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निःशस्त्रीकरण का अर्थ क्या है , किसे कहते हैं , परिभाषा , नकारात्मक तथा सकारात्मक कारणों की व्याख्या कीजिए

जानिये निःशस्त्रीकरण का अर्थ क्या है , किसे कहते हैं , परिभाषा , नकारात्मक तथा सकारात्मक कारणों की व्याख्या कीजिए असफलता के कारण है ?

प्रश्न: निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: इसका अर्थ था कि शस्त्रों को सीमित करना जहां तक राष्ट्रीय सुरक्षा में हित मे हो। राष्ट्रसंघ की प्रसविदा में भी ष्राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान रखते हुए राष्ट्र के शस्त्रास्त्रों की निम्नतम सीमा निर्धारित करना, शान्ति बनाए रखने के लिए आवश्यक। निशस्त्रीकरण माना गया।
प्रश्न: निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हैं? राष्ट्र संघ किये गये निःशस्त्रीकरण की प्रयासों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर: प्रथम महायुद्ध के बाद द्वितीय महायुद्ध के प्रारम्भ होने तक सम्पूर्ण अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक जगत को उद्वेलित कर देने वाली सुरक्षा की खोज की समस्या के साथ निःशस्त्रीकरण की समस्या का जुड़ा रहना स्वाभाविक था क्योंकि दोनों एक-दूसरे से पृथक् नहीं अपितु घनिष्ठ रूप से संबंद्ध है। राष्ट्रों के बीच जब तक शस्त्रों की होड़ निहित है तब तक वास्तविक शांति और सुरक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रथम महायुद्ध से पूर्व तक निःशस्त्रीकरण के सभी प्रयास लगभग प्रदर्शन मात्र से किन्तु 8 जनवरी, 1918 को शांतिदूत अमेरिकन राष्ट्रपति विल्सन ने पहली बार हृदय से और निष्ठापूर्वक निःशस्त्रीकरण के सिद्धांत पर बल देते हुए कहा कि ष्राष्ट्रीय शस्त्रों को केवल आंतरिक शांति की रक्षा तक ही सीमित कर देना चाहिए।ष्
उपर्युक्त निश्चय के अनुसार संघ की संविदा के आठवें अनुच्छेद द्वारा संघ के सदस्यों ने यह स्वीकार किया कि ष्राष्ट्रीय सरक्षा का ध्यान रखते हुए किसी भी राष्ट्र के शस्त्रास्त्रों की निम्नतम सीमा निर्धारित करना शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस स्वीकृति के अनुसार एक तरफ तो मित्रराष्ट्रों ने नैतिक रूप में जर्मनी को यह वचन दिया कि जर्मनी का निःशस्त्रीकरण कर दिए जाने के बाद व्यापक निःशस्त्रीकरण किया जाएगा और दूसरी ओर उन्होंने शस्त्रास्त्रों की कमी में श्राष्ट्रीय सुरक्षाश् को प्रमुख मान्यता दी। इसका अभिप्राय यही था था कि मित्रराष्ट्र अपनी सुरक्षा का ख्याल रखते हुए अपना निःशस्त्रीकरण करेंगे। वास्तव में ये दोनों ही बातें परस्पर कुछ विरोधी थी और इन दोनों सिद्धांतों का यह विरोध ही निःशस्त्रीकरण की समस्या बन गया।
प्रश्न यह उठा कि व्यापक निःशस्त्रीकरण की दिशा में किस तरह कदम उठाया जाए। सभी शांति चाहते थे और शांति की उपलब्धि शक्ति संचय द्वारा करना चाहते थे।
इसके अतिरिक्त दो विभिन्न विचारधाराओं के कारण निःशस्त्रीकरण की समस्या और भी जटिल हो गई। एक विचारधारा यह थी कि पहले सुरक्षा का प्रश्न हल हो तब निःशस्त्रीकरण काय दूसरी विचारधारा के पक्षपाती प्रत्यक्ष रूप में . निःशस्त्रीकरण की समस्या का निदान ढूंढ़ना चाहते थे।
संसार का यह दुर्भाग्य था कि अन्ततः दो विश्वयुद्धों के बीच का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का इतिहास निःशस्त्रीकरण के प्रयासों की दुखान्तः कहानी बन गया।
राष्ट्रसंघ द्वारा निःशस्त्रीकरण के प्रयास
राष्ट्रसंघ की संविदा (Covenant) के आठवें अनुच्छेद में निःशस्त्रीकरण संबंधी व्यवस्थाएं दी गई
स्थायी परामर्शदाता आयोग एवं अस्थायी मिश्रित आयोग (1920) रू संविदा के आठवें अनुच्छेद के द्वितीय प्रकरण के अनुपालन में जनवरी, 1920 में, राष्ट्रसंघ की संविदा के अनुच्छेद 1 के अंतर्गत एक स्थायी परामर्शदाता आयोग (Permanent Advisory Commission) की स्थापना हुई। इन सैनिक विशेषज्ञों से निःशस्त्रीकरण की आशा करना वैसा ही था जैसा पादरियों के किसी आयोग से नास्तिकता की घोषणा की आशा रखना।
एक प्रयत्न राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्थल-सेना को निश्चित करने संबंधी लार्ड इशर की योजना के रूप में था। इस प्रयत्न की असफलता के बाद दूसरा असफल प्रयत्न सन् 1922 की पाँच शक्तियों की संधि के सिद्धांतों का अहस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा स्वीकार कराने का. था। तीसरे प्रयत्न के फलस्वरूप पारस्परिक सहायता-संधि का प्रारूप तथा किया गया जिसमें निःशस्त्रीकरण को सामूहिक सुरक्षा का मूलाधार बताया गया।
तैयारी आयोग (Preparatory Commission) : 12 दिसम्बर, 1925 को नियक्त इस आयोग के सदस्य परिषद् में राज्या । प्रतिनिधियों के अतिरिक्त संघ के कुछ अन्य सदस्य-राज्यों के प्रतिनिधि भी थे और संघ के सदस्य न होने पर भी सयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत रूस तथा जर्मनी के प्रतिनिधियों को इसमें आमंत्रित किया गया था।
आयोग ने इन विभिन्न दृष्टिकोणों को लिपिबद्ध किया। आयोग के समक्ष एक जटिलता यह भी थी कि किस प्रकार सान विषयों को राजनीतिक विषयों से पृथक् रखा जाए। तैयारी आयोग पांच वर्ष तक निरंतर प्रयत्न करने और सात बैठक के पर भी निःशस्त्रीकरण संबंधी मतभेदों को नहीं सुलझा सका।
पूर्ण एवं सार्वदेशिक निःशस्त्रीकरण का प्रस्ताव रू 30 नवम्बर, 1927 को रूसी प्रतिनिधि लिटविनोव (Litvinove) नेतत्व में सोवियत प्रतिनिधि-मण्डल ने तैयारी आयोग के शरद्कालीन अधिवेशन में जान डाल दी।
9 नवम्बर, 1930 को आयोग का सातवां और अंतिम अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में भी सीमन सिद्धांतों (Principles of Limitation) संबंधी मतभेदों को दूर करने की दिशा में प्रगति नहीं की जा सकी। 9 दिसम्बर, 1930 को आयोग ने निरूशस्त्रीकरण की योजना का एक अस्थायी प्रारूप प्रस्ताव पास करने में सफलता प्राप्त की।
तैयारी आयोग के पाँच वर्षों के श्रम का केवल यही परिणाम सामने आया था। अब निःशस्त्रीकरण सम्मेलन के लिए मार्ग प्रशस्त हो चुका था और इस प्रस्ताव को मुख्य आधार मानकर 3 फरवरी, 1932 को जेनेवा में इसका आयोजन हुआ।
जेनेवा का निःशस्त्रीकरण सम्मेलन (Geneva Disarmament Conference 1932)
जेनेवा निःशस्त्रीकरण सम्मेलन निःशस्त्रीकरण की दिशा में राष्ट्रसंघ का महत्वपूर्ण प्रयास था। निःशस्त्रीकरण सम्मेलन का अधिवेशन 3 फरवरी, 1932 को प्रारम्भ हुआ जिसमें 61 राज्यों ने भाग लिया। इनमें से पाँच राज्य ऐसे भी थे जो राष्ट्रसंघ के सदस्य नहीं थे। निःशस्त्रीकरण सम्मेलन में आने वाले प्रतिनिधियों के दृष्टिकोणों में इतना अधिक मतभेद था कि व 232 व्यक्ति अपने साथ 337 प्रस्ताव लेकर आए थे। आखिरकार 20 जुलाई को सम्मेलन के सामने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जिसमें यह उल्लेख किया गया कि निम्नलिखित बातों पर समझौता हो गया है
(1) बमवर्षा निषिद्ध करना, वायुयानों की संख्या सीमित करना तथा असैनिक वायुयानों का विनियमन (Regulation), (2) भारी तोपखाना और वृहत् आकार (जो निश्चित नहीं किया गया था) के टैंकों को सीमित करना, एवं (3) रासायनिक युद्ध निषिद्ध करना है।
16 सितम्बर, 1932 का दिन सम्मेलन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुआ। जर्मन प्रतिनिधि मण्डल सदा ही इस सिद्धांत पर जोर देता रहा था कि अन्य राष्ट्रों को भी वर्साय की संधि के अनुसार अपना निःशस्त्रीकरण कर लेना चाहिए या पुनशस्त्रीकरण (Re-arming) का जर्मनी का अधिकार मान लेना चाहिए। सितम्बर को जर्मनी ने अपनी समानता की माँग स्वीकृत न होने के कारण यह घोषणा की कि सम्मेलन के भावी कार्यक्रम में जर्मनी केवल तभी भाग लेंगा, जबकि ष्राष्ट्रों के समान अधिकार का सिद्धांत स्पष्ट और निश्चित रूप से लिखा जाएगा।ष्
14 अक्टूबर, 1933 को हिटलर ने यह घोषणा की कि उसने निःशस्त्रीकरण सम्मेलन एवं राष्ट्रसंघ की सदस्यता त्याग दी है। जर्मनी की इस घोषणा से निःशस्त्रीकरण सम्मेलन क्रियात्मक रूप से समाप्त हो गया।
सम्मेलन के अध्यक्ष आर्थर हैण्डरसन ने स्पष्ट रूप से फ्रांस को निःशस्त्रीकरण की असफलता के लिए दोषी ठहराया।
पुर्नशस्त्रीकरण की दौड़ रू फ्रांस अपनी सुरक्षा की दुहाई देता हुआ निःशस्त्रीकरण योजनाओं का विरोध कर रहा था औरउधर अन्य देशों में भी अब पुनर्शस्त्रीकरण प्रतियोगिता आरम्भ हो गई।
प्रश्न: राष्ट्रसंघ के बाहर किये निःशस्त्रीकरण प्रयासों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर: 1. वाशिंगटन नौ-सेना निःशस्त्रीकरण सम्मेलन (1921-22)
12 नवम्बर, 1921 को आयोजित यह सम्मेलन यद्यपि मोटे तौर पर प्रशान्त महासागर की समस्याओं को हल करने की दृष्टि से बुलाया गया था, तथापि इसमें विभिन्न राष्ट्रों की नौ-शक्ति को नियंत्रित करने के भी प्रयत्न किए गए। सम्मेलन के प्रारंभ में विश्व की पांच महाशक्तियां – अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस और इटली शामिल हुई।
वाशिंगटन सम्मेलन ने 12 नवम्बर, 1921 से 6 फरवरी, 1922 तक कार्य किया और इस अवधि में उसने ऐसी 7 संधियाँ सम्पन्न की जिनका उद्देश्य नौ-सैनिक प्रतिद्वंद्विता का अन्त करना एवं सुदूर-पूर्व की कुछ समस्याओं का निराकरण करना था।
वाशिंगटन सम्मेलन प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्धों के मध्य हुए अनेक निःशस्त्रीकरण सम्मेलनों में सबसे अधिक महत्वपर्ण एवं सफल सम्मेलन था। इसने युद्धपातों के निर्माण की तात्कालिक प्रतियोगिता को नियंत्रित किया। इस सम्मेलन में हए समझौते का यह परिणाम निकला कि नौ-सैनिक प्रतियोगिता लगभग दस वर्ष तक रुक गई अथवा एकदम मन्द पड गई।
वाशिंगटन सम्मेलन यह अपने उद्देश्यों में पूर्ण सफल नहीं हुआ। बड़े जंगी जहाजों के बारे में निर्णय ले लिया गया था लेकिन अन्य प्रकार के छोटे जहाजों के संबंध में कोई समझौता नही हो सका। इसका परिणाम यह निकला कि छोटे लडाकु जहाजों के संबंध में प्रतिस्पर्धा चलती रही जिससे सुरक्षा की भावना बढ़ने की अपेक्षा कम हो गई।
2. जेनेवा नौ-सैनिक सम्मेलनय (Geneva Conference, June-August 1927)
इस सम्मेलन में तीनों राष्ट्रों अमेरिका, ब्रिटेन और जापान के जो प्रतिनिधि सम्मिलित हुए वे विख्यात नौ-सेनापति एवं नौ-विशेषज्ञ थे। वे अपना धन्धा समाप्त करना नहीं चाहते थे और उनसे यह आशा करना व्यर्थ था कि वे नौ-सैनिक शक्ति घटाने के सच्चे प्रयास करेंगे।
3. लंदन का नौ-सैनिक सम्मेलनय (London Naval Conference – 1930)
जेनेवा-सम्मेलन की असफलता के बाद युद्धपोतों के निर्माण में तीव्र वृद्धि का जो निश्चय अमेरिका ने किया वह निरूसंदेह अन्य देशों को भयभीत कर देने वाला था। ब्रिटेन के लिए यह विशेष चिंता का विषय था।
लन्दन का नौ-सैनिक सम्मेलन 21 जनवरी, 1930 से प्रारम्भ हुआ। इस सम्मेलन में ब्रिटेन ने इस बात पर बल दिया कि महाशक्तियों को सब प्रकार के युद्धपोतों के निर्माण को घटाना चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका ने ब्रिटिश प्रस्ताव का समर्थन करते हुए यह मांग की कि उसे ब्रिटेन के साथ समानता (Parity) मिलनी चाहिए। इटली अपनी नौ सेना में कमी इस शर्त पर करने को तैयार था कि उसकी घटी हुई जलशक्ति महाद्वीपीय शक्तियों अर्थात् फ्रांस के बराबर होनी चाहिए। फ्रास की मांग यह थी कि इटली और उसकी आवश्यकताओं को समानता के सिद्धांत से नहीं आंका जा सकता। फ्रांस में वाशिगटन-अनुपात को अन्य जहाजों पर लाग करने तथा इटली के समानता के दावे-दोनों बातों को अस्वीकार कर दिया सम्मेलन में पनडुब्बियों के प्रश्न पर भी गहरा मतभेद था। ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका इनकी समाप्ति करने के पक्ष में थे, फ्रांस और जापान इससे सहमत नहीं थे।
4. अंगोरा प्रोटोकोलय (Angora Protocol, 1930)
लंदन नौ-सैनिक संधि का अनुकरण करते हुए कुछ अन्य देशों ने भी नौ-सैनिक निःशस्त्रीकरण प्रदर्शन किया। 30 अक्टबर 1930 को यूनान और टर्की ने अंगोरा प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर किए जिसका उद्देश्य समुद्री अस्त्रशस्त्रों में प्रतियोगिता समाप्त करना था। इसी प्रकार के एक प्रोटोकोल पर टर्की एवं सोवियत संघ के बीच भी हस्ताक्षर हुए।
5. द्वितीय लंदन नौ-सैनिक सम्मेलन (London Naval Conference, 1935)
नौ-सेना के निःशस्त्रीकरण के संबंध में अंतिम प्रयास के रूप में 9 दिसम्बर, 1935 को द्वितीय लंदन सम्मेलन का आरम्भ हुआ। यह पांच देशों का नौ-सैनिक सम्मेलन था जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली ने भाग लिया।
द्वितीय लंदन सम्मेलन में जापान ने ब्रिटेन और अमेरिका के बराबर जल-सेना रखने की मांग की। ब्रिटेन एवं अमेरिका इस प्रस्ताव को मानने के लिए सहमत नहीं हुए, अतः 15 जनवरी, 1936 को जापान सम्मेलन से पृथक् हो गया। एबीसीनिया-संकट के कारण इटली ने भी सम्मेलन का परित्याग कर दिया।
प्रश्न: राष्ट्रसंघ एवं राष्ट्रसंघ से बाहर किये गये निःशस्त्रीकरण के प्रयास क्यों असफल हुए? बताइए।
उत्तर: सन् 1919 से 1935 के बीच निःशस्त्रीकरण-समस्या को हल करने के लिए राष्ट्रसंघ के अंतर्गत और इसके बाहर, कई प्रकार के प्रत्यन किए
गए, परन्तु वे असफल रहे और अन्ततोगत्वा संसार को दूसरा महायुद्ध लड़ना पड़ा।
1. निःशस्त्रीकरण प्रयासों के असफल होने का पहला. मुख्य कारण यह था कि संसार के विभिन्न राष्ट्रों की वास्तविक शांति में कोई आस्था न थी।
2. निःशस्त्रीकरण प्रयासों एवं निःशस्त्रीकरण सम्मेलन की असफलता का दूसरा कारण यह था कि समस्या के संबंध में विभिन्न राज्यों के
दृष्टिकोणों में तीव्र मतभेद थे।
3. निःशस्त्रीकरण सम्मेलन एवं निःशस्त्रीकरण के अन्य प्रयासों की विफलता का तीसरा मौलिक कारण यह था कि लक्ष्य की प्राप्ति के लिए
जो भी कदम उठाए गए उनके परिणामस्वरूप केवल एकपक्षीय निःशस्त्रीकरण ही सम्भव हो सका। महाशक्तियों ने निरूशस्त्रीकरण के सिद्धांत में अविश्वास और पक्षपातपूर्ण व्यवहार का नग्न प्रदर्शन किया।
4. चैथा कारण यह था कि शस्त्रास्त्रों का निर्माण करने वाली कम्पनियों ने निःशस्त्रीकरण सम्मेलनों को विफल बनाने का पूरा-पूरा प्रयास
किया।
5. निःशस्त्रीकरण सम्मेलनों की विफलता का पाँचवाँ प्रमुख कारण यह था कि निःशस्त्रीकरण की यथार्थ व्याख्या और स्वरूप निर्धारण के बारे में विभिन्न राष्ट्रों में मतैक्य नहीं था। रक्षात्मक अथवा आक्रमणकारी शस्त्रों के विभेद पर राष्ट्रों में गम्भीर मतभेद था।
6. निःशस्त्रीकरण सम्मेलन की असफलता का छठा कारण विभिन्न राष्ट्रों की युद्ध संबंधी मनोवृत्ति में मौलिक मतभेद था। कुछ राष्ट्र युद्ध का सहारा लेने को उत्सुक थे तो कुछ शांति के उपासका दृ
7. उपनिवेशों की सुरक्षा का प्रश्न निःशस्त्रीकरण प्रयासों के मार्ग में सातवीं बाधा था। पश्चिमी यूरोप के राज्यों का साम्राज्य दूर-दूर तक
फैला हुआ था। ब्रिटेन विश्वव्यापी साम्राज्य का मालिक था। इन उपनिवेशों पर अपना अपवित्र अथवा अनैतिक शासन बनाए रखने के
लिए साम्राज्यवादी राज्यों को निरंतर सैनिक शक्ति की आवश्यकता बनी रहती. थी, अतः उसके निःशस्त्रीकरण प्रयास केवल दर्शनी हुण्ड
के समान होते थे।
8. निःशस्त्रीकरण प्रयासों एवं सम्मेलनों की मौत का आठवां प्रमुख कारण यह था कि समस्या को सुलझाने का प्रयल
मौलिक रूप से नहीं, वरन् ऊपरी तौर से तथा प्राविधिक रूप से किया गया था।
निःशस्त्रीकरण के सभी प्रयत्न एवं सम्मेलनों ने शांति के मार्ग को प्रशस्त करने की अपेक्षा कंटकमय ही अधिक बनाया, क्योंकि इनकी असफलता ने वैमनस्य एवं भ्रांतियों को बढ़ावा दिया। इन सब बातों का यह परिणाम हुआ कि संसार उसा अंतर्राष्टीय अराजकता की स्थिति में पहुंच गया जिसमें यूरोप प्रथम विश्व-युद्ध के अवसर पर था। इटली, जर्मनी, फ्रास, पोलैण्ड और यूरोप के अन्य छोटे बड़े सभी राज्य युद्ध की तैयारी में लग गए। करोड़ों रुपयों की विशाल राशि खर्च करके फ्रांस ने मेजिनो-लाइन तैयार की। फ्रांस के जवाब में हिटलर ने भी समानान्तर रूप से किलेबन्दियों की एक श्रंखला तैयार कराई थी जिसे श्सीगफ्रीड-लाइनश् कहा जाता था। इस तरह प्रत्येक देश आत्मघाती यद्ध की तैयारी में लगा हुआ था। यद्धोन्माद के ऐसे वातावरण में निःशस्त्रीकरण प्रयासों का असफल हो जाना स्वाभाविक था।

1. जापान पर प्रभाव
आक्रामक राष्ट्रवाद
मेजी संविधान सीमित मताधिकार पर आधारित था और उसने डायट बनाई जिसके अधिकार सीमित थे (जापानियों ने संसद के लिए इस जर्मन शब्द का इस्तेमाल किया क्योंकि उनकी काननी सोच जर्मनी की सोच से प्रभावित थी)। शाही पुनःस्थापना करनेवाले नेता सत्ता में बने रहे और उन्होंने राजनीतिक पार्टियों का गठन किया। 1918 और 1931 के दरमियान जनमत से चुने गए प्रधानमंत्रियों ने मात्रपरिषद् बनायी। इसके बाद उन्होंने पार्टियों का भेद भुला कर बनाई गई राष्ट्रीय एकता मंत्रिपरिषदों के हाथों अपनी सत्ता खो दी। सम्राट सन्यबला का कमांडर था और 1890 से ये माना जाने लगा कि थलसेना और नौसेना का नियंत्रण स्वतंत्र है। 1899 में प्रधानमंत्री ने आदेश दिए कि केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही मंत्री बन सकते हैं। सेना को मजबत बनाने की महिम और जापान के उपनिवेश देशों की वृद्धि इस डर से जुडे हए थे कि जापान पश्चिमी शक्तियों की दया पर निर्भर है। इस डर को सैन्य-विस्तार के खिलाफ और सैन्यबलों को अधिक धन देने के लिए वसूले जानेवाले उच्चतर करों के खिलाफ उठनेवाली आवाजों को दबाने में इस्तेमाल किया गया।
पश्चिमीकरण‘ और ‘परंपरा
जापान के अन्य देशों के साथ संबंधों पर जापानी बुद्धिजीवियों की आनुक्रमिक पीढ़ियों के विचार अलग-अलग थे। कुछ के लिए, अमरीका और पश्चिमी यूरोपीय देश सभ्यता की ऊँचाइयों पर थे जहाँ जापान पहुँचने की आकांक्षा रखता था। फुकुजावा यूकिची (थ्नान्रंूं ल्नापबीप) मेजी काल के प्रमुख बुद्धिजीवियों में से थे। उनका कहना था कि जापान को श्अपने में से एशिया को निकाल फेंकना चाहिए। यानि जापान को अपने एशियाई लक्षण छोड़ देने चाहिए और पश्चिम का हिस्सा बन जाना चाहिए।
अगली पीढ़ी ने पश्चिमी विचारों को पूरी तरह से स्वीकार करने पर सवाल उठाये और कहा कि राष्ट्रीय गर्व देसी मूल्यों पर निर्मित होना चाहिए। दर्शनशास्त्री मियाके सेत्सुरे (Miyake Setsurei, 1860-1945.) ने तर्क पेश किया कि विश्व सभ्यता के हित में हर राष्ट्र को अपने खास हुनर का विकास करना चाहिए। “अपने को अपने देश के लिए समर्पित करना अपने को विश्व को समर्पित करना है। इसकी तुलना में बहुत से बुद्धिजीवी पश्चिमी उदारवाद की तरफ आकृर्षित थे. और वे चाहते थे कि जापान अपना आधार सेना की बजाय लोकतंत्र पर बनाए। संवैधानिक सरकार की माँग करने वाले जनवादी अधिकारों के आंदोलन के नेता उएकी एमोरी (Ueti Emori, 1857-1892) फ्रांसीसी क्रांति में मानवों के प्राकृतिक अधिकार और जन प्रभुसत्ता के सिद्धांतों के प्रशंसक थे वे उदारवादी शिक्षा के पक्ष में थे जो प्रत्येक व्यक्ति को विकसित कर सके रू श्व्यवस्था से ज्यादा कीमती चीज है, आजादीश्। कुछ दूसरे लोगों ने तो महिलाओं के मताधिकार की भी सिफारिश की। इस दबाव ने सरकार को संविधान की घोषणा करने पर बाध्य किया।
रोजमर्रा की जिंदगी
जापान का एक आधुनिक समाज में रूपांतरण रोजाना की जिंदगी में आए बदलावों में भी देखा जा सकता है। पैतृक परिवार व्यवस्था में कई पीढ़ियाँ परिवार के मुखिया के नियंत्रण में रहती थीं। लेकिन जैसे-जैसे लोग समृद्ध हुए, परिवार के बारे में नए विचार फैलने लगे। नया घर (जिसे जापानी अंग्रेजी शब्द का इस्तेमाल करते हुए होमु कहते हैं) का संबंध मूल परिवार से था, जहाँ पति-पत्नी साथ रह कर कमाते और घर बसाते थे। पारिवारिक जीवन की इस नयी समझ ने नए तरह के घरेलू उत्पादों, नए किस्म के पारिवारिक मनोरंजन और नए प्रकार के घर की मांग पैदा की। 1920 के दशक में निर्माण कम्पनियों ने शुरू में 200 येन देने के बाद लगातार 10 साल के लिए 12 येन माहवार की किश्तों पर लोगों को सस्ते मकान मुहैया कराये- यह एक ऐसे समय में जब एक बैंक कर्मचारी (उच्च शिक्षाप्राप्त व्यक्ति) की तनख्वाह 40 येन प्रतिमाह थी।
आधुनिकता पर विजय
सत्ता केंद्रित राष्ट्रवाद को 1930-40 के दौरान बढ़ावा मिला जब जापान ने चीन और एशिया में अपने उपनिवेश बढ़ाने के लिए लड़ाइयाँ छेड़ीं। ये लड़ाइयाँ दूसरे विश्व युद्ध में जाकर मिल गई जब जापान ने अमरीका के पर्ल हार्बर पर हमला किया। इस दौर में सामाजिक नियंत्रण में वृद्धि हुई। असहमति प्रकट करने वालों पर जुल्म ढाये गए और उन्हें जेल भेजा गया। देशभक्तों की ऐसी संस्थाएँ बनीं जो युद्ध का समर्थन करती थीं। इनमें महिलाओं के कई संगठन थे। 1943 में एक संगोष्ठी हुई श्आधुनिकता पर विजयश्। इसमें जापान के सामने जो दुविधा थी उस पर चर्चा हुई, यानि आधुनिक रहते हुए पश्चिम पर कैसे विजय पाई जाए। संगीतकार मोरोड साबरो ने सवाल उठाया कि संगीत को ऐंद्रिक उद्दीपन की कला से वापस लाकर आत्मा की कला के रूप में उसका पनर्वास कैसे कराया जाए। वे पश्चिमी संगीत को नकार नहीं रहे थे। वे ऐसी राह खोज रहे थे जहाँ जापानी संगीत को पश्चिमी वाद्यों पर बजाए या दहराए जाने से आगे ले जाया जा सके। दर्शनशास्त्री निशितानी केजी ने श्आधुनिकश् को तीन पश्चिमी धाराओं के मिलन और एकता से परिभाषित कियाः पनर्जागरण, प्रोटेस्टेंट सुधार, और प्राकृतिक विज्ञानों का विकास। उन्होंने कहा कि जापान की श्नैतिक ऊर्जाश् (यह शब्द जर्मन दर्शनशास्त्री रांके से लिया गया है) ने उसे एक उपनिवेश बनने से बचा लिया और जापान का फर्ज बनता है एक नयी विश्व पद्धति. एक विशाल पूर्वी एशिया के निर्माण का। इसके लिए एक नयी सोच की जरूरत है जो विज्ञान और धर्म को जोड सके।
हार के बाद एक वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में वापसी
जापान की औपनिवेशिक साम्राज्य की कोशिशें संयुक्त बलों के हाथों हारकर खत्म हो गई। यह तर्क दिया गया है कि यह जल्दी खत्म करने के लिए हिरोशिमा और नागासाकी पर नाभिकीय बम गिराये गये। लेकिन अन्य लोगों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर जो विध्वंस और दुख-दर्द का तांडव हुआ, वह पूरी तरह से अनावश्यक था। अमरीकी नेतृत्व वाले कब्जे (1945-47) के दौरान जापान का विसैन्यीकरण कर दिया गया और एक नया संविधान लागू हुआ। इसके अनुच्छेद 9 के श्तथाकथित युद्ध न करने के वाव्यांशश् के अनुसार युद्ध का राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल वर्जित है। कृषि सुधार, व्यापारिक संगठनों का पनर्गठन और जायबात्स यानि बडी एकाधिकार कंपनियों की पकड़ को खत्म करने की भी कोशिश की गई। राजनीतिक पार्टियों को पनर्जीवित किया गया और जंग के बाद पहले चुनाव 1946 में हुए। इसमें पहली बार महिलाओं ने भी मतदान किया। शानी भयंकर हार के बावजद जापानी अर्थव्यवस्था का जिस तेजी से पुनर्निर्माण हुआ, उसे एक युद्धोत्तर श्चमत्कारश् कहा गया है। लेकिन यह चमत्कार से कहीं अधिक था और इसकी जड़ें जापान के लंबे इतिहास में निहित थीं। संविधान को औपचारिक स्तर पर गणतांत्रिक रूप इसी समय दिया गया। लेकिन जापान में जनवादी आंदोलन और राजनीतिक भागेदारी का आधार बढ़ाने में बौद्धिक कियता की ऐतिहासिक परंपरा रही है। युद्ध से पहले के काल की सामाजिक संबद्धता को गणतांत्रिक रूपरेखा के बीच सदढ किया गया। इसके चलते सरकार, नौकरशाही और उद्योग के बीच एक करीबी रिश्ता कायम हुआ। अमरीकी समर्थन और साथ ही कोरिया और वियतनाम में जंग से जापानी अर्थव्यवस्था को मदद मिली।

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