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स्थगन प्रस्ताव किसे कहते हैं , का उद्देश्य क्या होता है , Adjournment Motion in Hindi
Adjournment Motion in Hindi स्थगन प्रस्ताव किसे कहते हैं , का उद्देश्य क्या होता है ?
संसद में मामले उठाने की प्रक्रिया
प्रश्नों के उत्तर पाने में दस दिन से अधिक का समय लग जाता है, सिवाय अल्प-सूचना प्रश्नों के जो संबंधित मंत्री की सहमति से ही पूछे जा सकते हैं। प्रश्नों की प्रक्रिया ऐसी है कि सिवाय आधे घंटे की चर्चा के, उन पर विस्तृत चर्चा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती । कभी कभी अनायास ही, अप्रत्याशित रूप से, कोई समस्या उत्पन्न हो सकती है। ऐसे मामले में यह हो सकता है कि उस समस्या को सरकार के ध्यान में लाने के लिए बहुत पहले सूचना देना संभव न हो । अविलंबनीय लोक महत्व के ऐसे मामले उठाने के लिए बहुत पहले सरकार और संसद द्वारा तुरंत ध्यान दिया जाना अपेक्षित हो, संसद सदस्य के लिए अनेक अतिरिक्त प्रक्रियागत उपाय उपलब्ध हैं, जैसे स्थगन प्रस्ताव (एडजॉर्नमेंट मोशन), ध्यानाकर्षण सूचनाएं (कॉलिंग एटेंशन), अल्पकालीन चर्चाएं (शार्ट डुरेशन डिस्कशन) और नियम 377 के अधीन उल्लेख । इसी तरह सदस्य सार्वजनिक रुचि के मामलों पर चर्चाएं उठाने के लिए विभिन्न प्रस्ताव (मोशन) और संकल्प (रजोल्यूशन) पेश कर सकते हैं और सदन का तथा सरकार का ध्यान उनकी ओर दिला सकते हैं। अविलंबनीय लोक महत्व के मामले उठाने और संसद में वाद विवाद आरंभ करने के लिए उक्त उपायों के प्रयोग के लिए दोनों सदनों के प्रक्रिया नियमों में शर्ते दो गई है।
स्थगन प्रस्ताव
सामान्यतया सदन कार्यसूची में दर्ज मदों के अनुसार ही काम निबटाता है और कार्यसूची में सम्मिलित न किया गया कोई कार्य अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं करता। तथापि अवलिंबनीय लोक महत्व का कोई मामला, यदि अध्यक्ष उस पर सहमत हो जाए तो, नियमित कार्य को रोक कर स्थगन प्रस्ताव के द्वारा सदन के समक्ष लाया जा सकता है।
स्थगन प्रस्ताव पेश करने का मूल उद्देश्य हाल के किसी अविलंबनीय लोक महत्व के मामले की ओर, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और जिसके संबंध में उचित सूचना देकर कोई प्रस्ताव या संकल्प पेश करने से बहुत देर हो सकती है, सदन का ध्यान दिलाना है । जो मामला उठाने का विचार हो वह ऐसा होना चाहिए कि लोगों को और उनकी सुरक्षा को प्रभावित करने वाली कोई गंभीर बात हो गई हो और सदन के लिए अपना नियमित कार्य रोक कर उसकी ओर तुरंत ध्यान देना आवश्यक हो गया हो । अतः स्थगन प्रस्ताव एक असाधारण प्रक्रिया है जिसे गृहीत कर लिए जाने पर “अविलंबनीय लोक महत्व के निश्चित मामले‘‘ पर चर्चा करने के लिए सदन का नियमित कार्य रोक देना होता है । स्थगन प्रस्ताव के आवश्यक तत्व इस प्रकार हैं:
(क) मामला निश्चित स्वरूप का हो;
(ख) उसका आधार तथ्यात्मक हो;
(ग) मामला अविलंबनीय हो;
(घ) वह लोक महत्व का हो;
इस प्रकार देश की राजनीतिक स्थिति, अराजकता, बेरोजगारी, रेल दुर्घटनाएं और विमान दुर्घटनाएं, मिलों का बंद हो जाना, सामान्य अंतराष्ट्रीय स्थिति, स्थगत प्रस्ताव के लिए उचित विषय नहीं है। इसी प्रकार परिवहन मोटर गाड़ियों की कमी, अपहरण के मामले, डकैती,विस्फोट, सांप्रदायिक तनाव भी ऐसे प्रस्ताव के लिए उचित विषय नहीं माने गए हैं। इस प्रस्ताव के द्वारा कोई विशेषाधिकार का प्रश्न, किसी विशिष्ट प्रस्ताव के अधीन उठाया जाने वाला प्रश्न, कोई न्यायालय में विचाराधीन मामला और ऐसा कोई मामला भी नहीं उठाया जाना चाहिए जिस पर उसी अधिवेशन में चर्चा हो चुकी हो ऐसे प्रस्ताव के विषय का संबंध प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत सरकार के आचरण या उसकी किसी त्रुटि से अवश्य होना चाहिए । परंतु यदि राज्य के अधिकार क्षेत्र का कोई विषय राज्य में संवैधानिक घटना से संबंधित हो या अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों या समाज के कमजोर वर्गों पर अत्याचार से संबंधित हो तो गुणावगुणों के आधार पर उसे गृहीत करने के लिए विचार किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, नीचे कुछ विषय दिए गए हैं जिन पर स्थगन प्रस्ताव गृहीत किए गए और चर्चा भी हुई:
1. दिल्ली में नकली शराब पीने के कारण आठ व्यक्तियों की मौत और अनेक राज्य व्यक्तियों का रोगग्रस्त हो जाना और इससे उत्पन्न गंभीर स्थिति;
2. कुतुब मीनार दुर्घटना जिसमें 45 लोग मारे गए;
3. पंजाब में उग्रवादियों की गतिविधियों से उत्पन्न गंभीर स्थिति और इस मामले को हल करने में सरकार की विफलता;
जो सदस्य स्थगन प्रस्ताव पेश करना चाहता हो उसके लिए अपेक्षित है कि वह जिस दिन प्रस्ताव पेश करना चाहता हो उस दिन 10.00 बजे म.पू. तक प्रस्ताव की सूचना अध्यक्ष को, संबंधित मंत्री को और महासचिव को दे। यदि प्रथम दृष्टया अध्यक्ष का समाधान हो जाए कि वह मामला नियमानुकूल है तो वह प्रस्ताव पेश करने के लिए अपनी सम्मति प्रदान कर सकता है । प्रश्नकाल के बाद, अध्यक्ष संबंधित सदस्य से कहता है कि वह प्रस्ताव पेश करने के लिए सदन की अनुमति मांगे। यदि अनुमति दिए जाने पर आपत्ति की जाए जो अध्यक्ष उन सदस्यों से जो अनुमति दिए जाने के पक्ष में हों अपने स्थानों पर खड़े होने के लिए कहेगा और तदनुसार यदि कम से कम पचास सदस्य खड़े हों तो वह घोषणा करेगा कि अनुमति दी जाती है।
प्रस्ताव पेश करने के लिए सदन की अनुमति मिल जाने के बाद, प्रस्ताव औपचारिक रूप से गृहीत हुआ माना जाता है। किसी गृहीत स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा सामान्यतया 16.00 बजे म. प्र. पर आरंभ होती है और ढाई घंटे तक, अर्थात 18.30 बजे म.पू. तक या उसके बाद चलती है। चर्चा प्रस्तावक द्वारा यह प्रस्ताव पेश किए जाने पर आरंभ होती है ‘‘कि सभा अब उपस्थित हो‘‘ । प्रस्ताव पर प्रस्तावक और अन्य सदस्यों के बोल चुकने के पश्चात मंत्री बोलता है और अंत में प्रस्तावक को चर्चा का उत्तर देने का अधिकार होता है। तत्पश्चात प्रस्ताव मतदान के लिए रखा जाता है । यह ध्यान में रखने की बात है कि ऐसे प्रस्ताव पर चर्चा जब आरंभ हो जाए तो उसे निबटाए जाने तक सदन को स्थगित करने की शक्ति अध्यक्ष को प्राप्त नहीं है क्योंकि उस समय यह शक्ति सदन में निहित रहती है।
यदि कोई स्थगन प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाता है तो सदन अपना कार्य पुनः आरंभ कर देता है जो उस प्रस्ताव के कारण रुक गया था। दूसरी ओर, यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो उससे सरकार की निंदा मानी जाती है । यद्यपि उससे सरकार अपदस्थ नहीं होती तथापि उससे यह सिद्ध हो जाता है कि जो सरकार स्थगन प्रस्ताव पर प्रतिकूल मत को रोकने में विफल रही है वह मंत्रिपरिषद में ‘‘अविश्वास के प्रस्ताव‘‘ के परिणाम से बच नहीं सकेगी। किसी स्थगन प्रस्ताव के स्वीकृत हो जाने में चूंकि सरकार की निंदा का तत्व होता है अतः राज्य सभा इस प्रक्रिया का प्रयोग नहीं करती। यह देखा गया है कि स्थगन प्रस्ताव की प्रक्रिया का प्रयोग कभी कभार ही किया जाता है। उदाहरणार्थ, सातवीं लोक सभा की कार्यावधि के दौरान प्राप्त हुई स्थगन प्रस्तावों की 5762 सूचनाओं में से केवल 149 सूचनाएं सदन के समक्ष लाई गईं और अंत में उनमें से केवल 24 सूचनाएं गृहीत हो सकी और उन पर चर्चा हो सकी और उनमें से कोई भी प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हुआ । आठवीं लोक सभा में 1801 सूचनाओं में से 4 विषयों पर 80 गृहीत हुईं और नवीं लोक सभा में 375 सूचनाएं प्राप्त हुईं और 9 पर चर्चा हुई।
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