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धर्म का राजनीतिकरण क्या है , धर्म और राजनीति नहीं मिलाया जाना चाहिए , भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका
जाने धर्म का राजनीतिकरण क्या है , धर्म और राजनीति नहीं मिलाया जाना चाहिए , भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका role of religion in indian politics in hindi ?
धर्म की परिभाषा : जब एक लोगों का समूह विशेष परम्पराओं का अनुसरण करते है और उन परम्पराओं के अनुसार अपना व्यवहार बना लेते है तो इसे धर्म कहते हैं | धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ होता है “धारण करने योग्य” अर्थात धर्म का अर्थ होता है , मानव को एक करना , सबसे बड़ा धर्म होता है मानवधर्म , जिसका उद्देश्य मानव सेवा को सर्वोपरी रखना है |
धर्म : किसी धर्म को मानना या धार्मिक व्यवस्था का अनुसरण करना बुरा नहीं है लेकिन धार्मिक हितों को राष्ट्रीय हितों से सर्वोपरि मानना और अपने धार्मिक हितों को अन्यों के धार्मिक हितों की कीमत पर प्रोत्साहन देना पूरे देश में समस्या खड़ी करता है। अर्थात सभी धर्मों को समान मानना चाहिए और राष्ट्र को सर्वोपरी रखना चाहिए , और अन्य धर्मों को भी समान दर्जा प्रदान करना चाहिए |
धीरे-धीरे भारतीय राजनीति ने धर्म का राजनीतिकरण देखा है और इसने भारतीय राजनीति को कई तरह से प्रभावित किया है |
धर्म का राजनीतिकरण क्या है ? : जब किसी राजनेता द्वारा या राजनीति पार्टी द्वारा धर्म के आधार पर वोट मांगना या जनता द्वारा राजनेता को वोट धर्म विशेष के कारण देना , धर्म का राजनीतिकरण कहलाता है |
धर्म के राजनीतिकरण के कारण
मुस्लिमों का आर्थिक पिछडापन – आजादी के बाद यह आशा की गई थी कि सभी को अवसर की समानता मिलने से मुस्लिम भी इसका पूर्ण उपयोग करेंगे परन्तु आज भी शैक्षणिक, स्वास्थ्य एवं अन्य व्यावसायिक संस्थानों में मुस्लिमों की संख्या उसकी जनसंख्या ? की तुलना में बहुत कम है तथा वे आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से हिंदुओं से बहत पिछड़े हुए है। समुदायों के बीच यह असमानता बहुत बढ़ती जा रही है और मलतफहमियाँ बढ़ा रही है। मुस्लिमों का आर्थिक , शैक्षणिक, स्वास्थ्य एवं अन्य व्यावसायिक संस्थानों के लिए पिछड़ापन उन्हें असहज और असुरक्षित बना सकता है जिससे वे अपने धर्म को ऊपर उठाने के लिए एक विशेष धर्म के लोगों को और धार्मिक एजेंडे वाली पार्टी चुनने के लिए मजबूर हो जाते है , इसी प्रकार कई कारण अन्य धर्मों के लोगों के साथ भी होता है और वे भी अपने धर्म के हिसाब से पार्टी और प्रतिनिधित्व चुन लेते है |
सांप्रदायिक दल एवं संस्थाएँ
देश में विभिन्न प्रकार के साम्प्रदायिक दल और संस्थाएं कार्य करती है जो अपने धर्म के लिए कार्य करते है और इन दलों के आग्रह पर इन दलों को अनुसरण करने वाले लोग एक विशेष धर्म को वोट देते है | अर्थात
हिंदु महासभा, मुस्लिम लीग, अकालीदल आदि जाने पहचाने धार्मिक सांप्रदायिक दल है तथा अन्य अराजनैतिक संस्थाएं जैसे बजरंग दल, विश्व हिंदु परिषद, इस्लामिक सेवक संघ, जमात-ए- इस्लाम आदि, जो यह घोषित करते हैं कि उनके कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है परंतु ये संगठन भाजपा/अकालीदल तथा मुस्लिम लीग जैसी पाटियों से समर्थित है। ये अर्द्ध शिक्षित तथा धार्मिक संवेदनशील तत्वों को धर्म के नाम पर सांप्रदायिक झगड़ों में लिप्त होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
कांग्रेस पार्टी की तुष्टिकरण की नीति :
सभी पार्टियों वोट खीचने के लालच में आग में घी डालने का काम किया है। मुस्लिमों द्वारा कांग्रेस का एक मुश्त मतदान के पीछे कांग्रेस की मुस्लिम उन्मुख नीतियां है और कांग्रेस नेताओं ने मुस्लिम तुष्टीकरण नेताओं पर न तो कोई कार्यवाही की गई और न ही मुस्लिम पर्सनल लॉ सुधारने के लिए प्रयास किया गया।
० चुनावी मजबूरियाँ
आज हमारी राजनीति पूर्णतया बेलेट -बॉक्स आधारित है तथा चनाव अपने आप में
साध्ये बन गए है। मतदाताओं की धार्मिक निष्ठा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रपंच /अभियानों में व्यक्त होती जाती है। जैसे भाजपा व शिवसेना 1989-90 के महाराष्ट्र चुनावों में एक हो गए थे तथा उनकी थीम हिंदुत्व तथा मुस्लिम विरोधी प्रपंच ही थी। किसी भी चुनावी क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन उस क्षेत्र में रहने वाली जातियाँ समुदाय
की मजबूती के आधार पर किया जाता है।
सांप्रदायिक मीडिया साहित्य व पुस्तके
अकाली पत्रिका, सोबत एवं आर्गेनाइजर जैसे सांप्रदायिक समाचार पत्रों का खुलकर
प्रसार भी सांप्रदायिक ताकतों के विकास में कम जिम्मदार नहीं है विभिन्न
इतिहासकारों द्वारा इतिहास के लेखन ने भी धार्मिक दरार बढ़ाने में मदद की है।
मुस्लिम में विलगन व अलगाववाद
आर्थिक पिछड़ेपन की भावना तथा यह निराशा कि सरकारी नौकरियों,व्यापार तथा शिक्षा के अवसरों के रूप में आधुनिकीकरण के लाभ मुस्लिमों तक नहीं पहुंचे है इसने मुस्लिमों में विलगन प्रवृतियों को प्रोत्साहित किया है और वे महसूस करते है कि बहुसंख्यक समुदाय में प्रशासन को प्रभावित करके अल्पसंख्यक हितों को गौण कर
दिया है। 0 उर्दू के साथ उत्तर प्रदेश में शर्मनाक व्यवहार ने मुस्लिम नेताओं को व्यथित किया
तथा उनके हिंदु-विरोधी पूर्वाग्रह में कोई परिवर्तन नहीं आया और मुस्लिम नेतओं के वंदेमातरम् तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम पर बयान उनकी
परंपरागत अलगाववादी प्रवृति की व्याख्या करते हैं।
हिंदु अंध राष्ट्रीयता –
बटवारे के पश्चात कई लोगों को लगा कि उनको (मुस्लिम) मातृभूमि मिल गई और
भारत अब सिर्फ हिंदुओं के लिए होना चाहिए। हिंदुमहासभा अखण्ड भारत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। 1951 में जनसंघ हिंदु पुनरुद्धार के उद्देश्य से बनाया गया “राष्ट्रीय
स्वयं सेवक संघ हमेशा सांप्रदायिक दंगों के लिए मुस्लिमों पर आरोप लगाता है।
राजनीतिक मौकापरस्ती/अवसरवाद
अपनी पंथनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं के बावजूद भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग तथा अकाली दल जैसे दलों के साथ गठबंधन किए तथा सांप्रदायिक तथा धर्म के राजनीतिकरण को राजनैतिक सम्मान दिलाया। सांप्रदायिक दलों के साथ राजनितिक गठबंधन से और उन्हें राजनितिक अवसर मिलने से देश में अन्य सांप्रदायिक संगठन और दल निर्मित हो गए जिससे धर्म के आधार पर वोट मांगना आम हो गया और जिसे धर्म विशेष के लोग अपने दल और संगठन बनाकर वोट मांगने लगे |
राजनीतिक में धर्म की भूमिका के परिणाम
यह हमारी बहुधार्मिक बंधुता में सहअस्तित्व के प्रतिरुप को बाधित करता है। अर्थात धर्म के आधार पर लोगों का बंटवारा राजनितिक विचारधारा के आधार पर हो गया जिससे अन्य धर्मों के साथ बंधुता कमजोर हो गयी और दो धर्मों के मध्य खाई और गहरी हो गयी |
यह भारत की राष्ट्रवादी पहचान के खिलाफ है और हमारी उभरती पंथनिरपेक्ष संस्कृति के लिए झटका है। प्राचीन काल से हमारा भारत देश बहु धार्मिक संस्कृति के लिए जाना जाता है लेकिन धर्म राजनीतिकरण होने से शासन में रह रही राजनीति पार्टी अन्य धर्मों के विरुद्ध और अपने धर्म को ध्यान में रखकर योजनायें बनाती है |
यह हमारी लोकतांत्रिक राजनैतिक स्थायित्व का निम्नीकरण करता है। धार्मिक राजनीति के नाम परे हत्याएं व अन्य शर्मनाक घटनाएं हमारी मानवता व संयुक्त संस्कृति की भी हत्या करते हैं। यह एक आपदा कारक बन चुका है तथा स्थायित्व विकास राष्ट्रीय सुरक्षा लोगों में देशभक्ति व गर्व की कमजोर कर सकती है। धर्म में राजनीतिक के आने से महत्वपूर्ण उद्देश्यों जैसे गरीबी उन्मूलन, बीमारी उन्मूलन शिक्षा की उपलब्धता, रोजगार, आवास की पूर्ति बाधित होती है।
राजनीति में धर्म के नकारात्मक प्रभाव को रोकने के उपाय
सांप्रदायिक सभाओं पर प्रतिबंध और दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सामुदायिक जुर्माना इसका एक महत्वपूर्ण उपाय हो सकता है। संयुक्त राष्ट्रीयता की सर्वश्रेष्ठ उम्मीद सभी समुदायों के संतुलित विकास पर निर्भर करती है | अर्थात धर्म के आधार पर होने वाली सभाओं पर नियंत्रण स्थापित किया जाना चाहिए और धार्मिक दंगों की स्थिति में सामुदायिक जुर्माना लगाया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे दंगों को रोका जा सके |
० मुस्लिम और अन्य समूहों को आर्थिक रूप से समानता पर लाया जाए ताकी उनमें सुरक्षा की भावना जागृत हो। कानून और व्यवस्था मशीनरी का विराजनीतिकरण होना चाहिए। अर्थात को समान अवसर और आर्थिक संसाधनों का समान वितरण किया जाना चाहिए ताकि अल्पसंख्यक धार्मिक लोगों में सुरक्षा का भाव बढे और वे राष्ट्र में सोचे न कि अपने समूह विशेष के बारे में |
० जिन क्षेत्रों में दंगे, लूट एवं हथियार मिलना आम हो वहाँ पिछले ट्रेंड का अध्ययन करके बचाव के उपाय अपनाने चाहिए ताकि समूह तनाव कम हो सकारात्मक उपाय जैसे- “शिक्षा तथा ऐसे प्रयास जिनसे लोगों में अन्य धर्मों के प्रति भी सम्मान व सहिष्णुता पनपे’ किए जाने चाहिए। टी वी, मीडिया, रेडियों को निर्देश देने चाहिए की ऐसी खबरों तथा विचारों को दिखाने से बचे जो धार्मिक पूर्वाग्रहों या नफरत को प्रोत्साहित करे।
शिक्षा संस्थानों व प्रतिष्ठानों के माध्यम से भी यह संदेश भेजे।
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