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पृथ्वी की आयु क्या है ? पृथ्वी की आयु का आकलन कैसे किया जाता है age of the earth can be determined by in hindi
age of the earth can be determined by in hindi पृथ्वी की आयु क्या है ? पृथ्वी की आयु का आकलन कैसे किया जाता है ?
पृथ्वी की आयु
(Age of the Earth)
पृथ्वी की आयु का निर्धारण करना उसी प्रकार जटिल एवं रहस्यमय है, जिस प्रकार सौर मण्डल की उत्पत्ति। भिन्न-भिन्न विद्वानों ने पृथ्वी की आयु सम्बन्धी समस्या को हल करने का प्रयास किया है, परन्तु सभी का निष्कर्ष एक जैसा नहीं है। पृथ्वी की आयु की व्याख्या वर्तमान वैज्ञानिकों के अलावा प्राचीन ऋषियों ने भी की थी, परन्तु इनकी व्याख्या प्रमाणों के आधार पर नहीं थी, इसलिए इसका महत्व नहीं के बराबर है। हम केवल आधुनिक विद्वानों के अनुसार पृथ्वी की आयु-मापन के आधारों की व्याख्या करेंगे।
1. सागरीय लवणता के आधार पर गणना
विद्वानों के अनुसार समुद्र में लवणता की मात्रा नदियों ने महाद्वीपों से काटकर जमा की है। इस तरह यदि नदियों में लवणता का माप किया जा सके तथा प्रतिवर्ष उसके द्वारा समुद्र में जमाव का अनुमान लगाया जा सके तथा समद्र में पूरी लवणता की मात्रा का ज्ञान हो सके, तो तीनों सम्बन्धों द्वारा यह अनुभव लगाया जा सकता है कि सागर में कब से लवणता का जमाव हुआ।
सागरों का निर्माण = कुल सागरीय लवणता / प्रतिवर्ष जमाव दर
जोली (श्रवसल) ने इसकी गणना इस प्रकार प्रस्तुत की –
सागर में कुल लवणता की मात्रा = 1.26 × 1022 ग्राम
प्रति वर्ष जमाव की मात्रा = 1.56 × 1014 ग्राम
सागर की आयु = 1.26 × 1022 / 1.56 × 1014
= 8,00,00,000
= 8 करोड़ वर्ष
इनके अनुसार सागर की आयु 8 करोड़ वर्ष होगी। पृथ्वी का निर्माण इसके पूर्व का होगा। कुछ विद्वानो ने पृथ्वी को 4 करोड़ वर्ष सागर से पूर्व उत्पन्न मानते हैं। इस तरह 12 करोड़ वर्ष पृथ्वी की आयु का अनुमान लगाया जा सकता है, परन्तु यह बहुत ही कम है।
नदी द्वारा जमाव की प्रक्रिया घटती बढ़ती रहती है, क्योंकि कई बार नदियों के प्रवाह में शिथिलता आ चुकी है। इस तरह न तो नदियों द्वारा प्रतिवर्ष जमान की मात्रा का सही अनुमान लगाया जा सकता है, न तो समद्र में कुल लवणता की मात्रा का ज्ञान हो सकता है। यही कारण है कि यह विचार अमान्य कर दिया गया है।
2. परतदार चट्टानों के जमाव के आधार पर
ऐसा अनुमान किया जाता है कि पृथ्वी के ठंडा होते समय ऊपरी भाग की ठोस परत आग्नेय चट्टान का निर्माण हुआ। इन आग्नेय चट्टानों के अपरदन के परिणामस्वरूप परतदार चटटानों निर्माण हुआ होगा। इस प्रकार यदि परतदार चट्टानों की जमाव की दर तथा सम्पूर्ण परतदार चटटानों की मात्रा का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो जाये, तो इन सम्बन्धों से यह पता लगाया जा सकता है कि परतदार चट्टान कब बनना प्रारम्भ हुई थी ?
प्रथम परतदार शैल का निर्माण काल = परतदार शैल की कुल गहराई / प्रतिवर्ष परतदार चट्टान का जमाव
विद्वानों का अनुमान है कि 3 फीट मोटी परत का जमाव लगभग 1000 वर्ष में हो जाता है। मिस्र में रैम्सीन द्वितीय की मूर्ति 9 फीट नीचे परतदार चट्टानों में पायी गयी। इसी आधार पर इस प्रकार गणना की जा सकती है –
पृथ्वी पर परतदार शैल की गहराई कुल = 100 मील
= 5,28,000 फीट
9 फीट परतदार शैल का जमाव = 3000 वर्ष में
3 फीट परतदार शैल का जमाव = 1000 वर्ष में
5,28,000 फीट परतदार शैल का जमाव = 1700,00,000 वर्ष
इस आधार पर शैल का जमाव काल 17 करोड़ 60 लाख वर्ष होता है। यदि पृथ्वी की आयु परतदार चट्टानों की आयु की तीन गुनी मान ली जाय तो लगभग 50 करोड़ वर्ष होती है। यह आयु अत्यन्त कम है।
यह अनुमान इस आधार पर आधारित है कि परतदार शैल की अधिक से अधिक मोटी 100 मील होगी, परन्तु मोटाई की यह कल्पना अतिशयोक्ति मालूम पड़ती है। अन्य आधारों पर ठोस परत की मोटाई 35 किलोमीटर से ज्यादा नहीं बतायी गयी है। ऐसी दशा में परतदार चट्टानों की मोटाई 10 मील से अधिक नहीं हो सकती है। परतदार चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के ठोस होने के उपरान्त हुआ होगा। पृथ्वी कितने समय में ठंडी हुई तथा ठंडी होने के कितने वर्षों के बाद जमाव की क्रिया प्रारम्भ हुई ? इसका सही ढंग से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। साथ-ही-साथ परतदार चट्टानों का जमाव एक जैसा नहीं रहा होगा। परतदार चट्टानों का बहुत सा भाग दबाव की क्रिया के कारण कायान्तरित हो गया है। यह कारण है कि यह विचार अमान्य कर दिया गया।
3. अपरदन के आधार पर
प्रयोगों या अनुभवों के द्वारा ऐसा अनुमान लगाया गया है कि महाद्वीपों का लगभग 1 फीट मोटा भाग 10,000 वर्षों में अपरदित होता है। इस प्रकार यदि महाद्वीपों का अब तक कटा हुआ पदार्थ अनुमानित किया जाय तो दोनों के सम्बन्धों से पृथ्वी की आयु ज्ञात की जा सकती है। परतदार शैल की गहराई 100 मील मानी गयी है। इस आधार पर पृथ्वी की आयु की गणना इस प्रकार से करते है –
परतदार शैल की मोटाई = 100 मील
= 5,28,000 फीट
1 फीट महाद्वीप का अपरदन = 10,000 वर्ष में
5.28.000 फीट का अपरदन = 5.28.000×10,000
= 5.28,00,00,000
यदि पृथ्वी की आयु इससे दो गुनी माने तो = 5,28,00,00,000×2
= 10,56,00,00,000 वर्ष
इस गणना के आधार पर महाद्वीपों की उत्पत्ति का सही-सही आकलन नहीं किया जा सकता है, क्योकि पृथ्वी के निर्माण के कितने वर्षों बाद महाद्वीपों तथा महानगरों की उत्पत्ति हुई होगी तथा उत्पत्ति वर्षों बाद अपरदन की क्रिया प्रारम्भ हुई होगी? अपरदन भी प्रत्येक समय में बराबर नहीं रहा होगा। प्रारम्भ में अपरदन तीव्र या मन्द था ? बीच-बीच में स्थलखण्डों के उत्थान या अवतलन से अपरदन पर प्रभाव पड़ता है। मुलायम चट्टानों का कठोर चट्टानों की अपेक्षा अपरदन अधिक होता है। जहाँ पर मुलायम चट्टानें हैं, वहाँ पर कटाव तथा जमाव अधिक होगा। इस तरह स्पष्ट होता है कि इस आधार पर पृथ्वी की आयु का सही आकलन नहीं किया जा सकता है।
4. चन्द्रमा की ज्वारीय शक्ति के आधार पर
कुछ विद्वानों ने पृथ्वी की आयु की गणना चन्द्रमा की ज्वारीय शक्ति के आधार पर की है। इन विद्वानों के अनुसार-चन्द्रमा पृथ्वी से उत्पन्न हुआ तथा यह जिस भाग से निकला था, अब वह प्रशान्त महासागर है। यद्यपि सभी विद्वान इस धारणा से एकमत नहीं है, तथापि इतना तो सभी मानते हैं कि चन्द्रमा पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है। जब चन्द्रमा पृथ्वी के निकट था, तो इसकी आकर्षण शक्ति अधिक थी, परन्तु ज्यों-ज्यों दूर चला गया आकर्षण शक्ति कम होती गयी। यदि चन्द्रमा की आकर्षक शक्ति की हास दर ज्ञात करें, तो यह जान सकते हैं कि चन्द्रमा कितने समय पूर्व पृथ्वी से उत्पन्न हुआ होगा ? इस आधार पर 4 अरब वर्ष पृथ्वी की आयु की गणना की गयी है, परन्तु चन्द्रमा के जन्म के पहले पृथ्वी का जन्म हुआ होगा। अतः अनुमान का आकलन सही नहीं प्रतीत होता है। अपोलो चन्द्र यान द्वारा चन्द्रमा के अन्वेषण के दौरान चन्द्रतल से लाई गयी चट्टानों को विद्वानों ने पृथ्वी की चट्टान से पुराना बताया है। यदि यह प्रमाणित हो जाता है तो यह विधि निर्मूल हो जायेगी।
5. पृथ्वी के ठंडा होने की गति के आधार पर
पृथ्वी की ढंडा होने की गति का अनुमान लगाया जा सके तो यह ज्ञात किया जा सकता है कि पृथ्वी कितनी मोटी परत में ठंडी हो चुकी है तथा इसमें कितना समय लगा। इन दोनों सम्बन्धों के आधार पर पृथ्वी की आयु की गणना की जा सकती है। इसी आधार पर लार्ड केलविन महोदय ने पृथ्वी की आयु की गणना 40 करोड़ वर्ष मानी है, परन्तु इस आधार के आकलन में भी कठिनाइयाँ हैं। उदाहरण के लिए प्रारम्भ में ठंडा होने की गति अधिक रही होगी। कालान्तर में यह गति धीमी हो गयी होगी। ऐसी दशा मे एक ही गति द्वारा पूरा अनुमान लगाना असंगत होगा। कुछ विद्वानों ने घटने-बढ़ने का अनुमान लगाने का प्रयास किया है। इनके अनसार पृथ्वी की आयु लगभग 100 करोड़ वर्ष हो सकती है, किन्तु इस तरह का आकलन भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मान्य नहीं है।
6. रेडियो सक्रिय तत्वों के आधार पर
पृथ्वी के अन्तर्गत जहाँ पर अणुशक्ति के पदार्थ स्थित हैं, वे ताप की किरणें प्रस्तुत करते हैं। ये किरणें कई प्रकार की होती हैं। तीन किरणें अल्फा, बीटा और गामा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन ताप क्रियाओं के द्वारा अणुशक्ति के खनिज उदाहरण के लिए यूरेनियम और थोरियम विखण्डित हो जाते है। जो भाग विखण्डित होता है, वह एक प्रकार का सीसा होता है। यह प्राकृतिक सीसा से भिन्न होता है। प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात हुआ कि विखण्डित का अणुभार 207.2 है, जबकि प्राकृतिक सीसे का अणुभार 206 होता है। इस प्रकार यदि विखण्डित सीसे का पूरा-पूरा अनुमान लगाया जा सके और उस गति का अनुमान लगाया जा सके जिसके द्वारा इनका निर्माण होता है, तो उस अवधि का पता लगाया जा सकता है, जब विखण्डित सीसा बना था। किन्तु, इस दृष्टिकोण से भी विखण्डित सीसे की अवधि के पूर्व का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उनके अनुसार पृथ्वी का आयु 200 करोड़ से अधिक तथा 300 करोड़ वर्ष से कम होगी, किन्तु इन विद्वानों ने भी अपनी गणना का रूप वैज्ञानिक प्रदान नहीं किया है, यही कारण है कि पृथ्वी की आयु का अनुमान रेडियो सक्रिय पदार्थों के आधार पर भी नहीं लगाया जा सकता है।
7. पृथ्वी के सतह पर जल के उद्भव के आधार पर
ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्रारम्भ में पृथ्वी की सतह पर जल नहीं था, क्योंकि प्रारम्भ में पृथ्वी संतप्त आग के गोले की तरह थी। कालान्तर में जब ऊपर का भाग ठोस हुआ और ठोसीकरण की अवस्था में ऊँचे-नीचे भाग उत्पन्न हो गये तो नीचे के भागों पर जल का जमाव हुआ। ग्रहाणु परिकल्पना के अनुसार ग्रहाणुओं के एकत्रीकरण के फलस्वरूप वायुमण्डल में गैसों का सम्मिश्रण हुआ। वायुमण्डल में गैसों के सम्मिलन से ही जल की उत्पत्ति हुयी। यदि हम उस अवधि का ज्ञान प्राप्त कर सकें, जब वायुमण्डल में गैस सम्मिश्रण की प्रक्रिया हुयी, तो पृथ्वी की आयु का आकलन किया जा सकता है।
कुछ विद्वानों ने समुद्र में जल की वृद्धि के आधार पर आकलन लगाने का प्रयास किया है, परन्तु यह अमान्य कर दिया गया है, क्योंकि जल की वृद्धि दर पूर्वकाल में अधिक रही होगी। कुछ विद्वानों ने लहरों के कटाव के आधार पृथ्वी की आयु 200 करोड़ वर्ष मानी, परन्तु यह विचारधारा भी महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि कटाव की मात्रा प्रत्येक समय बराबर नहीं रहती है। कार्बन 14 जिसे कार्बन डेटिंग कहते हैं, के द्वारा चट्टानों की आयु का पता लगाया जा सकता है। यदि हम पुरानी से पुरानी चट्टानों का विश्लेषण कर सकते हैं, तो उस अवधि का ज्ञान हो सकता है, जब कि चट्टानों का उद्भव हुआ था, किन्तु इस आधार में भी बड़ी असुविधायें हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नये प्रयोगों के द्वारा अधिक सही आयु का पता लगाया जा सकता है।
पृथ्वी की आयु का अनुमान भारतीय परम्परा के अनुसार प्राचीन विद्वानों ने भी लगाया था। इनके अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग दो सौ करोड़ वर्ष मानी गयी है। इन्होंने युगों तथा महायुगों के विश्लेषण द्वारा पृथ्वी की आयु का पता लगाया है, जो कि अन्य कई मतों से मिलता-जुलता है। पृथ्वी की आयु का अनुमान धार्मिक ग्रंथों के आधार पर भी लगाया गया है, परन्तु उनके आकलन सत्यता से दूर हैं, तथापि उनके प्रयास अवश्य सराहनीय हैं। उदाहरणार्थ यूरोप के एक बड़े धर्म नेता ने अनुमान लगाया है कि पृथ्वी आज से 40,000 ईसा पूर्व अक्टूबर के महीने में 26 ता० को 9 बजे सुबह उत्पन्न हुई थी। यह वैज्ञानिक आधार पर आधारित नहीं है, इसलिये किसी भी प्रकार मान्य नहीं है।
इन ऑकलनों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि पृथ्वी की आयु का जो भी अनुमान लगाया गया है, वह सही नहीं है, क्योंकि सभी अनुमान पृथ्वी के उत्पन्न होने के बाद के हैं। इसलिये पृथ्वी की आयु का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिये निम्न तथ्यों का ध्यान देना आवश्यक है –
(i) ऐसी क्रिया का आधार हो, जो या तो पृथ्वी से सम्बन्धित हो या पृथ्वी के जन्म से रही हो। यदि ऐसा नहीं है, तो जो भी
अनुमान लगाया जायेगा वह कल्पित होगा, वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं होगा।
(ii) जिस भी क्रिया का आधार लिया जाय, वह प्रारम्भ से लेकर अब तक एक जैसी हो या उसका ज्ञान पूर्ण हो। यदि क्रिया प्रारम्भ
से अब तक एक जैसी नहीं होगी, तो उसकी गणना भ्रामक होगी। परन्तु खेद का विषय है कि अब तक ऐसी किसी भी क्रिया
का पता नहीं लगाया जा सका है, जो प्रत्येक समय समान रही हो।
(iii) जिस भी क्रिया का आधार दिया जाय उसका सम्बन्ध समय के साथ हो। यदि उसका सम्बन्ध समय के साथ स्थापित नहीं
किया जा सकता है, तो पृथ्वी की आयु का ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता है।
(iv) क्रिया ऐसी होनी चाहिए जिनकी मात्रा जानी हुई इकाइयों में जाना जा सके, यदि ऐसा नहीं होता, तो पृथ्वी की आयु का ज्ञान
नहीं प्राप्त किया जा सकता है।
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