मंदिर की तिथि को 634 ई. इंगित करता है। रविकीर्ति के इस अभिलेख में पड़ोसी राजाओं के विरुद्ध पुलकेशिन द्वितीय के पराक्रमों का विस्तृत वर्णन है।
दुर्गा मंदिर (इसका नामकरण देवी दुर्गा के आधार पर नहीं बल्कि समीप स्थित एक किले के आधार पर हुआ है) में बौद्ध धर्म के चैत्य महाकक्ष प्रतिरूप का अनुसरण हुआ है। यह एक मेहराबदार संरचना है जिसके भीतरी भाग में स्तंभ पंक्तिबद्ध हैं।
एक और मंदिर है हच्छिमल्लीगुडी मंदिर, जिसमें पहली बार मंडप तथा गर्भगृह के बीच में अन्तराल (दहलीज) का प्रयोग हुआ है।
रावणपदी (अथवा रावलफदी) गुफा जो कि हच्छिमल्लीगुडी मंदिर के दक्षिण-पूर्व में स्थित है, एहोल के प्राचीनतम मंदिरों, जो शैल काटकर बनाए गए हैं, में से एक है। यह पत्थर से निर्मित गुफा मंदिर है जो शिव को समर्पित हैं। 550 ई. के लगभग निर्मित इस मंदिर में बादामी गुफा मंदिरों से भी बड़ा एक पवित्र द्रव्यागार है। प्रवेश द्वार के सामने एक ही पत्थर से बना स्तंभ है जिसका आधार वर्गाकार है। मंडप की छत पर एक विशाल तथा बारीकी से तराशा हुआ कमल का फूल बनाया गया है। एक पाश्र्व भित्ति पर अर्द्ध-नारीश्वर की आकृति बनी हुई है। अर्द्ध-नारीश्वर को शिव का मूर्तरूप माना गया है। जिसमें उनका आधा शरीर पुरुष तथा आधा नारी (शिव की अर्धागिनी पार्वती) का है। रावणपदी मंदिर परिसर में प्राप्त अन्य वस्तुओं में शिव की नटराज रूप में मूर्ति, जिसमें पार्वती तथा भागीरथ भी साथ हैं, विष्णु का वाराह अवतार, तथा अन्य देवता हैं।

अजंता (20°33‘ उत्तर, 75°42‘ पूर्व)
अजन्ता की गुफाएं (यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में सूचीबद्ध) औरंगाबाद जिले में महाराष्ट्र के पठार के उत्तरी सीमांत पर स्थित हैं। ये गुफाएं महिष्मति तथा उज्जैन के रास्ते पश्चिमी भारत व उत्तरी भारत को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर स्थित हैं। 550 मी. से भी अधिक क्षेत्र में विस्तृत ये गुफाएं घोड़े की नाल के आकार में बनी हैं।
ये गुफाएं स्थापत्य कला, मूर्तिकला तथा चित्रकला का एक बहुत उत्तम मिश्रण हैं, और बौद्ध भिक्षुओं के भिक्षुजीवन को दर्शाते हुए तराशी गई हैं। इन गुफाओं का उत्खनन लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से सातवीं शताब्दी ई. तक हुआ। यहां कुल मिलाकर 30 गुफाएं हैं (कुछ अपूर्ण गुफाओं को सम्मिलित करके) जिनमें से 9, 10, 19, 26 तथा 29 संख्या वाली गुफाएं चैत्य गृह हैं तथा बाकी विहार है।
अजन्ता शैलों को काटने के कार्य के दो चरणों की ओर संकेत करती है। अपने प्रारंभिक चरण अथवा बौद्ध-पूर्व प्रतिमा चरण, जिसे दूसरी शताब्दी ई.पू. से चैथी शताब्दी ई. तक के काल से सम्बद्ध किया जा सकता है, में काष्ठ कला परम्परा पर जोर था। इसके साक्ष्य पत्थर की छत पर लकड़ी की धारियों और घोड़े की नाल की आकृतियों में मिलते हैं। बाद की अवस्था में बौद्ध मूर्तियों की प्रबलता है। भव्य स्थापत्य कला एवं मूर्तिकला के अतिरिक्त, गुप्तकाल से संबंधित अति सुन्दर चित्र भी सामने आए हैं।
अजन्ता चित्रों की विषयवस्तु अत्यधिक धार्मिक एवं अधिकांशतः बुद्ध, बोधिसत्व, बुद्ध के जीवन वृतांतों तथा जातक कथाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। इन चित्रों में तत्कालीन महल, दरबार, शहर, ग्राम तथा आश्रमों का जीवन भी प्रतिबिंबित होता है तथा ये प्रारम्भिक भारतीय भित्ति चित्रों की परम्परा की झलक देते हैं।

अजमेर (26°45‘ उत्तर, 74°94‘ पूर्व)
अजमेर को सांभर तथा अजयमेरू के नाम से भी जाना जाता है। यह राजस्थान में जयपुर के दक्षिण में स्थित है। यह चैहान शासकों की राजधानी था।
परम्परानुसार, इसकी स्थापना प्रसिद्ध चैहान शासक राजा अजय देव द्वारा की गई थी। चैहानवंशीय शासक पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 ई. में मुहम्मद गोरी के आक्रमण का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया था। तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय के उपरांत मो. गोरी ने अजमेर को तहस-नहस कर दिया। कुछ वर्षों पश्चात गुलामवंशीय शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर पर अधिकार कर लिया।
मुगलों से पूर्व मेवाड़, मालवा एवं जोधपुर तीनों घरानों के शासकों ने अजमेर पर शासन किया। 1556 में अकबर ने अजमेर पर अधिकार कर लिया तथा यहां ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का निर्माण कराया। यह दरगाह हिन्दू तथा मुसलमान दोनों धर्मों के लोगों द्वारा समान श्रद्धा से देखी जाती है तथा प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दरगाह के दर्शन के लिए आते हैं।
यहां की एक अन्य प्रसिद्ध इमारत ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा‘ नामक मस्जिद है, जिसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1210 में करवाया था।
1720 में मारवाड़ के अजीत सिंह ने यहां के मुगल गवर्नर को परास्त कर इस नगर पर अधिकार कर लिया था। बाद में यह मराठों के प्रभाव क्षेत्र में आ गया तथा 1818 में मराठों ने इसे अंग्रेजों को सौंप दिया। अजमेर ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत एक शाही राज्य बन गया।
अजमेर में सांस्कृतिक महत्व के अन्य महलों में अजयपाल चैहान द्वारा निर्मित तारागढ़ किला है जिसे तारा किला के नाम से भी जाना जाता है।
19वीं शताब्दी में निर्मित नासियां का जैन मंदिर या लाल मंदिर जैन धर्म के अनुयायियों का एक प्रमुख उपासना स्थल है।

आलमगीरपुर (29° उत्तर, 77°28‘ पूर्व)
आलमगीरपुर, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है। यह नगर हड़प्पा सभ्यता की पूर्वी सीमा था। यहां से उत्तरकालीन हड़प्पा सभ्यता के अवशेष पाए गए हैं तथा यह हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र स्थल है, जो यमुना के तट पर स्थित है। यहां के उत्खनन से मृतिपण्ड, मृद्भाण्ड, एवं मनके प्राप्त हुए हैं किंतु यहां से कोई मुहर नहीं मिली है। एक गर्त से कटोरे के बहुत से टुकड़े तथा रोटी बेलने की चैकी भी मिली है। कुछ के ऊपर सैंधव लिपि के दो अक्षर अंकित हैं। कुछ बर्तनों पर त्रिभुज, मोर, गिलहरी इत्यादि की चित्रकारियां भी प्राप्त हुईं हैं। यहां पर पाई गई प्राचीन वस्तुओं में टेराकोटा के छिद्रित जार, तिपाई पर बर्तन, बेलनाकार फूलदान, मोती, चूड़ियां तथा एक कूबड़ वाला बैल सम्मिलित है। ठीकरों के साथ एक ईंटों की श्रृंखला की दीवार वाला गहरा गड़ा भी खोजा गया है जो कि भट्टी जैसा दिखता है। एक अन्य उल्लेखनीय खोज है ठीकरों के सादे बनावट में कपड़े की छाप।
आलमगीरपुर से सैंधव अवशेषों की प्राप्ति यह सिद्ध करती है कि यह सभ्यता गंगा-यमुना दोआब में भी फैली हुई थी। हड़प्पा काल के पश्चात् चित्रित धूसर मृदभांड अवस्था में कांस्य तथा लौह की वस्तुएं जैसे तीर तथा भाले प्राप्त हुए हैं। चिकनी मिट्टी के शल्कन तथा पंचमार्क सिक्के भी प्राप्त हुए हैं जो तीसरी अथवा दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रतीत होते हैं।

अलची गोम्पा (34°13‘ उत्तर, 77°10‘ पूर्व)
अलची मठ लद्दाख क्षेत्र का सबसे पुराना व प्रसिद्ध बौद्ध मठ माना जाता है। यह सिंधु नदी के दक्षिणी तट पर लेह जिले के अलची गांव में स्थित है तथा इसका प्रबंधन लिकरी बौद्धमठ द्वारा किया जाता है। अलची मठ का ढांचा 1000 ई. का है तथा इसका निर्माण एक अनुवादक रिनचेन जेंगपो द्वारा किया गया। जेंगपो को ‘लोहत्सव‘ अथवा महान अनुवादक‘ के नाम से भी जाना जाता था। किवदंती के अनुसार, गोम्पा के निर्माण हेतु कश्मीर के 32 शिल्पियों को अभिनियोजित किया गया। हालांकि स्मारकों के अभिलेखों को 11वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के तिब्बती अभिजात ‘काल-दान-शेस-रब‘ से संबंधित माना गया है।
इस बौद्धमठ में तीन प्रमुख पूजा स्थल-दुखांग (सभा कक्ष), समत्सेग, तथा मंजुश्री का मंदिर हैं, जो 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध बीच के हैं। इन भवन समूहों के भित्ति चित्र, जिनमें से कुछ लद्दाख के प्राचीनतम संरक्षित चित्र हैं, में तत्कालीन कश्मीर के हिन्दू राजाओं एवं बौद्ध धर्म का कलात्मक व आध्यात्मिक विवरण प्रतिबिंबित होता है। मठ परिसर में बुद्ध की कुछ वृहद प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं। कुछ स्तूप भी पाए गए हैं। 13वीं शताब्दी के ये प्राचीनतम स्तूप अलंकृत तोरण हैं, तथा इन्हें अलची की अद्वितीय विशेषता माना जाता है।

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